कलि-सन्तरण उपनिषद्--कलि-सन्तरण उपनिषद् अथर्ववेद से सम्बद्ध एक लघु उपनिषद् माना जाता है। इसमें कलियुग के दोषों से पार होने के उपाय के रूप में भगवान् के नाम-स्मरण का वर्णन है।१. प्रारम्भिक प्रश्नमूल पाठॐ नारदो ब्रह्माणं जगाम।कथं भगवन् गाम् पर्यटन् कलिं संतरेयमिति।स होवाच ब्रह्मा—साधु पृष्टोऽस्मि।सर्वश्रुतिरहस्यं गोप्यं तच्छृणु, येन कलिं तरिष्यसि॥सरल हिन्दी अर्थएक समय देवर्षि नारद ब्रह्माजी के पास गए और बोले—“हे भगवन्! मैं संसार में विचरण करते हुए कलियुग के दोषों से किस प्रकार पार हो सकता हूँ?”ब्रह्माजी ने कहा—“तुमने बहुत उत्तम प्रश्न किया है। अब वह गोपनीय रहस्य सुनो, जिसे जानकर और अपनाकर तुम कलियुग के दोषों से पार हो सकोगे।”२. कलियुग से पार होने का उपाय--भगवन्! कः स उपाय इति।स होवाच हिरण्यगर्भः—हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे।हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे॥अर्थात् ब्रह्माजी ने कहा कि इसका उपाय यह नाम-मंत्र है—हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे।हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे॥३. इस मंत्र का महत्वइति षोडशकं नाम्नां कलिकल्मषनाशनम्।नातः परतरोपायः सर्ववेदेषु दृश्यते॥पदच्छेदइति — षोडशकम् — नाम्नाम् — कलि-कल्मष-नाशनम्।न — अतः — परतरः — उपायः — सर्व-वेदेषु — दृश्यते।हिन्दी अर्थइन सोलह नामों का यह मंत्र कलियुग के पापों और कलुषों का नाश करने वाला है। समस्त वेदों में इससे बढ़कर कोई अन्य उपाय दिखाई नहीं देता।४. षोडश नाम अर्थात् सोलह नाममंत्र में कुल सोलह नाम हैं—हरे-8, राम-4, कृष्ण-4 कुल=16मंत्र इस प्रकार है—हरे (1) राम (2) हरे (3) राम (4)राम (5) राम (6) हरे (7) हरे (8)हरे (9) कृष्ण (10) हरे (11) कृष्ण (12)कृष्ण (13) कृष्ण (14) हरे (15) हरे (16)५. नाम-स्मरण का फलषोडशकलावृतस्य जीवस्यावरणविनाशनम्।ततः प्रकाशते परं ब्रह्म मेघापाये रविरश्मिमण्डलीव॥सरल अर्थजीव अनेक प्रकार के आवरणों और अज्ञान से घिरा हुआ है। इन सोलह नामों के जप से उसके आवरण नष्ट होने लगते हैं।तब परम ब्रह्म का प्रकाश वैसे ही प्रकट होता है—जैसे बादल हट जाने पर सूर्य की किरणें प्रकाशित हो जाती हैं।भावार्थमनुष्य के भीतर सत्य और आत्मज्ञान का प्रकाश विद्यमान है, किंतु—अज्ञान, मोह, लोभ, क्रोध,अहंकार, विषयासक्तिउस प्रकाश को ढक देते हैं।ईश्वर-नाम का स्मरण मन को शुद्ध करने और आध्यात्मिक चेतना को जागृत करने का साधन बताया गया है।६. मंत्र के जप में विशेष नियम?मूल पाठपुनर्नारदो ब्रह्माणं पर्यपृच्छत्—भगवन्! कोऽस्य विधिरिति।तं होवाच—नास्य विधिरिति।सर्वदा शुचिरशुचिर्वा पठन् ब्राह्मणः सालोकतां समीपतां सरूपतां सायुज्यतामेति॥ अर्थ- नारदजी ने फिर पूछा—“हे भगवन्! इसके जप की क्या विधि है?”ब्रह्माजी ने कहा—“इसके लिए कोई कठिन या अनिवार्य विधि नहीं है।”अर्थात् व्यक्ति श्रद्धा और भक्ति के साथ ईश्वर के नाम का स्मरण कर सकता है।७. जप की संख्याउपनिषद् में आगे आता है—यदा षोडशकस्य सार्धत्रिकोटिर्जपति तदा ब्रह्महत्यां तरति।वीरहत्यां तरति।स्वर्णस्तेयात्पूतो भवति।पितृदेवमनुष्याणामपकारात्पूतो भवति।सर्वधर्मपरित्यागपापात्सद्यो मुच्यते।सद्यो मुच्यते॥भावार्थ--उपनिषद् में इस नाम-जप की अत्यन्त महिमा का वर्णन किया गया है और कहा गया है कि श्रद्धापूर्वक जप मनुष्य को पापों एवं बन्धनों से मुक्ति के मार्ग पर ले जाता है।“सद्यो मुच्यते” का दो बार प्रयोग इसकी महत्ता को विशेष रूप से प्रकट करता है।८. मुख्य शिक्षाकलि-सन्तरण उपनिषद् का सार यह है कि—१. ईश्वर का नाम महान आध्यात्मिक साधन है।२. कलियुग में मनुष्य का मन अनेक विकारों से घिरा रहता है।३. निरन्तर नाम-स्मरण से मन की शुद्धि होती है।४. भक्ति और श्रद्धा से किया गया जप आध्यात्मिक उन्नति का साधन है।५. बाहरी आडम्बर से अधिक महत्त्व हृदय की सच्ची भावना का है।नाम-स्मरण से मन शुद्ध होता है, चित्त एकाग्र होता है और मनुष्य परम सत्य की ओर अग्रसर होता है।प्रसिद्ध षोडश-नाम मंत्रहरे राम हरे राम राम राम हरे हरे।हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे।-------×-------×------×------/