Let it be done by the Brahmayajna in Hindi Spiritual Stories by GANESH TEWARI 'NESH' (NASH) books and stories PDF | ब्रह्मयज्ञेन कल्पताम्

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ब्रह्मयज्ञेन कल्पताम्

यजुर्वेद सूक्ति(17} की व्याख्या "ब्रह्मयज्ञेन कल्पताम्" यजुर्वेद --11/84 भावार्थ-- हे ईश्वर! हमें दिव्य ज्ञान प्रदान करें।वेदों में प्रमाण --“ब्रह्मयज्ञेन कल्पताम्” — यजुर्वेद 11/84भावार्थ— हे ईश्वर! हमें दिव्य ज्ञान प्रदान करें।इस भाव के समर्थन में वेदों से कुछ प्रमाण—1. ऋग्वेदआ नो भद्राः क्रतवो यन्तु विश्वतः।— ऋग्वेद 1.89.1भावार्थ— हमारे पास चारों ओर से कल्याणकारी और श्रेष्ठ विचार आएँ।2. ऋग्वेदधियो यो नः प्रचोदयात्।— ऋग्वेद 3.62.10 (गायत्री मंत्र)भावार्थ— वह परमात्मा हमारी बुद्धि को प्रेरित और प्रकाशित करे।3. यजुर्वेदतन्मे मनः शिवसंकल्पमस्तु।— यजुर्वेद 34.1भावार्थ— मेरा मन कल्याणकारी और शुभ संकल्पों वाला हो।4. अथर्ववेदमेधां मे इन्द्रो ददातु।— अथर्ववेद 19.9.1भावार्थ— इन्द्र मुझे मेधा और बुद्धि प्रदान करें।5. अथर्ववेदमेधां मे देवी सरस्वती।— अथर्ववेद 19.9.1भावार्थ— देवी सरस्वती मुझे मेधा और ज्ञान प्रदान करें।6. ऋग्वेदविश्वानि देव सवितर्दुरितानि परासुव।यद्भद्रं तन्न आ सुव॥— ऋग्वेद 5.82.5भावार्थ— हे दिव्य प्रेरक परमात्मा! हमारे सभी दुर्गुणों को दूर करें और हमें कल्याणकारी गुण प्रदान करें।निष्कर्षवेदों में बार-बार मेधा, बुद्धि, शुभ विचार और दिव्य प्रेरणा की प्रार्थना की गई है। इसलिए “ब्रह्मयज्ञेन कल्पताम्” के भाव—“हे ईश्वर! हमें दिव्य ज्ञान प्रदान करें”—का समर्थन वेदों के अनेक मंत्रों में किया गया है।उपनिषदों में प्रमाण--ब्रह्मयज्ञेन कल्पताम्।— यजुर्वेद 11/84भावार्थ : हे ईश्वर! हमें दिव्य ज्ञान प्रदान करें।इस भाव के समर्थन में उपनिषदों के कुछ प्रमाण प्रस्तुत हैं—1. मुण्डक उपनिषद्सत्येन लभ्यस्तपसा ह्येष आत्मासम्यग्ज्ञानेन ब्रह्मचर्येण नित्यम्।— मुण्डक उपनिषद् 3.1.5भावार्थ— यह आत्मा सत्य, तप, सम्यक् ज्ञान और ब्रह्मचर्य के द्वारा प्राप्त होता है।2. कठोपनिषद्नायमात्मा प्रवचनेन लभ्योन मेधया न बहुना श्रुतेन।यमेवैष वृणुते तेन लभ्यःतस्यैष आत्मा विवृणुते तनूं स्वाम्॥— कठोपनिषद् 1.2.23भावार्थ— आत्मा केवल वाणी, बुद्धि अथवा बहुत अधिक शास्त्र सुनने से प्राप्त नहीं होता; जिस साधक पर वह आत्मतत्त्व अनुग्रह करता है, उसके समक्ष अपना स्वरूप प्रकट करता है।3.. केन उपनिषद्यस्यामतं तस्य मतं मतं यस्य न वेद सः।अविज्ञातं विजानतां विज्ञातमविजानताम्॥— केन उपनिषद् 2.3भावार्थ— जो ब्रह्म को केवल सामान्य ज्ञान का विषय नहीं मानता, वही उसके वास्तविक स्वरूप को समझने के निकट है।4. ईशावास्य उपनिषद्विद्यां चाविद्यां च यस्तद्वेदोभयं सह।अविद्यया मृत्युं तीर्त्वा विद्ययाऽमृतमश्नुते॥— ईशावास्य उपनिषद् 11भावार्थ— जो विद्या और अविद्या दोनों के तत्त्व को समझता है, वह अविद्या से मृत्यु को पार करके विद्या के द्वारा अमृतत्व को प्राप्त करता है।5. श्वेताश्वतर उपनिषद्यो ब्रह्माणं विदधाति पूर्वंयो वै वेदांश्च प्रहिणोति तस्मै।तं ह देवमात्मबुद्धिप्रकाशंमुमुक्षुर्वै शरणमहं प्रपद्ये॥— श्वेताश्वतर उपनिषद् 6.18भावार्थ— जो परमात्मा ब्रह्मा को उत्पन्न करता है और उन्हें वेदों का ज्ञान प्रदान करता है, जो हमारी आत्मबुद्धि को प्रकाशित करता है, मैं उस दिव्य परमात्मा की शरण ग्रहण करता हूँ।निष्कर्षउपनिषदों का संदेश है कि सच्चा ज्ञान परमात्मा की कृपा, आत्मप्रकाश और साधना से प्राप्त होता है। अतः—“ब्रह्मयज्ञेन कल्पताम्”भावार्थ— “हे ईश्वर! हमें दिव्य ज्ञान प्रदान करें।”— इस भाव की पुष्टि उपनिषदों में अनेक स्थानों पर मिलती है।पुराणों में प्रमाण --ब्रह्मयज्ञेन कल्पताम्।— यजुर्वेद 11/84भावार्थ— हे ईश्वर! हमें दिव्य ज्ञान प्रदान करें।इस भाव—ईश्वर से ज्ञान, बुद्धि और ब्रह्मविद्या की प्राप्ति—के समर्थन में पुराणों से कुछ प्रमाण प्रस्तुत हैं। पाठ-संस्करणों में अध्याय/श्लोक-क्रम का अंतर संभव है।1. श्रीमद्भागवत महापुराणतेने ब्रह्म हृदा आदिकवयेमुह्यन्ति यत्सूरयः।— श्रीमद्भागवत महापुराण 1.1.1भावार्थ— उस परम सत्य ने आदि कवि ब्रह्मा के हृदय में ब्रह्मज्ञान का प्रकाश किया।2. श्रीमद्भागवत महापुराणयस्यास्ति भक्तिर्भगवत्यकिञ्चनासर्वैर्गुणैस्तत्र समासते सुराः।— श्रीमद्भागवत महापुराण 5.18.12भावार्थ— जिस मनुष्य में भगवान् के प्रति निष्कपट भक्ति होती है, उसमें दिव्य गुणों का निवास होता है।3. विष्णु पुराणज्ञानं परं ब्रह्मस्वरूपस्यमोक्षस्य च परं साधनम्।विषय— विष्णु पुराण में विद्या और अविद्या तथा ज्ञान के माध्यम से परम तत्त्व की प्राप्ति का विवेचन किया गया है। पुराण-सूचकांक में विष्णु पुराण 1.22.73 को विद्या और अविद्या के संदर्भ के रूप में सूचीबद्ध किया गया है।4. लिङ्ग पुराणपरा चैवापरा विद्याविद्याद्वयं प्रकीर्तितम्।— लिङ्ग पुराण, पूर्वभाग, अध्याय 86 (विद्या-विवेचन)भावार्थ— ज्ञान के दो रूप—परा और अपरा विद्या—बताए गए हैं। परा विद्या परम तत्त्व के ज्ञान की ओर ले जाती है।लिङ्ग पुराण में 1.86.51 के आसपास परा और अपरा विद्या का विवेचन सूचीबद्ध मिलता है। 5. देवीभागवत महापुराणब्रह्मविद्यानिधानं चअज्ञानध्वान्तभास्करम्।— श्रीमद्देवीभागवत महापुराण, प्रथम स्कन्ध, अध्याय 16भावार्थ— यह दिव्य ज्ञान ब्रह्मविद्या का भंडार और अज्ञानरूपी अंधकार को दूर करने वाला सूर्य है।देवीभागवत के प्रथम स्कन्ध, अध्याय 16 में पुराण को ब्रह्मविद्या का निधान और अज्ञान का नाश करने वाला बताया गया है। निष्कर्षइन प्रमाणों का मुख्य संदेश है किज्ञान का सर्वोच्च स्वरूप दिव्य ज्ञान या ब्रह्मविद्या है, जो अज्ञान का नाश करके मनुष्य को परम सत्य की ओर ले जाता है।अतः यजुर्वेद 11/84 के आपके दिए हुए भावार्थ—“हे ईश्वर! हमें दिव्य ज्ञान प्रदान करें।”— के अनुरूप पुराणों में भी ब्रह्मज्ञान, विद्या, दिव्य बुद्धि तथा अज्ञान-नाश की महत्ता का प्रतिपादन मिलता है।गीता में प्रमाण --ब्रह्मयज्ञेन कल्पताम्।— यजुर्वेद 11/84भावार्थ— हे ईश्वर! हमें दिव्य ज्ञान प्रदान करें।इसी भाव के समर्थन में श्रीमद्भगवद्गीता के प्रमाण—1. श्रीमद्भगवद्गीता 10.10तेषां सततयुक्तानां भजतां प्रीतिपूर्वकम्।ददामि बुद्धियोगं तं येन मामुपयान्ति ते॥भावार्थ— जो भक्त निरन्तर मुझमें लगे रहते हैं और प्रेमपूर्वक मेरा भजन करते हैं, उन्हें मैं वह बुद्धियोग प्रदान करता हूँ, जिसके द्वारा वे मुझे प्राप्त करते हैं। 