I am an atheist in Hindi Philosophy by Naastik Aman Verma books and stories PDF | मैं नास्तिक हूं

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मैं नास्तिक हूं



अगर मै नास्तिक हूं तो मेरा कर्म है खुद को पहचानूं अगर तुम खुद को पहचान ही नहीं रहे हो तो तुम नास्तिक हो ही नहीं सकते क्योंकि नास्तिक वो नहीं होता जो भगवान को नहीं मानता नास्तिक वो है जो खुद है जानता जिस आप सब भगवान को खोजने निकले हो बाहर की दुनियां में असल में वो है ही नहीं इस दुनिया में अगर इस दुनियां में होता तो भगवान की पूजा नहीं करनी पड़ती उसके पास चलकर जाना पड़ता अपने दुखों को बताना नहीं वो आपको देखकर आपके दुखों को बताते इसलिए मनुष्य को अपने अंदर के भगवान को पहचानो बाहर की प्रकृति को देखो खुद एहसास होगा कि हां किसी ने सही कहा था आस्तिक नहीं मैं नास्तिक हूं।

      जैसे कि भारत में एक आस्तिक व्यक्ति 300 भगवान में से एक को सही मानता है और 299 को गलत और एक नास्तिक व्यक्ति किसी को नहीं मानता अगर मानना है तो सभी को मानो या तो फिर किसी को न मानो इसीलिए मैं आस्तिक नहीं नास्तिक हूं।

        नास्तिक व्यक्ति हर मनुष्य के दुखों समझता भी है और समाधान भी देता है । कबीरदास जी ने कहा है —
            “मोको कहाँ ढूँढे रे बंदे, मैं तो तेरे पास में।”

कबीरदास कहते हैं कि हे मनुष्य! तू मुझे अर्थात् (ईश्वर को) बाहर कहाँ खोज रहा है? मैं तो तेरे भीतर और तेरे आसपास ही विद्यमान हूँ।

      इसलिए बाहरी दुनिया से दूर रहकर अपने अन्दर की दुनिया देखो बहुत ही हसीन और खूबसूरत पाखण्ड मुक्त मिलेगी खुद का मार्गदर्शन करो लोगों के दुखों को सुनो ओर उन्हें समाधान दिलाओ देखो फिर आपके दर्शन करने हर वो व्यक्ति आएगा जिसके दुखों का आप समाधान बताएंगे 
      फिर आप खुद ही कहेंगे कि भगवान दूसरा नहीं मैं खुद भगवान् हूँ । अगर मनुष्य अपने मन में यही बात ठान ले तो उसकी ताकत और बढ़ जाएगी साथ ही उसके मन की विचारधारा परिवर्तित होगी जिससे विज्ञानवाद का जन्म होगा न कि पाखण्डवाद का।
           जब विज्ञानवाद का जन्म होगा उससे नई - नई चीजों की खोज होगी जिससे लोगों को व्यापार मिलेगा लोग अपना जीवन हंसी खुशी व्यतीत कर सकेंगे। भगवान के सहारे न रहिए खुद के भरोसे रहिए अंधविश्वास को न मानकर प्रमाण को मानिए।

           “आँख मूँद मत मान तू, प्रमाणों से बात।
       विज्ञान जहाँ परख करे, वहीं मिले सच्ची जात॥”
   मनुष्य को किसी भी बात को केवल इसलिए आँख बंद करके नहीं मान लेना चाहिए कि लोग उसे सच कहते हैं। हर बात को तर्क, प्रमाण और वैज्ञानिक कसौटी पर परखना चाहिए। जहाँ विज्ञान किसी तथ्य की जाँच करके उसे प्रमाणित करता है, वहीं उस सत्य को स्वीकार करना उचित है।
मैं नास्तिक हूँ। मेरे लिए नास्तिक होना केवल भगवान को न मानने का नाम नहीं है, बल्कि हर बात को तर्क, प्रमाण और विवेक की कसौटी पर परखने का साहस है। मैं किसी विचार को केवल इसलिए सत्य नहीं मानता क्योंकि उसे परंपरा, समाज में कहा गया है। मेरे लिए सत्य वही है जिसे समझा, परखा और प्रमाणित किया जा सके।
    मैं मानता हूँ कि मनुष्य को सबसे पहले स्वयं को जानना चाहिए। हम अक्सर उस शक्ति को बाहर खोजते हैं, जिसके उत्तर हमारे अपने विवेक, अनुभव और प्रकृति के अध्ययन में छिपे हो सकते हैं। यदि हम अपने भीतर के प्रश्नों को समझे बिना केवल बाहरी दुनिया में किसी अदृश्य शक्ति को खोजते रहें, तो शायद हम अपने अस्तित्व को ही ठीक से नहीं समझ पाएँगे।
   मेरी आस्था विज्ञान में है—उस अर्थ में नहीं कि विज्ञान हर प्रश्न का उत्तर आज ही दे चुका है, बल्कि इसलिए कि विज्ञान प्रश्न पूछने, प्रमाण खोजने और गलती होने पर अपने निष्कर्ष को बदलने की स्वतंत्रता देता है। विज्ञान हमें सिखाता है कि किसी दावे को केवल विश्वास के आधार पर स्वीकार न करें, बल्कि उसके पीछे मौजूद प्रमाण को देखें।
    नास्तिक होने का अर्थ मेरे लिए धर्म या धार्मिक व्यक्ति का अपमान करना भी नहीं है। हर व्यक्ति को अपने विश्वास और विचार रखने की स्वतंत्रता है। मेरा प्रश्न केवल इतना है कि किसी भी विचार को अंतिम सत्य मानने से पहले उसे तर्क की कसौटी पर क्यों न परखा जाए?
 मैं नास्तिक हूँ, क्योंकि मैं अंधविश्वास के बजाय जिज्ञासा को चुनता हूँ, डर के बजाय प्रश्न को चुनता हूँ और बिना प्रमाण के विश्वास करने के बजाय सत्य की खोज को महत्व देता हूँ।

