मार्गशीर्ष का महीना जब भी आता है, मेरी स्मृतियों के आँगन में हल्दी के पत्तों की वह सोंधी खुशबू तैरने लगती है। बचपन से लेकर शादी से पहले तक, यह महीना मेरे लिए किसी उत्सव से कम नहीं था। घर की पहली संतान होने के नाते, प्रथमाष्टमी के दिन मुझे जो 'राजकुमारी' वाला ट्रीटमेंट मिलता था, उसकी मिठास आज भी मेरे मन में रची-बसी है।
मुझे याद है, इस दिन सुबह से ही घर में एक अलग सी चहल-पहल होती थी। मामा के यहाँ से आया हुआ 'मामुघर भार' जब खुलता, तो उसमें मेरे लिए रखे नए-नवेले रेशमी कपड़े, मिठाइयाँ, नारियल, गुड़ और उरद की दाल देखकर मेरा बाल-मन गर्व से भर उठता था। माँ और दादी मुझे नए कपड़े पहनाकर पीढ़े पर बिठातीं, अक्षत और दूर्वा से मेरी आरती उतारतीं और सिर पर हाथ रखकर ढेर सारा प्यार और आशीर्वाद देतीं। उस दिन पूरे घर का केंद्र सिर्फ़ मैं होती थी—सबकी लाडली 'पढ़ुआँ'।
रसोई से आती 'एंडुरी पीठा' की खुशबू पूरे घर को महका देती। हल्दी के पत्तों में लिपटी वह भाप, मानो सिर्फ़ स्वाद नहीं, बल्कि मेरे ननिहाल के दुलार और माँ की ममता की खुशबू समेटे होती थी। यहाँ तक कि पुरी के श्रीमंदिर में जगन्नाथ महाप्रभु को भी जब अपने ननिहाल से वस्त्र मिलते थे, तो मुझे लगता था जैसे यह पर्व मुझे सीधे ईश्वर के उस दिव्य स्नेह से जोड़ रहा है।
लेकिन अब मेरी शादी हो चुकी है...
मार्गशीर्ष का यह महीना फिर से दस्तक देने वाला है, पर इस बार माहौल बदला हुआ है। अब मैं उस घर की 'राजकुमारी' से ज़्यादा, इस घर की बहू और गृहिणी हूँ। अब कोई सुबह-सुबह मेरी आरती उतारने के लिए थाली सजाकर इंतज़ार नहीं करता। अब हल्दी के पत्तों की वह खुशबू मुझे माँ की रसोई की याद दिलाकर आँखें नम कर देती है।
आज भी जब मामा के घर से 'अष्टमी भार' के रूप में नए कपड़े आते हैं, तो वे सिर्फ़ उपहार नहीं होते; वे उस लाड-प्यार का लिफ़ाफ़ा होते हैं जो समय और दूरी के बंधनों से परे आज भी मेरे लिए वैसा ही है। अब मैं समझती हूँ कि 'पढ़ुआँ' होना केवल एक दिन का शहज़ादी जैसा अहसास नहीं था, बल्कि वह यह अहसास कराने का तरीका था कि चाहे मैं कितनी भी बड़ी हो जाऊँ, अपनों के लिए आज भी वही पहली खुशी हूँ।
इस बार प्रथमाष्टमी पर जब मैं खुद अपने हाथों से एंडुरी पीठा बनाऊँगी, तो उस हल्दी के पत्ते को मोड़ते हुए मैं सिर्फ़ एक पकवान नहीं बनाऊँगी, बल्कि अपने बचपन, अपने ननिहाल के स्नेह और उन सुनहरे दिनों को फिर से जीने की कोशिश करूँगी।
जब मैं प्रथमाष्टमी की पौराणिक कथाओं में गहराई से उतरती हूँ, तो श्रीमंदिर का दृश्य मेरी आँखों के सामने जीवंत हो उठता है। शास्त्रों में तो प्रभु बलभद्र (बलराम जी) ही सबसे बड़े भ्राता हैं, और नियमानुसार वही ज्येष्ठ संतान हैं। लेकिन हमारी जगन्नाथ संस्कृति इतनी उदार और भावुक है कि यहाँ महाप्रभु बलभद्र के साथ-साथ स्वयं महाप्रभु जगन्नाथ को भी 'पढ़ुआँ' कराया जाता है। जगन्नाथ जी को संपूर्ण संसार का स्वामी और इस राष्ट्र का राजा माना गया है, इसलिए भक्त उन्हें भी अपने ज्येष्ठ रूप में पूजते हैं।
प्रथमाष्टमी के दिन, पुरी से दूर नियाली के पास स्थित 'कांतपुर' (शोभनेश्वर) से — जिसे प्रभु का ननिहाल माना जाता है — महाप्रभु के लिए विशेष 'मामुघर भार' (उपहार) आता है। उस भार में दोनों भाइयों और बहन सुभद्रा के लिए रेशमी नए वस्त्र ('खंडुआ पाटा'), ताज़े फल, उरद दाल, गुड़, नारियल और विशेष रूप से सुगंधित हल्दी के पत्ते भेजे जाते हैं।
गर्भगृह में जब प्रभु बलभद्र और महाप्रभु जगन्नाथ अपने ननिहाल से आए नए परिधान धारण करते हैं, तो ऐसा लगता है मानो ईश्वर स्वयं इंसानी रिश्तों की मिठास को अंगीकार कर रहे हैं। उन्हें नए वस्त्रों में सजाकर, आरती उतारी जाती है और हल्दी के पत्तों में बनी विशेष 'एंडुरी पीठा' का भोग लगाया जाता है।
