Naagbandhan in English Horror Stories by Simran books and stories PDF | नागबंधन: मुक्ति का श्राप - 3

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नागबंधन: मुक्ति का श्राप - 3

खौफनाक रात के बाद की सुबह उम्मीद से कहीं ज़्यादा उजली थी। 
रात भर की मूसलाधार बारिश ने हवा को बिल्कुल साफ़ कर दिया था। जब शिवांशी की आँख खुली, तो सूरज की किरणें खिड़की के काँच से छनकर उसके चेहरे पर पड़ रही थीं। कल रात का वह खौफ, वह विशाल परछाईं और साँप—दिन के उजाले में सब कुछ किसी धुंधली याद जैसा लग रहा था। शिवांशी ने एक गहरी साँस ली। वह महादेव की अनन्य भक्त थी, और उसका अटूट विश्वास था कि जहाँ शिव का वास है, वहाँ अमंगल नहीं हो सकता। फिर भी, वह सपना और वे घटनाएँ उसके मन के किसी कोने में उलझी हुई थीं। वह खुद को बार-बार समझा रही थी कि यह सिर्फ नई जगह का असर है, लेकिन उलझन अभी भी बनी थी।

घर में नीचे से आती शोर-शराबे की आवाज़ों ने उसे अहसास कराया कि वह अकेले नहीं है। उसका परिवार बहुत बड़ा था—पापा, मम्मी, दादी और तीन चाचा-चाची अपने आठ बच्चों के साथ। इतने बड़े परिवार के साथ सन्नाटा ज़्यादा देर तक टिक नहीं सकता था। रसोई से आती मसालों की महक और बच्चों के भागने की धमक ने घर को जीवन से भर दिया था।
दोपहर होते-होते, शिवांशी अपने सभी भाई-बहनों के साथ घर की सबसे ऊपरी छत पर पहुँच गई।
यह तीन मंज़िला बंगला शहर की सीमा से काफी बाहर था। यहाँ से दूर-दूर तक कोई पड़ोस या दूसरी इमारतें नहीं थीं। छत के एक तरफ से केवल ऊँचे पेड़ और झाड़ियाँ दिखती थीं, और दूसरी तरफ वह गहरा, रहस्यमयी जंगल। घर के पीछे की ज़मीन बिल्कुल खाली थी, जहाँ सूखी घास और बारिश के बाद जमी काई की महक आ रही थी। दूर-दूर तक कोई इंसानी बस्ती नहीं थी, बस प्रकृति का अनगढ़ विस्तार था।
छत पर इस वक्त आठों बच्चों और शिवांशी के बीच जबरदस्त धमाचौकड़ी मची थी। कोई क्रिकेट खेलने की ज़िद कर रहा था, तो कोई पकड़म-पकड़ाई में भाग रहा था।
“दीदी! संभल के, वरना आप आउट हो जाओगी!” सबसे छोटे भाई आर्यन ने ज़ोर से चिल्लाते हुए कहा।
शिवांशी हँस रही थी। इतनी खुलकर, इतनी बेफ़िक्र—जैसे उसे दुनिया की किसी भी चिंता से कोई लेना-देना ही न हो। छत पर मची यह हलचल उसे सुकून दे रही थी। उसने देखा कि नीचे आँगन में तीनों चाचियाँ बड़े बर्तनों में खाना बनाने की तैयारी कर रही थीं और चचा लोग बरामदे में बैठकर घर के रख-रखाव की बातें कर रहे थे। इतने सारे अपनों के बीच उसे लगा कि कल रात का डर वाकई सिर्फ एक 'वहम' था।
वह भागती हुई छत की मुंडेर के पास जाकर खड़ी हो गई। उसने नीचे झाँका। नीचे कोई सड़क नहीं थी, कोई शोर नहीं था। केवल सन्नाटा और वह कच्ची पगडंडी थी जो घर की तरफ आती थी।
“देखो, यहाँ से जंगल कितना सुंदर लग रहा है!” शिवांशी ने अपनी बाहें फैलाकर कहा। दोपहर की धूप उसके चेहरे पर चमक रही थी।
“डर नहीं लगता आपको?” उसकी एक चचेरी बहन ने पास आकर पूछा। “दादी कह रही थीं कि इस जंगल की तरफ अकेले नहीं जाना चाहिए।”
