Ravana's deathbed in Hindi Spiritual Stories by prem chand hembram books and stories PDF | रावण की मृत्युशय्या

Featured Books
Categories
Share

रावण की मृत्युशय्या


रावण की मृत्युशय्या
ज्ञान का अंतिम उपदेश
लंका की धरती पर युद्ध की विभीषिका शांत हो चुकी थी।
कुछ समय पहले तक जहाँ शंखनाद, धनुष की टंकार और योद्धाओं की गर्जना सुनाई दे रही थी, वहाँ अब एक गहरा सन्नाटा पसरा था। चारों ओर टूटे हुए रथ, बिखरे हुए अस्त्र-शस्त्र और युद्ध की विभीषिका के चिह्न दिखाई दे रहे थे।
स्वर्णमयी लंका के आकाश पर सूर्य अस्ताचल की ओर बढ़ रहा था। उसकी अंतिम किरणें महलों के स्वर्ण-शिखरों को छू रही थीं, मानो प्रकृति स्वयं उस महान घटना की साक्षी बनकर मौन खड़ी हो।
युद्धभूमि में रावण पड़ा था।
वही रावण—जिसके नाम से तीनों लोक काँपते थे।
वही रावण—जिसने देवताओं को परास्त किया था, जिसने अपार ज्ञान अर्जित किया था, जिसने वेद-शास्त्रों का गहन अध्ययन किया था और जिसकी विद्वता की चर्चा दूर-दूर तक थी।
लेकिन आज वही रावण मृत्युशय्या पर पड़ा अपनी अंतिम साँसें गिन रहा था।
शरीर शक्तिहीन हो चुका था, किंतु उसकी आँखों में अभी भी ज्ञान की ज्योति शेष थी।
श्रीराम कुछ दूरी पर खड़े उसे देख रहे थे। उनके मन में शत्रु के प्रति भी कोई द्वेष नहीं था।
उन्होंने लक्ष्मण से कहा—
“लक्ष्मण, रावण महान विद्वान है। उसके जीवन में अनेक दोष रहे, परंतु उसके भीतर जो ज्ञान है, वह अमूल्य है। मृत्यु के इस अंतिम क्षण में उससे जीवन का अंतिम उपदेश प्राप्त करो।”
लक्ष्मण ने आश्चर्य से राम की ओर देखा।
“भैया! रावण से?”
जिस व्यक्ति ने माता सीता का हरण किया था, जिसके कारण यह भयंकर युद्ध हुआ था, उसी व्यक्ति को राम आज भी ज्ञान का अधिकारी मान रहे थे!
लेकिन राम की आज्ञा सर्वोपरि थी।
लक्ष्मण रावण के पास पहुँचे।
वे उसके सिरहाने की ओर खड़े हो गए। मन में रावण के प्रति आदर का भाव नहीं था। शत्रु के प्रति मन में जो स्वाभाविक कठोरता होती है, वह अभी पूरी तरह समाप्त नहीं हुई थी।
रावण ने लक्ष्मण की ओर देखा।
कुछ क्षण मौन रहा।
लक्ष्मण भी मौन खड़े रहे।
फिर वे वापस श्रीराम के पास लौट आए और सारी बात बता दी।
श्रीराम मुस्कुराए। उन्हें समझते देर नहीं लगी कि लक्ष्मण से कहाँ भूल हुई है।
उन्होंने कहा—
“लक्ष्मण, ज्ञान प्राप्त करने के लिए केवल कान पर्याप्त नहीं होते, मन भी विनम्र होना चाहिए। तुम उसके सिरहाने खड़े थे। गुरु के समीप शिष्य को विनयपूर्वक जाना चाहिए। जाओ, उसके चरणों की ओर खड़े होकर उससे ज्ञान माँगो।”
लक्ष्मण को अपनी भूल का बोध हुआ।
उन्होंने अपने भीतर के अहंकार को त्यागा और पुनः रावण के पास पहुँचे।
इस बार वे उसके चरणों की ओर खड़े हुए। दोनों हाथ जोड़कर बोले—
“हे रावण!
आप त्रिलोक-विजयी रहे हैं। ज्ञान, बुद्धि, शास्त्र और कौशल में आप अद्वितीय रहे हैं।
मैं आपको गुरु के रूप में नमन करता हूँ।
कृपया अपने जीवन का वह सबसे मूल्यवान उपदेश मुझे दें, जो मेरे जीवन को सार्थक कर सके।”
रावण के चेहरे पर संतोष की हल्की मुस्कान आई।
उसने कहा—
“हे लक्ष्मण!