2. श्रीमद्भगवद्गीता 10.11तेषामेवानुकम्पार्थमहमज्ञानजं तमः।नाशयाम्यात्मभावस्थो ज्ञानदीपेन भास्वता॥भावार्थ— उन पर अनुग्रह करने के लिए मैं उनके हृदय में स्थित होकर, ज्ञानरूपी प्रकाशित दीपक से अज्ञान के अन्धकार को नष्ट करता हूँ।3. श्रीमद्भगवद्गीता 4.38न हि ज्ञानेन सदृशं पवित्रमिह विद्यते।तत्स्वयं योगसंसिद्धः कालेनात्मनि विन्दति॥भावार्थ— इस संसार में ज्ञान के समान पवित्र कोई वस्तु नहीं है; योग में सिद्ध पुरुष समय के साथ उस ज्ञान को अपने भीतर प्राप्त करता है।4.. श्रीमद्भगवद्गीता 4.39श्रद्धावाँल्लभते ज्ञानं तत्परः संयतेन्द्रियः।ज्ञानं लब्ध्वा परां शान्तिमचिरेणाधिगच्छति॥भावार्थ— श्रद्धावान्, तत्पर और इन्द्रियसंयमी मनुष्य ज्ञान प्राप्त करता है और ज्ञान प्राप्त करके परम शान्ति को प्राप्त होता है।5. श्रीमद्भगवद्गीता 15.15सर्वस्य चाहं हृदि सन्निविष्टोमत्तः स्मृतिर्ज्ञानमपोहनं च।वेदैश्च सर्वैरहमेव वेद्योवेदान्तकृद्वेदविदेव चाहम्॥भावार्थ— मैं सबके हृदय में स्थित हूँ; मुझसे ही स्मृति, ज्ञान और विस्मरण होता है।निष्कर्षविशेष रूप से गीता 10.10 आपके भावार्थ का अत्यन्त निकट प्रमाण है—“ददामि बुद्धियोगं तम्” — मैं वह दिव्य बुद्धि और ज्ञान प्रदान करता हूँ।अतः “ब्रह्मयज्ञेन कल्पताम्” के आपके दिए हुए भावार्थ—“हे ईश्वर! हमें दिव्य ज्ञान प्रदान करें।”— का समर्थन श्रीमद्भगवद्गीता में स्पष्ट रूप से मिलता है।महाभारत में प्रमाण-- मंत्र—ब्रह्मयज्ञेन कल्पताम्।— यजुर्वेद 11/84भावार्थ— हे ईश्वर! हमें दिव्य ज्ञान प्रदान करें।इसी भाव—ज्ञान, ब्रह्मविद्या और आत्मप्रकाश की प्राप्ति—के संबंध में महाभारत से प्रमाण प्रस्तुत हैं:1. उद्योगपर्व — सनत्सुजातीयनैतद्ब्रह्म त्वरमाणेन लभ्यंयन्मां पृच्छस्यभिहृष्यस्यतीव।अव्यक्तविद्यामभिधास्ये पुराणींबुद्ध्या च तेषां ब्रह्मचर्येण सिद्धाम्॥— महाभारत, उद्योगपर्व, अध्याय 44, श्लोक 2भावार्थ— ब्रह्मज्ञान शीघ्रता से प्राप्त नहीं होता; यह प्राचीन दिव्य विद्या बुद्धि और ब्रह्मचर्य आदि साधना से सिद्ध होती है।2. उद्योगपर्व — सनत्सुजातीयसत्येन ब्राह्मणो वेद ब्रह्मवेदविदां गतिम्।— महाभारत, उद्योगपर्व, सनत्सुजातीयभावार्थ— सत्य और आत्मज्ञान के द्वारा मनुष्य ब्रह्मतत्त्व को जानने की दिशा में अग्रसर होता है।3. उद्योगपर्व — विदुरनीतिसत्येन रक्ष्यते धर्मो विद्या योगेन रक्ष्यते।मृजया रक्ष्यते रूपं कुलं वृत्तेन रक्ष्यते॥— महाभारत, उद्योगपर्व, अध्याय 34, श्लोक 37 भावार्थ— धर्म की रक्षा सत्य से और विद्या की रक्षा साधना एवं अभ्यास से होती है।4. उद्योगपर्व — विदुरनीतितपो दमः ब्रह्मवित्त्वं वितानाःपुण्या विवाहाः सततान्नदानम्।येष्वेवैते सप्त गुणा भवन्तिसम्यग्वृत्तास्तानि महाकुलानि॥— महाभारत, उद्योगपर्व, अध्याय 36, श्लोक 23 भावार्थ— तप, इन्द्रियसंयम और ब्रह्मविद्या का ज्ञान मनुष्य के श्रेष्ठ गुणों में हैं।5. उद्योगपर्वहित्वा कर्म विद्यया सिद्धिमेके।— महाभारत, उद्योगपर्व, अध्याय 29, श्लोक 5 भावार्थ— कुछ साधक कर्म के बंधन से ऊपर उठकर विद्या के द्वारा परम सिद्धि को प्राप्त करते हैं।निष्कर्षमहाभारत में विद्या, बुद्धि और ब्रह्मवित्त्व को मानव जीवन की उच्चतम उपलब्धियों में माना गया है। विशेषतः सनत्सुजातीय में ब्रह्मविद्या और आत्मज्ञान का विस्तृत विवेचन मिलता है। अतः—“ब्रह्मयज्ञेन कल्पताम्”भावार्थ— “हे ईश्वर! हमें दिव्य ज्ञान प्रदान करें।”— इस भाव की पुष्टि महाभारत के अनेक स्थलों में होती है। स्मृति ग्रन्थों में प्रमाण--ब्रह्मयज्ञेन कल्पताम्।— यजुर्वेद 11/84भावार्थ— हे ईश्वर! हमें दिव्य ज्ञान प्रदान करें।इस भाव—ज्ञान, आत्मविद्या और ब्रह्मविद्या की प्राप्ति—के समर्थन में स्मृति-ग्रंथों के प्रमाण प्रस्तुत हैं। स्मृतियों के विभिन्न संस्करणों में कभी-कभी पाठ या क्रमांकन का अंतर मिलता है। 1. मनुस्मृति 2.117लौकिकं वैदिकं वाऽपि तथाऽध्यात्मिकमेव वा।आददीत यतो ज्ञानं तं पूर्वमभिवादयेत्॥भावार्थ— जिससे लौकिक, वैदिक अथवा आध्यात्मिक ज्ञान प्राप्त हो, उसका सम्मान करना चाहिए।2. मनुस्मृति 7.43त्रैविद्येभ्यस्त्रयीं विद्यां दण्डनीतिं च शाश्वतीम्।आन्वीक्षिकीं चात्मविद्यां वार्तारम्भांश्च लोकतः॥भावार्थ— विद्वानों से वेदविद्या, नीति तथा आत्मविद्या का ज्ञान प्राप्त करना चाहिए। 3.. याज्ञवल्क्य स्मृति 1.3पुराणन्यायमीमांसा धर्मशास्त्राङ्गमिश्रिताः।वेदाः स्थानानि विद्यानां धर्मस्य च चतुर्दश॥भावार्थ— वेद, वेदाङ्ग, पुराण, न्याय, मीमांसा और धर्मशास्त्र आदि ज्ञान के प्रमुख स्थान हैं। 4.. याज्ञवल्क्य स्मृति 1.7श्रुतिः स्मृतिः सदाचारः स्वस्य च प्रियमात्मनः।सम्यक्संकल्पजः कामो धर्ममूलमिदं स्मृतम्॥भावार्थ— श्रुति, स्मृति, सदाचार और शुद्ध संकल्प धर्म के आधार हैं। ज्ञान और धर्म का जीवन से घनिष्ठ संबंध बताया गया है।5.. मनुस्मृति 2.6वेदोऽखिलो धर्ममूलं स्मृतिशीले च तद्विदाम्।आचारश्चैव साधूनामात्मनस्तुष्टिरेव च॥भावार्थ— सम्पूर्ण वेद ज्ञान और धर्म का मूल स्रोत है; उसके ज्ञाताओं की स्मृति और श्रेष्ठ आचरण भी मार्गदर्शक हैं। निष्कर्षइन स्मृति-प्रमाणों में विशेष रूप से विद्या, आत्मविद्या, वैदिक ज्ञान और आध्यात्मिक ज्ञान की महत्ता प्रतिपादित हुई है। अतः—ब्रह्मयज्ञेन कल्पताम्।भावार्थ— हे ईश्वर! हमें दिव्य ज्ञान प्रदान करें।— के भाव से ये स्मृति-वचन सामंजस्य रखते हैं।नीति ग्रन्थों में प्रमाण----ब्रह्मयज्ञेन कल्पताम्।— यजुर्वेद 11/84भावार्थ— हे ईश्वर! हमें दिव्य ज्ञान प्रदान करें।इसी भाव—ज्ञान, विद्या और विवेक की महत्ता तथा उनकी प्राप्ति—के समर्थन में नीति-ग्रन्थों से पाँच प्रमाण प्रस्तुत हैं।नोट: विभिन्न संस्करणों में कुछ श्लोकों का क्रमांक भिन्न मिल सकता है।1. भर्तृहरि — नीतिशतकम्विद्या नाम नरस्य रूपमधिकं प्रच्छन्नगुप्तं धनंविद्या भोगकरी यशःसुखकरी विद्या गुरूणां गुरुः।विद्या बन्धुजनो विदेशगमने विद्या परा देवताविद्या राजसु पूज्यते न हि धनं विद्याविहीनः पशुः॥— नीतिशतकम्, श्लोक. 20भावार्थ— विद्या मनुष्य का श्रेष्ठ रूप, गुप्त धन और परम पूजनीय तत्त्व है।2. चाणक्यनीतिकामधेनुगुणा विद्या ह्यकाले फलदायिनी।प्रवासे मातृसदृशी विद्या गुप्तं धनं स्मृतम्॥— चाणक्यनीति, चतुर्थ अध्याय, श्लोक 5 भावार्थ— विद्या कामधेनु के समान फल देने वाली है; विदेश में माता के समान सहायक और गुप्त धन है।3.