Flute Tune - Part 6 in Hindi Moral Stories by prem chand hembram books and stories PDF | बांसुरी की धुन - भाग 6

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बांसुरी की धुन - भाग 6

बांसुरी की धुनभाग : ०६

रावण हेंब्रम ने धीरे-धीरे सभा की ओर देखा। उनके चेहरे पर संतोष की हल्की मुस्कान थी। सामने बैठे लोगों की आँखों में अभी भी प्रश्नों की चमक थी।

उन्होंने कहा—

“मुझे बहुत अच्छा लगा। यहाँ के भक्तवृंद काफी जिज्ञासु हैं। इनके प्रश्न भी उतने ही गहरे हैं। ज्ञान अनंत है और हम सब उस अनंत ज्ञान के पथिक हैं। आज हमने जो समझा है, वह अंतिम सत्य नहीं है। समझने और सीखने की यात्रा निरंतर चलती रहती है।”

संध्या अब धीरे-धीरे प्रांगण पर उतर रही थी। दूर पश्चिम के आकाश में सूर्य की अंतिम लालिमा शेष थी। पेड़ों की पत्तियों से आती ठंडी हवा सभा में बैठे लोगों को छू रही थी।

रावण हेंब्रम ने एक क्षण रुककर कहा—

“अब हमारे बीच लाल दा हैं। वे आप सबको ठाकुर जी की भावधारा से प्रेरित करेंगे।”

उन्होंने दोनों हाथ जोड़ दिए।

“आप सभी का मंगल हो।”

फिर उन्होंने विनम्रता से माइक लाल दा को सौंप दिया।

लाल दा धीरे-धीरे उठे।

उम्र ने उनके शरीर को झुका दिया था। हाथ में पुरानी लाठी थी, लेकिन कदमों में अजीब-सा विश्वास था। ठाकुर जी के सान्निध्य में बिताए वर्षों ने उनके चेहरे पर ऐसी गंभीरता ला दी थी, जिसे केवल उम्र से नहीं समझा जा सकता था।

वे मंच तक पहुँचे।

कुछ क्षण उन्होंने सामने बैठे लोगों को देखा।

किसी ने सिर झुका रखा था, कोई उनकी ओर टकटकी लगाए था। कुछ बुजुर्ग अपने घुटनों पर हाथ रखे शांत बैठे थे। पीछे बैठे कुछ युवक आपस में धीमे स्वर में बातें कर रहे थे, लेकिन लाल दा के मंच पर आते ही वे भी चुप हो गए।

लाल दा ने लाठी एक ओर टिकाई और दोनों हाथ जोड़ दिए।

“ग्राम के गुरुजन, माताएँ और भाइयों... आप सभी को मेरा प्रणाम।”

एक क्षण का विराम।

फिर उनके मुख से निकला—

“जयगुरु!”

पूरा प्रांगण उसी स्वर से गूँज उठा—

“जयगुरु!”

पास के पेड़ पर बैठे पक्षियों का झुंड अचानक फड़फड़ाकर उड़ गया।

लाल दा मुस्कुराए।

“आज रावण भाई ने जो प्रश्न उठाया, वह साधारण प्रश्न नहीं है। वह हमें अपने बाहर देखने से पहले अपने भीतर देखने के लिए विवश करता है।”

उन्होंने सामने बैठे लोगों पर दृष्टि डाली।

“हम अक्सर पूछते हैं—सत्य कहाँ है? कौन सही है? किसे गुरु मानना चाहिए? कौन बड़ा है और कौन छोटा?”

वे कुछ क्षण चुप रहे।

“लेकिन शायद सबसे बड़ा प्रश्न यह है—मैं स्वयं कितना सत्यवान हूँ?”

सभा में फिर निस्तब्धता छा गई।

लाल दा ने कहा—

“जब भगवान श्रीकृष्ण इस धरती पर आए, तब क्या सब लोगों ने उन्हें पहचान लिया था?”

कुछ लोग एक-दूसरे का चेहरा देखने लगे।

लाल दा स्वयं ही बोले—

“नहीं।”

उनकी आवाज में दृढ़ता थी।

“उन्होंने धर्म की स्थापना के लिए जीवनभर प्रयास किया। लेकिन उस समय भी अनेक लोग उन्हें केवल अपनी दृष्टि और अपनी धारणाओं के आधार पर देखते रहे। जिन्हें उनके संदेश को सुनना चाहिए था, वे अपने अहंकार, स्वार्थ और मोह में उलझे रहे।”

