भाग ९ — एक बड़ा फैसला
अगली सुबह मिहिर की आँख खुली तो उसके मन में एक ही बात थी—
“क्या मैं फिर से शुरुआत कर पाऊँगा?”
पिछले कुछ दिनों में उसकी जिंदगी पूरी तरह बदल गई थी।
जिस नौकरी पर उसे गर्व था, वह चली गई थी।
जिस भविष्य को उसने सुरक्षित समझा था, वह अचानक अनिश्चित हो गया था।
लेकिन अब उसके सामने एक मौका था।
नई कंपनी ने उसे दूसरे राउंड के लिए बुलाया था।
मिहिर तैयार होकर घर से निकलने लगा।
तभी पापा ने पूछा—
“कितने बजे लौटेगा?”
“पता नहीं पापा। शायद देर हो जाए।”
पापा ने सिर हिलाया।
“ठीक है।”
मिहिर जाने लगा तभी निशा ने उसे रोक लिया।
“एक मिनट।”
उसने उसके हाथ में एक छोटा-सा डिब्बा रखा।
“ये क्या है?”
“कुछ नहीं। रास्ते में खा लेना।”
मिहिर मुस्कुराया।
“तुम भी ना…”
निशा ने कहा—
“आज सिर्फ इंटरव्यू पर ध्यान देना।”
“हम्म।”
“और एक बात।”
“क्या?”
“अगर नौकरी मिल गई तो बहुत अच्छा।”
मिहिर मुस्कुराया।
“और अगर नहीं मिली?”
निशा ने उसकी आँखों में देखकर कहा—
“तो दूसरी ढूँढ लेंगे।”
मिहिर ने उसका हाथ पकड़ लिया।
“तुम्हें कभी डर नहीं लगता?”
निशा कुछ पल चुप रही।
“लगता है।”
“फिर?”
“लेकिन तुम्हारे सामने अपना डर दिखाऊँगी तो तुम और डर जाओगे।”
मिहिर चुप हो गया।
उसने पहली बार महसूस किया कि सिर्फ पुरुष ही परिवार के लिए मजबूत बनने की कोशिश नहीं करते।
कई बार एक पत्नी भी अपने डर को छुपाकर पति को हिम्मत देती है।
मिहिर इंटरव्यू के लिए पहुँचा।
दूसरा राउंड पहले से ज्यादा कठिन था।
इस बार उससे उसकी सोच, नेतृत्व क्षमता और मुश्किल परिस्थितियों में फैसले लेने के बारे में सवाल किए गए।
एक अधिकारी ने पूछा—
“अगर आपकी टीम में कोई व्यक्ति लगातार गलती कर रहा हो तो आप क्या करेंगे?”
मिहिर ने कहा—
“पहले उसकी गलती समझूँगा। उसके बाद यह समझने की कोशिश करूँगा कि गलती की वजह क्या है।”
“और अगर वह फिर भी गलती करता रहे?”
“तो जिम्मेदारी तय करनी होगी।”
अधिकारी ने पूछा—
“आप भावनाओं और जिम्मेदारी के बीच संतुलन कैसे बनाएँगे?”
मिहिर कुछ क्षण चुप रहा।
फिर बोला—
“भावनाएँ इंसान को समझने में मदद करती हैं। लेकिन फैसला जिम्मेदारी देखकर लेना चाहिए।”
सामने बैठे अधिकारी ने उसकी तरफ ध्यान से देखा।
“आपने यह बात कहाँ सीखी?”
मिहिर हल्का-सा मुस्कुराया।
“जिंदगी से।”
इंटरव्यू खत्म हुआ।
मिहिर बाहर निकला।
इस बार उसे लगा कि उसने अपना सर्वश्रेष्ठ दिया है।
लेकिन बाहर निकलते ही उसका मोबाइल बजा।
घर से फोन था।
उसने फोन उठाया।
“हैलो?”
माँ की आवाज थी।
“बेटा… पापा की तबीयत थोड़ी खराब है।”
मिहिर का चेहरा तुरंत बदल गया।
“क्या हुआ?”