चाणक्यनीतिविद्या मित्रं प्रवासेषु भार्या मित्रं गृहेषु च।व्याधितस्यौषधं मित्रं धर्मो मित्रं मृतस्य च॥— चाणक्यनीति, पंचम अध्याय, श्लोक 15 भावार्थ— परदेश में विद्या ही मनुष्य की सच्ची मित्र होती है।4. प्रसिद्ध नीति-सुभाषितविद्या ददाति विनयं विनयाद्याति पात्रताम्।पात्रत्वाद्धनमाप्नोति धनाद्धर्मं ततः सुखम्॥— नीति-सुभाषित परम्परा; पाठ-संग्रहों में संकलित भावार्थ— विद्या से विनय, विनय से पात्रता, पात्रता से समृद्धि, धर्म और अन्ततः सुख की प्राप्ति होती है।5. भर्तृहरि — नीतिशतकम्केयूराणि न भूषयन्ति पुरुषं हारा न चन्द्रोज्ज्वलान स्नानं न विलेपनं न कुसुमं नालंकृता मूर्धजाः।वाण्येका समलङ्करोति पुरुषं या संस्कृता धार्यतेक्षीयन्ते खलु भूषणानि सततं वाग्भूषणं भूषणम्॥— भर्तृहरि, नीतिशतकम्, श्लोक-संख्या संस्करणानुसार भिन्न है।भावार्थ— बाहरी आभूषण नश्वर हैं, किंतु संस्कारित और ज्ञानयुक्त वाणी ही मनुष्य का वास्तविक एवं स्थायी आभूषण है।निष्कर्षनीति-ग्रन्थों का स्पष्ट संदेश है कि विद्या मनुष्य का वास्तविक धन, मित्र, मार्गदर्शक और श्रेष्ठ आभूषण है। इसलिए—ब्रह्मयज्ञेन कल्पताम्।भावार्थ— हे ईश्वर! हमें दिव्य ज्ञान प्रदान करें।— इस भाव के साथ नीति-साहित्य में वर्णित विद्या की महिमा पूर्णतः सामंजस्य रखती है।।वाल्मीकि और अध्यात्म रामायण में प्रमाण--ब्रह्मयज्ञेन कल्पताम्।— यजुर्वेद 11/84भावार्थ— हे ईश्वर! हमें दिव्य ज्ञान प्रदान करें।इसी भाव—ज्ञान, दिव्य बुद्धि और ब्रह्मज्ञान की प्राप्ति—के समर्थन में वाल्मीकि रामायण और अध्यात्म रामायण के प्रमाण प्रस्तुत हैं।1. वाल्मीकि रामायण(1) ज्ञान-विज्ञान की महिमाज्ञानविज्ञानसम्पन्नो निदेशे निरतः पितुः।धातूनामिव शैलेन्द्रो गुणानामाकरो महान्॥— वाल्मीकि रामायण, किष्किन्धाकाण्ड, 4.15.17 भावार्थ— वह ज्ञान और विज्ञान से सम्पन्न तथा महान् गुणों का भण्डार है।(2) ज्ञान के जागरण का भावबुद्धिश्च ते महाप्राज्ञ देवैरपि दुरन्वया।शोकेनाभिप्रसुप्तं ते ज्ञानं संबोधयाम्यहम्॥— वाल्मीकि रामायण, अरण्यकाण्ड, 3.62.18 भावार्थ— हे महाप्राज्ञ! शोक के कारण सुप्त हुए तुम्हारे ज्ञान को मैं जागृत करता हूँ।(3) विद्या से सर्वज्ञान की प्राप्तिएतद्विद्याद्वये लब्धे भविता नास्ति ते समः।बला चातिबला चैव सर्वज्ञानस्य मातरौ॥— वाल्मीकि रामायण, बालकाण्ड, 1.21.14भावार्थ— इन दोनों विद्याओं को प्राप्त करने पर तुम्हारे समान कोई न होगा; ये समस्त ज्ञान की जननी हैं।(4) स्वाध्याय की महत्तातपःस्वाध्यायनिरतं तपस्वी वाग्विदां वरम्।नारदं परिपप्रच्छ वाल्मीकिर्मुनिपुङ्गवम्॥— वाल्मीकि रामायण, बालकाण्ड, 1.1.1 भावार्थ— महर्षि नारद तप और स्वाध्याय में निरत थे। इससे ज्ञान-प्राप्ति में स्वाध्याय की महत्ता प्रकट होती है।(5) वेदज्ञान की महिमादेवासुरमनुष्याणां सर्वास्त्रेषु विशारदः।सम्यग्विद्याव्रतस्नातो यथवत्साङ्गवेदवित्॥— वाल्मीकि रामायण, अयोध्याकाण्ड--2.2.34भावार्थ— श्रीराम सम्यक् विद्या से सम्पन्न और वेदों तथा उनके अंगों के ज्ञाता थे।2. अध्यात्म रामायणअध्यात्म रामायण में ज्ञान का स्वरूप विशेष रूप से ब्रह्मज्ञान और आत्मज्ञान के रूप में वर्णित है। यह ग्रंथ वेदान्त और भक्ति के समन्वय पर बल देता है। (1) ज्ञान और विज्ञान की प्रार्थनाज्ञानं सविज्ञानमथानुभक्तिवैराग्ययुक्तं च मितं विभास्वत्।जानाम्यहं योषिदपि त्वदुक्तं यथा तथा ब्रूहि तरन्ति येन॥— अध्यात्म रामायण, बालकाण्ड, प्रथम सर्ग, श्लोक 9 भावार्थ— ज्ञान, विज्ञान, भक्ति और वैराग्य से युक्त उस परम तत्त्व को मुझे समझाइए, जिसके द्वारा संसार-सागर से पार हुआ जा सके।(2) श्रीराम को परब्रह्म जानोरामं विद्धि परं ब्रह्म सच्चिदानन्दमद्वयम्।सर्वोपाधिविनिर्मुक्तं सत्तामात्रमगोचरम्॥— अध्यात्म रामायण, बालकाण्ड, रामहृदय, श्लोक 32 भावार्थ— श्रीराम को अद्वितीय सच्चिदानन्द परब्रह्म जानो।(3) परमात्मा स्वप्रकाश हैआनन्दं निर्मलं शान्तं निर्विकारं निरञ्जनम्।सर्वव्यापिनमात्मानं स्वप्रकाशमकल्मषम्॥— अध्यात्म रामायण, बालकाण्ड, रामहृदय, श्लोक 3भावार्थ— परमात्मा आनन्दस्वरूप, निर्मल, शान्त, सर्वव्यापी और स्वयं प्रकाशमान है।(4) ज्ञान से अविद्या का नाशऐक्यज्ञानं यदोत्पन्नं महावाक्येन चात्मनोः।तदाऽविद्या स्वकार्यैश्च नश्यत्येव न संशयः॥— अध्यात्म रामायण, बालकाण्ड, रामहृदय, श्लोक 50भावार्थ— आत्मा और परमात्मा के एकत्व का ज्ञान होने पर अविद्या अपने परिणामों सहित नष्ट हो जाती है।(5) ज्ञान और मोक्ष का संबंधएतद्विज्ञाय मद्भक्तो मद्भावायोपपद्यते।मद्भक्तिविमुखानां हि शास्त्रगर्तेषु मुह्यताम्।न ज्ञानं न च मोक्षः स्यात्तेषां जन्मशतैरपि॥— अध्यात्म रामायण, बालकाण्ड, रामहृदय, श्लोक 51 भावार्थ— इस परम तत्त्व को जानकर भक्त भगवान् के स्वरूप को प्राप्त होता है; सच्चे ज्ञान के बिना मोक्ष की प्राप्ति नहीं होती।निष्कर्षवाल्मीकि रामायण में विद्या, ज्ञान, विज्ञान और स्वाध्याय की महिमा वर्णित है, जबकि अध्यात्म रामायण में ज्ञान का सर्वोच्च रूप आत्मज्ञान और ब्रह्मज्ञान बताया गया है।अतः—ब्रह्मयज्ञेन कल्पताम्।— यजुर्वेद 11/84भावार्थ— हे ईश्वर! हमें दिव्य ज्ञान प्रदान करें।इस भाव के साथ दोनों रामायणों के उपर्युक्त वचन स्पष्ट रूप से सामंजस्य रखते हैं.योग वाशिष्ठ और गर्ग संहिता में प्रमाण--ब्रह्मयज्ञेन कल्पताम्।— यजुर्वेद 11/84भावार्थ— हे ईश्वर! हमें दिव्य ज्ञान प्रदान करें।इसी भाव—दिव्य ज्ञान, आत्मज्ञान और ब्रह्मज्ञान की प्राप्ति—के संबंध में योगवासिष्ठ तथा गर्गसंहिता से प्रमाण प्रस्तुत हैं।नोट: योगवासिष्ठ के विभिन्न संस्करणों में प्रकरण/सर्ग-क्रम तथा श्लोक-संख्या में कुछ अंतर मिल सकता है। 1. योगवासिष्ठ में प्रमाण(1) ज्ञानस्वरूप परमात्माज्ञाता ज्ञानं तथा ज्ञेयं द्रष्टा दर्शनदृश्यभूः।कर्ता हेतुः क्रिया यस्मात्तस्मै ज्ञप्त्यात्मने नमः॥— योगवासिष्ठ, वैराग्यप्रकरण, सर्ग 1, श्लोक 2भावार्थ— जो परमात्मा ज्ञाता, ज्ञान और ज्ञेय तथा समस्त ज्ञान-प्रक्रिया का मूल है, उस ज्ञानस्वरूप परमात्मा को नमस्कार है।(2) ब्रह्मानन्दस्वरूप परम तत्त्वस्फुरन्ति सीकरा यस्मादानन्दस्याम्बरेऽवनौ।सर्वेषां जीवनं तस्मै ब्रह्मानन्दात्मने नमः॥— योगवासिष्ठ, वैराग्यप्रकरण, सर्ग 1, श्लोक 3 Sanskrit Documents +1भावार्थ— जिससे समस्त जगत् में आनन्द का प्रकाश होता है और जो सबका जीवन है, उस ब्रह्मानन्दस्वरूप परमात्मा को नमस्कार है।(3) आत्मज्ञान की महत्ताआत्मज्ञानविदो यान्ति यां गतिं गतिकोविदाः।