अन्विका जैसे ही झटके से संभलकर सीधी हुई, उसने हैरानी से सामने देखा।
कुछ ही दूरी पर कई किन्नर खड़े थे। वे सभी तालियाँ बजाते हुए नई-नवेली दुल्हन और दूल्हे को आशीर्वाद देने के लिए उनकी गाड़ी के पास आ गए थे।
मुंबई की व्यस्त सड़क पर अचानक गाड़ियों का काफिला रुक जाने से कुछ पल के लिए हलचल मच गई थी।
राठौर परिवार की सिक्योरिटी तुरंत सतर्क हो गई। आगे-पीछे चल रही एसयूवी से कई गार्ड उतरकर चारों तरफ नजर रखने लगे। उनके हाथों में आधुनिक हथियार थे और आँखें हर तरफ घूम रही थीं।
लेकिन...
अन्विका की नजर उन किन्नरों पर नहीं रुकी।
उनके बीच खड़े एक चेहरे पर जाकर ठहर गई।
एक ऐसा चेहरा...
जिसे वह अच्छी तरह पहचानती थी।
उसका दिल एक पल के लिए तेजी से धड़क उठा, लेकिन अगले ही पल उसने अपने चेहरे के भाव पूरी तरह सामान्य कर लिए। ऐसा लगा मानो उसने किसी अनजान इंसान को देखा हो।
उधर...
किन्नरों के बीच खड़ा वह व्यक्ति भी एक पल के लिए अन्विका की आँखों में देखता रहा।
फिर वह बाकी किन्नरों की तरह तालियाँ बजाता हुआ उनकी कार के बिल्कुल पास आ गया।
ठक... ठक...
उसने कार की खिड़की पर हल्के से दस्तक दी।
आगे बैठा ड्राइवर तुरंत पलटकर पीछे देखने लगा।
उसने बिना कुछ बोले रुद्रांश की तरफ देखा।
रुद्रांश ने बस हल्के से आँखों के इशारे से खिड़की खोलने का आदेश दिया।
अगले ही पल...
कार की खिड़की धीरे-धीरे नीचे सरक गई।
खिड़की खुलते ही वह किन्नर मुस्कुराया और तालियाँ बजाते हुए बोला—
"अरे बेटा..."
"इतना बड़ा शुभ मौका है।"
"नई-नई शादी हुई है..."
"हमें भी कुछ देकर भेज दो।"
"भगवान तुम दोनों की जोड़ी सलामत रखे।"
उसकी आवाज में दुआएँ थीं...
लेकिन उसकी नजर सिर्फ एक पल के लिए अन्विका से मिली।
इतना ही काफी था।
रुद्रांश ने बिना कोई भाव दिखाए अपनी जेब में हाथ डाला और अपना महंगा लेदर वॉलेट निकाल लिया।
वह कुछ पैसे निकालकर उसे देने ही वाला था...
कि उससे पहले...
अन्विका ने अपना छोटा-सा पर्स खोला।
उसने बिना एक पल गंवाए नोटों की पूरी गड्डी निकालकर उस किन्नर की तरफ बढ़ा दी।
रुद्रांश का हाथ वहीं रुक गया।
ड्राइवर भी एक पल के लिए चौंक गया।
वह किन्नर मुस्कुराते हुए नोटों की गड्डी ले लिया।
"वाह बेटी..."
"भगवान तुम्हारी हर मनोकामना पूरी करे।"
इतना कहते हुए उसने आशीर्वाद देने के बहाने अपना हाथ अन्विका के सिर पर रखा।
उसी क्षण...
उसकी उँगलियों से एक छोटी-सी मुड़ी हुई कागज की पर्ची फिसलकर अन्विका की गोद में आ गिरी।
सब कुछ इतना स्वाभाविक था...
कि किसी को जरा-सा भी शक नहीं हुआ।
अन्विका ने बिना किसी हड़बड़ाहट के अपने दूसरे हाथ से उस पर्ची को उठा लिया।
चेहरे पर मुस्कान थी...