आज तुम ज्ञान लेने योग्य होकर मेरे पास आए हो।
सुनो—
अहंकार चाहे ज्ञान का हो, बुद्धि का हो, विद्वता का हो, रूप-सौंदर्य का हो अथवा धन और शक्ति का—यदि वह मनुष्य के भीतर ‘मैं’ को बढ़ाता है, तो अंततः उसके पतन का कारण बनता है।
मुझे ज्ञान का अहंकार था।
मुझे अपनी शक्ति का अहंकार था।
मुझे अपनी विद्वता का अहंकार था।
और यही मेरा पतन बना।
तुम्हारे भाई राम तुम्हें यह उपदेश स्वयं दे सकते थे। फिर उन्होंने तुम्हें मेरे पास क्यों भेजा?
क्योंकि मैं उच्च कोटि का ज्ञानी होते हुए भी अपने ज्ञान को जीवन में उतार नहीं सका।
मैं शिक्षित था, लेकिन सुशिक्षित नहीं था।
मैंने शास्त्र पढ़े, परंतु शास्त्रों का सार अपने आचरण में नहीं उतारा।
मेरी जिह्वा ज्ञान बोल सकती थी, लेकिन उसी जिह्वा ने निंदा और कठोर वचन भी बोले।
मेरे पास बुद्धि थी, लेकिन उस बुद्धि ने लोकमंगल का मार्ग नहीं चुना।
मेरे पास शक्ति थी, लेकिन मैंने उसका उपयोग अपने अहंकार की रक्षा के लिए किया।
मेरे पास धन था, वैभव था, स्वर्ण की लंका थी—लेकिन मेरे भीतर शांति नहीं थी।
मैंने अपने ज्ञान को दूसरों के मंगल के लिए खर्च नहीं किया।
मेरे मन ने सत्य के बजाय अहंकार, ईर्ष्या और आसक्ति का साथ दिया।
और आज देखो—
मेरी सारी शक्ति कहाँ है?
मेरा वैभव कहाँ है?
मेरी विजय कहाँ है?
मेरा अहंकार कहाँ है?
सब कुछ यहीं छूट गया।
मैंने सोने की लंका बनाई थी, लेकिन अपने ही अहंकार की अग्नि से उसे जला दिया।
मेरे कर्मों ने मेरे वंश को विनाश की ओर पहुँचा दिया।
इतिहास मुझे बार-बार इसलिए धिक्कारेगा कि मेरे पास ज्ञान था, लेकिन उस ज्ञान से मेरा और संसार का मंगल नहीं हो सका।”
रावण कुछ क्षण के लिए रुका।
उसकी साँसें भारी हो रही थीं।
फिर उसने श्रीराम की ओर देखा।
उसकी आँखों में इस बार न क्रोध था, न ईर्ष्या।
केवल एक गहरी शांति थी।
उसने कहा—
“लक्ष्मण!
देखो, तुम्हारे भाई राम कितने दयालु हैं।
जिसे संसार उनका शत्रु कहता है, उसके अंतिम क्षण में भी उन्होंने मेरे भीतर के ज्ञान का सम्मान किया।
उन्होंने तुम्हें मेरे पास भेजा ताकि मेरी जिह्वा से निकला अंतिम ज्ञान भी लोककल्याण का कारण बने।
मृत्यु के निकट आकर मनुष्य के भीतर बहुत-सा भ्रम समाप्त हो जाता है।
अब मेरे भीतर न ईर्ष्या है, न अहंकार।
मेरा मन निर्मल हो चुका है।
और मुझे लगता है कि राम ने तुम्हें मेरे पास भेजकर केवल तुम्हें ही शिक्षा नहीं दी—उन्होंने मेरे जीवन के अंतिम क्षणों को भी सार्थक कर दिया।
उन्होंने मेरे मोक्ष का मार्ग भी प्रशस्त किया।
मेरे अहंकार ने मुझे उस सच्चे, अनुभवजन्य ज्ञान से वंचित रखा, जो केवल शास्त्रों को जानने से नहीं, बल्कि उन्हें जीवन में जीने से प्राप्त होता है।
राम को ज्ञान था, लेकिन उस ज्ञान के साथ अहंकार नहीं था। यही कारण है कि उनका ज्ञान जीवन में उतरकर करुणा, मर्यादा और लोकमंगल बन गया।”
लक्ष्मण निःशब्द खड़े रहे।
उनके भीतर कुछ बदल चुका था।
कुछ समय पहले जिस रावण को वे केवल अधर्मी और शत्रु समझकर उसके सिरहाने खड़े हुए थे, आज उसी रावण के चरणों के पास खड़े होकर उन्हें एक महान जीवन-सत्य प्राप्त हुआ था।
उन्होंने मन ही मन श्रीराम को प्रणाम किया।
अब उन्हें समझ में आ रहा था कि राम ने उन्हें रावण के पास क्यों भेजा था।
राम ने केवल रावण से ज्ञान लेने के लिए नहीं भेजा था; उन्होंने लक्ष्मण को ज्ञान ग्रहण करने की पात्रता सिखाने के लिए भेजा था।
