DASTAN-E-KARB भ्रम से परे क्या है? in Hindi Drama by Azoorey books and stories PDF | DASTAN-E-KARB - भ्रम से परे क्या है? - Chapter 2 Scene 3

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DASTAN-E-KARB - भ्रम से परे क्या है? - Chapter 2 Scene 3

"बाबा आज क्या क्या करना है?" दरगाह के अंदर नौशीन ने चारों तरफ़ देखते हुए पीर से सलाह लिया

"तुम्हें तो ख़बर है की आज काफ़ी लोग आएंगे दरगाह और शाही घराने से भी लोग आ सकते हैं इसलिए काम बहुत है, तुम अपने साथ वाली लड़कियों को भी साथ रखो और अभी ऐसा करो पानी वगैरह का इंतज़ाम देख लो और जहां पर मिस्किनो को कपड़े वगैरह दिए जाते है वहां पर अम्हेल तुम चली जाओ, उनका ध्यान रखना की सबको सब बराबर से मिले। मेहमान खाने की तैयारी भी देख लेना। अब जाओ जल्दी वक़्त मत ज़ाया करो।" पीर बाबा की सलाह से बिना किसी इंतजार दोनो अपने अपने काम की तरफ़ चली गई। 

आज दरगाह में आने वाले लोगों के लिए मौसम बहुत ख़ुशगवार था, दरगाह में लोगों का आना जाना शुरू हो गया, अगरबत्ती वाले अपनी दुकानें लगाकर बैठ गए, पूरे दरगाह को फूलो से सजा दिया गया। आज मन्नती दरगाह का शोरो-ग़ुल बढ़ा हुआ लगा क्योंकि यहां पर माना जाता है दुआएं जल्द पूरी हो जाती है इसलिए आज के दिन दूर दूर से लोग यहां मन्नते, दुआएं मानने और बढ़ाने आते है। और हर मन्नत मानने वाला यही कहता है कि मानी हुई मन्नत पूरी हो गई।

पीर बाबा दरगाह के दरवाज़े पर किसी के इंतजार में खड़े थे उतने में उनकी नज़र किसी आशना रु लंबे, शानदार, ख़ूबसूरत नौजवान पर ठहर गई जिसके साथ उसकी छोटी बहन भी थी। उन्हें उस नौजवान को दूर से पहचानने में थोड़ी मुश्किल हुई इसलिए उन्होंने अपनी आंखें सिकुड़ ली, कुछ ही पल में दोनो भाई बहन पीर बाबा के सामने आकर खड़े हो गए 

"सलाम बाबा, मेरा रास्ता देख रहे थे?" उस नौजवान ने पूछा

"मैं तो रास्ता किसी और का देख रहा था मगर रास्ते में आपकी ख़ूबसूरती और आप नज़र आ गए।" उसके सवाल के जवाब पर बाबा और नौजवान दोनो ही हसने लगे "आप बताइए शहज़ादे, देख रहा हूं कुछ हफ्तों से हर दूसरे दिन आ रहे हैं आप, और आज इन्हें भी साथ लेकर आएं है।"

"क्या आपके दरगाह में शहज़ादों का आना मना है?" उसने मज़ाह किया

"नहीं बिलकुल नहीं, ये वो दरवाज़ा है जो सबके लिए खुला हैं।"

"लोग समझते है हमें दरगाह या दरबार जाने की क्या ज़रूरत, मगर यहां मन लग गया है मेरा। मेरे दिल में भी एक ऐसी ख़्वाहिश है जिसे मैं चाहता हूं पूरी हो जाए और आज तो मन्नत की अगरबत्तियां जलाना है मुझे।" उसने डूबे लहजे में कहा 

"अरे... मेरे तो ज़हन से ही निकल गया था, अच्छा किया आपने याद दिला दिया। चलिए अंदर आ जाइए।" नजाने किस बात के याद आने पर पीर बाबा ने जल्दबाज़ी से इनके साथ अंदर जाते हुए बताया

"आप अगरबत्ती जलाकर धागा भी बांध लीजिएगा।"

नौजवान और पीर बाबा चंद क़दम आगे बढ़ कर किसी को ढूंढने लगे, और बाबा ने वहीं से नन्ही बच्ची को आवाज़ दिया

"दुआ बेटी इधर आओ जल्दी।" दुआ नन्हे पैरो से दौड़कर बाबा के क़रीब आ गई
"जी बाबा?"

"अंदर जाकर अम्हेल आपी से कहो मैं बुला रहा हूं।" दुआ दौड़कर चली गई। अम्हेल का नाम सुनते ही ये दोनो भाई बहन एक दूसरे को ख़ुशगवारी से नीम मुस्कान के साथ देखा। दुआ ने दौड़कर अंदर की लाई हुई ख़बर बाबा तक पहुंचा दिया

"मुझे आपी मिली नहीं लेकिन मैने नौशीन ख़ाला से कह दिया है की आप आपी को बुला रहे है वो उन्हें आपके पास भेज दें, उन्होंने बोला ठीक है भेज देंगे।" 

"अच्छा किया बेटा, शाबाश।" बाबा कि शाबाशी पाकर दुआ अपने चेहरे पर बड़ी सी मुस्कान बिखेर कर चली गई। बाबा भी दरवाज़े पर लौट गए। ख़बर सुनकर भाई बहन भी मज़ार की तरफ़ चले गए।