लेकिन उसकी उँगलियाँ बेहद सावधानी से उस पर्ची को अपनी मुट्ठी में छिपा चुकी थीं।
"सदा सुहागन रहो बेटी..."
"भगवान तुम्हें हर खुशी दे..."
दुआ देते हुए वह बाकी किन्नरों के साथ धीरे-धीरे आगे बढ़ गया।
लेकिन...
रुद्रांश की नजर अब भी अन्विका पर ही थी।
उसकी आँखों में गुस्सा साफ दिखाई दे रहा था।
उसने अभी तक अपना वॉलेट हाथ में ही पकड़ा हुआ था।
कुछ सेकंड तक वह अन्विका को घूरता रहा।
फिर अचानक तीखी आवाज में बोला—
"तुम्हें अपने पैसों का बहुत घमंड है ना?"
कार के अंदर अचानक सन्नाटा छा गया।
ड्राइवर ने तुरंत अपनी नजरें सामने कर लीं।
अन्विका ने बिल्कुल शांत भाव से उसकी तरफ देखा।
उसके चेहरे पर ना गुस्सा था...
ना हैरानी।
वह बिल्कुल सामान्य आवाज में बोली—
"इसमें घमंड की क्या बात है?"
"तुम देते या मैं देती..."
"फर्क ही क्या पड़ता है?"
उसने हल्की-सी मुस्कान के साथ आगे कहा—
"वैसे भी..."
"अगर तुम्हें मेरे पैसे देने से इतनी परेशानी है..."
"तो मैं मम्मा को मना कर देती हूँ।"
"वो जो सौ करोड़ रुपये देने वाली हैं..."
"वो भी मत दें।"
उसकी बात पूरी होते ही...
रुद्रांश का चेहरा तमतमा उठा।
उसकी उँगलियाँ वॉलेट पर कस गईं।
एक पल के लिए ऐसा लगा जैसे वह कुछ बहुत कठोर बोल देगा।
लेकिन...
अगले ही पल उसने खुद को रोक लिया।
इतने लोगों के सामने...
और कार में बैठे-बैठे...
वह कोई तमाशा नहीं करना चाहता था।
उसने गुस्से में दाँत भींचे।
फिर बिना अन्विका की तरफ देखे ड्राइवर से कहा—
"गाड़ी बढ़ाओ।"
"जी सर।"
ड्राइवर ने तुरंत कार आगे बढ़ा दी।
उधर...
कार के चलने से पहले अन्विका ने एक बार फिर शीशे से बाहर देखा।
वह किन्नर अभी भी वहीं खड़ा था।
उसने बहुत हल्के से सिर झुकाकर इशारा किया।
अन्विका ने बिना कोई भाव बदले अपनी मुट्ठी खोली।
उस छोटी-सी पर्ची को बेहद सावधानी से अपने लहंगे में बनी गुप्त जेब के अंदर रख लिया।
सब कुछ इतनी सफाई से हुआ...
कि रुद्रांश तक को कुछ पता नहीं चला।
दूसरी तरफ...
रुद्रांश ने गुस्से में अपना वॉलेट सीट पर फेंक दिया।
फिर अपने दूसरे हाथ को हल्के-हल्के मलने लगा।
उसके चेहरे पर झुंझलाहट साफ दिखाई दे रही थी।
वह मन ही मन बड़बड़ाया—
"पता नहीं पापा को क्या जरूरत थी..."
"इलेक्शन के लिए मल्होत्रा फैमिली से पैसे लेने की..."
"अब जिंदगी भर ये मुझे ऐसे ही ताने मारेगी..."
उधर...
अन्विका खिड़की से बाहर देख रही थी।
लेकिन उसके होंठों के किनारों पर बेहद हल्की मुस्कान उभर आई थी।
उसके मिशन का पहला कदम...
बिना किसी परेशानी के पूरा हो चुका था।
कार अब मुंबई की चौड़ी सड़कों को छोड़कर एक शांत और बेहद पॉश इलाके की तरफ बढ़ रही थी।
दोनों तरफ आलीशान बंगलों की लंबी कतारें थीं।
ऊँचे-ऊँचे पेड़ों के बीच से गुजरती सड़कें...
