सुरेश विदर्भ के एक छोटे से गाँव का गरीब किसान था। उसके पिता की दो साल पहले बीमारी से मौत हो गई थी। पिता अपने पीछे दो एकड़ बंजर जमीन और ऊपर से पाँच लाख रुपये का कर्ज़ छोड़ गए थे। यह कर्ज़ गाँव के साहूकार हरिराम से लिया गया था।
सुरेश ने दिन-रात खेत में मेहनत की, पर पैदावार इतनी नहीं होती थी कि घर चल सके और कर्ज़ भी चुक सके। उसकी पत्नी सुनीता ने तो अपने सारे गहने तक बेच दिए थे, फिर भी साहूकार का ब्याज बढ़ता ही जा रहा था। साहूकार हर हफ्ते उसके दरवाजे पर आकर उसे सबके सामने बेइज्जत करता था। सुरेश अंदर ही अंदर टूट चुका था।
एक शाम जब साहूकार ने उसे धमकी दी कि अगर अगले महीने पैसा नहीं दिया तो वह उसकी जमीन पर कब्जा कर लेगा, तो सुरेश पूरी तरह हार गया। वह गाँव के बाहर वाले बड़े पीपल के पेड़ के नीचे बैठ कर अकेले में फूट-फूट कर रोने लगा।
उसी रास्ते से गाँव के रिटायर्ड मास्टर जी, सत्यप्रकाश जी गुजर रहे थे। उन्होंने सुरेश को रोते देखा तो उसके पास बैठ गए और प्यार से पूछा, "क्या हुआ बेटा सुरेश, क्यों रो रहे हो?"
सुरेश ने रोते-रोते अपनी सारी कहानी बता दी। मास्टर जी ने सब ध्यान से सुना। फिर उन्होंने अपने झोले से एक पुरानी, फटी हुई, पीले पन्नों वाली डायरी निकाली और सुरेश के हाथ में रख दी।
मास्टर जी बोले, "बेटा, जब मैं तुम्हारी उम्र का था, तब मुझ पर तुम्हारे से भी ज्यादा, दस लाख रुपये का कर्ज़ था। सबने मेरा साथ छोड़ दिया था। तब मुझे भी एक साधु ने यही डायरी दी थी। इसी डायरी ने मेरा कर्ज़ उतारा और आज मेरे पास अपना पक्का मकान है। इसमें एक ही नियम लिखा है।"
सुरेश ने कांपते हाथों से डायरी खोली। पहले पन्ने पर बड़े अक्षरों में लिखा था - "हर दिन, सिर्फ एक ईंट।"
सुरेश को कुछ समझ नहीं आया। मास्टर जी मुस्कुराए और बोले, "बेटा, ताजमहल एक दिन में नहीं बना था। रोज एक ईंट रखने से ही महल बनता है। तुम कल से एक काम करो। तुम जितना भी कमाओ, उसमें से सिर्फ 100 रुपये अलग निकाल कर एक मिट्टी के घड़े में डाल दो। चाहे भूखा रहना पड़े, पर उस घड़े को मत फोड़ना। यही तुम्हारी एक ईंट है।"
सुरेश को यह उपाय बहुत छोटा लगा, पर उसके पास खोने को कुछ नहीं था। उसने अगले दिन से ही नियम शुरू कर दिया। खेत से लौट कर वह सबसे पहले 100 रुपये उस घड़े में डालता।
एक महीना बीता, साहूकार फिर आया। सुरेश का मन किया कि घड़ा फोड़ कर उसे दे दे, पर उसे मास्टर जी की बात याद आई। उसने हिम्मत करके साहूकार से एक महीने की और मोहलत मांग ली।
देखते-देखते एक साल बीत गया। सुरेश ने एक भी दिन नागा नहीं किया। एक साल बाद दिवाली वाले दिन उसने जब अपना घड़ा फोड़ा तो उसमें 36,500 रुपये निकले। अपनी आँखों के सामने इतने सारे पैसे देख कर सुनीता की आँखों में आँसू आ गए। सुरेश ने उसी दिन जाकर साहूकार का एक बड़ा हिस्सा चुका दिया। साहूकार भी उसकी हिम्मत देख कर हैरान रह गया।
अब सुरेश का हौसला बढ़ गया था। उसने अब रोज 200 रुपये डालने शुरू कर दिए। सिर्फ तीन साल के अंदर उसने अपने पिता का पूरा पाँच लाख का कर्ज़ चुका दिया और बचे हुए पैसों से अपने खेत के लिए एक सेकंड-हैंड ट्रैक्टर भी खरीद लिया।
कर्ज़ मुक्त होने के बाद वह सबसे पहले मास्टर जी के पास गया। मास्टर जी ने कहा, "बेटा, डायरी में कोई जादू नहीं था। जादू तुम्हारी रोज़ की ईमानदारी और निरंतरता में था।"
*शिक्षा - बड़ी से बड़ी मुश्किल भी रोज़ के छोटे-छोटे प्रयासों से ही खत्म होती है।*