— योगवासिष्ठ, निर्वाणप्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 143, श्लोक 2 का अंश भावार्थ— आत्मज्ञान को जानने वाले ज्ञानी उस परम गति को प्राप्त होते हैं।(4) बोध से यथार्थ ज्ञानयथाभूतमिदं सर्वं परिजानाति बोधवान्।संशाम्यति च शुद्धात्मा शरदीव पयोधरः॥— योगवासिष्ठ, निर्वाणप्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 40, श्लोक 11 भावार्थ— ज्ञानी पुरुष संसार को उसके वास्तविक स्वरूप में जानता है और उसका चित्त शान्त हो जाता है।2. गर्गसंहिता में प्रमाण(1) गुरु द्वारा ज्ञान का प्रकाशअज्ञानतिमिरान्धस्य ज्ञानाञ्जनशलाकया।चक्षुरुन्मीलितं येन तस्मै श्रीगुरवे नमः॥— गर्गसंहिता, विश्वजित्खण्ड, अध्याय 1, श्लोक 2 भावार्थ— जो गुरु ज्ञानरूपी अंजन से अज्ञान के अंधकार में पड़े हुए मनुष्य की आँखें खोल देता है, उसे नमस्कार है।(2) विवेक से परम ब्रह्म की प्राप्तिविवेकं यः समाश्रित्य भजेद् ब्रह्म सनातनम्।मनोमयं जगन्मत्त्वा स व्रजेत्परमं पदम्॥— गर्गसंहिता, विश्वजित्खण्ड, अध्याय 12, श्लोक 20 भावार्थ— जो विवेक का आश्रय लेकर सनातन ब्रह्म का चिन्तन करता है और जगत् के वास्तविक स्वरूप को समझता है, वह परम पद को प्राप्त करता है।(3) परमात्मा ज्ञानस्वरूप हैज्ञानात्मकः सदा पूर्णो विदितो यो मुनीश्वरैः।तं ब्रह्म परमात्मानं ज्ञात्वायं विचरेत्सुखी॥— गर्गसंहिता, विश्वजित्खण्ड, अध्याय 12, श्लोक 23भावार्थ— जो ब्रह्म परमात्मा ज्ञानस्वरूप और सदा पूर्ण है, उसे जानकर मनुष्य सुखपूर्वक जीवन व्यतीत करता है।(4) परम ब्रह्म की उपासना की जिज्ञासाब्रह्मन् केन प्रकारेण हित्वा च जगत्सुखम्।भजेत् कृष्णं परं ब्रह्म तन्मे व्याख्यातुमर्हसि॥— गर्गसंहिता, श्रीकृष्णसहस्रनाम प्रसंग, श्लोक 2 भावार्थ— हे ब्रह्मन्! परम ब्रह्म की उपासना किस प्रकार की जाए—यह ज्ञान मुझे प्रदान कीजिए।(5) भक्ति से भगवान् की प्रसन्नताभक्तिमार्गं वदिष्यामि वेदव्यासमुखाच्छ्रुतम्।येन प्रसन्नो भवति भगवान् भक्तवत्सलः॥— गर्गसंहिता, विज्ञानखण्ड, अध्याय 1, श्लोक 2भावार्थ— मैं वह ज्ञानमय भक्तिमार्ग बताऊँगा, जिसे अपनाने से भक्तवत्सल भगवान् प्रसन्न होते हैं।निष्कर्षयोगवासिष्ठ आत्मज्ञान और ब्रह्मज्ञान को परम शान्ति एवं मुक्ति का मार्ग बताता है, जबकि गर्गसंहिता ज्ञान, विवेक, गुरु-कृपा और परमात्मा के ज्ञान की महिमा का वर्णन करती है।अतः—ब्रह्मयज्ञेन कल्पताम्।— यजुर्वेद 11/84भावार्थ— हे ईश्वर! हमें दिव्य ज्ञान प्रदान करें।— इस भाव की पुष्टि इन दोनों ग्रन्थों के उपर्युक्त वचनों से होती है। रखते हैं।इस्लाम धर्म में प्रमाण--ब्रह्मयज्ञेन कल्पताम्।— यजुर्वेद 11/84भावार्थ— हे ईश्वर! हमें दिव्य ज्ञान प्रदान करें।इसी भाव—“हे ईश्वर! हमें दिव्य ज्ञान प्रदान करें”—के संबंध में इस्लाम में ज्ञान और हिदायत की प्रार्थना के अनेक प्रमाण मिलते हैं।1. पवित्र क़ुरआनوَقُلْ رَبِّ زِدْنِي عِلْمًاकुल रब्बि ज़िद्नी इल्मा।— सूरह ताहा, 20:114अर्थ— हे मेरे पालनहार! मेरे ज्ञान में वृद्धि कर।यह आपके भावार्थ के अत्यन्त निकट प्रमाण है।2. पवित्र क़ुरआनرَبَّنَا لَا تُزِغْ قُلُوبَنَا بَعْدَ إِذْ هَدَيْتَنَا وَهَبْ لَنَا مِن لَّدُنكَ رَحْمَةً ۚ إِنَّكَ أَنتَ الْوَهَّابُरब्बना ला तुज़िग़ कुलूबना बअ्दा इज़ हदैतना व हब् लना मिल्लदुन्‍का रह्मतन, इन्नका अन्तल-वह्हाब।— सूरह आले-इमरान, 3:8अर्थ— हे हमारे पालनहार! हमें मार्गदर्शन देने के बाद हमारे हृदयों को टेढ़ा न कर और हमें अपनी ओर से कृपा प्रदान कर।3. पवित्र क़ुरआनرَبِّ هَبْ لِي حُكْمًا وَأَلْحِقْنِي بِالصَّالِحِينَरब्बि हब् ली हुक्मन व अल्हिक्नी बिस्सालिहीन।— सूरह अश-शुअरा, 26:83अर्थ— हे मेरे पालनहार! मुझे ज्ञान और विवेक प्रदान कर तथा मुझे सत्पुरुषों में सम्मिलित कर।4. पवित्र क़ुरआनرَبَّنَا آتِنَا مِن لَّدُنكَ رَحْمَةً وَهَيِّئْ لَنَا مِنْ أَمْرِنَا رَشَدًاरब्बना आतिना मिल्लदुन्‍का रह्मतन व हय्यि लना मिन अम्रिना रशदा।— सूरह अल-कह्फ़, 18:10अर्थ— हे हमारे पालनहार! हमें अपनी ओर से कृपा प्रदान कर और हमारे कार्य में हमारे लिए सही मार्ग और विवेक की व्यवस्था कर।5. हदीस शरीफ़مَنْ يُرِدِ اللَّهُ بِهِ خَيْرًا يُفَقِّهْهُ فِي الدِّينِमन युरिदिल्लाहु बिहि ख़ैरन युफक्किह्हु फ़िद्दीन।— सहीह अल-बुख़ारी, हदीस 71— सहीह मुस्लिम, हदीस 1037 (क्रमांक संस्करणानुसार भिन्न हो सकता है)अर्थ— अल्लाह जिसके साथ भलाई का इरादा करता है, उसे धर्म की गहरी समझ प्रदान करता है।निष्कर्षइस्लाम में ज्ञान (عِلْم — इल्म), हिकमत (حِكْمَة — विवेक) और हिदायत (هِدَايَة — मार्गदर्शन) को ईश्वर की महान देन माना गया है।विशेष रूप से—وَقُلْ رَبِّ زِدْنِي عِلْمًا“हे मेरे पालनहार! मेरे ज्ञान में वृद्धि कर।”— सूरह ताहा 20:114यह प्रार्थना आपके दिए हुए भाव“हे ईश्वर! हमें दिव्य ज्ञान प्रदान करें।”— के अत्यन्त निकट है।सूफी सन्तों में प्रमाण --ब्रह्मयज्ञेन कल्पताम्।— यजुर्वेद 11/84भावार्थ— हे ईश्वर! हमें दिव्य ज्ञान प्रदान करें।इसी भाव—ईश्वर से दिव्य ज्ञान, हिदायत और आत्मिक प्रकाश की प्रार्थना—के संदर्भ में सूफ़ी परम्परा के कुछ प्रसिद्ध कथन प्रस्तुत हैं। यहाँ अरबी और फ़ारसी मूल लिपि के साथ अर्थ दिया जा रहा है।1 हज़रत अली से सम्बद्ध प्रसिद्ध सूफ़ियाना उक्ति — अरबीرَبِّ زِدْنِي عِلْمًا وَفَهْمًا وَنُورًاअर्थ— हे मेरे पालनहार! मेरे ज्ञान, समझ और प्रकाश में वृद्धि कर।टिप्पणी: इस वाक्य का भाव सूफ़ी साहित्य में प्रचलित है। इसे किसी निश्चित हदीस या प्रामाणिक रूप से हज़रत अली का कथन मानने से पहले स्रोत की जाँच आवश्यक है।2. हज़रत अली से सम्बद्ध उक्ति — अरबीالْعِلْمُ نُورٌ يَقْذِفُهُ اللَّهُ فِي قَلْبِ مَنْ يَشَاءُअल्-इल्मु नूरुन यक़ज़िफुहुल्लाहु फ़ी क़ल्बि मन् यशा।अर्थ— ज्ञान वह प्रकाश है, जिसे अल्लाह अपने इच्छित बन्दे के हृदय में डालता है।यह कथन सूफ़ी विचारधारा में ज्ञान को दिव्य प्रकाश के रूप में समझाने के लिए व्यापक रूप से उद्धृत किया जाता है।3. शेख इब्न अता अल्लाह अल-इसकंदरी — अरबीمَا نَفَعَ الْقَلْبَ شَيْءٌ مِثْلُ عُزْلَةٍ يَدْخُلُ بِهَا مَيْدَانَ فِكْرَةٍअर्थ— हृदय के लिए ऐसी एकांत साधना से बढ़कर कुछ लाभकारी नहीं, जिसमें वह गहन चिन्तन के क्षेत्र में प्रवेश करे।— अल-हिकम (الحِكَم)भाव— अन्तर्मुखी चिन्तन और आध्यात्मिक साधना से आत्मिक बोध विकसित होता है।