श्रीसरस्वतीरहस्योपनिषद-- सरस्वती रहस्य उपनिषद् को सामान्यतः कृष्ण यजुर्वेद से सम्बद्ध शाक्त उपनिषद् माना जाता है, न कि अथर्ववेद से। यह शाक्त उपनिषदों में गिना जाती है। १. शान्तिपाठॐ वाङ्मे मनसि प्रतिष्ठिता मनो मे वाचि प्रतिष्ठितम्।आविरावीर्म एधि। वेदस्य म आणीस्थः।श्रुतं मे मा प्रहासीरनेनाधीतेनाहोरात्रान्सन्दधामि।ऋतं वदिष्यामि। सत्यं वदिष्यामि।तन्मामवतु। तद्वक्तारमवतु।अवतु माम्। अवतु वक्तारम्॥ॐ शान्तिः शान्तिः शान्तिः॥भावार्थहे परम सत्य! मेरी वाणी मेरे मन में स्थित हो और मेरा मन मेरी वाणी में स्थित हो। आप मेरे समक्ष प्रकाशित हों। जो ज्ञान मैंने सुना और पढ़ा है, वह मुझसे दूर न हो। मैं सत्य और ऋत का पालन करूँ। परमात्मा मेरी और मेरे गुरु अथवा वक्ता की रक्षा करें।प्रथम भाग — सरस्वती की उपासना२. ऋषियों का प्रश्नउपनिषद् का आरम्भ ऋषियों के प्रश्न से होता है। वे महर्षि आश्वलायन से पूछते हैं—केनोपायेन तज्ज्ञानं तत्पदार्थावभासकम्।यदुपासनया तत्त्वं जानासि भगवन् वद॥भावार्थहे भगवन्! वह कौन-सा उपाय है, जिसके द्वारा परम ज्ञान और परम तत्त्व का प्रकाश प्राप्त होता है? किस उपासना से मनुष्य उस सत्य को जान सकता है?३. दशश्लोकी सरस्वती-महामन्त्र(१) प्रणो देवी सरस्वतीॐ प्रणो देवी सरस्वतीवाजेभिर्वाजिनीवती।धीनामवित्र्यवतु॥भावार्थज्ञान और प्रेरणा प्रदान करने वाली देवी सरस्वती हमारी बुद्धियों की रक्षा करें और उन्हें पवित्र एवं प्रकाशित करें।(२) आ नो दिवो बृहतःआ नो दिवो बृहतः पर्वतादा सरस्वती यजता गन्तु यज्ञम्।हवं देवी जुजुषाणा घृताचीशग्मां नो वाचमुशती शृणोतु॥भावार्थहे देवी सरस्वती! आप हमारे पवित्र कर्मों में पधारें। हमारी प्रार्थना स्वीकार करें और हमें कल्याणकारी तथा श्रेष्ठ वाणी प्रदान करें।(३) पावका नः सरस्वतीपावका नः सरस्वतीवाजेभिर्वाजिनीवती।यज्ञं वष्टु धियावसुः॥भावार्थपवित्र करने वाली, ज्ञान और बुद्धि का धन देने वाली देवी सरस्वती हमारे श्रेष्ठ कर्मों को सफल करें।४. वाणी के चार स्तरइस उपनिषद् में ऋग्वेद का प्रसिद्ध मंत्र आता है—चत्वारि वाक् परिमिता पदानितानि विदुर्ब्राह्मणा ये मनीषिणः।गुहा त्रीणि निहिता नेङ्गयन्तितुरीयं वाचो मनुष्या वदन्ति॥भावार्थवाणी के चार स्तर हैं। ज्ञानी पुरुष उन्हें जानते हैं। उनमें से तीन गुप्त हैं और सामान्य रूप से प्रकट नहीं होते; मनुष्य केवल चौथे स्तर की वाणी बोलते हैं।दार्शनिक अर्थभारतीय परम्परा में वाणी के चार रूप बताए जाते हैं—परा — मूल, दिव्य वाणी।पश्यन्ती — सूक्ष्म रूप में अनुभूत होने वाली वाणी।मध्यमा — मन में विचार के रूप में स्थित वाणी।वैखरी — मुख से निकलने वाली प्रकट वाणी।इस प्रकार उपनिषद् बताता है कि जो शब्द हम बोलते हैं, उसके पीछे चेतना और ज्ञान के अत्यन्त सूक्ष्म स्तर हैं। ५.सरस्वती का व्यापक स्वरूप-अद्वैता ब्रह्मणः शक्तिः सा मां पातु सरस्वती।भावार्थजो अद्वितीय ब्रह्म की शक्ति हैं, वे देवी सरस्वती मेरी रक्षा करें।