मिट्टी का दीपक
वर्धमानपुर नाम का एक छोटा-सा नगर था। नगर के बाहर एक पुराना जिनालय था। सुबह होते ही वहाँ घंटियों की मधुर ध्वनि सुनाई देती और लोग भगवान महावीर के दर्शन के लिए पहुँचते। जिनालय के पास ही एक छोटी-सी मिट्टी की दुकान थी, जिसे सत्तर वर्षीय सेठ शांतिलाल चलाते थे।
शांतिलाल के पास धन बहुत था, लेकिन जीवन सरल था। वे हमेशा कहते—
“धन घर में रहे तो ठीक है, मन में आ जाए तो बंधन बन जाता है।”
उनका सोलह वर्षीय पोता आर्यन उनके साथ रहता था। आर्यन बुद्धिमान था, पर उसे धन और प्रतिष्ठा का बहुत आकर्षण था। वह अपने दादा की तरह साधारण जीवन नहीं चाहता था।
एक दिन आर्यन ने कहा, “दादाजी, आप इतनी मेहनत करते हैं, फिर भी साधारण कपड़े पहनते हैं और छोटी-सी दुकान चलाते हैं। अगर मेरे पास इतना धन होता तो मैं बड़ा मकान बनाता, घोड़ा खरीदता और पूरे नगर में मेरा नाम होता।”
शांतिलाल मुस्कुराए।
“बेटा, नाम बड़ा होना जरूरी नहीं, जीवन बड़ा होना जरूरी है।”
आर्यन को यह बात समझ नहीं आई।
उसी दिन नगर में एक प्रसिद्ध व्यापारी आया। उसके पास दूर-दूर के नगरों से लाई हुई वस्तुएँ थीं। वह लोगों को चमकदार आभूषण और महँगे वस्त्र दिखा रहा था। आर्यन भी वहाँ पहुँच गया।
व्यापारी ने उसे एक सुंदर रत्न दिखाया।
“युवक, यह पत्थर साधारण नहीं है। बहुत मूल्यवान है। इसे खरीद लो, तो तुम्हारी प्रतिष्ठा बढ़ जाएगी।”
आर्यन की आँखें चमक उठीं।
उसने दादा से छिपाकर दुकान की कुछ बचत से वह रत्न खरीद लिया।
कुछ दिनों बाद नगर में खबर फैल गई कि व्यापारी ने कई लोगों को नकली रत्न बेचकर धोखा दिया है।
आर्यन घबरा गया।
वह रत्न लेकर दादा के पास पहुँचा।
“दादाजी, मुझे डर लग रहा है। मैंने आपके पैसे से यह रत्न खरीदा था।”
शांतिलाल ने रत्न को हाथ में लिया, फिर बोले—
“डर रत्न से नहीं, अपने कर्म से पैदा होता है।”
आर्यन की आँखें झुक गईं।
“अब क्या होगा?”
दादा ने कहा, “पहला संस्कार—सत्य। गलती हुई है तो उसे स्वीकार करो।”
आर्यन व्यापारी के पास गया और सारी बात बता दी। व्यापारी ने उसे डाँटा, पर शांतिलाल ने आर्यन को रोकने के बजाय कहा—
“गलती छिपाने से छोटी नहीं होती। स्वीकार करने से मन हल्का होता है।”
व्यापारी ने अंततः पैसे लौटा दिए और अपनी गलती स्वीकार कर ली।
उस रात आर्यन देर तक सो नहीं सका।
अगली सुबह वह दादा के साथ जिनालय गया। वहाँ एक मुनिराज का प्रवचन चल रहा था।
मुनिराज ने कहा—
“मनुष्य दूसरों को जीतने में लगा रहता है, जबकि सबसे बड़ी विजय अपने क्रोध, लोभ और अहंकार पर विजय है।”
आर्यन ध्यान से सुन रहा था।
प्रवचन के बाद उसने पूछा, “महाराज, यदि कोई हमें बुरा कहे तो क्या हमें उत्तर नहीं देना चाहिए?”
मुनिराज बोले—
“उत्तर देना और प्रतिशोध लेना अलग बातें हैं। सत्य बोलो, पर क्रोध से नहीं। अपनी रक्षा करो, पर घृणा से नहीं। क्षमा कमजोर व्यक्ति का आभूषण नहीं, आत्मबल का प्रमाण है।”
आर्यन के मन में कुछ बदलने लगा।
कुछ दिन बाद नगर में एक घटना हुई। एक गरीब किसान पर चोरी का आरोप लगा। नगर के लोगों ने उसे चोर कहना शुरू कर दिया। आर्यन ने देखा कि उसके पास कुछ सामान था, लेकिन वह बार-बार कह रहा था—
“मैंने चोरी नहीं की।”
भीड़ उसे मारने ही वाली थी कि आर्यन आगे आया।
“रुकिए! बिना प्रमाण किसी को दोषी मत ठहराइए।”
एक व्यक्ति बोला, “तुम्हें क्या पता कि यह निर्दोष है?”