और हर मोड़ पर कड़ी सुरक्षा।
करीब बीस मिनट बाद...
रुद्रांश की कार की रफ्तार धीरे होने लगी।
अन्विका ने खिड़की से बाहर देखा।
सामने दूर तक फैला हुआ एक विशाल काला लोहे का गेट दिखाई दे रहा था।
गेट इतना ऊँचा था कि किसी किले के प्रवेश द्वार जैसा लगता था।
उस पर सुनहरे अक्षरों में लिखा था—
"राठौर मेंशन"
गेट के दोनों तरफ हथियारों से लैस कई गार्ड तैनात थे।
उन्होंने जैसे ही रुद्रांश की कार देखी...
तुरंत सावधान की मुद्रा में खड़े हो गए।
अगले ही पल...
भारी-भरकम लोहे का गेट धीरे-धीरे खुलने लगा।
राठौर परिवार का पूरा काफिला एक-एक करके विशाल लोहे के गेट के अंदर प्रवेश करने लगा।
जैसे ही कार अंदर पहुँची...
अन्विका की नज़रें चारों तरफ घूमने लगीं।
उसकी आँखें किसी नई दुल्हन की तरह अपने नए घर को नहीं...
बल्कि एक ऐसे इंसान की तरह हर छोटी-बड़ी चीज़ को देख रही थीं, जो किसी खास मकसद से वहाँ आया हो।
गेट के अंदर का नज़ारा किसी आलीशान महल से कम नहीं था।
दोनों तरफ दूर-दूर तक फैले हरे-भरे लॉन थे। घास इतनी करीने से कटी हुई थी कि मानो हरे रंग का मखमली कालीन बिछा हो।
बीचों-बीच सफेद संगमरमर से बना एक विशाल फाउंटेन था।
उसमें से ऊपर उठती पानी की धाराएँ सुबह की धूप में इंद्रधनुष जैसी चमक रही थीं।
फाउंटेन के चारों ओर विदेशी फूलों की कतारें लगी थीं, जिनकी हल्की खुशबू पूरे वातावरण में घुली हुई थी।
कार धीरे-धीरे आगे बढ़ रही थी।
अन्विका की नज़र अब दाईं ओर गई।
वहाँ एक बहुत बड़ा खुला बैठकखाना बना हुआ था।
लकड़ी की भारी-भरकम कुर्सियाँ, संगमरमर की मेज़ें और ऊपर ऊँची छत...
सब कुछ यह बता रहा था कि यशवर्धन राठौर अक्सर यहीं बैठकर लोगों से मुलाकात करते होंगे।
लेकिन...
जिस चीज़ ने सबसे ज़्यादा अन्विका का ध्यान खींचा...
वो थी सुरक्षा व्यवस्था।
हर कोने में सीसीटीवी कैमरे लगे हुए थे।
छतों पर स्नाइपर तैनात थे।
लॉन में कई हथियारबंद गार्ड गश्त लगा रहे थे।
कुछ गार्डों के हाथों में आधुनिक राइफलें थीं।
अन्विका बिना पलक झपकाए सब कुछ देख रही थी।
"चार कैमरे मुख्य गेट पर..."
"दो फाउंटेन के पास..."
"छत पर स्नाइपर..."
"मुख्य प्रवेश द्वार पर आठ गार्ड..."
वह मन ही मन हर जानकारी याद करती जा रही थी।
कुछ ही क्षण बाद...
कार विशाल इमारत के सामने जाकर रुक गई।
अन्विका ने शीशे से बाहर देखा...
और कुछ पल के लिए उसकी नज़र उसी पर टिक गई।
सामने सफेद संगमरमर से बना तीन मंज़िला भव्य मेंशन खड़ा था।
ऊँचे-ऊँचे स्तंभ...
विशाल बालकनियाँ...
