Sawan in Hindi Short Stories by Rakesh Kumar Sharma books and stories PDF | सावन

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सावन

सावन की दोपहर लगभग आधी खत्म हो चुकी थी और ढलते सूरज की सुन्हरी रोशनी से नीम की काली छाया और लम्बी हो चली थी। इसी नीम की छाया में लखपत अपनी चारपाई पर औंधे मुंह लेटा हुआ था। काफी देर से सोने की कोशिश कर रहा था पर नींद मानो उससे कोसो दूर चली गई थी। काफी देर तक ऐसे ही लेटे रहने के बाद वो उठ बैठा और अलसाई हुई नजरों से अपने घर की ओर देखने लगा। घर के आंगन में उसकी पत्नी निम्मो भैसों के लिए चारा डाल रही थी। चारपाई से उठ कर लखपत पत्नी के पास आया, निम्मो ने उसको आता देख पूछा - ‘‘क्या हुआ दीदी की याद आ रही है क्या’’? रज्जो...... निम्मो इस सवाल से लखपत की आंखों के आगे बहन का वो प्यारा सा चेहरा आ गया पर लाचारी से उसने ना में सिर हिला दिया। निम्मो उसको एकटक देखती रही। उसको एसे देखते हुए लखपत बोला- ‘‘मुझे क्यो आये उसकी याद, और वैसे भी वो ही कौन सा मुझे याद करती होगी? अगर करती तो आ नहीं जाती।’’ ‘‘कहीं दीदी........’’ धीरे से निम्मो बुदबुदाई। उसकी ये बात सुनकर लखपत का चेहरा सफेद पड गया, फिर अचानक बोला- ‘‘नहीं-नहीं ऐसा कुछ भी नहीं हुआ होगा, वो ठीक-ठाक होगी। एक बार फिर से मानो अतीत की बंद कोठरी का दरवाजा खुल गया था। उसकी आंखों के सामने वो मंजर ठहर गया जब राखी वाले दिन उसकी और बहन की अचानक से किसी बात को लेकर लड़ाई हो गई। बात इतनी बढ़ी कि गुस्से में लखपत ने यह तक कह दिया कि आज के बाद मेरे घर मत आना। रज्जो भी उस वक्त गुस्से में थी, उसने आँसू पोंछते हुए कहा- ‘‘ठीक है भैया... नहीं आऊँगी। वैसे भी अब कौन है यहां मेरा जिसके लिए आया करू।’’ दोनों ने उस दिन जो शब्द कहे, वो शब्द बाद में दोनों के सीने में काँटों की तरह चुभते रहे मगर अहंकार ने दोनों के होंठ सिल दिए। इन सब बातों को याद करता हुआ लखपत फर से नीम के नीचे चारपाई पर लेट गया और अपनी आंखे बंद कर ली। समय अपनी गति से चलता रहता है। रज्जो भी अब बुढ़ी हो चली थी। दूर दराज़ के एक गाँव के आखिरी छोर पर, जहाँ कच्ची पगडंडी जाकर सूखे तालाब के किनारे खत्म हो जाती थी, वहीं मिट्टी और खपरैल की एक छोटी-सी झोंपड़ी थी। झोंपड़ी के बाहर तुलसी का चौरा था। उसके पास एक पुरानी चारपाई पड़ी रहती थी, जिस पर हर सुबह रज्जो बैठकर सूरज निकलते देखती थी। गाँव वाले उसे काकी कहते थे। उम्र ने उसके बालों को सफेद कर दिया था, चेहरे पर झुर्रियों की गहरी लकीरें खींच दी थीं और कमर को इतना झुका दिया था कि चलते समय उसे अपनी लकड़ी की लाठी का सहारा लेना पड़ता था लेकिन उसका मन अब भी एक मासूम बच्ची जैसा था, वो बच्ची जो सावन आते ही मायके जाने के लिए बेचौन हो जाती थी। रज्जो का अपना कहने को अब कोई नहीं था। उसका पति रामस्वरूप फौज में था और देश की सरहद पर ड्यूटी करते हुए एक दिन उसकी शहादत की खबर आई थी। उस समय रज्जो की गोद में दो छोटे बच्चे थे। रामस्वरूप की चिट्ठी आज भी उसके संदूक में संभालकर रखी थी। वो अक्सर संदूक खोलती, चिट्ठी निकालती और उसे ऐसे पढ़ती जैसे उसमें लिखे शब्द आज भी बोलते हों। ‘‘रज्जो, बच्चों का ख्याल रखना। मैं जल्दी छुट्टी लेकर घर आऊँगा।’’ रज्जो हर बार चिट्ठी को सीने से लगा लेती और कहती- ‘‘तुम आए तो नहीं ... पर तुम्हारी चिट्ठी आज तक मेरा साथ निभा रही है।’’ लेकिन किस्मत ने उसके साथ एक और बेरहमी की, कुछ साल बाद उसके दोनों बच्चे भी एक सड़क हादसे में उससे हमेशा के लिए दूर चले गए। उस दिन के बाद रज्जो की झोंपड़ी में चूल्हा तो जलता था, लेकिन घर में आवाज नहीं रहती थी। रोज़ सुबह होती और दूर खेतों में किसान हल चलाते। कहीं बैलों के गले की घंटियाँ बजतीं पर रज्जो अकेली अपनी चौखट पर बैठी रहती। गाँव की औरतें कभी-कभी उसके पास आकर पूछतीं की काकी, तबियत कैसी है? तो रज्जो मुस्कुराकर कहती- ‘‘अरी बिटिया, जब तक साँस चल रही है, तबियत भी चल रही है।’’ फिर सब अपने-अपने घर चली जाती। रज्जो को सबसे ज्यादा याद आता था अपना मायका। मायका गाँव से बहुत दूर नहीं था। शादी के बाद भी वो साल में कई बार वहाँ जाया करती थी। सावन आते ही जैसे उसके पैरों में पंख लग जाते थे। अपनेे घर की मिट्टी की खुशबू, भाई का वो प्यार, भाभी के हाथ की बाजरे की रोटी, आँगन में लगा नीम का पेड़ और भाई की आवाज- ‘‘अरी इतनी जल्दी किस बात की है? दो दिन और रुक जा।’’ वो दिन उसकी जिंदगी के सबसे अच्छे दिन थे। समय गुजरता गया पहले पति चला गया फिर बच्चे भी चले गए लेकिन भाई की याद नहीं गई। एक सावन में उसने बहुत हिम्मत करके मायके जाने का फैसला किया। राखी का दिन था, सुबह-सुबह उसने अपनी पुरानी साड़ी पहनी, माथे पर छोटी-सी बिंदी लगाई और एक कपड़े में दो राखियाँ बाँध लीं। चलते-चलते रास्ते में उसने खुद से कहा- ‘‘भैया मुझे देखकर नाराज होंगे तो होंगे... लेकिन भाई है मेरा। राखी तो बाँधूँगी ही।’’ वो दोपहर तक भाई के घर पहुँच गई। दरवाजे पर खड़ी होकर उसने आवाज लगाई- ‘‘भैया... भैया’’! अंदर से निम्मो निकलीं। उसने रज्जो को देखा और चेहरे पर खुशी आ गई। ‘‘अरे, दीदी तुम इतने साल बाद?’’ रज्जो ने मुस्कुराकर कहा- ‘‘हाँ भाभी... आज राखी है ना, सोचा भाई की कलाई सूनी क्यों रहे?’’ भाभी ने ठंडी आवाज में कहा- वो तो अभी खेत में गये हैं आप अंदर आओ, पर रज्जो दरवाजे पर ही खड़ी रही और बोली- ‘‘पहले भैया लौट आएँगे तो राखी बाँध दूँगी तब अंदर आऊंगी।’’ निम्मो ने पड़ोस के एक बच्चे को खेत पर भेज कर लखपत को ख़बर भेज दी थी पर काफी देर हो गई और भाई नहीं आया तो रज्जो समझ गई की भाई उससे मिलना नहीं चाहता। उसने अपने हाथ में रखी राखी को देखा और धीरे से निम्मो से बोली- ‘‘भैया से कहना... रज्जो आई थी।’’ फिर वो वापस चल पड़ी। निम्मो ने बहुत कोशिश की उसको रोकने की पर मन में उमड़ते तुफान ने रज्जो को घर से बाहर निकलने पर मज़बुर कर दिया। रास्ते भर सावन की बारिश होती रही और उसकी आँखों से आँसू बहते रहे लेकिन बारिश ने किसी को पता नहीं चलने दिया कि ये आंसू थे या पानी। उस दिन के बाद रज्जो ने मायके जाना छोड़ दिया। हर साल सावन आता गाँव की गलियों में झूले पड़ते, बहनें मायके जातीं, भाइयों की कलाई पर राखियाँ बंधतीं पर रज्जो अपनी झोंपड़ी के बाहर बैठकर दूर जाती पगडंडी को देखती रहती। कभी-कभी कोई लड़की राखी बाँधकर लौटती तो रज्जो उसे देखकर मुस्कुरा देती और फिर धीरे से कहती- ‘‘बिटिया... अपने भैया का हाथ मत छोड़ना।’’ रज्जो के पड़ोस में एक छोटी लड़की रहती थी गुड़िया। बचपन से ही वह रज्जो की गोद में खेली थी एक बार उस छोटी सी गुड़िया ने पूछा कि काकी आपका भाई आपको राखी बाँधने नहीं बुलाता? रज्जो कुछ पल चुप रही। फिर मुस्कुराकर बोली- ‘‘बुलाता होगा बिटिया... बस उसकी आवाज मेरे गाँव तक नहीं पहुँचती।’’ गुड़िया मासूमियत से बोली- ‘‘आप खुद चली जाया करो।’’ रज्जो ने उसकी तरफ देखा और बोली- ‘‘गई थी बिटिया... कई बार गई थी।’’ फिर उसकी आवाज धीमी हो गई। अब रास्ता याद है... मगर हिम्मत नहीं बची। और इस तरह साल गुजरते गए, यादें धुंधली होती गई। ‘‘बाबा’’- पीछे से आई इस आवाज से लखपत की तंद्रा टुटी, पीछे मुड़कर देखा तो उसका बेटा मोहन खड़ा था। ‘‘अरे बेटा तु कब आया?’’ चारपाई से उठते हुए लखपत बोला। ‘‘बस अभी आ ही रहा हूं’’- मुस्कुराते हुए मोहन ने कहा और पिता के पैर छुए। ‘‘मां कहां है बाबा’’- मोहन बोला। ‘‘वो अंदर है जा मिल ले उससे काफी दिन से तेरी राह देख रही है’’- लखपत बोला। मोहन शहर में कॉलेज में पढ़ता था और आज कॉलेज की पढ़ाई पूरी करके लौटा था। निम्मो बेटे को देखकर फुली नहीं समा रही थी। ‘‘चल थक गया होगा कुछ खा-पी कर आराम कर ले’’- निम्मो बोली और उसका बैग लेकर घर के अंदर चली गई। खा-पी कर और थोडा आराम करके मोहन अपने बैग से सामान निकालने लगा। ‘‘मां ये सारा सामान कहां रखूं?’’- मोहन ने मां को आवाज लगाई। ‘‘तख़्त पर एक संदूक रखा है उसमें ही रख दे बेटा’’- रसोई से निम्मो बोली। इधर उधर देखने के बाद मोहन को एक संदूक दिखाई दिया। पहले तो उसको हैरानी हुई की बचपन से तो कभी भी ये संदूक उसने घर में तो नहीं देखा, फिर सोचा कि शायद बाबा कहीं से लेकर आये होंगे। पुराने संदूक को साफ करते हुए उसे एक कपड़े में लिपटी पुरानी राखियाँ मिलीं। दिखने में काफी पुरानी लग रही थी। उसने बाहर आकर पिता से पूछा- ‘‘बाबा, ये राखियाँ किसकी हैं?’’ लखपत ने राखियों को देखा तो उसकी आँखें भर आईं। बहुत देर तक वह कुछ नहीं बोला फिर काँपती आवाज में बोला- ‘‘तेरी बुआ की हैं’’। मोहन ने हैरानी से पूछा- ‘‘मेरी बुआ?’’ लखपत ने सिर झुका लिया और बोला- ‘‘हाँ... मेरी बहन रज्जो’’। मोहन हैरान था कि यदी उसकी कोई बुआ है तो बचपन से अब तक मां-बाप ने यह बात उसको क्यों नहीं बताई। मोहन ने फिर पूछा कि वो कहाँ रहती हैं और यहां आती क्यों नहीं है तो लखपत ने बाहर देखते हुए कहा- ‘‘पता नहीं बेटा... लेकिन जिंदा होगी तो उसी पुराने गाँव में होगी’’। मोहन ने पिता की आँखों में पछतावा देख लिया और पुछा कि बाबा, आपने उन्हें कभी बुलाया क्यों नहीं? लखपत के होंठ काँपने