दो शहर एक सपना
रायगढ़ की लाल मिट्टी से निकला था रघु। उसके हाथों में फावड़ा था और आँखों में एक सपना - अपना एक पक्का मकान। रायगढ़ में काम था पर पैसा कम। किसी ने बताया - "मंदसौर चला जा, वहाँ लहसुन और अफीम की खेती में मजदूरी अच्छी मिलती है।"
रघु ने पहली बार ट्रेन देखी। रायगढ़ से मंदसौर का सफर उसके लिए दो शहरों का सफर नहीं, दो दुनिया का सफर था। एक तरफ उसका गाँव, जहाँ शाम को चूल्हे का धुआँ और माँ के हाथ की रोटी थी। दूसरी तरफ अनजान शहर, जहाँ सिर्फ मशीनें और भीड़ थी।
मंदसौर पहुँचा तो सब कुछ अलग था। भाषा अलग, लोग अलग, काम भी अलग। दिन भर खेत में काम करता और रात को टिन के एक छोटे से कमरे में चार लोगों के साथ सोता। पहले महीने का पैसा जब हाथ में आया तो उसने तुरंत गाँव मनीऑर्डर कर दिया।
माँ ने फोन पर कहा, "बेटा, पैसा मिल गया, पर तू कब आएगा?" रघु कुछ बोल नहीं पाया। उसे समझ आ रहा था कि दो शहरों के बीच वह कहीं अटक गया है। रायगढ़ अब भी उसका घर था पर रोजगार मंदसौर में था।
एक दिन खेत में काम करते हुए उसके मालिक ने कहा, "रघु, तू मेहनती बहुत है। यहीं जमीन ले ले, यहीं बस जा।" रघु मुस्कुराया। उसने सोचा, क्या सपना सिर्फ एक पक्का मकान का था? नहीं। सपना था अपनी मिट्टी पर अपना घर बनाने का।
उसने फैसला किया। उसने दो साल तक एक-एक रुपया जोड़ा। ना बीड़ी पी, ना बाजार गया। सिर्फ काम और बचत। दो साल बाद जब वह रायगढ़ लौटा तो उसके हाथ में सिर्फ पैसे नहीं, मंदसौर की नई खेती की तकनीक भी थी।
उसने अपनी बंजर पड़ी जमीन पर मंदसौर वाला लहसुन लगाया। गाँव वाले हँसे - "ये रायगढ़ है, यहाँ ये सब नहीं उगता।" पर रघु ने हार नहीं मानी। तीन महीने बाद जब फसल लहलहाई तो पूरा गाँव देखने आया।
आज रघु के पास दो शहर हैं। एक शहर ने उसे पैसा दिया, दूसरे ने उसे पहचान दी। और उसका एक सपना? वो अब पक्के मकान में बदल चुका है, उसी लाल मिट्टी पर, जहाँ उसके सपने ने जन्म लिया था। रघु ने साबित कर दिया कि आदमी चाहे कितने भी शहर घूम ले, उसका सपना हमेशा अपनी मिट्टी से ही जुड़ा होता है।
कभी-कभी सपने पूरे करने के लिए घर छोड़ना पड़ता है, ताकि लौट कर उसी घर को और बड़ा बनाया जा आज रायगढ़ स्टेशन पर रघु का नाम इज्जत से लिया जाता है। उसने अपने गाँव के दस लड़कों को मंदसौर में काम दिलवाया, पर एक शर्त पर - पैसा जोड़ कर वापस गाँव में ही कुछ करना है। रघु कहता है, "शहर हमें मजदूर बनाता है, पर गाँव हमें मालिक बनाता है।" दो शहरों ने मिलकर एक आदमी का एक सपना पूरा किया। अब उसका घर पक्का है, खेत हरा-भरा है, और आँगन में उसकी माँ की हँसी है। यही तो असली सपना था। वह रोज शाम को अपने बच्चों को कहानी सुनाता है कि मेहनत कहीं भी करो, पर दिल हमेशा अपनी मिट्टी में ही रखो। क्योंकि मिट्टी ही है जो हमें कभी नहीं भूलती।।