काँच की बड़ी-बड़ी खिड़कियाँ...
और मुख्य द्वार तक जाती चौड़ी संगमरमर की सीढ़ियाँ...
पूरा भवन किसी शाही महल जैसा दिखाई दे रहा था।
उसकी भव्यता साफ बता रही थी कि राठौर परिवार सिर्फ राजनीति में ही नहीं...
दौलत और रुतबे में भी किसी से कम नहीं था।
तभी दूसरी कार से उतरकर चंचल मुस्कुराते हुए उनकी कार के पास आई।
ड्राइवर तुरंत उतरकर पीछे का दरवाज़ा खोलने ही वाला था कि चंचल ने हाथ उठाकर उसे रोक दिया।
वह खिड़की के पास आई और मुस्कुराकर बोली—
"तुम दोनों यहीं रुको।"
"मैं मम्मी जी को लेकर आती हूँ।"
"जब तक गृहप्रवेश नहीं हो जाता..."
"तब तक तुम दोनों अंदर नहीं जा सकते।"
उसकी बात सुनते ही रुद्रांश ने झुँझलाकर गहरी साँस ली।
"भाभी..."
"जो करना है जल्दी कीजिए।"
"अब ये सब रस्में मेरी बर्दाश्त के बाहर हैं।"
चंचल ने शरारत से उसकी तरफ देखा।
फिर हँसते हुए बोली—
"अरे भैया..."
"मैं चाहे जितनी जल्दी कर लूँ..."
"सुहागरात तो आपको रात में ही मनानी पड़ेगी।"
"उसमें मैं क्या कर सकती हूँ?"
"सुहागरात" शब्द सुनते ही...
आगे बैठा शेखर ज़ोर से खाँसने लगा।
"खँ... खँ..."
उसका चेहरा लाल पड़ गया।
पीछे बैठी अन्विका का दिल एक पल के लिए बैठ गया।
उसकी उँगलियाँ अनजाने में कस गईं।
वहीं...
रुद्रांश के चेहरे पर कोई भाव नहीं आया।
वह वैसे ही मोबाइल स्क्रीन पर नज़रें गड़ाए बैठा रहा।
चंचल ने शेखर के सिर पर हल्की-सी चपत लगाई।
"तुझे क्या हुआ?"
"तेरी सुहागरात तो अभी बहुत दूर है।"
"चल..."
"आकर मेरी मदद कर।"
बेचारा शेखर बिना कुछ बोले कार से उतर गया।
दोनों हँसते हुए अंदर चले गए।
अब कार में सिर्फ तीन लोग थे—
रुद्रांश...
अन्विका...
और ड्राइवर।
कार के अंदर फिर से खामोशी फैल गई।
रुद्रांश पूरी तरह अपने मोबाइल में व्यस्त था।
उसके चेहरे पर कोई भाव नहीं था।
मानो उसके बगल में बैठी लड़की उसकी पत्नी नहीं...
बल्कि कोई अजनबी हो।
उधर...
अन्विका की नज़रें लगातार बाहर घूम रही थीं।
वह मेंशन के हर हिस्से को गौर से देख रही थी।
कहाँ कैमरा लगा है...
कहाँ गार्ड खड़े हैं...
किस तरफ आने-जाने का रास्ता है...
कुछ भी उसकी नज़रों से नहीं बच रहा था।
करीब पाँच मिनट बाद...
मेंशन का मुख्य दरवाज़ा खुला।
चंचल वापस बाहर आई।
उसके साथ लगभग पचपन वर्ष की एक गरिमामयी महिला थीं।
हल्के रंग की रेशमी साड़ी...
माथे पर बड़ी लाल बिंदी...
गले में मंगलसूत्र...
और चेहरे पर अपनापन।
उनके हाथ में आरती की थाल थी।
चंचल के हाथ में आलते की थाली थी।
जबकि शेखर एक कलश लेकर उनके पीछे चल रहा था।
तीनों मुख्य चौखट के पास आकर रुक गए।
ड्राइवर तुरंत आगे बढ़ा और कार का दरवाज़ा खोल दिया।
अन्विका बाहर उतरने ही वाली थी...