मेरे लिए नास्तिकता किसी चीज़ का अंत नहीं, बल्कि प्रश्न पूछने और स्वयं को समझने की शुरुआत है।
      मेरे विचार में मनुष्य की सबसे बड़ी शक्ति उसकी जिज्ञासा है। जिस दिन वह प्रश्न करना छोड़ देता है, उसी दिन उसकी बौद्धिक यात्रा रुकने लगती है। सभ्यता की प्रगति भी उन्हीं सवालों से हुई है जिन्हें कभी असंभव या अनुचित समझा गया था। आकाश को देखकर मनुष्य ने पूछा कि तारों की दूरी कितनी है, बीमारी को देखकर पूछा कि उसका कारण क्या है और प्रकृति की घटनाओं को देखकर उनके पीछे छिपे नियमों को समझने का प्रयास किया। यही प्रश्न आगे चलकर ज्ञान में बदलते गए।
   इसलिए मैं किसी रहस्य से डरने के बजाय उसे समझने की कोशिश करना अधिक उचित मानता हूँ। किसी घटना का कारण मेरी समझ से बाहर होना इस बात का प्रमाण नहीं कि उसके पीछे कोई अलौकिक शक्ति ही होगी। हमारी जानकारी सीमित हो सकती है, लेकिन अज्ञान को उत्तर मान लेना समस्या का समाधान नहीं है। जहाँ जानकारी समाप्त होती है, वहीं से खोज शुरू होनी चाहिए।
     प्रकृति मेरे लिए किसी पूजा की वस्तु से अधिक अध्ययन का विषय है। एक पेड़ बिना किसी उपदेश के हमें जीवन का चक्र दिखाता है। नदी अपने रास्ते में आने वाली बाधाओं के अनुसार दिशा बदलती है। ग्रह अपने निश्चित नियमों के अनुसार गति करते हैं। ऋतुओं का परिवर्तन किसी मनुष्य की इच्छा से नहीं, बल्कि प्राकृतिक प्रक्रियाओं से होता है। इन घटनाओं को समझने का प्रयास मुझे किसी तैयार उत्तर को स्वीकार करने से अधिक सार्थक लगता है।
    मेरा मानना है कि नैतिकता के लिए किसी अदृश्य निगरानी की आवश्यकता नहीं होनी चाहिए। यदि कोई व्यक्ति केवल दंड के डर से अच्छा व्यवहार करता है, तो उसके आचरण की जड़ में करुणा नहीं बल्कि भय है। सच्ची इंसानियत तब दिखाई देती है जब हम किसी कमजोर व्यक्ति की सहायता इसलिए करें क्योंकि हमें उसके दर्द का एहसास है, न कि इसलिए कि बदले में कोई पुरस्कार मिलने की उम्मीद है।
     इंसान का मूल्य उसके विश्वास से नहीं, बल्कि उसके व्यवहार से तय होना चाहिए। कोई व्यक्ति किसी ईश्वर को मानता है या नहीं मानता, इससे पहले यह देखना चाहिए कि वह दूसरों के साथ कैसा व्यवहार करता है। क्या वह अन्याय के विरुद्ध खड़ा होता है? क्या वह कमजोर के प्रति संवेदनशील है? क्या वह अपने विचार से अलग व्यक्ति का सम्मान कर सकता है? मेरे लिए ये प्रश्न कहीं अधिक महत्वपूर्ण हैं।
    मुझे यह भी लगता है कि संदेह हमेशा नकारात्मक नहीं होता। सही दिशा में किया गया संदेह ज्ञान का द्वार खोल सकता है। जब हम किसी स्थापित धारणा से पूछते हैं—“ऐसा क्यों है?”—तो हम विरोध नहीं कर रहे होते, बल्कि समझने की कोशिश कर रहे होते हैं। यदि किसी कथन के पीछे मजबूत आधार है, तो प्रश्न करने से वह और स्पष्ट होगा; और यदि आधार कमजोर है, तो उसकी कमजोरी सामने आ जाएगी।
   मनुष्य ने इतिहास में अनेक ऐसी धारणाएँ रखीं जिन्हें बाद में बदलना पड़ा। इसका अर्थ यह नहीं कि पुराने लोग मूर्ख थे। इसका अर्थ यह है कि ज्ञान लगातार विकसित होता है। इसलिए मुझे अपने विचारों को भी अंतिम और अचूक मानने में संकोच है। यदि भविष्य में कोई बेहतर प्रमाण मेरे वर्तमान निष्कर्ष को गलत साबित करता है, तो अपने विचार को बदलना मेरे लिए हार नहीं, बल्कि सीखने की प्रक्रिया होगी।
