गुज़र होता था कभी कभी उस टाहली के पास से,यहां मेरे बापू और भाई से बदला लिया था... उसे कुहाड़ी से काट दिया था.. पर बापू की तो गर्दन ही उड़ा दी थी, मेरे भाई की बाजू काट दी थी,पर उसने भी दुश्मन शरीक का कुछ नहीं छोड़ा था... पर बचाव मे भी उसे जेल तो हो ही गयी थी... उसकी एक बाजू बाई नहीं थी... पर हमारा निक्मा कानून बचाव मे भी जेल तो भेज ही देता है... कुछ भी हो। आज उसकी रहायी थी... बहुत खुश था बलजार। उसके छोटे ने घर आना था। ठीक टाइम के शाम को कैदी छोड़ा जाता है, वो सतर्क था , छोड़ा गया... दरवाज़े लोहे की खुलने की आवाज ए ---ए --- फिर जैकी ने कंधे पे शर्ट उतार के रखी.. बॉडरी से बाहर देखा शायद हताश था कोई उसे लेने ही नहीं आया था ---- तभी आवाज पड़ी.. "मुने ओह जैकी..." वोह एक दम से पलटा उसके घुग्राले वाल माथे पर थे... " बड़े भईया आप... " वो पेरी गिरा... "नहीं मुने ये नहीं करना..." दोनों गले लगे...embraced... हाल चाल पूछने के बाद जैकी ने पूछा, " बड़े भईया भाभी नहीं आयी.. ठीक है न... " बलराज हसा.. "तेरा आभागा भाई हुँ --- तुम्हे शादी भी मेरी देखना नसीब नहीं हुआ।" आंसू भर आये जैकी के," कयो भाई को ऐसा कह रहा है... तुम तो राम हो भईया मेरे बड़े भाई... " दोनों थोड़ी देर मे घर थे... खेत दिखाता आया था.. बलराज... फिर कदम रखा सीढिया चढ़ता बलराज और जैकी अंदर ऊपर छत पे कमरे मे थे। "--- भागवान ओह सुरभि... कहा हो.. " बलराज ने उच्ची आवाज मे कहा। " जी आ रही हुँ " सुरभि ने जैकी को देखा तो एक दम घबरा गयी.. उधर जैकी का भी यही हाल था। एक दोनों का प्यार मिलन, अमानत जैकी की... वो उसे जान से बड़ी आपनी सास मानता था ---- पर ये कया हुआ ? सुरभि के होंठ खुशक हो चुके थे। कया हुआ क्या नहीं होगा... ये समय की बंद मुठी मे था। आदमी शुरू से अंत तक समय के आगे हारा है, और हारता ही रहा है.... कया होगा कया नहीं कोई नहीं जानता... बलराज ने कहा --"बापू की तुमाहरी कोई फोटो भी नहीं है... जो सुरभि को दिखा सकता... " जैकी ने कहा कोई बात नहीं... जो बड़े भाई ने जमीन की खातिर किया और होता यही करता, बलिदान... भाई मेरा होता बापू का नहीं ---"बलराज एक दम से सहम गया, वो कोई अनहोनी सी घटना को याद कर डर गया, " कयो ऐसा सुरभि ओ वदना ये कयो कह रहा है, कयो झला गए हो " सुरभि ने हाथ जोड़े जैसे वो शतरज की रानी को शह दे दी हो किसी बेवफा नसीब की कुंझी ने " देवर जी ऐसा मत कहो, हम सब मर जाते... वो ऐसा आभूल से रोयी जैसे कोई बांध टूट गया हो। " जैकी ने कापते हुए उसके हाथ पकड़ लिये," वदना भाभी ऐसा मत करो, हाथ मत जोड़ो, बेवफा वक़्त कभी किसी का नहीं। " जैसे उसने बहुत कुछ कह दिया। तभी बच्ची के रोने की आवाज गुजी," हा जैकी तेरी भतीजी.... " जैकी ने सडोल बाहो मे पकड़ा, ओह बिलकुल आपनी माँ पर और हाथ पैर बिलकुल पिता पर और नाक भईया पर है... कितनी सुंदर परी सी... " फिर परिवार ने इकठे रोटी और चावल खाये... और बड़े भईया के साथ वदना सोने चले गयी। और जैकी शहर की तरफ चाचे को मिलने के लिये निकल पड़ा। वदना पुरानी याद मे चले गयी... वर्षा मे दोनों भीगते हुए हसते हसते कार मे बैठ गए... तभी वदना का सुपना टुटा ज़ब छिपकली छत से बलराज पर आ गिरी... चीख मार कर बलराज को भी हैरान कर दिया। " कया हुआ वदना... कया। " वदना ने घबराते हुए कहा ---" छिपकली.... वोह.... " हसने लगा बलराज। "वाह आप डरती भी है " बलराज ने कहा। हाँ बहुत किसी आने वाली घटना से ----" ----" कया कह रही हो ---" बलराज ने कहा। " फालतू कि किस बात की टेशन है तुझे " वदना ने बात बदली ----" मुझे वैसे ही लगा पता नहीं कयो... "वचन लिया था उससे कि वो तीर चलाये सिंगानिया फेमली पर... जिसने सब कुछ उसका छीन लिया है।चाचा शिगार का शौकीन था... खूब कश मारता था.. खूब। ♥️