कि उस महिला ने हाथ उठाकर उसे रोक दिया।
"रुको बेटा..."
उन्होंने पहले पानी से भरा लोटा उठाया।
धीरे-धीरे उसे रुद्रांश और अन्विका के ऊपर से घुमाया।
फिर पानी चौखट के बाहर उड़ेल दिया।
उसके बाद मुस्कुराकर बोलीं—
"अब उतर जाओ।"
अन्विका धीरे से कार से नीचे उतरी।
उसी समय चंचल मुस्कुराकर बोली—
"देवरानी जी..."
"ये आपकी सासू माँ हैं।"
"पहले इनके चरण स्पर्श कीजिए।"
बिना कुछ कहे...
अन्विका झुक गई।
उसने आदर से दुर्गा देवी के चरण छू लिए।
दुर्गा देवी ने स्नेह से उसके सिर पर हाथ रख दिया।
फिर उनकी नज़र रुद्रांश पर गई।
वह अब भी मोबाइल में व्यस्त था।
उन्होंने बिना कुछ कहे उसके हाथ से मोबाइल छीन लिया।
"तुझे अलग से कहना पड़ेगा क्या?"
रुद्रांश ने हल्की-सी मुस्कान दबाई।
फिर बिना बहस किए झुककर अपनी माँ के पैर छू लिए।
यह दृश्य देखकर...
अन्विका सचमुच हैरान रह गई।
जिस इंसान की एक आवाज़ से लोग काँपते थे...
वह अपनी माँ के सामने बिल्कुल शांत खड़ा था।
दुर्गा देवी ने दोनों के सिर पर हाथ रखा।
"खुश रहो..."
"सदा सुहागन रहो।"
ये शब्द सुनते ही...
अन्विका की मुट्ठी अनजाने में कस गई।
लेकिन अगले ही पल उसने अपने चेहरे पर मुस्कान वापस ला दी।
दुर्गा देवी ने दोनों की आरती उतारी।
उनके माथे पर तिलक लगाया।
फिर चंचल ने कलश चौखट पर रख दिया।
"देवरानी जी..."
"इस कलश को धीरे से पैर से आगे बढ़ाइए।"
अन्विका ने बिना कुछ बोले हल्के से अपने दाएँ पैर से कलश को आगे बढ़ाया।
चावल चौखट पर बिखर गए।
इसके बाद उसने आलते की थाली में अपने पैर रखे।
लाल रंग उसके पैरों पर चढ़ गया।
धीरे-धीरे वह चौखट पार करके मेंशन के अंदर दाखिल हुई।
सफेद संगमरमर के फर्श पर उसके लाल पदचिह्न बनते चले गए।
वह चलते हुए पूरे हॉल को ध्यान से देख रही थी।
विशाल झूमर...
महँगे पेंटिंग...
ऊँची छत...
और हर कोने में शाही ठाठ।
उसी समय...
रुद्रांश बिना इधर-उधर देखे सीधे सीढ़ियों की तरफ बढ़ने लगा।
तभी पीछे से दुर्गा देवी की आवाज़ आई—
"रुद्र..."
"अभी बहुत-सी रस्में बाकी हैं।"
"उन्हें पूरा करके जाना।"
रुद्रांश ने थके हुए स्वर में पलटकर कहा—
"मॉम प्लीज़..."
"मैं बहुत थक गया हूँ।"
"थोड़ा आराम करना चाहता हूँ।"
दुर्गा देवी कुछ कह पातीं...
उससे पहले ऊपर सीढ़ियों से यशवर्धन राठौर उतरते दिखाई दिए।
उन्होंने गंभीर आवाज़ में कहा—
"सुना नहीं तुमने?"
"तुम्हारी माँ क्या कह रही हैं।"
"पहले सारी रस्में पूरी करो।"
"उसके बाद मेरे कमरे में आना।"
"मुझे तुमसे कुछ ज़रूरी बात करनी है।"
बस...