यहाँ सरस्वती का स्वरूप अत्यन्त व्यापक हो जाता है। वे केवल पुस्तक और वीणा धारण करने वाली देवी मात्र नहीं, बल्कि— ज्ञान की शक्ति, चेतना की शक्ति, वाणी की शक्ति, ब्रह्मज्ञान की शक्ति के रूप में वर्णित हैं।६. देवी सरस्वती की स्तुतिउपनिषद् में आगे सरस्वती की स्तुति के कुछ प्रसिद्ध श्लोक आते हैं।(१)चतुर्मुखमुखाम्भोजवनहंसवधूर्मममानसे रमतां नित्यं सर्वशुक्ला सरस्वती॥भावार्थब्रह्माजी के मुखरूपी कमलवन की हंसिनी, सर्वथा श्वेत स्वरूप वाली देवी सरस्वती सदा मेरे मन में निवास करें।(२) नमस्ते शारदे देवि काश्मीरपुरवासिनि।त्वामहं प्रार्थये नित्यं विद्यादानं च देहि मे॥भावार्थ--हे शारदा देवी! आपको नमस्कार है। मैं प्रतिदिन आपसे प्रार्थना करता हूँ कि मुझे विद्या प्रदान करें।(३) अक्षसूत्राङ्कुशधरा पाशपुस्तकधारिणी।मुक्ताहारसमायुक्ता वाचि तिष्ठतु मे सदा॥भावार्थ-- अक्षमाला, अंकुश, पाश और पुस्तक धारण करने वाली, मोतियों के हार से सुशोभित देवी मेरे वचन और मेरी वाणी में सदा विराजमान रहें।(४) कम्बुकण्ठी सुताम्रोष्ठी सर्वाभरणभूषिता।महासरस्वती देवी जिह्वाग्रे संनिविश्यताम्॥भावार्थ--सुन्दर कण्ठ और दिव्य स्वरूप वाली, समस्त आभूषणों से विभूषित महासरस्वती मेरी जिह्वा के अग्रभाग में निवास करें।७. सरस्वती के स्वरूपउपनिषद् में देवी को निम्न गुणों से सम्बद्ध किया गया है—या श्रद्धा धारणा मेधा वाग्देवी विधिवल्लभा। भक्तजिह्वाग्रसदना शमादिगुणदायिनी॥भावार्थ--जो श्रद्धा हैं, धारणा हैं, मेधा हैं, वाणी की देवी हैं, भक्तों की जिह्वा पर निवास करती हैं और शम आदि सद्गुण प्रदान करती हैं—ऐसी देवी को नमस्कार है।यहाँ सरस्वती के प्रमुख स्वरूप हैंश्रद्धा — सत्य के प्रति विश्वास।धारणा — मन को स्थिर करने की शक्ति।मेधा — ग्रहण करने और समझने की शक्ति।वाक् — अभिव्यक्ति की शक्ति।शम — मन की शान्ति।द्वितीय भाग — ब्रह्मविद्या का रहस्यसरस्वती रहस्य उपनिषद् का दूसरा पक्ष अत्यन्त दार्शनिक है। यहाँ देवी स्वयं ब्रह्मविद्या का उपदेश करती हैं।८. आत्मविद्या का स्वरूपउपनिषद् में कहा गया है—आत्मविद्या मया लब्ध्वा ब्रह्मणैव सनातनी।ब्रह्मत्वं मे सदा नित्यं सच्चिदानन्दरूपतः॥भावार्थसनातन ब्रह्म से प्राप्त आत्मविद्या के द्वारा मेरा स्वरूप सदा सत्, चित् और आनन्द रूप ब्रह्म है।सत्-चित्-आनन्दसत् — जिसका वास्तविक अस्तित्व है।चित् — जो चेतन और ज्ञानस्वरूप है।आनन्द — जो परम आनन्दस्वरूप है।अर्थात् परम सत्य का स्वरूप सच्चिदानन्द है।९. माया की दो शक्तियाँ--उपनिषद् में माया की दो प्रमुख शक्तियों का वर्णन मिलता है—शक्तिद्वयं हि मायायाविक्षेपावृतिरूपकम्॥अर्थात् माया की दो शक्तियाँ हैं—१. विक्षेप शक्तियह विविध प्रकार के जगत् और अनुभवों का प्रक्षेप करती है।२. आवरण शक्तियह वास्तविक ब्रह्मस्वरूप को ढक देती है।