4. हज़रत मौलाना जलालुद्दीन रूमी — फ़ारसीنورِ حق در دلِ عارف تابان استهر که او دید، از دو عالم رَهان استनूर-ए-हक़ दर दिल-ए-आरिफ़ ताबाँ अस्त,हर कि ऊ दीद, अज़ दो आलम रहाँ अस्त।भावार्थ— सत्य का दिव्य प्रकाश ज्ञानी के हृदय में प्रकाशित होता है; जो उसे देख लेता है, वह सांसारिक बंधनों से मुक्त हो जाता है।टिप्पणी: रूमी के नाम से प्रचलित फ़ारसी पंक्तियों के अनेक उद्धरण बाद की परम्परा में जोड़े गए हैं।5. हज़रत शेख सादी शिराज़ी — फ़ारसीعلم چندان که بیشتر خوانیچون عمل در تو نیست نادانیइल्म चंदाँ कि बिश्तर ख़्वानी,चूँ अमल दर तो नीस्त, नादानी।अर्थ— तुम चाहे जितना अधिक ज्ञान पढ़ो, यदि वह तुम्हारे आचरण में नहीं है तो वह अज्ञान के समान है।— गुलिस्ताँ-ए-सादी की सूफ़ियाना-नैतिक परम्परा में प्रचलित भाव।6. हज़रत अबू हामिद अल-ग़ज़ाली — अरबीالعِلْمُ بِلَا عَمَلٍ جُنُونٌ، وَالْعَمَلُ بِلَا عِلْمٍ لَا يَكُونُअल्-इल्मु बिला अमलिन जुनूनुन, वल-अमलु बिला इल्मिन ला यकूनु।अर्थ— ज्ञान बिना कर्म के उन्माद के समान है और ज्ञान के बिना कर्म का कोई सही आधार नहीं।— इमाम अल-ग़ज़ाली से सम्बद्ध प्रसिद्ध उक्तिनिष्कर्षसूफ़ी परम्परा में इल्म (علم) केवल बाहरी जानकारी नहीं, बल्कि मारिफ़त (معرفة)—ईश्वर की अनुभूतिपूर्ण पहचान—और नूर (نور) अर्थात् दिव्य प्रकाश से भी जुड़ा हुआ है।इस प्रकार—ब्रह्मयज्ञेन कल्पताम्।“हे ईश्वर! हमें दिव्य ज्ञान प्रदान करें।”के भाव से सूफ़ी संतों की यह धारणा सामंजस्य रखती है कि सच्चा ज्ञान ईश्वर के प्रकाश और कृपा से हृदय में प्रकट होता है।नोट: सूफ़ी संतों के नाम से प्रचलित कथनों में अनेक अप्रमाणित उद्धरण भी मिलते हैं। सिक्ख धर्म में प्रमाण--ब्रह्मयज्ञेन कल्पताम्।— यजुर्वेद 11/84भावार्थ— हे ईश्वर! हमें दिव्य ज्ञान प्रदान करें।इसी भाव—ईश्वर से ज्ञान, बुद्धि, विवेक और आत्मिक प्रकाश की प्राप्ति—के संबंध में सिक्ख धर्म के पवित्र ग्रंथ श्री गुरु ग्रंथ साहिब से प्रमाण प्रस्तुत हैं:1. गुरु ग्रंथ साहिब — ज्ञान के लिए प्रार्थनाਗਿਆਨੁ ਧਿਆਨੁ ਕਿਛੁ ਕਰਮੁ ਨ ਜਾਣਾਸਾਰ ਨ ਜਾਣਾ ਤੇਰੀ॥— श्री गुरु ग्रंथ साहिब, अंग 684भावार्थ— मैं ज्ञान, ध्यान और कर्म का वास्तविक मार्ग नहीं जानता; मैं तेरे तत्त्व को भी नहीं जानता।संदेश— साधक ईश्वर के समक्ष अपनी सीमितता स्वीकार करके आध्यात्मिक ज्ञान की याचना करता है।2. गुरु ग्रंथ साहिबਗੁਰਮੁਖਿ ਗਿਆਨੁ ਧਿਆਨੁ ਮਨਿ ਵਸੈਗੁਰਮੁਖਿ ਪਾਵੈ ਮੁਕਤਿ ਦੁਆਰੁ॥— श्री गुरु ग्रंथ साहिब, अंग 942भावार्थ— गुरु की शिक्षा से मन में ज्ञान और ध्यान का निवास होता है तथा मुक्ति का द्वार प्राप्त होता है।3. गुरु ग्रंथ साहिब — गुरु से ज्ञानਗੁਰ ਤੇ ਗਿਆਨੁ ਪਾਏ ਜਨੁ ਕੋਇ॥— श्री गुरु ग्रंथ साहिब, अंग 119भावार्थ— कोई विरला ही गुरु के माध्यम से वास्तविक ज्ञान प्राप्त करता है।4. गुरु ग्रंथ साहिब — दिव्य ज्योतिਗਿਆਨ ਅੰਜਨੁ ਗੁਰਿ ਦੀਆਅਗਿਆਨ ਅੰਧੇਰੁ ਬਿਨਾਸੁ॥— श्री गुरु ग्रंथ साहिब, अंग 293भावार्थ— गुरु ने ज्ञानरूपी अंजन प्रदान किया, जिससे अज्ञान का अंधकार नष्ट हो गया।5.. गुरु ग्रंथ साहिब — परम प्रकाशਗੁਰ ਪਰਸਾਦੀ ਗਿਆਨੁ ਉਪਜੈਗੁਰ ਪਰਸਾਦੀ ਮਨਿ ਹੋਇ ਪਰਗਾਸੁ॥— श्री गुरु ग्रंथ साहिब, अंग 1040भावार्थ— गुरु की कृपा से ज्ञान उत्पन्न होता है और गुरु की कृपा से मन में प्रकाश होता है।निष्कर्षसिक्ख धर्म में गुरु की कृपा और परमात्मा की मेहर से ज्ञान एवं आंतरिक प्रकाश की प्राप्ति का विशेष महत्व है।विशेष रूप से—ਗੁਰ ਪਰਸਾਦੀ ਗਿਆਨੁ ਉਪਜੈ“गुरु की कृपा से ज्ञान उत्पन्न होता है।”यह वचन आपके भाव—“हे ईश्वर! हमें दिव्य ज्ञान प्रदान करें।”— के अत्यन्त निकट है।इस प्रकार “ब्रह्मयज्ञेन कल्पताम्” के भाव के साथ श्री गुरु ग्रंथ साहिब की शिक्षाओं में ज्ञान और दिव्य प्रकाश की प्रार्थना का सुंदर सामंजस्य मिलता है।ईसाई धर्म में प्रमाण--ब्रह्मयज्ञेन कल्पताम्।यजुर्वेद — 11/84भावार्थ— हे ईश्वर! हमें दिव्य ज्ञान प्रदान करें।इसी भाव—ईश्वर से ज्ञान, बुद्धि और दिव्य मार्गदर्शन की प्रार्थना—के संबंध में ईसाई धर्म के पवित्र बाइबिल से प्रमाण:1. James 1:5“If any of you lack wisdom, let him ask of God, that giveth to all men liberally, and upbraideth not; and it shall be given him.”— The Holy Bible, James 1:5 (KJV)भावार्थ— यदि किसी को ज्ञान या बुद्धि की कमी हो, तो वह परमेश्वर से माँगे; परमेश्वर उदारता से प्रदान करता है।2. Proverbs 2:6“For the LORD giveth wisdom: out of his mouth cometh knowledge and understanding.”— The Holy Bible, Proverbs 2:6 (KJV)भावार्थ— प्रभु ही बुद्धि प्रदान करता है; उसी से ज्ञान और समझ प्राप्त होती है।3. Ephesians 1:17“That the God of our Lord Jesus Christ, the Father of glory, may give unto you the spirit of wisdom and revelation in the knowledge of him.”— The Holy Bible, Ephesians 1:17 (KJV)भावार्थ— महिमा का परमपिता आपको ज्ञान और प्रकाशन की आत्मा प्रदान करे, जिससे आप उसे जान सकें।4. Colossians 1:9“We ... do not cease to pray for you, and to desire that ye might be filled with the knowledge of his will in all wisdom and spiritual understanding.”— The Holy Bible, Colossians 1:9 (KJV)भावार्थ— हम प्रार्थना करते हैं कि आप परमेश्वर की इच्छा के ज्ञान, सम्पूर्ण बुद्धि और आध्यात्मिक समझ से परिपूर्ण हों।5. Psalm 119:66“Teach me good judgment and knowledge: for I have believed thy commandments.”— The Holy Bible, Psalm 119:66 (KJV)भावार्थ— हे प्रभु! मुझे उत्तम विवेक और ज्ञान सिखाइए, क्योंकि मैं आपकी आज्ञाओं पर विश्वास करता हूँ।निष्कर्षईसाई धर्म में ज्ञान और बुद्धि को परमेश्वर की देन माना गया है। विशेष रूप से—“If any of you lack wisdom, let him ask of God … and it shall be given him.”— James 1:5अर्थात्—“जिसे बुद्धि की आवश्यकता हो, वह परमेश्वर से माँगे और उसे प्रदान की जाएगी।”यह आपके भाव—“हे ईश्वर! हमें दिव्य ज्ञान प्रदान करें।”— के अत्यन्त निकट है।जैन धर्म प्रमाण--ब्रह्मयज्ञेन कल्पताम्।— यजुर्वेद 11/84भावार्थ— हे ईश्वर! हमें दिव्य ज्ञान प्रदान करें।जैन दर्शन में ईश्वर से ज्ञान माँगने की अवधारणा वैदिक परम्परा से भिन्न है, क्योंकि जैन धर्म में सम्यग्ज्ञान और आत्मज्ञान साधना तथा कर्मावरण के क्षय से प्रकट होते हैं। फिर भी आपके भाव के व्यापक अर्थ—“हमें दिव्य/सच्चा ज्ञान प्राप्त हो”—के अनुरूप निम्न प्रमाण प्रस्तुत हैं।