Jab Rishta pyaar ban jaye - 16 in Hindi Love Stories by Priyam Gupta books and stories PDF | जब रिश्ता प्यार बन जाए. - 16

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जब रिश्ता प्यार बन जाए. - 16

Episode 16 – पहली औपचारिक मुलाक़ात 




कुछ मुलाक़ातें
सिर्फ़ लोगों की नहीं होतीं,
वे दो परिवारों की सोच,
दो परवरिशों
और दो उम्मीदों की भी होती हैं।
और उस दिन
यही होने वाला था।
सुबह से ही
घर में एक हल्की-सी हलचल थी।
शोर नहीं था,
पर हर चीज़
कुछ ज़्यादा ध्यान से की जा रही थी।
परदे ठीक से लगाए जा रहे थे,
सोफे के कुशन
दो-तीन बार सीधा किए जा रहे थे।
रसोई से
इलायची वाली चाय की खुशबू
धीरे-धीरे बाहर आ रही थी।
Priyam अपने कमरे में थी।
आईने के सामने खड़ी,
सादा-सा सूट पहने।
कोई भारी गहने नहीं,
कोई ज़्यादा सजावट नहीं।
बस वही
जो वह रोज़ होती है—
थोड़ी सुलझी,
थोड़ी सोच में डूबी।
आईने में खुद को देखते हुए
उसने गहरी साँस ली।
उसकी आँखों में
डर नहीं था,
पर हल्की-सी गंभीरता थी।
“आज कोई इम्तिहान नहीं है,”
उसने खुद से कहा।
“आज कोई फैसला नहीं सुनाया जाएगा।
बस लोग मिलेंगे…
और बातें होंगी।”
उसने खुद को
धीरे-धीरे समझाया।
माँ कमरे में आईं।
“तैयार हो?”
उन्होंने प्यार से पूछा।
Priyam ने सिर हिलाया।
माँ ने उसके कंधे पर
हल्का-सा हाथ रखा।
“जो तुम हो,
वही रहना,”
उन्होंने कहा।
“किसी को खुश करने के लिए
खुद को बदलने की ज़रूरत नहीं।”
Priyam ने
हल्की-सी मुस्कान के साथ
सिर झुका दिया।
उस पल
उसे लगा
कि वह सच में अकेली नहीं है।
थोड़ी देर बाद
डोरबेल बजी।
घर में
एक पल के लिए
सन्नाटा छा गया।
जैसे सबकी साँस
एक साथ रुक गई हो।
फिर आवाज़ें आईं।
दरवाज़ा खुला।
Yaman अपने माता-पिता के साथ
अंदर आया।
सफेद शर्ट,
सादा-सा पहनावा।
उसका चेहरा शांत था,
पर आँखों में
ध्यान था।
उसकी नज़र
एक पल के लिए
Priyam पर गई।
ना चौंकना,
ना घबराना।
बस
एक हल्की-सी पहचान।
जैसे वह सोच रहा हो—
“हाँ…
यही है।”
Priyam ने भी
उसी शांति से
नज़र मिलाई।
कोई जल्दबाज़ी नहीं,
कोई झिझक नहीं।
ड्रॉइंग रूम में
सब बैठ गए।
शुरुआती बातें
वही थीं—
हालचाल,
यात्रा कैसी रही,
मौसम।
लेकिन बातचीत में
कोई बनावट नहीं थी।
Yaman के पापा
कम बोल रहे थे,
ज़्यादा सुन रहे थे।
उनकी आँखें
सब कुछ नोटिस कर रही थीं।
Yaman की माँ की आवाज़ में
एक अपनापन था।
Priyam के माता-पिता
भी सहज थे।
किसी को
किसी से ऊपर
खुद को साबित नहीं करना था।
कुछ देर बाद
Yaman की माँ ने कहा—
“अगर आपको ठीक लगे,
तो Yaman और Priyam
थोड़ी देर
आपस में बात कर लें।”
कमरे में
कोई असहजता नहीं आई।
सबको लगा
यही सही है।
Priyam और Yaman
धीरे-धीरे
बालकनी की तरफ़ चले गए।
बाहर
हल्की हवा चल रही थी।
नीचे सड़क पर
लोगों की आवाज़ें थीं,
पर ऊपर
एक सुकून था।
कुछ पल
दोनों चुप रहे।
यह चुप्पी
अजीब नहीं थी।
यह वो चुप्पी थी
जिसमें डर नहीं होता।
फिर Yaman ने पूछा—
“आप ठीक हैं?”
Priyam ने
हल्की-सी मुस्कान के साथ
सिर हिलाया।
“हाँ।
आज…
अजीब तरह से शांत हूँ।”
Yaman ने भी
धीरे से कहा—
“मुझे भी
कुछ वैसा ही लग रहा है।”
Priyam ने नीचे देखा।
“आपको कभी लगता है
कि आज सब
बहुत जल्दी हो रहा है?”
Yaman ने बिना रुके कहा—
“नहीं।
मुझे लगता है
आज वही हो रहा है
जिसके लिए
हम दोनों
धीरे-धीरे तैयार हुए हैं।”
उसकी आवाज़ में
कोई दावा नहीं था।
बस यकीन था।
Priyam ने
पहली बार
सीधे उसकी तरफ़ देखा।
“अगर आज के बाद
चीज़ें आगे बढ़ें…”
उसने धीरे से कहा,
“तो क्या आप
वही रहेंगे
जो अभी हैं?”
Yaman ने
पूरी गंभीरता से
उसकी आँखों में देखा।
“और आप?”
उसने पूछा।
Priyam के होंठों पर
हल्की-सी हँसी आ गई।
“मैं भी।”
Yaman ने कहा—
“तो फिर
मुझे डर नहीं लगता।”
उस एक वाक्य में
किसी वादे का बोझ नहीं था।
बस साथ चलने की बात थी।
अंदर से
चाय की आवाज़ आई।
दोनों एक साथ
मुड़े।
इस बार
कदमों में
कोई हिचक नहीं थी।
बैठक के आख़िरी हिस्से में
Yaman के पापा ने कहा—
“हमें लगता है
बच्चों को
एक-दूसरे को समझने का
पूरा मौका मिला है।”
Priyam के पापा ने
धीरे-से सिर हिलाया।
“और हमें भी
ऐसा ही लगता है।”
कमरे में
कोई तालियाँ नहीं बजीं,
कोई घोषणा नहीं हुई।
बस
एक शांत सहमति थी।
जाते वक़्त
Yaman की माँ ने
Priyam का हाथ थाम लिया।
“तुम बहुत सुलझी हुई लड़की हो,”
उन्होंने कहा।
“हमें अच्छा लगा।”
Priyam ने
आँखों में भरोसा लेकर
सिर झुका दिया।
उस पल
उसे लगा
कि वह इस घर से
बिल्कुल खाली हाथ नहीं जा रही।
दरवाज़ा बंद हुआ।
घर अचानक
खामोश हो गया।
Priyam वहीं खड़ी रही।
माँ ने पास आकर पूछा—
“कैसा लगा?”
Priyam ने बिना सोचे कहा—
“ठीक…
और सच्चा।”
रात को
Yaman का मैसेज आया।
आज का दिन
मेरे लिए बहुत मायने रखता है।
Priyam ने जवाब दिया—
मेरे लिए भी।
आज सब कुछ
जैसा होना चाहिए था,
वैसा ही लगा।
कुछ देर बाद—
अब आगे
हम साथ चलेंगे।
Priyam ने फोन रखा।
उसके चेहरे पर
एक गहरी,
शांत मुस्कान थी।