पहाड़ी पर मौत का सन्नाटा और कालू का अट्टहास गूँज रहा था।
दीपक और अभिलाषा कांपते हुए कातिलों की भूमिका निभा रहे थे, लेकिन तभी कार्तिक के मुँह से निकली बात ने सबको सुन्न कर दिया।
कार्तिक, जिसकी आँखों में अब एक अजीब सी ठंडी चमक थी, चिल्लाकर बोला— "हाँ कालू! मत छोड़ इन्हें! यही वो हाथ हैं जिन्होंने तुझे धक्का दिया था।
यही वो ज़बान है जिसने तुझे चरवाहा कहकर दुत्कारा था। मार डाल इन्हें! खत्म कर दे यह अध्याय, ताकि तेरा प्रतिशोध पूरा हो सके!"
कार्तिक के ये शब्द सुनकर घेरे के अंदर बैठे दोस्तों के होश उड़ गए। सबसे ज़्यादा धक्का रूही को लगा।
रूही, जो अब तक सुरक्षा घेरे की मर्यादा बनाए बैठी थी, अपनी जान की परवाह किए बिना घेरे से बाहर निकल आई।
रूही ने कांपते हुए स्वर में चिल्लाकर कहा, "कार्तिक! तुम यह क्या कह रहे है? तुम इन्हें मारने के लिए क्यों उकसा रहा है? तुम तो इन्हें बचाने गए थे! तुम तो इस पहाड़ी को श्रापमुक्त करने गए थे!"
रूही की नज़रें कार्तिक पर टिकी थीं। उसे कुछ गलत महसूस हो रहा था। जो कार्तिक जंगल गया था, उसकी आवाज़ में करुणा थी, लेकिन इस कार्तिक की आवाज़ में एक अजीब सी खनक थी।
पहाड़ी पर मंजर अब भयावह हो चुका था। कालू ने अपनी आसुरी शक्ति से दीपक और अभिलाषा के चारों ओर अग्नि का एक घेरा बना दिया।
आग की लपटें आसमान छूने लगी थीं। दीपक और अभिलाषा उस आग के बीच फंसे चिल्ला रहे थे, "बचाओ! कार्तिक बचाओ!"
लेकिन वहां खड़ा कार्तिक बोला तक नहीं अब सभी दोस्तों को लगने लगा यहकारतिक है ही नहीं असल में कालू की नफरत की परछाईं है कार्तिक बस पत्थर दिल बनकर मुस्कुरा रहा था।
रूही का सब्र अब टूट गया। वह दौड़ती हुई उस 'कार्तिक' के पास पहुंची और उसका कॉलर पकड़कर झकझोरते हुए चिल्लाई, "कार्तिक! अपनी आँखें खोलो! देखो तुम क्या कर रहे हो?
दीपक और अभिलाषा हमारे दोस्त हैं, वे कोई प्रेमचंद और मीना नहीं हैं! तुम इंसान हो या हैवान? क्या तुम्हें उनकी चीखें सुनाई नहीं दे रही हैं?"
रूही की आँखों में नफरत और दर्द दोनों थे। उसने सिसकते हुए कहा, "या तो इस कालू के जादू ने तुम्हें पूरी तरह अपने वश में कर लिया है,
या फिर तुम मेरे वो कार्तिक हो ही नहीं जिससे मैंने प्यार किया था। मेरा कार्तिक किसी की जान लेने के लिए उकसा नहीं सकता!"
उधर, आग की लपटें दीपक और अभिलाषा के और करीब पहुँच रही थीं। कालू का अट्टहास रुकने का नाम नहीं ले रहा था।
वह चिल्लाया, "देखो! जलते हुए देखो इन्हें! जैसे मैं उस रात तड़पा था, वैसे ही आज ये दोनों जलेंगे!"
पहाड़ी पर तनाव अपने चरम पर था। जैसे ही कार्तिक ने रूही को ज़ोर से धक्का दिया, रूही पत्थर से टकराते-टकराते बची।
उसकी आँखों में अविश्वास और आँसू थे। उसे लगा कि उसका कार्तिक अब पूरी तरह बदल चुका है या शायद वह वाक़ई कालू का साथ देकर न्याय करना चाहता है।
कार्तिक चिल्लाया, "दूर हट रूही! आज कालू को उसका हक़ मिलकर रहेगा। सदियों का इंसाफ आज होकर रहेगा!"