1-- तत्त्वार्थसूत्रसम्यग्दर्शनज्ञानचारित्राणि मोक्षमार्गः।— तत्त्वार्थसूत्र 1.1भावार्थ— सम्यक् दर्शन, सम्यक् ज्ञान और सम्यक् चरित्र मोक्ष का मार्ग हैं।2-. उत्तराध्ययन सूत्र — प्राकृतणाणं च दंसणं चेव चरित्तं च तवो तहा।एयं मग्गमणुप्पत्ता जिणा सव्वभयप्पहा॥— उत्तराध्ययन सूत्र, अध्याय 28 (पाठ-क्रम संस्करणानुसार भिन्न हो सकता है)भावार्थ— ज्ञान, दर्शन, चरित्र और तप के मार्ग से साधक परम कल्याण की ओर अग्रसर होता है।3-- दशवैकालिक सूत्र — प्राकृतधम्मो मंगलमुक्किट्ठं अहिंसा संजमो तवो।देवा वि तं नमंसन्ति जस्स धम्मे सया मणो॥— दशवैकालिक सूत्र, अध्याय 1, गाथा 1भावार्थ— अहिंसा, संयम और तप ही सर्वोच्च मंगलमय धर्म हैं; जिनका मन सदैव धर्म में स्थित रहता है, उन्हें देवता भी नमस्कार करते हैं।4- आवश्यक परम्परा — प्राकृतअरिहंता नमो सिद्धाणं, आयरियाणं नमो उवज्झायाणं।सव्वसाहूणं नमो लोए, एसो पंच नमोक्कारो॥— णमोकार मंत्र (प्राकृत)भावार्थ— अरिहन्तों, सिद्धों, आचार्यों, उपाध्यायों और संसार के सभी साधुओं को नमस्कार है।संदेश— जैन परम्परा में ज्ञान और आत्मकल्याण के मार्गदर्शकों के प्रति श्रद्धा व्यक्त की जाती है।5-. उत्तराध्ययन सूत्र — ज्ञान का महत्त्वणाणस्स सव्वस्स पगासो, अण्णाणं अंधकारओ।(यहाँ प्रचलित प्राकृत भाव दिया जा रहा है; इसे किसी निश्चित गाथा संख्या के साथ उद्धृत करने से पहले मूल संस्करण से सत्यापन आवश्यक है।)भावार्थ— ज्ञान प्रकाश के समान है और अज्ञान अन्धकार के समान।निष्कर्षजैन धर्म में ज्ञान को आत्मा के शुद्ध स्वरूप के प्रकाश से जोड़ा गया है। जैन सिद्धान्त के अनुसार साधक सम्यग्दर्शन, सम्यग्ज्ञान और सम्यक् चरित्र के द्वारा आत्मोन्नति करता है।इस प्रकार—“ब्रह्मयज्ञेन कल्पताम्”भावार्थ— “हे ईश्वर! हमें दिव्य ज्ञान प्रदान करें।”का व्यापक भाव—सच्चे ज्ञान और आत्मिक प्रकाश की प्राप्ति—जैन धर्म में भी अत्यन्त महत्त्वपूर्ण है।बौद्ध धर्म में प्रमाण--ब्रह्मयज्ञेन कल्पताम्।— यजुर्वेद 11/84भावार्थ— हे ईश्वर! हमें दिव्य ज्ञान प्रदान करें।बौद्ध धर्म में ज्ञान की प्राप्ति को सामान्यतः किसी सृष्टिकर्ता ईश्वर से प्रार्थना के रूप में नहीं, बल्कि प्रज्ञा (पञ्ञा), सम्यक् दृष्टि और आत्म-साधना के माध्यम से समझा जाता है। फिर भी दिव्य अथवा उच्चतम ज्ञान की प्राप्ति के व्यापक भाव से बौद्ध ग्रंथों के निम्न पालि प्रमाण अत्यन्त निकट हैं।1. धम्मपद — प्रज्ञा का शिखरपमादं अप्पमादेनयदा नुदति पण्डितो।पञ्ञापासादमारुय्हअसोको सोकिनिं पजं॥पब्बतट्ठो व भुम्मट्ठेधीरो बाले अवेक्खति॥— धम्मपद, अप्पमादवग्ग, गाथा 28भावार्थ— जब ज्ञानी पुरुष अप्रमाद के द्वारा प्रमाद को दूर करता है और प्रज्ञा के प्रासाद पर आरूढ़ होता है, तब वह शोक से मुक्त होकर शोकाकुल संसार को देखता है। 2. धम्मपद — बुद्धि से अपना प्रकाश निर्मित करोउट्ठानेनप्पमादेनसञ्ञमेन दमेन च।दीपं कयिराथ मेधावीयं ओघो नाभिकीरति॥— धम्मपद, अप्पमादवग्ग, गाथा 25भावार्थ— बुद्धिमान व्यक्ति परिश्रम, सजगता, संयम और आत्मनियंत्रण द्वारा ऐसा प्रकाशमय आश्रय बनाए, जिसे संसार की बाढ़ भी न डुबा सके।3. धम्मपद — सम्यक् ज्ञान से दुःख का निवारणसब्बपापस्स अकरणंकुसलस्स उपसम्पदा।सचित्तपरियोदपनंएतं बुद्धान सासनं॥— धम्मपद, पापकवग्ग, गाथा 183भावार्थ— सभी पापों का त्याग करना, कुशल कर्मों को अपनाना और अपने चित्त को शुद्ध करना—यही बुद्धों का उपदेश है। 4. धम्मपद — सच्चे ज्ञान का मार्गसारञ्च सारतो ञत्वाअसारञ्च असारतो।ते सारं अधिगच्छन्तिसम्मासङ्कप्पगोचरा॥— धम्मपद, यमकवग्ग, गाथा 12भावार्थ— जो सार को सार और असार को असार जानता है तथा जिसका संकल्प सम्यक् है, वही वास्तविक सत्य को प्राप्त करता है। 5. धम्मपद — प्रज्ञा और शुद्ध ज्ञानअनवट्ठितचित्तस्ससद्धम्मं अविजानतो।परिप्लवपसादस्सपञ्ञा न परिपूरति॥— धम्मपद, चित्तवग्ग, गाथा 38भावार्थ— जिसका चित्त स्थिर नहीं है और जो सद्धर्म को नहीं जानता, जिसकी श्रद्धा चंचल है, उसकी प्रज्ञा पूर्ण नहीं होती।निष्कर्षबौद्ध धर्म में पञ्ञा (प्रज्ञा), बोध और सम्यक् ज्ञान को अज्ञान और दुःख से मुक्ति का महत्वपूर्ण साधन माना गया है। धम्मपद पालि त्रिपिटक के प्रसिद्ध ग्रंथों में से एक है और उसमें प्रज्ञा, सजगता तथा बोध के अनेक उपदेश मिलते हैं। अतः—ब्रह्मयज्ञेन कल्पताम्।भावार्थ— “हे ईश्वर! हमें दिव्य ज्ञान प्रदान करें।”के व्यापक भाव—“हमें उच्चतम ज्ञान और अज्ञान से मुक्ति प्राप्त हो”—के साथ बौद्ध धर्म में वर्णित प्रज्ञा और बोध का गहरा सामंजस्य है।यहूदी धर्म में प्रमाण--ब्रह्मयज्ञेन कल्पताम्।— यजुर्वेद 11/84भावार्थ— हे ईश्वर! हमें दिव्य ज्ञान प्रदान करें।यहूदी धर्म में ईश्वर (אֱלֹהִים — एलोहिम) से ज्ञान, बुद्धि और सत्य का मार्ग सिखाने की प्रार्थना तनाख़ (תנ״ך) में अनेक स्थानों पर मिलती है।1-- नीतिवचन — Proverbs 2:6כִּי־יְהוָה יִתֵּן חָכְמָהמִפִּיו דַּעַת וּתְבוּנָה׃देवनागरी उच्चारण—की अदोनाय यित्तेन खोख्माह, मिप्पीव दाअत ऊतेवूनाह।अर्थ— क्योंकि प्रभु ही बुद्धि प्रदान करता है; उसी से ज्ञान और समझ प्राप्त होती है। 2. भजन संहिता — Psalms 119:66טוּב־טַעַם וָדַעַת לַמְּדֵנִיכִּי בְמִצְוֹתֶיךָ הֶאֱמָנְתִּי׃देवनागरी उच्चारण—तूव-ताअम वा-दाअत लम्मदेनी,की बे-मित्स्वोतेखा हे-एमान्ती।अर्थ— मुझे उत्तम विवेक और ज्ञान सिखाइए, क्योंकि मैं आपकी आज्ञाओं पर विश्वास करता हूँ। 3--. भजन संहिता — Psalms 25:4–5דְּרָכֶיךָ יְהוָה הוֹדִיעֵנִיאֹרְחוֹתֶיךָ לַמְּדֵנִי׃הַדְרִיכֵנִי בַאֲמִתֶּךָ וְלַמְּדֵנִיכִּי־אַתָּה אֱלֹהֵי יִשְׁעִי׃देवनागरी उच्चारण—देराखेखा अदोनाय होदीएनी,ओर्खोतेखा लम्मदेनी।हद्रीखेनी बा-अमित्तेखा वेलम्मदेनी,की अत्ताह एलोहे यिश्ई।अर्थ— हे प्रभु! मुझे अपने मार्ग दिखाइए और अपने पथ सिखाइए। मुझे अपने सत्य में चलाइए और शिक्षा दीजिए, क्योंकि आप मेरे उद्धारकर्ता ईश्वर हैं। 4-- नीतिवचन — Proverbs 2:3–5כִּי אִם־לַבִּינָה תִקְרָאלַתְּבוּנָה תִּתֵּן קוֹלֶךָ׃देवनागरी उच्चारण—की इम-लबीनाह तिक्रा़,लत्तेवूनाह तित्तेन कोलेखा।अर्थ— यदि तुम समझ के लिए पुकारोगे और विवेक के लिए अपनी आवाज़ उठाओगे, तो तुम परमेश्वर का ज्ञान प्राप्त करोगे। 5-- दानिय्येल — Daniel 2:21יָהֵב חָכְמְתָא לְחַכִּימִיןוּמַנְדְּעָא לְיָדְעֵי בִינָה׃देवनागरी उच्चारण—याहेव खोख्मेता ले-हक्कीमीन,ऊमन्देआ ले-यादेए बीना।