इतना सुनना था कि रुद्रांश बिना एक शब्द बोले चुपचाप वहीं खड़ा हो गया।
यह देखकर अन्विका की आँखों में आश्चर्य साफ दिखाई दिया।
"कमाल है..."
"अपने पिता की सिर्फ एक आवाज़..."
"और रुद्रांश बिल्कुल शांत..."
कुछ देर बाद...
दुर्गा देवी और चंचल ने मिलकर बाकी सभी रस्में भी पूरी करवाईं।
रस्में समाप्त होते ही...
रुद्रांश बिना किसी से कुछ कहे तेज़ी से सीढ़ियाँ चढ़ता हुआ ऊपर चला गया।
सीधे अपने पिता के कमरे की ओर।
अन्विका अब भी हॉल में खड़ी थी।
तभी दुर्गा देवी ने चंचल की तरफ देखकर कहा—
"चंचल बहू..."
"छोटी बहू को उसका कमरा दिखा दो।"
"बेचारी रात भर से थकी हुई है।"
"मैं खाना ऊपर ही भिजवा देती हूँ।"
"खाना खाकर थोड़ा आराम कर लेगी।"
"शाम को रिसेप्शन भी है..."
"उसे तैयार भी होना होगा।"
चंचल मुस्कुराई।
"जी मम्मी जी।"
फिर उसने शरारत भरी मुस्कान के साथ अन्विका की तरफ देखा।
"आइए देवरानी जी..."
"आपको आपके 'ऐ–जी-ओ-जी' का कमरा दिखा दूँ।"
उसकी बात सुनकर आसपास खड़े लोग हल्का-सा मुस्कुरा दिए।
अन्विका ने भी औपचारिक मुस्कान दे दी।
दोनों धीरे-धीरे सीढ़ियाँ चढ़ने लगीं।
हर सीढ़ी के साथ...
अन्विका का दिल और मजबूत होता जा रहा था।
उसने मन ही मन कहा—
"आज का रिसेप्शन..."
"आप सब ज़िंदगी भर याद रखेंगे..."
"ये मेरा वादा है..."
अगले ही पल...
उसके होंठों पर एक बेहद खतरनाक मुस्कान उभर आई।
वह मुस्कान...
जो आने वाले तूफ़ान का इशारा कर रही थी।
🌙 Chapter ending lines:
किन्नर के भेष में अन्विका से मिलने वाला वह रहस्यमयी व्यक्ति आखिर कौन था?
उस छोटी-सी पर्ची में ऐसा क्या लिखा था, जिसके लिए उसने राठौर परिवार की कड़ी सुरक्षा के बीच अपनी जान तक जोखिम में डाल दी?
क्या रुद्रांश को अन्विका की इस गुप्त चाल की भनक लग जाएगी...
या फिर राठौर मेंशन में शुरू होने वाला खेल उसके सोच से भी ज़्यादा खतरनाक होगा?
और सबसे बड़ा सवाल...
आखिर आज की रिसेप्शन पार्टी में ऐसा क्या होने वाला है, जिसकी चेतावनी अन्विका ने अपने मन ही मन पहले ही दे दी है?
To Be Continued...
❤️ Dear Lovely Readers ❤️
अगर आपको आज का चैप्टर पसंद आया हो, तो कृपया अपना Like ❤️, Comment 💬, Follow ⭐, Share 📲 और Review 📝 देना बिल्कुल मत भूलिए।
आपका हर एक कमेंट मुझे अगला चैप्टर और भी बेहतर लिखने की प्रेरणा देता है।
बताइए—
आपको सबसे ज़्यादा कौन-सा सीन पसंद आया?
किन्नर के भेष में आया वो रहस्यमयी इंसान आखिर कौन हो सकता है?
उस पर्ची में क्या लिखा होगा?
और आपको क्या लगता है... रिसेप्शन पार्टी में अन्विका क्या करने वाली है?
मैं आपके हर थ्योरी और हर कमेंट का इंतज़ार करूँगी। ❤️