कालू को अब पूरा यकीन हो गया था कि कार्तिक उसका इकलौता मददगार है। उसका ध्यान अब पूरी तरह उन जलते हुए 'कातिलों' पर था।
तभी कार्तिक ने मोहित की ओर एक तीखी नज़र डाली और सिर हिलाया। मोहित, जो पसीने से तर-बतर था, उसने कांपते होंठों से वह पुरानी बाँसुरी बजानी शुरू की।
जैसे ही बाँसुरी से वही पुरानी, विरह भरी धुन निकली, कालू का शरीर एक बार फिर सुन्न होने लगा। वह आग की लपटों को भूलकर मोहित की ओर मुड़ने लगा।
उसके आसुरी रूप में अब थोड़ी स्थिरता आने लगी थी। उसे लगा जैसे उसकी माँ उसे पुकार रही हो।
कार्तिक ने देखा कि यही मौका है। वह धीरे से कालू की नज़रों से बचकर पीछे हटा और उस पुराने शिवलिंग की ओर भागा, जो पहाड़ी की चोटी पर धूल और मलबे से ढका हुआ था।
कार्तिक ने फुर्ती से शिवलिंग के पास पहुँचकर वहाँ जमा हुई सदियों पुरानी भस्म को अपनी मुट्ठी में भर लिया।
उसने महादेव का नाम लिया और शिवलिंग पर पड़े कचरे को साफ किया। जैसे ही उसने उस पवित्र भस्म को अपनी हथेली पर मलिए और गंगाजल की कुछ बूंदें उस पर डालीं, कार्तिक के हाथों में एक अलौकिक सफ़ेद चमक पैदा हो गई।
वह अब एक साधारण लड़का नहीं, बल्कि महादेव का एक दूत लग रहा था। उसने भस्म का तिलक अपने माथे पर लगाया और दबे पाँव, पर चीते जैसी फुर्ती से कालू की ओर बढ़ने लगा।
कार्तिक अब अंतिम प्रहार की तैयारी कर चुका था
कालू अभी भी संगीत की धुन में खोया हुआ था।
उसे लग रहा था कि वह फिर से वही चरवाहा कल्याण सिंह बन गया है। उधर दीपक और अभिलाषा आग के बीच बेसुध होने लगे थे।
रूही ने देखा कि कार्तिक कालू के ठीक पीछे पहुँच चुका है। उसके हाथ में वही जादुई भस्म थी। रूही ने अपनी सांसें थाम लीं। उसे समझ नहीं आ रहा था कि कार्तिक कालू को मारने जा रहा है या उसे बचाने।
कार्तिक ने हवा में हाथ उठाया। उसके पास अब सिर्फ एक मौका था। कालू के विशाल काले साये के ठीक पीछे पहुँचकर उसने पूरी ताकत से वह अभिमंत्रित भस्म कालू की पीठ पर छिड़कने के लिए हाथ आगे बढ़ाया।
पहाड़ी की चोटी पर एक ऐसा धमाका हुआ मानो आसमान टूट पड़ा हो। जैसे ही कालू मोहित की ओर बढ़ने के लिए अपनी विशाल कुल्हाड़ी उठाई, कार्तिक ने महादेव का नाम लेकर अपनी पूरी शक्ति झोंक दी।
कार्तिक के हाथ में वह प्राचीन त्रिशूल था, जो उसने मंदिर के मलबे से निकाला था। उसने सबसे पहले वह अभिमंत्रित भस्म कालू के ऊपर फेंकी।
जैसे ही वह पवित्र भस्म कालू के काले साये से टकराई, उसके शरीर से नीली चिंगारियां निकलने लगीं और वह दर्द से कराह उठा।
उसकी आसुरी शक्ति उस पवित्रता को बर्दाश्त नहीं कर पा रही थी।
कालू अभी संभल भी नहीं पाया था कि कार्तिक ने पीछे से वह पवित्र त्रिशूल पूरी ताकत के साथ उसकी पीठ में उतार दिया।
शक्ति का अंत: जैसे ही त्रिशूल कालू के शरीर के आर-पार हुआ, उसके भीतर बसी सदियों की नफरत और अंधकार धुएँ की तरह बाहर निकलने लगा। उसकी आँखों की लाल रोशनी बुझने लगी और उसका विशाल शरीर धीरे-धीरे एक साधारण इंसान की परछाईं में बदलने लगा।
अग्नि का शांत होना: कालू की शक्ति क्षीण होते ही, दीपक और अभिलाषा के चारों ओर धधक रही आग की लपटें पल भर में गायब हो गईं। वे दोनों बेसुध होकर ज़मीन पर गिर पड़े, पर सुरक्षित थे।
जब कालू का आसुरी रूप नष्ट हो रहा है और वह वापस 'कल्याण सिंह' (चरवाहे) के मानवीय रूप में लौट रहा है, तो मरने से पहले उसके अंतिम शब्द क्या होंगे? क्या वह अपने किए पर पछतावा करेगा, या वह कार्तिक को कोई ऐसा रहस्य बताएगा जो इस पहाड़ी के भविष्य से जुड़ा है?