लगे। अपने दर्द को समेटते हुए वो बोला- ‘‘मर्द का गुस्सा बेटा... बहुत अजीब चीज होती है। उस वक्त लगता है कि हम सही हैं और जब समझ आती है कि गलती हमारी थी... तब सामने वाला बहुत दूर जा चुका होता है’’। फिर लाचारी से लखपत ने मोहन की ओर देखा और बोला- ‘‘बेटा जो भूल मुझसे हो गई है मरने से पहले मै उसको सुधारना चाहता हूं क्या तू मेरी बहन को मेरे पास ला सकता है’’। बाप की मायूस आवाज से मोहन कांप गया और उसने अपनी बुआ को ढूँढने का फैसला कर लिया। अगली सुबह वो निकल पड़ा और उस गाँव में जा पहुँचा जहाँ रज्जो रहती थी। गाँव में घुसते ही मोहन को एक बुजुर्ग दिखाई दिये तो उसने उनसे पूछा कि चाचा यहाँ रज्जो नाम की कोई बूढ़ी काकी रहती हैं? बुजुर्ग ने उसे ऊपर से नीचे तक देखा और बोले- ‘‘बेटा तुम कौन हो जो रज्जो के बारे में पूछ रहे हो? इतने सालोें में पहली बार कोई उसको पूछ रहा है’’। ‘‘मैं... लखपत का बेटा और रज्जो बूआ का भतीजा मोहन हूँ’’- उसने धीरे से कहा। बुजुर्ग कुछ पल चुप रहे फिर उनकी आँखों में चमक आ गई। अरे... रज्जो का भतीजा! मोहन की धड़कन तेज हो गई। बुजुर्ग बोले- ‘‘इतने दिन कहां लगा दिये बेटा वो कब से तुम सबकी राह देख रही है। ले जा बेटा उसको ले जा... सम्हाल ले अपनी विरासत को जाने कब ये पुराना पेड़ अपनी जड़ों को अलविदा कह दे’’। उनकी बात को सुनकर मोेहन दौड़ता हुआ गाँव के आखिरी छोर की तरफ गया और एक घर के दरवाजे पर जाकर ही उसने दम लिया। सामने रज्जो उस समय चूल्हे पर रोटी सेंक रही थी। उसको इस हाल में देखकर मोहन की आंखें भर आई फिर हिम्मत जुटा कर उसने बुआ को आवाज लगाई - ‘‘बुआ...’’ रज्जो का हाथ रुक गया। उसने धीरे-धीरे पलटकर देखा। सामने कोई खड़ा था पर उसकी आंखों में अब मोतिया उतर आया था तो उसको कुछ भी साफ दिखाई नहीं देता था। ‘‘कौन?’’- उसने आंखों पर जोर डालते हुए कहा और उठ खड़ हुई। मोहन ने आगे बढ़कर उसके पैर छुए और बोला- ‘‘मैं मोहन हूँ बुआ... आपका भतीजा’’। इसको सुनते ही रज्जो की आँखें फैल गईं। उसने काँपते हाथ से मोहन का चेहरा छुआ। ‘‘तु लखपत का... बेटा?’’ ‘‘हाँ बुआ- मोहन बोला’’। ‘‘बिल्कुल अपने बाप पर गया है’’ -रज्जो बुदबुदाई पर इसके बाद कुछ बोल नहीं पाई बस उसकी आँखों से आँसू बहने लगे। बरसों बाद इस आंगन में उसका कोई अपना आया था। दुखः और खुशी की जो कश्मकश उसके अंदर चल रही थी उसको बता पाना उसके लिए लगभग न के बराबर था। दिमाग शून्य की स्थिति में पहुंच चुका था। उसके कंघे को सहलाकर मोहन ने कहा- ‘‘बुआ, बाबा ने आपको घर बुलाया है’’। उसकी बात को सुनते ही रज्जो को होश आया तो उसने तुरंत चेहरा फेर लिया। ‘‘नहीं बेटा... अब मैं कहीं नहीं जाती’’। ‘‘बुआ, बाबा आपको रोज याद करतें है और उन्होंने ही आपको बुलाया है’’ - मोहन ने मायूस होकर कहा। रज्जो चुप रही। मोहन ने अपनी जेब से एक छोटा-सा लिफाफा निकाला। उसमें राखी थी। ‘‘बाबा ने कहा है... अगर बुआ नाराज हो तो ये उनके हाथ में दे देना। बरसों से ये राखी एक बहन का इन्तजार कर रही है’’। रज्जो ने राखी को हाथ में लिया। उसकी उँगलियाँ काँपने लगीं। ‘‘तेरे बाबा ने भेजी है?’’ - रज्जो बुदबुदाई। ‘‘हाँ। उन्होंने... यह भी कहा कि बहुत देर कर दी अपनी बहन को याद करनें मैं’’ - मोहन ने धीरे से कहा। रज्जो ने आँसू पोंछे और फिर मुस्कुराकर बोली- ‘‘तेरे बाबा हमेशा से जिद्दी थे’’। मोहन भी मुस्कुरा दिया। बुआ, अब भी जिद्दी हैं इसलिए आपको लेने खुद नहीं आए... मुझे भेज दिया। रज्जो पहली बार खुलकर हँसी। उस रात उसने अपनी झोंपड़ी में बहुत दिनों बाद मन से खाना बनाया और मोहन को खिलाया। इसके बाद दोनो ने मिलकर सामान बाँधा। पुराना संदूक खोला, रामस्वरूप की चिट्ठी उसमें रखी। बच्चों की दो पुरानी तस्वीरें रखीं और पति की पुरानी फौजी टोपी को कपड़े में लपेटकर संदूक में रख दिया। सुबह गाँव वाले उसे विदा करने आए। गुड़िया भी आई। उसने पूछा- ‘‘काकी, आप वापस कब आओगी?’’ रज्जो ने उसके सिर पर हाथ रखा और बोली- ‘‘पता नहीं बिटिया लेकिन अब शायद मेरा मन यहाँ अकेला नहीं रहेगा, जा रहीं हूं अब अपने पीहर.....’’ इतने में मोहन तांगा लेकर आ गया फिर दोनों तांगें में बैठ गये और धीरे-धीरे गाँव से बाहर निकलने लगे। रज्जो पीछे मुड़कर अपनी झोंपड़ी को देखती रही। वही तुलसी.. वही चारपाई... वही मिट्टी की दीवारें। उसकी पूरी जिंदगी छूट रही थी लेकिन इस बार उसके चेहरे पर अकेलापन नहीं था। कई घंटों के सफर के बाद जब वो अपने मायके पहुँची तो दरवाजे पर बूढ़ा लखपत खड़ा था.. बहुत बूढ़ा, लाठी के सहारे। दूर से दोनों भाई-बहन एक-दूसरे को देखते रहे। न कोई आगे बढ़ा, न कोई कुछ बोला। फिर यकायक लखपत की आँखों से आँसू गिर पड़े। रज्जो... बस एक शब्द और रज्जो का कलेजा भर आया। वो धीरे-धीरे आगे बढ़ी। ‘‘हाँ भैया...’’ लखपत ने काँपते हाथ आगे किए। ‘‘बहुत देर कर दी बहन....’’। रज्जो ने उसके हाथ पकड़ लिए और बोली- ‘‘देर तो दोनों ने की भैया’’। लखपत रो पड़ा और सुबकते हुए बोला- ‘‘मुझे माफ कर दे मेरी बहन’’। रज्जो ने हां में सिर हिलाया- ‘‘भाई से भी कोई नाराज रहता है क्या?’’ लखपत ने उसे सीने से लगा लिया। दोनों बूढ़े भाई-बहन बरसों का दर्द एक-दूसरे के कंधे पर रखकर रोते रहे। आँगन में खड़े मोहन और निम्मो चुपचाप भाई-बहन के इस निश्च्ल प्रेम को देखते रहे... एक ऐसा रिश्ता जिसको शब्दों में नहीं पिरोया जा सकता। थोड़ी देर बाद लखपत ने कहा- ‘‘रज्जो अब तेरा घर यहीं है और जब तक मैं जिंदा हूँ, मेरी कलाई खाली नहीं रहेगी’’। रज्जो भाई की ओर देखा, भाई की आंखों में प्रेम था। उसने भाई की कलाई पर राखी बाँधी। राखी बाँधते समय उसके हाथ काँप रहे थे लेकिन इस बार उन हाथों में अकेलापन नहीं था। बाहर बारिश शुरू हो चुकी थी, नीम के पेड़ से पानी की बूँदें टपक रही थीं। कच्चे आँगन में मिट्टी की खुशबू फैल रही थी और बहुत सालों बाद रज्जो को लगा मायका कभी खत्म नहीं होता बस कभी-कभी रास्ते पर अहंकार की धूल जम जाती है और जब कोई अपना उस धूल को हटाकर वापस बुला ले तो बूढ़े दिल में भी एक सावन फिर से उतर आता है..... - राकेश शर्मा