और शायद यही इस प्रसंग का सबसे गहरा संदेश है—
जिस ज्ञान के सामने विनम्रता न हो, वह ज्ञान अभी अधूरा है।
आदर्श सीख
रावण की मृत्युशय्या हमें एक बहुत गहरी सीख देती है—
ज्ञान का मूल्य इस बात में नहीं कि मनुष्य कितना जानता है, बल्कि इस बात में है कि वह अपने ज्ञान को जीवन में कितना उतारता है।
संसार में जितना भी ज्ञान है—वेद, वेदांत, शास्त्र और आध्यात्मिक ग्रंथ—वे मनुष्य को सत्य की ओर बढ़ने में सहायक हैं। वे मार्ग दिखा सकते हैं, विवेक जगा सकते हैं और जीवन को दिशा दे सकते हैं; किंतु केवल उनका अध्ययन कर लेने मात्र से मनुष्य मुक्त नहीं हो जाता।
मुक्ति केवल जान लेने का नाम नहीं है; मुक्ति उस ज्ञान को जीवन में आत्मसात करने का नाम है।
जब तक मन में प्रेम का उदय नहीं होता, अहिंसा जीवन का स्वभाव नहीं बनती और अहंकार का त्याग नहीं होता, तब तक मन वास्तव में सत्य में स्थित नहीं हो सकता।
ज्ञान वाणी में हो सकता है, पुस्तकों में हो सकता है, स्मृति में हो सकता है—लेकिन जब वही ज्ञान हमारे विचार, व्यवहार और कर्म में उतरता है, तभी वह जीवन का प्रकाश बनता है।
इसीलिए सद्गुरु की शरण अत्यंत आवश्यक है।
सद्गुरु केवल ज्ञान प्रदान नहीं करते; वे साधक को उसके भीतर छिपे अहंकार को देखने और उस ज्ञान को जीवन में उतारने की दिशा देते हैं। वे हमें समझाते हैं कि सत्य केवल पढ़ने या सुनने की वस्तु नहीं, बल्कि जीने की अवस्था है।
प्रेम से मन निर्मल होता है।
अहिंसा से हृदय कोमल होता है।
अहंकार के त्याग से भीतर विस्तार उत्पन्न होता है।
और सतत सत्य-चिंतन से मन सत्य की ओर उन्मुख होने लगता है।
तब ज्ञान केवल मस्तिष्क में संचित शब्द नहीं रहता—वह चरित्र बन जाता है, आचरण बन जाता है और अंततः जीवन का प्रकाश बन जाता है।
इसलिए हमें अपने भीतर बार-बार पूछना चाहिए—
क्या मेरा ज्ञान मुझे विनम्र बना रहा है?
क्या मेरा चिंतन मुझे प्रेममय बना रहा है?
क्या मेरे कर्म दूसरों के लिए मंगलकारी सिद्ध हो रहे हैं?
क्या मेरे भीतर का ‘मैं’ धीरे-धीरे क्षीण हो रहा है?
यदि इन प्रश्नों के उत्तर ‘हाँ’ की दिशा में बढ़ रहे हैं, तो समझना चाहिए कि ज्ञान अब केवल मस्तिष्क तक सीमित नहीं है—वह हृदय में उतर रहा है।
और जब ज्ञान हृदय में उतरता है, तब मन सत्य की ओर बढ़ता है; सत्य की ओर बढ़ने पर प्रेम जागृत होता है; प्रेम से अहिंसा का भाव उत्पन्न होता है; और जब अहंकार का आवरण हटने लगता है, तब मनुष्य उस सत्य के निकट पहुँचता है जिसे शास्त्र मुक्ति कहते हैं।
इसलिए रावण की मृत्युशय्या केवल एक पराजित योद्धा की अंतिम कथा नहीं है।
यह हम सभी के लिए एक दर्पण है।
कहीं ऐसा तो नहीं कि हमारे पास ज्ञान बहुत है,
लेकिन हमारे जीवन में उसका प्रकाश बहुत कम है?
यदि यह प्रश्न हमारे भीतर जाग जाए, तो समझना चाहिए कि रावण की अंतिम शिक्षा हमारे लिए सार्थक हो गई है।
ज्ञान होना बड़ी बात है,
पर ज्ञान को जीवन बना लेना उससे भी बड़ी बात है।
और शायद यही रावण की मृत्युशय्या से मिलने वाली सबसे आदर्श सीख है।
( यह लेख आध्यात्मिक साहित्यिक रचना है मूल ग्रन्थ से कथा संवाद भिन्न हो सकता है ,जो रावण को केंद्र में रख कर रची गई है )
जयगुरु 🙏🏻 🙏🏻 🙏🏻 
वंदे पुरुषोत्तमम 
चंद्रा सत्संग केंद्र 
बोकारो (झारखंड)