सावन की रिमझिम फहारों के बीच जब बाज़ार रंग-बिरंगी राखियों से सजे थे, तब राघव अपनी किताबों की अलमारी के सबसे निचले दराज में एक पुरानी लकड़ी की डिब्बी ढूंढ रहा था।
उस डिब्बी में कोई कीमती ज़ेवर नहीं था—बस एक सूती धागे की हल्की सी फीकी पड़ चुकी राखी और एक हाथ से लिखा हुआ मुड़ा-तुड़ा कागज़ का टुकड़ा था।
राघव और अनन्या सगे भाई-बहन नहीं थे। शहर के एक अनाथ आश्रम में, जहाँ राघव पाँच साल का और अनन्या तीन साल की थी, दोनों पहली बार मिले थे। अनन्या का इस दुनिया में कोई नहीं था, और राघव भी तन्हा था। उस मासूम उम्र में राघव ने अनन्या का हाथ ऐसा थामा कि फिर कभी नहीं छोड़ा। वह उसके लिए भाई भी था, माँ भी और पिता भी।
हर साल राखी के दिन, अनन्या अपनी नन्हीं उंगलियों से राघव की कलाई पर रंगीन धागा बाँधती और राघव अपनी गुल्लक के सारे पैसे निकालकर उसके हाथ पर रख देता।
"भैया, मुझे पैसे नहीं चाहिए," अनन्या एक बार रुआँसी होकर बोली थी, "मुझे तो बस यह वादा चाहिए कि तुम हमेशा मेरे साथ रहोगे।"
राघव ने हँसकर उसकी पेशानी चूम ली थी, "जब तक मेरी साँसें हैं, तेरा यह भाई तेरे साथ है।"
समय बीतता गया। राघव ने दिन-रात मेहनत करके पढ़ाई की और शहर का बड़ा डॉक्टर बना। अनन्या भी एक होनहार चित्रकार बनी। दोनों की ज़िंदगी खुशियों से भरी थी। लेकिन किस्मत को कुछ और ही मंज़ूर था।
राघव के डॉक्टर बनने के दो साल बाद, अनन्या को एक गंभीर बीमारी ने घेर लिया। राघव ने दुनिया भर के डॉक्टरों से संपर्क किया, अपना सब कुछ दाँव पर लगा दिया, लेकिन अनन्या का शरीर ढलता चला गया।
राखी से ठीक दो दिन पहले, अनन्या अस्पताल के बिस्तर पर पड़ी थी। उसकी आँखें कमज़ोर हो चुकी थीं, पर चेहरे पर वही पुरानी मासूम मुस्कान थी। उसने राघव की कांपती कलाई को छुआ और कहा, "भैया... इस बार सावन में मैं तुम्हारे लिए रेशम का धागा नहीं ला पाई। पर वादा करो, तुम कभी उदास नहीं होओगे।"
अगले ही दिन, राखी की सुबह से पहले अनन्या ने आखिरी साँस ली। राघव की दुनिया उजड़ गई।
उस बात को आज पाँच साल बीत चुके थे। राघव ने डिब्बी खोली। उसमें वही आखिरी राखी रखी थी जो अनन्या ने अपनी बीमारी के दौरान अपने हाथों से पिरोई थी। खत पर धुंधले अक्षरों में लिखा था:
"मेरे प्यारे भैया,
राखी सिर्फ धागा नहीं होती, यह वो अहसास है जो दो रूहों को जोड़ता है। मैं भले ही तुम्हारी आँखों के सामने न रहूँ, पर जब भी तुम किसी बेसहारा बच्ची के चेहरे पर मुस्कान लाओगे, समझ लेना तुम्हारी अनन्या तुम्हें देखकर मुस्कुरा रही है। मेरी राखी हमेशा तुम्हारी कलाई पर invisible (अदृश्य) बनकर बंधी रहेगी।"
राघव ने अपनी आँखों के आँसू पोंछे। उसने वह राखी अपने दिल से लगाई।
उसी दोपहर, राघव ने अनाथ आश्रम जाकर कई बेसहारा बच्चों के इलाज का पूरा खर्च उठाने का फ़ैसला किया। जब एक नन्हीं बच्ची ने राघव की कलाई पर मुस्कुराते हुए राखी बांधी, तो राघव को लगा जैसे खिड़की से आती हवा के हल्के झोंके में अनन्या की सरगोशी गूँज गई हो— "थैंक यू, भैया!"
राघव समझ गया था कि रिश्ता खून का हो या न हो, अगर उसमें समर्पण और बेइंतहा मोहब्बत हो, तो मौत भी उस धागे को तोड़ नहीं सकती।