“सीने में दर्द था। अभी डॉक्टर के पास ले जा रहे हैं।”
“मैं अभी आता हूँ।”
मिहिर बिना देर किए अस्पताल पहुँचा।
पापा डॉक्टर के कमरे में थे।
मिहिर बाहर बेचैनी से बैठा था।
कुछ देर बाद डॉक्टर बाहर आए।
“घबराने की जरूरत नहीं है। अभी स्थिति नियंत्रण में है। कुछ टेस्ट करवाने होंगे।”
मिहिर ने राहत की साँस ली।
लेकिन उसके मन में एक और चिंता पैदा हो गई।
इलाज का खर्च।
उसने जेब से मोबाइल निकाला।
बैंक बैलेंस देखा।
उसके पास सीमित पैसे थे।
उसने आँखें बंद कर लीं।
उसे लगा जैसे जिंदगी उसे एक के बाद एक परीक्षा दे रही है।
नौकरी नहीं।
लोन।
घर का खर्च।
और अब पापा की बीमारी।
निशा उसके पास आकर बैठी।
“क्या सोच रहे हो?”
“पैसों के बारे में।”
“अभी पापा ठीक हैं। पहले उनका इलाज।”
“लेकिन खर्च?”
निशा ने कहा—
“हम संभाल लेंगे।”
मिहिर ने उसकी तरफ देखा।
“हर बार तुम यही कहती हो।”
“क्योंकि हर बार तुम्हें यही सुनने की जरूरत होती है।”
मिहिर की आँखें भर आईं।
कुछ देर बाद पापा को कमरे में शिफ्ट कर दिया गया।
रात काफी हो चुकी थी।
मिहिर उनके पास बैठा था।
पापा ने आँखें खोलीं।
“मिहिर…”
“हाँ पापा।”
“तू परेशान है?”
मिहिर ने मुस्कुराकर कहा—
“नहीं।”
पापा ने हल्की मुस्कान के साथ कहा—
“फिर वही झूठ।”
मिहिर चुप हो गया।
पापा ने उसका हाथ पकड़ लिया।
“बेटा, मेरी वजह से अपनी जिंदगी मत रोकना।”
“ऐसा मत बोलिए।”
“सच कह रहा हूँ।”
“आप मेरे पापा हैं।”
“और तू मेरा बेटा।”
पापा की आवाज धीमी हो गई।
“बेटे का काम सिर्फ पिता की जिम्मेदारी उठाना नहीं होता।”
मिहिर की आँखों में आँसू आ गए।
“तो क्या होता है?”
पापा ने कहा—
“अपनी जिंदगी जीना भी होता है।”
मिहिर ने सिर झुका लिया।
अगले दिन सुबह अस्पताल से निकलते समय उसका मोबाइल फिर बजा।
वही कंपनी का नंबर था।
उसका दिल तेज धड़कने लगा।
“हैलो?”
“नमस्ते मिहिर जी।”
“जी।”
“हमने आपका इंटरव्यू और प्रोफाइल देखा।”
मिहिर चुपचाप सुनता रहा।
“हमें आपको एक ऑफर देना है।”
मिहिर की आँखें बंद हो गईं।
उसने राहत की साँस ली।
“जी… बताइए।”
कंपनी ने उसे नौकरी की पेशकश की थी।
वेतन पहले से थोड़ा कम था।
लेकिन नौकरी अच्छी थी।
बस एक समस्या थी—
ऑफिस दूसरे शहर में था।
मिहिर कुछ पल चुप रहा।
“क्या मुझे थोड़ा समय मिल सकता है?”
“जी बिल्कुल। आप कल तक बता सकते हैं।”
फोन कट गया।
मिहिर अस्पताल की सीढ़ियों पर बैठ गया।
एक तरफ नौकरी थी।
दूसरी तरफ परिवार।
अगर नौकरी स्वीकार करता तो उसे दूसरे शहर जाना पड़ता।
अगर मना करता तो पता नहीं अगला मौका कब मिलता।
उसने निशा को फोन किया।
“निशा…”
“हाँ?”
“मुझे नौकरी मिल गई है।”
निशा खुशी से बोली—
“सच?”
“हाँ।”
“तो फिर इतनी आवाज भारी क्यों है?”
मिहिर ने कहा—
“ऑफिस दूसरे शहर में है।”
फोन के दूसरी तरफ कुछ पल खामोशी रही।
मिहिर ने धीरे से पूछा—
“क्या करूँ?”
निशा ने तुरंत जवाब नहीं दिया।
फिर बोली—
“तुम क्या करना चाहते हो?”
मिहिर ने पहली बार खुद से यह सवाल पूछा।
वह हमेशा सोचता था—
परिवार क्या चाहता है?
पापा क्या चाहते हैं?
माँ क्या चाहती हैं?
निशा क्या चाहती है?
लेकिन आज पहली बार सवाल था—
“मिहिर क्या चाहता है?”
वह देर तक सोचता रहा।
और फिर उसने एक फैसला लिया।
ऐसा फैसला…
जो आने वाले दिनों में उसके रिश्तों की असली परीक्षा लेने वाला था।