जब मैं यह सोचती हूँ कि जिस परंपरा को मैं अपने घर के आँगन में जीती आई हूँ, वही परंपरा सदियों से श्रीमंदिर के गर्भगृह में रची-बसी है, तो मेरा मन एक अजीब से गर्व से भर जाता है। शादी के बाद भले ही मेरे लिए दिन बदल गए हों, लेकिन यह अहसास आज भी वही है — कि रिश्तों का यह दुलार केवल इंसानों का नहीं, बल्कि स्वयं ईश्वर का भी पसंदीदा अनुभव है।
1. ज्येष्ठ संतान की मंगल कामना और 'पढ़ुआँ' की परंपरा:
घर की सबसे पहली संतान — चाहे वह बेटा हो या बेटी — सिर्फ एक बच्चा नहीं, बल्कि पूरे परिवार की उम्मीदों का पहला अंकुर होती है। मार्गशीर्ष (अगहन) महीने की कृष्ण पक्ष की अष्टमी को मनाया जाने वाला 'प्रथमाष्टमी' पर्व इसी ज्येष्ठ संतान की लंबी उम्र, अच्छी सेहत और सुख-समृद्धि की मंगल कामना को समर्पित है। इस विशेष दिन प्रथम संतान को प्यार और आदर से 'पढ़ुआँ' कहा जाता है। घर की बुजुर्ग और वरिष्ठ महिलाएँ (माताएँ और दादियाँ) नए वस्त्र पहने उस बच्चे की आरती उतारती हैं, अक्षत-पुष्प से उसका वंदन करती हैं और हृदय से स्नेह का आशीर्वाद देती हैं।
2. ननिहाल का स्नेह और 'मामुघर भार' की महत्ता:
संस्कृति और पारिवारिक रिश्तों का सुंदर ताना-बाना इस पर्व में साफ झलकता है। प्रथमाष्टमी पर 'पढ़ुआँ' संतान के लिए नए कपड़े, मिठाइयाँ और विशेष पकवान बनाने की सामग्री — जैसे चावल, उरद दाल, गुड़ और नारियल — उसके ननिहाल (मामा के घर) से आती है। ननिहाल से आए इस प्रेमपूर्ण उपहार को पारंपरिक भाषा में 'अष्टमी भार' या 'मामुघर भार' (मामा के घर का उपहार) कहा जाता है। यह परंपरा मामा और भांजे-भांजी के अटूट और स्नेही रिश्ते को उत्सव का रूप देती है।
3. 'एंडुरी पीठा' और हल्दी के पत्तों की महक:
इस पर्व का सबसे स्वादिष्ट और मुख्य आकर्षण है पारंपरिक पकवान — 'एंडुरी पीठा'। यह सिर्फ एक पकवान नहीं, बल्कि स्वाद और स्वास्थ्य का अनोखा संगम है। उरद दाल और चावल के घोल में नारियल और गुड़ का मिश्रण भरकर, इसे हल्दी के हरे पत्तों में लपेटकर भाप (Steam) में पकाया जाता है। जब हल्दी के पत्तों में लिपटा पीठा पकता है, तो उसकी सोंधी सुगंध पूरे घर में महक उठती है। हल्दी के पत्तों की यह भीतरी सुगंध न सिर्फ पीठे का स्वाद बढ़ाती है, बल्कि इसके औषधीय गुण स्वास्थ्य के लिए भी अत्यंत लाभकारी माने जाते हैं।
4. पौराणिक मान्यता और श्रीमंदिर की परंपरा:
प्रथमाष्टमी का धार्मिक और पौराणिक महत्व केवल जनसाधारण तक सीमित नहीं है, बल्कि इसका सीधा संबंध स्वयं जगन्नाथ संस्कृति से है। पुरी के प्रसिद्ध श्रीमंदिर में मान्यता है कि भगवान श्री जगन्नाथ भी अपने दाऊ (ज्येष्ठ भ्राता) बलभद्र के साथ जेठ संतान के रूप में इस दिन नए वस्त्र धारण करते हैं। प्रभु को भी 'पढ़ुआँ' कराया जाता है और परंपरा के अनुसार उनके ननिहाल (नियाली के पास कांतपुर स्थित माधव मंदिर) से प्रभु के लिए विशेष 'अष्टमी भार' और उपहार आते हैं।
श्रीमंदिर की यह कथा मुझे सिखाती है कि रिश्ते और परंपराएँ समय या दूरी से कभी ख़त्म नहीं होते। आज शादी के बाद, जब मैं अपनी रसोई में हल्दी के पत्तों में पीठा बनाती हूँ, तो भाप के साथ उड़ती हुई वह सोंधी महक मुझे मेरे मायके और ननिहाल से जोड़े रखती है।
शायद 'पढ़ुआँ' होना सिर्फ़ एक दिन राजकुमारी की तरह सजने का नाम नहीं था... यह तो इस बात का ताउम्र अहसास है कि दुनिया चाहे कितनी भी बदल जाए, अपने अपनों के दिल में मेरी जगह हमेशा वही पहली खुशी वाली रहेगी। और इसी मीठी आस के साथ, मैं हर साल मार्गशीर्ष के इस पावन महीने का इंतज़ार करती हूँ।
आज जब मैं बहू के रूप में अपनी रसोई में यह पीठा बनाती हूँ, तो महसूस करती हूँ कि 'पढ़ुआँ' केवल एक व्यक्ति नहीं, बल्कि पीढ़ियों से चली आ रही प्रेम और समर्पण की वह ज्योति है, जो मायके और ससुराल दोनों को एक साथ रोशन करती है।