उदाहरण--जिस प्रकार अन्धकार में रस्सी दिखाई न देने पर व्यक्ति उसे सर्प समझ सकता है—रस्सी का वास्तविक स्वरूप न दिखना — आवरण।उसके स्थान पर सर्प दिखाई देना — विक्षेप।इसी प्रकार अज्ञान के कारण मनुष्य अपने वास्तविक आत्मस्वरूप को नहीं पहचानता।१०. जीव और ब्रह्म का प्रश्नउपनिषद् जीवभाव और ईश्वरभाव को भी दार्शनिक दृष्टि से समझाता है।अन्त में अत्यन्त महत्त्वपूर्ण कथन मिलता है—मयि जीवत्वमीशत्वं कल्पितं वस्तुतो नहि। इति यस्तु विजानाति स मुक्तो नात्र संशयः॥भावार्थ--मेरे वास्तविक स्वरूप में जीवत्व और ईश्वरत्व का भेद वस्तुतः परम सत्य नहीं है; जो इस वास्तविक तत्त्व को जान लेता है, वह मुक्त हो जाता है—इसमें कोई संदेह नहीं।यह उपनिषद् के अद्वैत वेदान्त सम्बन्धी विचार का महत्त्वपूर्ण पक्ष है। ११. जगत् के पाँच अंशउपनिषद् में प्रसिद्ध नाम-रूप विवेक का सिद्धान्त मिलता है—अस्ति भाति प्रियं रूपं नाम चेत्यंशपञ्चकम्।अर्थात् किसी वस्तु के पाँच पक्ष हैं—अस्ति — उसका अस्तित्व।भाति — उसका ज्ञान अथवा प्रकाश।प्रिय — उसका आनन्दमय या आकर्षक पक्ष।रूप — उसका आकार।नाम — उसका नाम।फिर कहा गया है—आद्यत्रयं ब्रह्मरूपं जगद्रूपं ततो द्वयम्।भावार्थ--पहले तीन—अस्ति, भाति और प्रिय—ब्रह्म के स्वरूप से सम्बन्धित हैं; जबकि नाम और रूप जगत् के परिवर्तनशील पक्ष हैं।१२. समाधि और आत्मज्ञानउपनिषद् में मन को ब्रह्म में स्थिर करने की साधना का भी वर्णन है।एतैः समाधिभिः षड्भिर्नयेत्कालं निरन्तरम्।देहाभिमाने गलिते विज्ञाते परमात्मनि॥भावार्थइन समाधि-रूप साधनों द्वारा निरन्तर अभ्यास करना चाहिए। जब देह के प्रति अहंभाव दूर हो जाता है और परमात्मा का ज्ञान हो जाता है, तब वास्तविक आत्मस्वरूप प्रकट होता है।१३. ज्ञान का फलउपनिषद् का अत्यन्त प्रसिद्ध उपनिषदिक निष्कर्ष है—भिद्यते हृदयग्रन्थिश्छिद्यन्ते सर्वसंशयाः।क्षीयन्ते चास्य कर्माणि तस्मिन्दृष्टे परावरे॥भावार्थ--जब उस परम सत्य का साक्षात्कार होता है—हृदय की गाँठ खुल जाती है, सभी संशय समाप्त हो जाते हैं, कर्मों के बन्धन क्षीण हो जाते हैं।सरस्वती रहस्य उपनिषद् का सारइस उपनिषद् की शिक्षा को पाँच सूत्रों में समझा जा सकता है—१. वाणी को पवित्र बनाओवाणी केवल बोलने का साधन नहीं, दिव्य शक्ति है।२. विद्या को आत्मज्ञान से जोड़ोकेवल बाहरी ज्ञान पर्याप्त नहीं; वास्तविक ज्ञान आत्मस्वरूप की पहचान है।३. मेधा और श्रद्धा विकसित करोसच्ची शिक्षा में बुद्धि के साथ चरित्र और श्रद्धा भी आवश्यक हैं।४. नाम और रूप से परे सत्य को पहचानोबदलते हुए संसार के पीछे एक नित्य चेतन सत्य है।५. ज्ञान ही मुक्ति का मार्ग हैजब मनुष्य अपने वास्तविक स्वरूप को पहचानता है, तब अज्ञान और बन्धन दूर होते हैं।उपनिषद् का मुख्य संदेशसरस्वती केवल पुस्तक की विद्या नहीं हैं; वे वह दिव्य चेतना हैं जो मनुष्य को वाणी की शुद्धता से बुद्धि की शुद्धता और बुद्धि की शुद्धता से ब्रह्मज्ञान तक ले जाती हैं।-------×-------×-------×--------