    यही कारण है कि मैं व्यक्ति-पूजा से भी दूरी रखता हूँ। कोई भी विद्वान, दार्शनिक या वैज्ञानिक प्रश्नों से ऊपर नहीं हो सकता। किसी महान व्यक्ति की बात इसलिए सही नहीं हो जाती कि वह महान है। विचार की मजबूती उसके कहने वाले के नाम से नहीं, उसके आधार और तर्क से निर्धारित होनी चाहिए।
     मेरे लिए स्वतंत्र चिंतन का अर्थ यह भी है कि मैं भीड़ के साथ चलने को सत्य का प्रमाण न मानूँ। यदि हजार लोग एक बात कह रहे हों और एक व्यक्ति उसके प्रमाण पर सवाल उठा रहा हो, तो केवल संख्या के आधार पर सत्य तय नहीं किया जा सकता। कभी-कभी अकेला प्रश्न ही उस रास्ते की शुरुआत करता है जिस पर आगे चलकर पूरी मानवता चलती है।
   मैं अपनी सीमाओं को भी स्वीकार करता हूँ। नास्तिक दृष्टिकोण रखने का अर्थ यह दावा करना नहीं कि मेरे पास ब्रह्मांड के हर प्रश्न का उत्तर है। वास्तव में, अनिश्चितता को स्वीकार करना ही ईमानदार बौद्धिकता का हिस्सा है। “मुझे नहीं पता” कहना उस उत्तर से बेहतर है जो केवल कल्पना पर आधारित हो।
    ब्रह्मांड जितना विशाल है, उसके सामने मनुष्य का ज्ञान बहुत छोटा है। शायद ऐसे अनगिनत प्रश्न हैं जिनके उत्तर हमें अभी नहीं मालूम। लेकिन अज्ञात को देखकर भयभीत होने के बजाय उसके बारे में जानने की इच्छा रखना मुझे अधिक मानवीय लगता है। हमारी यात्रा शायद सभी उत्तर पाने की नहीं, बल्कि हर पीढ़ी के साथ कुछ नए प्रश्न समझने की यात्रा है।
   इस दृष्टि से मेरी नास्तिकता किसी खालीपन का नाम नहीं है। यह जिम्मेदारी का विचार है। यदि संसार को बेहतर बनाना है, तो हमें किसी चमत्कार की प्रतीक्षा करने के बजाय अपने कर्मों पर भरोसा करना होगा। भूख, गरीबी, भेदभाव, हिंसा और अज्ञान जैसी समस्याओं का समाधान मानवीय प्रयास, शिक्षा, वैज्ञानिक सोच और संवेदनशील व्यवस्था से ही संभव होगा
    मैं चाहता हूँ कि आने वाली पीढ़ियाँ सवाल पूछने से न डरें। वे अपने माता-पिता, शिक्षकों, पुस्तकों और समाज से मिले विचारों का सम्मान करें, लेकिन उन्हें समझने और जाँचने का अधिकार भी अपने पास रखें। क्योंकि विचार तभी जीवित रहते हैं जब उन पर चर्चा होती है।
     मेरे लिए जीवन का अर्थ किसी निश्चित उत्तर को पकड़ लेना नहीं, बल्कि लगातार सीखते रहना है। अपनी गलतियों को पहचानना, दूसरों के अनुभवों से सीखना, प्रकृति को समझना और मानवता के प्रति जिम्मेदार रहना—यही मेरे जीवन-दर्शन का आधार है।
    मैं नास्तिक हूँ, इसलिए नहीं कि मेरे पास हर रहस्य का उत्तर है, बल्कि इसलिए कि मैं अज्ञात के सामने ईमानदारी से खड़ा होना चाहता हूँ। जहाँ प्रमाण होगा, वहाँ स्वीकार करूँगा; जहाँ प्रमाण नहीं होगा, वहाँ प्रतीक्षा करूँगा; और जहाँ प्रश्न होगा, वहाँ उसे पूछने से पीछे नहीं हटूँगा।
   शायद मेरी सबसे बड़ी पहचान यही है—मैं तैयार उत्तरों से अधिक सत्य की खोज को महत्व देता हूँ। मेरे लिए विचार कोई बंद दरवाजा नहीं, बल्कि खुली खिड़की है, जहाँ से हर नई जानकारी भीतर आ सकती है और पुराने निष्कर्षों को फिर से परखा जा सकता है।              
स्वलिखित 
नास्तिक अमन वर्मा