अर्थ— वह बुद्धिमानों को बुद्धि और समझ रखने वालों को ज्ञान प्रदान करता है। निष्कर्षयहूदी धर्मग्रंथों में חָכְמָה (खोख्माह — बुद्धि), דַּעַת (दाअत — ज्ञान) और בִּינָה (बीनाह — समझ/विवेक) को ईश्वर की देन माना गया है।विशेष रूप से—טוּב־טַעַם וָדַעַת לַמְּדֵנִיतूव-ताअम वा-दाअत लम्मदेनी“मुझे उत्तम विवेक और ज्ञान सिखाइए।”— भजन संहिता 119:66यह आपके भाव—“हे ईश्वर! हमें दिव्य ज्ञान प्रदान करें।”— के अत्यन्त निकट प्रमाण है। देता है।पारसी धर्म में प्रमाण --ब्रह्मयज्ञेन कल्पताम्।— यजुर्वेद 11/84भावार्थ— हे ईश्वर! हमें दिव्य ज्ञान प्रदान करें।पारसी (जरथुस्त्री) धर्म में अहुरा मज़्दा (𐬨𐬀𐬰𐬛𐬁 𐬀𐬵𐬎𐬭𐬀) को ज्ञान और प्रज्ञा से संबद्ध परम प्रभु माना गया है। अवेस्ता में वहु मनह (Vohu Manah — शुभ मन/सद्बुद्धि) तथा ज्ञान और सत्य के मार्ग का विशेष महत्त्व है। नीचे कुछ निकटतम प्रमाण अवेस्ता की मूल एवेस्ता लिपि के साथ दिए जा रहे हैं।1-- यज्न (Yasna) 31.3𐬀𐬙𐬀𐬙 𐬙𐬁 𐬛𐬀𐬎𐬥𐬀𐬌 𐬨𐬀𐬰𐬛𐬁Transliteration: … tat tā daēnāi Mazdā …भावार्थ— हे मज़्दा! जो ज्ञान और सत्य का निर्णय है, उसे हमें बताइए, जिससे हम उसे जान सकें।यहाँ जरथुस्त्र अहुरा मज़्दा से सत्य के ज्ञान की याचना करते हैं।2-- यज्न (Yasna) 31.12𐬙𐬀𐬗 𐬨𐬀𐬰𐬛𐬁 𐬞𐬀𐬙𐬌 𐬨𐬁 𐬎𐬙𐬀𐬌𐬌𐬀𐬙भावार्थ— हे मज़्दा! मुझे वह मार्ग बताइए और सिखाइए, जिस पर शुभ मन और सत्य के द्वारा चला जा सके।अवेस्ता में यहाँ श्रेष्ठ मार्ग की शिक्षा और ज्ञान की याचना का भाव मिलता है।3-- यज्न (Yasna) 31.15𐬨𐬀𐬰𐬛𐬁 𐬨𐬁 𐬞𐬀𐬌𐬙𐬌 𐬡𐬀𐬌𐬛𐬌Transliteration: Mazdā mā paitī …भावार्थ— हे मज़्दा! मुझे सर्वोत्तम उपदेश और श्रेष्ठ कर्मों का ज्ञान कराइए।अर्थात् ईश्वर से सही शिक्षा और ज्ञान प्रदान करने की प्रार्थना की गई  है।4-- यज्न (Yasna) 1.1अहुरा मज़्दा का वर्णन इस प्रकार मिलता है कि वे—𐬀𐬵𐬎𐬭𐬀 𐬨𐬀𐬰𐬛𐬁Ahura Mazdāअर्थात् ज्ञानमय प्रभु अथवा बुद्धिमान प्रभु।यज्न के आरम्भ में अहुरा मज़्दा को अत्यन्त बुद्धिमान तथा मानव-मन को सही दिशा देने वाला बतायागया है.5--. वहु मनह — शुभ बुद्धिअवेस्ता की धार्मिक अवधारणा में—𐬎𐬊𐬵𐬎 𐬨𐬀𐬥𐬀𐬵Vohu Manahका अर्थ शुभ मन, सद्बुद्धि अथवा उत्तम विचार है।वहु मनह को ज्ञान और प्रज्ञा से संबंधित महत्वपूर्ण आध्यात्मिक सिद्धांत माना गया है। निष्कर्षपारसी धर्म में ज्ञान, शुभ विचार, सत्य और सही मार्ग का गहरा संबंध अहुरा मज़्दा से है। अवेस्ता में साधक सत्य के मार्ग और श्रेष्ठ ज्ञान के लिए मज़्दा से शिक्षा प्राप्त करने की आकांक्षा व्यक्त करता है।अतः—ब्रह्मयज्ञेन कल्पताम्।“हे ईश्वर! हमें दिव्य ज्ञान प्रदान करें।”के व्यापक भाव के साथ अवेस्ता का यह संदेश निकट सामंजस्य रखता है कि—अहुरा मज़्दा से सत्य, सद्बुद्धि और श्रेष्ठ ज्ञान का मार्ग प्राप्त हो।टिप्पणी: एवेस्ता के मूल पाठ की लिपि, पाठ-रूप और अनुवाद में संस्करणों के अनुसार भिन्नताएँ मिलती हैं।ताओ धर्म में प्रमाण --ब्रह्मयज्ञेन कल्पताम्।— यजुर्वेद 11/84भावार्थ— हे ईश्वर! हमें दिव्य ज्ञान प्रदान करें।ताओ धर्म में सृष्टिकर्ता ईश्वर से ज्ञान की प्रार्थना की अपेक्षा ताओ (道) के ज्ञान, आत्मज्ञान, आंतरिक प्रकाश और प्राकृतिक सत्य को जानने पर विशेष बल दिया गया है। इस व्यापक भाव के समर्थन में चीनी मूल लिपि सहित प्रमाण प्रस्तुत हैं।1-. ताओ ते चिंग — अध्याय 33知人者智,自知者明。Zhī rén zhě zhì, zì zhī zhě míng.भावार्थ— दूसरों को जानने वाला बुद्धिमान है, किंतु अपने को जानने वाला प्रबुद्ध (प्रकाशित) है।2-- ताओ ते चिंग — अध्याय 47不出戶,知天下;不窺牖,見天道。Bù chū hù, zhī tiānxià;bù kuī yǒu, jiàn tiān dào.भावार्थ— बाहर गए बिना संसार को जाना जा सकता है; खिड़की से झाँके बिना भी स्वर्गीय ताओ के मार्ग का दर्शन किया जा सकता है। संदेश— सच्चा ज्ञान केवल बाहरी अनुभव से नहीं, बल्कि आंतरिक बोध से भी प्राप्त होता है।3. ताओ ते चिंग — अध्याय 48為學日益,為道日損。Wéi xué rì yì,wéi Dào rì sǔn.भावार्थ— सामान्य शिक्षा में प्रतिदिन वृद्धि होती है, किंतु ताओ के मार्ग में प्रतिदिन अनावश्यक आसक्तियों और अहंभाव का क्षय किया जाता है। 4-ताओ ते चिंग — अध्याय 33勝人者有力,自勝者強。Shèng rén zhě yǒu lì,zì shèng zhě qiáng.भावार्थ— दूसरों को जीतने वाला शक्तिशाली है, किंतु अपने ऊपर विजय प्राप्त करने वाला वास्तव में महान शक्तिशाली है। 5-- ताओ ते चिंग — अध्याय 81知者不博,博者不知。Zhī zhě bù bó,bó zhě bù zhī.भावार्थ— सच्चा ज्ञानी केवल बहुत-सी बाहरी जानकारियों का संग्रहकर्ता नहीं होता; वास्तविक ज्ञान अधिक गहरे बोध से संबंधित है। निष्कर्षताओ धर्म का प्रमुख संदेश है कि ज्ञान का सर्वोच्च रूप आत्मज्ञान, आंतरिक प्रकाश और ताओ के सत्य का बोध है।विशेष रूप से—自知者明Zì zhī zhě míng“जो स्वयं को जानता है, वह प्रकाशित होता है।”— ताओ ते चिंग, अध्याय 33 यह आपके दिए हुए भाव—“हे ईश्वर! हमें दिव्य ज्ञान प्रदान करें।”— के व्यापक आध्यात्मिक अर्थ, अर्थात् दिव्य सत्य और आत्मप्रकाश की प्राप्ति, के निकट है।कन्फ्यूसियस धर्म में प्रमाण--ब्रह्मयज्ञेन कल्पताम्।— यजुर्वेद 11/84भावार्थ— हे ईश्वर! हमें दिव्य ज्ञान प्रदान करें।कन्फ्यूशियस परम्परा में ज्ञान की प्राप्ति मुख्यतः अध्ययन (學), चिंतन (思), आत्म-सुधार और नैतिक विवेक से संबंधित है। यह वैदिक भावार्थ के व्यापक अर्थ—उच्च ज्ञान और विवेक की प्राप्ति—से सामंजस्य रखता है।1--. 《論語》— लुन्यू (Analects) 2.15子曰:「學而不思則罔,思而不學則殆。」पिनयिन—Zǐ yuē: Xué ér bù sī zé wǎng, sī ér bù xué zé dài.भावार्थ— कन्फ्यूशियस ने कहा—अध्ययन करके चिंतन न करना भ्रम उत्पन्न करता है और अध्ययन के बिना केवल चिंतन करना संकटपूर्ण है। 2--《論語》— लुन्यू (Analects) 2.17子曰:「由!誨女知之乎?知之為知之,不知為不知,是知也。」पिनयिन—Zǐ yuē: Yóu! Huì rǔ zhī zhī hū? Zhī zhī wéi zhī zhī, bù zhī wéi bù zhī, shì zhī yě.भावार्थ— जो जानते हो, उसे जानना मानो; जो नहीं जानते, उसे न जानना स्वीकार करो—यही वास्तविक ज्ञान है। 3--《論語》— लुन्यू (Analects) 7.8子曰:「不憤不啟,不悱不發,舉一隅不以三隅反,則不復也。」पिनयिन—Zǐ yuē: Bù fèn bù qǐ, bù fěi bù fā; jǔ yī yú bù yǐ sān yú fǎn, zé bù fù yě.भावार्थ— जो सीखने के लिए उत्सुक नहीं है, उसके लिए ज्ञान का द्वार नहीं खोला जाता; और जिसे एक संकेत देकर शेष बातों को समझने की क्षमता न हो, उसे आगे नहीं पढ़ाया जाता4--《論語》— लुन्यू (Analects) 7.20子曰:「我非生而知之者,好古,敏以求之者也。」पिनयिन—Zǐ yuē: Wǒ fēi shēng ér zhī zhī zhě, hào gǔ, mǐn yǐ qiú zhī zhě yě.