जिंदगी में बेदाग और बिल्कुल सही दिखना बहुत आसान है, बशर्ते आपने कभी मैदान में उतरकर कोई काम न किया हो।
आज मेज़ पर बिखरे सामान के बीच किसी के लिए पेंसिल ढूंढते हुए मेरे हाथ में दो पेंसिलें आईं। पहली पेंसिल बिल्कुल नई थी—उसकी नोक सधी हुई, चमकीला रंग और उस पर इस्तेमाल का एक भी निशान नहीं था। दूसरी पेंसिल घिस-घिसकर बहुत छोटी हो चुकी थी, उसकी लकड़ी पर उंगलियों के दबाव के निशान थे और वह इतनी बार तराशी जा चुकी थी कि शायद एक या दो बार के छिलने के बाद उसका वजूद खत्म हो जाता।
मैंने बिना कुछ सोचे-समझे उस छोटी पेंसिल को उठाया और कागज़ पर कुछ लकीरें खींचीं। हैरानी की बात यह थी कि वह बेहद सहज और मुलायम चल रही थी। बिना किसी रुकावट के उसने पन्नों पर अपनी गहरी छाप छोड़ दी। उस वक्त मेरे चेहरे पर एक खामोश मुस्कान आ गई, क्योंकि मुझे लगा कि हमारी ज़िंदगी भी तो बिल्कुल ऐसी ही है।
हम अक्सर उन लोगों से बहुत जल्दी प्रभावित हो जाते हैं जो बाहर से एकदम संपूर्ण और बेदाग दिखते हैं। वे लोग जो कभी थके हुए नज़र नहीं आते, जिनके दामन पर किसी गलती का कोई दाग नहीं होता और जिनके चेहरे पर संघर्ष की कोई लकीर नहीं दिखती। लेकिन सच्चाई कई बार कड़वी होती है; कई बार लोग बेदाग इसलिए दिखते हैं क्योंकि उन्होंने कभी किसी मुश्किल इम्तिहान का सामना ही नहीं किया होता। वे उस अलमारी में सजी नई पेंसिल की तरह होते हैं जिसे कभी कागज़ के खुरदुरेपन से रूबरू ही नहीं कराया गया।
मुझे कला के एक पुराने शिक्षक की बात याद आ गई। एक बार उन्होंने अपनी कक्षा में एक छात्र के सामने दो पेंसिलें रखीं। एक पूरी तरह नई और तराशी हुई थी, जबकि दूसरी इतनी छोटी थी कि उसे पकड़ना भी मुश्किल था। छात्र ने तुरंत चमकती हुई नई पेंसिल उठा ली। शिक्षक ने मुस्कुराते हुए बड़े धीमे स्वर में कहा, "यह नई पेंसिल देखने में भले ही धारदार और खूबसूरत लगे, लेकिन इस छोटी सी घिसी हुई पेंसिल ने सैकड़ों बेमिसाल तस्वीरें बनाई हैं।"
उस पल पूरी कक्षा में एक गहरा सन्नाटा छा गया था। हर किसी को बात की गहराई समझ आ चुकी थी।
इस्तेमाल होना, घिस जाना या जीवन की रगड़ खाना किसी चीज़ या इंसान की कीमत कम नहीं करता; बल्कि यह इस बात का सबसे बड़ा सबूत है कि उसने किसी मकसद को पूरा किया है। वह पेंसिल छोटी इसलिए नहीं हुई थी कि वह कमज़ोर थी, बल्कि इसलिए हुई क्योंकि वह बार-बार कागज़ पर उतरती रही, उसने लिखना नहीं छोड़ा और वह लगातार कुछ नया रचती रही।
इंसान भी बिल्कुल पेंसिलों जैसे ही होते हैं।
अस्पताल के गलियारों में रातों की नींद गंवा चुका वह डॉक्टर, परिवार की फिक्र में थकी हुई लकीरों वाले हाथों से काम करती मां, शाम ढलते-ढलते बैठती आवाज़ के साथ बच्चों को तराशता शिक्षक, और वह दोस्त जो हर मुश्किल घड़ी में बिना कहे ढाल बनकर खड़ा हो जाता है। ज़िंदगी उन लोगों पर अपने गहरे निशान छोड़ ही देती है जो दूसरों के लिए खुद को खपा देते हैं।
चेहरे की झुर्रियां, आंखों के नीचे के काले घेरे और दिल पर लगे तजुर्बों के निशान इंसान के टूटने की निशानी नहीं होते। ये निशान इस बात का जिंदा सुबूत होते हैं कि आपने ज़िंदगी को सिर्फ दूर से देखा नहीं, बल्कि उसे जी भरकर जिया है।
अगर ज़िंदगी ने आपको कई बार तराशा है, दर्द की नोक से छीला है या थका दिया है, तो कभी निराश मत होना। जो पेंसिल जितनी ज्यादा घिसती है, अक्सर वही दुनिया की सबसे खूबसूरत कहानियां लिखती है।
सीख:जिंदगी की जद्दोजहद में घिस जाने से आपकी अहमियत कम नहीं होती; बल्कि वही घिसावट आपके वजूद को एक खूबसूरत कहानी बना देती है।