शिवांशी मुस्कुराई। उसने अपने गले में पहने महादेव के लॉकेट को छुआ। “जिसके रक्षक महादेव हों, उसे डर कैसा? और वैसे भी, दिन के उजाले में तो यहाँ सिर्फ चिड़ियाँ और हरियाली है।”
हवा अचानक थोड़ी तेज़ हुई। शिवांशी ने आँखें बंद कर लीं। कुछ पल… बस शांति। उसे लगा जैसे हवा उसके कान में कुछ कह रही हो।
फिर—
“शिवांशी…”
किसी ने उसका नाम पुकारा। आवाज़ किसी इंसानी गले जैसी नहीं थी—उसमें मिट्टी और गूंज की ठंडक थी। वह स्वर जैसे किसी गुफा की गहराई से निकलकर सीधे उसके कानों में समा गया हो।
उसने फौरन आँखें खोलीं और पीछे मुड़कर देखा। उसके आठों भाई-बहन अपने खेल में मस्त थे। कोई भाग रहा था, कोई ज़ोर से हँस रहा था। किसी ने उसे नहीं पुकारा था।
“शायद मेरा मन फिर से खेल रहा है,” उसने खुद को शांत करने के लिए बुदबुदाया। वह वापस खेल की तरफ मुड़ने वाली थी कि तभी उसे महसूस हुआ कि छत की बनावट कुछ बदल गई है।
उसने फिर से मुंडेर से नीचे देखा। अब नीचे का दृश्य वह नहीं था जो कुछ सेकंड पहले था।
धूप अचानक मद्धम पड़ गई थी, जैसे आसमान पर बिना किसी चेतावनी के काले बादल छा गए हों। बगीचे की क्यारियाँ अब झाड़ियों में बदली हुई लग रही थीं और वह दूर वाला जंगल… ऐसा लग रहा था मानो खिसक कर घर की दीवारों के बिल्कुल करीब आ गया हो। पेड़ों की शाखाएँ हवा में इस तरह डोल रही थीं मानो वे उसे पुकार रही हों।
शिवांशी का दिल ज़ोर से धड़कने लगा। “ये… ये कैसे मुमकिन है? जंगल इतना पास कैसे आ गया?”
उसने पीछे मुड़कर अपने भाई-बहनों को देखना चाहा, लेकिन वे सब अब धुंधले लग रहे थे। उनकी हँसी अब भी गूँज रही थी, लेकिन वह हँसी अब मधुर नहीं, बल्कि कानों को चुभने वाली लग रही थी। ऐसा लग रहा था जैसे वे सब हज़ारों मील दूर चले गए हों।
तभी उसकी नज़र छत के फर्श के बीचों-बीच पड़ी।
धूल और बारिश के पानी के बीच, ज़मीन पर एक आकृति उभर आई थी। यह एक बड़ा गोल घेरा था, जिसके अंदर राख से बना हुआ वह प्राचीन तारा साफ़ दिख रहा था। यह वही चिन्ह था जो उसने अपने सपने में देखा था—वही जगह जहाँ नाग को कैद किया गया था। उस घेरे से उठती हुई राख की गंध उसके साँसों में उतर गई, जो किसी पुराने श्मशान की राख जैसी ठंडी और तीखी थी।
शिवांशी के पैर जम गए। उसे महसूस हुआ कि छत अब सीमेंट की नहीं, बल्कि ठंडी, गीली मिट्टी की बनी है। उसके कानों में कबीले के लोगों के मंत्रों की हल्की फुसफुसाहट गूँजने लगी।
“महादेव… रक्षा करना,” उसने काँपते हाथों से अपना लॉकेट कसकर पकड़ लिया।”
आसमान में बादल गरज उठे। दोपहर का उजाला अचानक शाम के धुंधलके में बदल गया। छत के उस घेरे से एक हल्की सी सरसराहट की आवाज़ आई, जैसे कोई बहुत विशाल चीज़ ज़मीन के नीचे से ऊपर आने की कोशिश कर रही हो। शिवांशी ने नीचे मुंडेर से देखा—जंगल अब घर की बालकनी को छू रहा था।
हँसी बंद हो गई। हवा रुक गई। और शिवांशी को अहसास हुआ कि कल रात का वह 'वहम' खत्म नहीं हुआ था, बल्कि वह तो उसे दिन के उजाले में भी ढूँढने निकल पड़ा था।