उन्होंने धीरे से अपनी लाठी पर हाथ रखा।

“महाभारत केवल दो पक्षों का युद्ध नहीं था। वह मनुष्य के भीतर चलने वाले धर्म और अधर्म के संघर्ष का भी प्रतीक था।”

कुछ युवकों ने सिर उठाकर उनकी ओर देखा।

“भगवान श्रीराम के समय भी हर व्यक्ति उनके आदर्श को उसी क्षण नहीं समझ सका। सत्य सामने होने पर भी मनुष्य कई बार अपनी धारणाओं का बंदी बना रहता है।”

लाल दा की आवाज थोड़ी धीमी हुई।

“और यही बात आज हमारे सामने भी है।”

उन्होंने सभा के एक छोर से दूसरे छोर तक देखा।

“सत में मन लगाए रखना, सत की बात करना और सत की चिंता करना—यह किसी एक व्यक्ति का अधिकार नहीं, बल्कि हर जाग्रत मनुष्य का दायित्व है।”

उन्होंने कहा—

“जो स्वयं को विप्र मानता है, उसके ऊपर यह दायित्व और भी अधिक होना चाहिए। क्योंकि विद्या यदि मनुष्य को विनम्र न बनाए, तो वह केवल ज्ञान का बोझ बन जाती है।”

सभा में बैठे एक वृद्ध ने धीरे से सिर हिलाया।

लाल दा आगे बोले—

“हमें अपने आप से पूछना चाहिए—क्या हम अपने दायित्व को निभा रहे हैं?”

हवा में जैसे अचानक गंभीरता बढ़ गई।

“क्या हमारी विद्या से किसी का जीवन सुधर रहा है?”

“क्या हमारी साधना से हमारे भीतर करुणा बढ़ रही है?”

“क्या हमारी परंपरा हमें दूसरों का सम्मान करना सिखा रही है?”

वे रुके।

“और सबसे बड़ा प्रश्न—क्या हम अपने से अलग किसी मनुष्य में भी उसी परम तत्व को देख पा रहे हैं?”

रामलाल ने पहली बार गर्दन उठाकर लाल दा को ध्यान से देखा।

लाल दा बोल रहे थे—

“समाज में अनेक जातियाँ हैं, अनेक परंपराएँ हैं, अनेक जीवन-पद्धतियाँ हैं। किसी की सामाजिक स्थिति ऊँची रही, किसी की नीची मानी गई। इतिहास में इन भेदों ने मनुष्य को मनुष्य से दूर भी किया है।”

उनकी आवाज में कठोरता नहीं, बल्कि एक शांत स्वीकार था।

“लेकिन आध्यात्मिक मार्ग पर मनुष्य की पहचान उसके जन्म से नहीं, उसके आचरण से होती है।”

सभा में कुछ लोग बिल्कुल स्थिर हो गए।

“यदि कोई व्यक्ति अपने जीवन में बुराइयों से लड़ रहा है, अपने परिवार को संस्कार दे रहा है, नशे से दूर हो रहा है, श्रम कर रहा है, सत्य बोलने का प्रयास कर रहा है और दूसरों की सेवा कर रहा है—तो हमें उसके जन्म से पहले उसके आचरण को देखना चाहिए।”

उन्होंने मुस्कुराकर कहा—

“और यदि कोई व्यक्ति विद्या, पद या परंपरा का अभिमान करके दूसरों को तुच्छ समझता है, तो उसे भी अपने भीतर झाँकने की आवश्यकता है।”

एक हल्की-सी फुसफुसाहट सभा के बीच उठी और फिर शांत हो गई।

लाल दा ने कहा—

“किसी को ऊपर उठते देखकर हमारे भीतर ईर्ष्या क्यों पैदा हो?”

“यदि कल तक जिसे हम साधारण समझते थे, आज वह अपने चरित्र से हमसे आगे निकलने का प्रयास कर रहा है, तो हमें उससे जलना नहीं चाहिए। हमें उसके अच्छे गुणों को ग्रहण करने का प्रयास करना चाहिए।”

उन्होंने अपनी छाती पर हाथ रखा।

“विप्र होने का अर्थ दूसरों को छोटा समझना नहीं है।”

एक क्षण का मौन।

“विप्र होने का अर्थ है—अपने भीतर इतनी रोशनी पैदा करना कि अँधेरे में खड़े दूसरे मनुष्य को भी रास्ता दिखाई देने लगे।”