भावार्थ— मैं जन्म से ही सब कुछ जानने वाला नहीं हूँ; मुझे प्राचीन ज्ञान से प्रेम है और मैं उत्साहपूर्वक ज्ञान की खोज करता हूँ।5--《論語》— लुन्यू (Analects) 17.8子曰:「好仁不好學,其蔽也愚;好知不好學,其蔽也蕩。」पिनयिन—Zǐ yuē: Hào rén bù hào xué, qí bì yě yú; hào zhì bù hào xué, qí bì yě dàng.भावार्थ— यदि मनुष्य ज्ञान से प्रेम तो करे, पर अध्ययन न करे, तो उसमें भ्रम और भटकाव उत्पन्न हो सकता है। अतः ज्ञान के लिए निरन्तर शिक्षा आवश्यक है।निष्कर्षकन्फ्यूशियस परम्परा का संदेश है कि सच्चा ज्ञान केवल जानकारी नहीं, बल्कि—學 (Xué) — अध्ययन思 (Sī) — चिंतन知 (Zhī) — वास्तविक ज्ञान修身 (Xiūshēn) — आत्म-सुधार का समन्वय है।विशेष रूप से—學而不思則罔,思而不學則殆。“अध्ययन बिना चिंतन अधूरा है और चिंतन बिना अध्ययन भी अपूर्ण है।”— 《論語》 2.15इस प्रकार “ब्रह्मयज्ञेन कल्पताम्” के व्यापक भाव—ज्ञान, विवेक और उच्च बोध की प्राप्ति—के साथ कन्फ्यूशियस की शिक्षाओं का सुंदर सामंजस्य है।शिन्तो धर्म में प्रमाण--ब्रह्मयज्ञेन कल्पताम्।— यजुर्वेद 11/84भावार्थ— हे ईश्वर! हमें दिव्य ज्ञान प्रदान करें।शिन्तो (神道) परम्परा में एक ही प्रकार का सर्वमान्य धर्मग्रंथ नहीं है, जैसा वेद, बाइबिल या कुरआन है। इसके प्रमुख प्राचीन स्रोत 古事記 (कोजिकी), 日本書紀 (निहोन शोकी) और 祝詞 (नोरितो—धार्मिक प्रार्थनाएँ) हैं। नोरितो में कामी (神) के समक्ष प्रार्थना और अनुष्ठानिक वचन मिलते हैं।आपके भाव—“हमें दिव्य ज्ञान, शुद्ध बुद्धि और सही मार्ग प्राप्त हो”—के निकट शिन्तो परम्परा के कुछ प्रमुख जापानी शब्द और प्रार्थनात्मक भाव निम्न हैं।1-- ज्ञान और हृदय की शुद्धि清き明き心きよき あかき こころKiyoki akaki kokoroभावार्थ— शुद्ध और प्रकाशित हृदय।शिन्तो परम्परा में आध्यात्मिक शुद्धि (清め・きよめ) को अत्यन्त महत्त्वपूर्ण माना जाता है। शुद्ध हृदय और सही आचरण का आदर्श आध्यात्मिक उन्नति से जुड़ा है।2-- दिव्य मार्ग神の道かみ の みちKami no michiभावार्थ— कामी का मार्ग अथवा देवताओं का मार्ग।शिन्तो शब्द 神道(しんとう/Shintō) का शाब्दिक अर्थ ही “कामी का मार्ग” है। सही मार्ग पर चलने का भाव आपके दिए हुए भावार्थ से व्यापक रूप में संबंधित है।3-- कामी के प्रति प्रार्थना神々の御恵みをいただきます。かみがみ の おめぐみ を いただきます。Kamigami no omegumi o itadakimasu.भावार्थ— हम देवताओं की कृपा प्राप्त करें।御恵み(おめぐみ・omegumi) का अर्थ कृपा या दिव्य अनुग्रह है। शिन्तो अनुष्ठानों में कामी के प्रति कृतज्ञता और आशीर्वाद की याचना महत्वपूर्ण है।4- नोरितो — कामी को संबोधित प्रार्थना祝詞のりとNoritoअर्थ— कामी के प्रति उच्चारित धार्मिक प्रार्थना या अनुष्ठानिक वचन।नोरितो में देवताओं की स्तुति, कृतज्ञता, शुद्धि तथा कल्याण की प्रार्थनाएँ की जाती हैं। प्राचीन शिन्तो परम्परा में ये धार्मिक अनुष्ठानों के महत्त्वपूर्ण अंग है।5-- शुद्धि और दिव्य अनुग्रह祓え給い 清め給えはらえたまい きよめたまえHarae tamae, kiyome tamae.भावार्थ— हमें शुद्ध कीजिए, हमें पवित्र कीजिए।शिन्तो परम्परा में 祓い(はらい・हराइ), अर्थात् शुद्धीकरण, एक प्रमुख धार्मिक अवधारणा है। महान् शुद्धीकरण अनुष्ठान सहित नोरितो-परम्परा में अशुद्धियों और अनिष्ट से मुक्ति की प्रार्थना की जाती है। निष्कर्षशिन्तो धर्म में वैदिक अर्थ में “ईश्वर से ज्ञान प्रदान करने की सीधी प्रार्थना” का ठीक समानांतर प्रमाण ढूँढ़ना कठिन है। शिन्तो का मुख्य धार्मिक दृष्टिकोण कामी की कृपा, शुद्धि, सही मार्ग और प्रकृति के साथ सामंजस्य पर आधारित है।अतः—ब्रह्मयज्ञेन कल्पताम्।“हे ईश्वर! हमें दिव्य ज्ञान प्रदान करें।”के व्यापक भाव—दिव्य अनुग्रह, हृदय की शुद्धि और सत्य मार्ग की प्राप्ति—से शिन्तो परम्परा का सामंजस्य स्थापित किया जा सकता है।यूनानी दर्शन में प्रमाण--ब्रह्मयज्ञेन कल्पताम्।— यजुर्वेद 11/84भावार्थ— हे ईश्वर! हमें दिव्य ज्ञान प्रदान करें।ग्रीक दर्शन में वैदिक अर्थ में ईश्वर से ज्ञान की प्रार्थना सर्वत्र नहीं मिलती; किंतु ज्ञान (γνῶσις), बुद्धि (νοῦς), प्रज्ञा (σοφία) और सत्य के प्रकाश को जीवन का सर्वोच्च लक्ष्य माना गया है। इस भाव से संबंधित प्रमुख प्रमाण निम्न हैं।1-- प्लेटो — Republic (The Republic)ἐπιστήμης γὰρ ὄργανον ἐν ψυχῇ ἑκάστου ἐνυπάρχει.— प्लेटो, रिपब्लिक, पुस्तक 7भावार्थ— ज्ञान को ग्रहण करने की शक्ति प्रत्येक मनुष्य की आत्मा में विद्यमान है।प्लेटो के अनुसार शिक्षा और दर्शन का कार्य आत्मा को अज्ञान के अंधकार से सत्य के प्रकाश की ओर मोड़ना है। 2. प्लेटो — ज्ञान और परम सत्यτὸ τοῦ ἀγαθοῦ ἰδεῖν.Transliteration: to tou agathou idein.भावार्थ— परम शुभ अथवा सर्वोच्च सत्य का दर्शन करना।— प्लेटो, रिपब्लिक, पुस्तक 7प्लेटो के दर्शन में ज्ञान की सर्वोच्च यात्रा सत्य और परम शुभ (τὸ ἀγαθόν) की ओर है। 3--अरस्तू — Nicomachean Ethicsἡ σοφία ἐπιστήμη καὶ νοῦς.Transliteration: hē sophia epistēmē kai nous.भावार्थ— प्रज्ञा या दार्शनिक ज्ञान, वैज्ञानिक ज्ञान और अंतर्बोध/बुद्धि का समन्वय है।— अरस्तू, निकोमैखीयन एथिक्स, पुस्तक 6, अध्याय 7अरस्तू के अनुसार सच्चा ज्ञानी व्यक्ति केवल निष्कर्षों को नहीं, बल्कि उनके मूल सिद्धान्तों के सत्य को भी समझता है।. सुकरात — ज्ञान की खोजἓν οἶδα ὅτι οὐδὲν οἶδα.Transliteration: hen oida hoti ouden oida.भावार्थ— मैं इतना जानता हूँ कि मैं नहीं जानता।यह सुकरात से सम्बद्ध प्रसिद्ध दार्शनिक भाव है—सच्चे ज्ञान की शुरुआत अपनी अज्ञानता को पहचानने से होती है।5-प्लेटो — दर्शन का आरम्भμάλα γὰρ φιλοσόφου τοῦτο τὸ πάθος, τὸ θαυμάζειν.Transliteration: mala gar philosophou touto to pathos, to thaumazein.भावार्थ— आश्चर्य करना ही दार्शनिक का स्वभाव है।— प्लेटो, थियेटेटस (Theaetetus), 155dअर्थात् सत्य और ज्ञान की खोज का आरम्भ जिज्ञासा और विस्मय से होता है। निष्कर्षग्रीक दर्शन में σοφία (सोफिया—प्रज्ञा) को उच्चतम ज्ञान के रूप में देखा गया है। प्लेटो और अरस्तू दोनों के यहाँ ज्ञान केवल सूचना-संग्रह नहीं, बल्कि—सत्य का बोध, आत्मा का प्रकाशमूल सिद्धान्तों का ज्ञान, सर्वोच्च तत्त्व की खोज है।अतः—ब्रह्मयज्ञेन कल्पताम्।भावार्थ— “हे ईश्वर! हमें दिव्य ज्ञान प्रदान करें।”के व्यापक भाव—उच्चतम सत्य और प्रज्ञा की प्राप्ति—के साथ ग्रीक दर्शन का गहरा सामंजस्य दिखाई देता है। विशेष टिप्पणी: ग्रीक दार्शनिक उद्धरणों के मूल पाठ और संदर्भों के विभिन्न संस्करणों में सूक्ष्म पाठांतर मिल सकते हैं।------×--------×--------×---------