आर्यन ने कहा, “मुझे यह भी नहीं पता कि यह दोषी है। इसलिए निर्णय करने से पहले सत्य जानना जरूरी है।”
जाँच हुई। पता चला कि सामान किसान का नहीं था; वह किसी दूसरे व्यापारी के गोदाम से गलती से उसके बैलगाड़ी में आ गया था।
किसान निर्दोष था।
लोगों ने आर्यन की प्रशंसा की।
लेकिन आर्यन ने कहा—
“आज मैंने कोई बड़ा काम नहीं किया। मैंने केवल इतना किया कि बिना सत्य जाने किसी जीव को दोषी नहीं माना।”
शांतिलाल दूर खड़े मुस्कुरा रहे थे।
समय बीतता गया।
अब आर्यन ने अपने जीवन में एक और परिवर्तन किया। पहले वह छोटी-सी चींटी को भी अनदेखा कर देता था। अब चलते समय जमीन देखकर चलता। भोजन व्यर्थ नहीं फेंकता। पानी की बर्बादी रोकता। अनावश्यक वस्तुएँ खरीदना कम कर दिया।
एक दिन उसने दादा से पूछा—
“क्या यही अहिंसा है?”
शांतिलाल बोले—
“अहिंसा केवल किसी जीव को न मारने का नाम नहीं है। किसी को अपमानित न करना, किसी को धोखा न देना, किसी के मन को अनावश्यक दुख न देना और प्रकृति का अंधाधुंध शोषण न करना भी अहिंसा की भावना से जुड़ा है।”
आर्यन ने पूछा, “और अपरिग्रह?”
दादा ने दुकान की ओर देखकर कहा—
“जरूरत से अधिक वस्तुओं को पकड़कर रखना और उन्हें ही अपनी पहचान मान लेना परिग्रह है। वस्तुएँ हमारे पास रहें, लेकिन हमारा मन वस्तुओं का गुलाम न बने—यही अपरिग्रह की दिशा है।”
उस दिन से आर्यन ने अपनी कई अनावश्यक वस्तुएँ गरीब बच्चों में बाँट दीं।
एक वर्ष बाद वर्धमानपुर में भयंकर वर्षा हुई। नदी का पानी बढ़ गया। कई घरों में पानी घुस गया। लोगों को भोजन और कपड़ों की आवश्यकता थी।
आर्यन ने अपनी बचत निकाली। उसने दादा से कहा—
“दादाजी, मैं अपने लिए नया घोड़ा खरीदने वाला था। लेकिन अभी लगता है कि उससे ज्यादा जरूरी किसी का घर बचाना है।”
शांतिलाल की आँखें नम हो गईं।
“आज तूने घोड़ा नहीं खरीदा, बेटा। आज तूने अपने भीतर का लोभ थोड़ा कम किया है।”
आर्यन ने राहत कार्य में कई दिन लगाए।
एक शाम वह जिनालय के बाहर बैठा था। सूर्य अस्त हो रहा था। उसके सामने एक छोटा-सा मिट्टी का दीपक जल रहा था।
वह दीपक बहुत साधारण था। न उसमें सोना था, न चाँदी, न कोई रत्न। फिर भी वह अँधेरे में प्रकाश दे रहा था।
आर्यन ने दादा से कहा—
“दादाजी, अब मुझे समझ आया कि बड़ा बनने का अर्थ बहुत धन इकट्ठा करना नहीं है।”
“तो क्या है?” दादा ने पूछा।
आर्यन ने दीपक की ओर देखते हुए कहा—
“अपने भीतर इतना प्रकाश पैदा करना कि उससे किसी दूसरे का अँधेरा थोड़ा कम हो जाए।”
शांतिलाल ने उसके सिर पर हाथ रखा।
“यही संस्कार है।”
आर्यन ने आँखें बंद कीं।
उसने अपने भीतर झाँका—क्रोध अभी भी था, लोभ अभी भी था, अहंकार भी कहीं न कहीं जीवित था। लेकिन अब उसे उनसे लड़ने का रास्ता दिखाई देने लगा था।
उसने मन ही मन संकल्प लिया—
“मैं सत्य बोलूँगा।अहिंसा को जीवन में उतारूँगा।जरूरत से अधिक संग्रह नहीं करूँगा।क्रोध के स्थान पर क्षमा को चुनूँगा।अपने कर्मों के लिए स्वयं उत्तरदायी रहूँगा।और प्रतिदिन अपने भीतर झाँकूँगा।”
जिनालय की घंटी बजी।
आर्यन ने मिट्टी के दीपक को देखा।
उसे लगा जैसे वह दीपक बाहर नहीं, उसके भीतर जल रहा हो।
और उसी दिन से वर्धमानपुर के लोगों ने आर्यन में एक नया परिवर्तन देखा। वह पहले जैसा धन का स्वप्न देखने वाला युवक नहीं रहा था। अब उसका लक्ष्य था—अच्छा मनुष्य बनना।
क्योंकि उसने समझ लिया था कि संसार को बदलने से पहले मनुष्य को अपने भीतर का संसार बदलना पड़ता है।
यही जैन संस्कार की पहली सीढ़ी है—बाहरी विजय नहीं, आत्मविजय।