इस बार सभा में कोई हलचल नहीं हुई।

केवल दूर कहीं किसी गाय के गले की घंटी सुनाई दी।

लाल दा ने फिर कहा—

“हमारे समाज में यदि कोई संताल अपने जीवन को सुधार रहा है, कोई कोइरी अपने बच्चों को संस्कार दे रहा है, कोई दलित परिवार शिक्षा की ओर बढ़ रहा है, कोई आदिवासी युवक नशे को छोड़कर सेवा का मार्ग अपना रहा है, कोई भुईयाँ या डोम परिवार अपने बच्चों को आगे बढ़ाने का प्रयास कर रहा है—तो यह किसी एक जाति की जीत नहीं है।”

उनकी आँखों में चमक आ गई।

“यह मनुष्य की जीत है।”

कुछ चेहरों पर हल्की मुस्कान आई।

“और जब मनुष्य ऊपर उठता है, तो समाज थोड़ा ऊपर उठता है।”

उन्होंने धीरे से कहा—

“लेकिन यदि हमारी विद्या, हमारी परंपरा और हमारी साधना के बावजूद हमारे भीतर अहंकार, ईर्ष्या और द्वेष बढ़ता जाए, तो हमें स्वयं से पूछना होगा—हमने धर्म पाया है या केवल धर्म का नाम?”

ये शब्द जैसे हवा में ठहर गए।

रामलाल के भीतर कुछ टूटने लगा।

उसे अचानक अपने पिछले दिनों की याद आने लगी।

शराब की बोतल...

घर लौटते समय लड़खड़ाते कदम...

पत्नी की डरी हुई आँखें...

बच्चों का उससे बचकर रहना...

और फिर वे रातें, जब नशे में वह स्वयं को बहुत बड़ा समझता था, लेकिन सुबह आईने में अपना चेहरा देखकर भीतर से खाली महसूस करता था।

उसने सिर झुका लिया।

लाल दा की आवाज अब भी सुनाई दे रही थी—

“सुधार का पहला कदम दूसरों की गलती देखना नहीं है। पहला कदम है—अपनी गलती को स्वीकार करना।”

रामलाल के हाथ अनायास आपस में कस गए।

“मनुष्य अपने जन्म को नहीं बदल सकता, लेकिन अपने आचरण को बदल सकता है। वह अपने अतीत को मिटा नहीं सकता, लेकिन अपने आने वाले कल को बदलने का प्रयास अवश्य कर सकता है।”

रामलाल की आँखों के सामने जैसे अँधेरा और उजाला एक साथ आ गया।

उसे लगा, लाल दा किसी और से नहीं, सीधे उसी से बात कर रहे हैं।

लाल दा ने अंत में कहा—

“याद रखिए... सत्य को पहचानने में देर हो सकती है, लेकिन सत्य किसी के पहचानने का मोहताज नहीं होता।”

उन्होंने माइक से थोड़ा पीछे हटकर सभा को देखा।

“हम सब उस सत्य के पथिक हैं। कोई आगे है, कोई पीछे। कोई अभी रास्ते पर आया है, कोई वर्षों से चल रहा है। लेकिन रास्ता सबके लिए खुला है।”

उन्होंने दोनों हाथ जोड़ दिए।

“जयगुरु।”

पूरा प्रांगण एक साथ गूँज उठा—

“जयगुरु!”

सामूहिक स्वर कुछ क्षण तक हवा में तैरता रहा।

सूर्य अब पूरी तरह डूब चुका था। आकाश का लाल रंग धीरे-धीरे नीले अँधेरे में बदल रहा था। किसी ने सभा के किनारे रखी लालटेन जला दी। उसके पीले प्रकाश में बैठे लोगों के चेहरे एक-एक करके उभरने लगे।

रामलाल वहीं बैठा रहा।

लोग उठने लगे थे, लेकिन वह जैसे अपनी जगह जम गया था।

उसके भीतर एक प्रश्न जन्म ले चुका था।

“अगर सत्य सबके लिए है, तो मेरे जीवन में अब तक सत्य कहाँ था?”

उसने आँखें बंद कर लीं।

पहली बार उसे लगा कि धर्म केवल सुनने की चीज नहीं है।

शायद धर्म वह है, जिसे मनुष्य अपने जीवन में उतारता है।

और उसी क्षण उसके भीतर एक दूसरा प्रश्न उठा—

“क्या मैं सचमुच बदल सकता हूँ?”

उसने आँखें खोलीं।

सामने लालटेन की लौ काँप रही थी।

रामलाल कुछ क्षण उस लौ को देखता रहा।

फिर उसके भीतर से एक धीमी आवाज उठी—

“अगर रास्ता सबके लिए खुला है... तो मेरे लिए भी होगा।”

वह धीरे से उठा।

लेकिन उसके कदम सभा से बाहर नहीं, मानो अपने पुराने जीवन से बाहर निकलने की ओर बढ़ रहे थे।

क्रमशः...