तब उसे कुछ याद आता है और उठकर अपने आस-पास देखता है। उसे याद आता है कि जब वह घर से गया था तो घर पूरी तरह फैला हुआ था, लेकिन अब सब अपनी जगह पर वैसे ही रखा था। लेकिन यह सब सोचना भी उसके लिए भारी लग रहा था। आर्य बिस्तर पर वापस लेट जाता है और गहरी नींद में सो जाता है।
उसकी नींद कॉल की आवाज़ से टूटती है। आर्य को लगता है वह सपना देख रहा है, लेकिन कॉल की आवाज़ इतनी तेज़ होती है कि उसे समझ ही नहीं आता। तभी उसकी आँख खुलती है। वह देखता है कि वह अब अपने कमरे में नहीं है। घर तो उसी का है, लेकिन यह कमरा कुछ अलग है। दीवारों पर काली तितलियाँ बनी हुई हैं और कमरे में लाल बत्ती जल रही है।
तभी उसे लड़की की हँसने की आवाज़ आती है। आर्य इधर-उधर देखता है तो आवाज़ कमरे के बाहर से आ रही थी। आर्य बिस्तर से उठता है और बाहर जाता है।
बाहर एक सुंदर-सी लड़की फोन पर किसी से बात कर रही थी।
लड़की — हँसते हुए, "तुम भी ना... वैसे ये बताओ मुझे लेने कब आओगे? हम्म? तुम्हें पता है मैंने तुम्हारे लिए खाना बनाना सीख लिया है... हाँ..."
इतना कहते ही वह लड़की गायब हो जाती है और बाहर अँधेरा हो जाता है।
आर्य बहुत डर जाता है। वह डरकर जैसे ही पीछे मुड़ता है, सामने वही लड़की खड़ी होती है और वह खुद को शीशे में निहार रही होती है। खुद को देखते ही कहती है—
"आज मुझे वो लेने आ रहे हैं। फाइनली मैं इस जगह से बाहर जाऊँगी। मैं बहुत खुश हूँ... बहुत ज़्यादा।"
वह लड़की फिर गायब हो जाती है।
आर्य को कुछ समझ नहीं आ रहा था। यह हो क्या रहा है? क्या यह सब एक सपना है?
फिर वह लड़की खिड़की में खड़ी होती है। उसके बाल काले नाग जैसे हवा के साथ लहरा रहे थे और वह आसमान की ओर देख रही थी।
"तुम आज भी मुझे लेने नहीं आए... हम्म? मैं यहाँ से बाहर कब जाऊँगी?"
इतना कहकर वह आर्य की तरफ़ मुड़ती है और उसे देखते हुए कहती है—
"आर्य... तुम मुझे यहाँ से बाहर लेके जाओगे ना? बोलो..."
वह लड़की अपना हाथ आगे बढ़ाती है। उसका हाथ खून से भरा हुआ था।
आर्य उसके हाथ से नज़र हटाकर उसके चेहरे को जैसे ही देखता है, वह डरकर पीछे गिर जाता है।
लड़की के चेहरे पर चाकू के बहुत से निशान थे और उसका पूरा शरीर खून से भरा था।
वह धीरे-धीरे आर्य की तरफ़ बढ़ रही थी, यह कहते हुए—
"आर्य... तुम मुझे यहाँ से बाहर निकालोगे ना? बोलो ना आर्य..."
वह आर्य के बहुत करीब आ जाती है और उसका चेहरा और भी खतरनाक होता जा रहा था।
आर्य बहुत डर जाता है और ज़ोर से चीखता है—
"आह्ह्ह्ह..."
इतने में ही उसकी आँख खुलती है। वह हाँफ रहा था। वह बहुत डर जाता है। वह अपने आस-पास देखता है। इस बार वह अपने कमरे में ही था।
वह डरकर बिस्तर से उठ जाता है और इधर-उधर देखने लगता है। उसे कुछ समझ नहीं आ रहा था। वह अपना सिर पकड़कर रोने लगता है।
तभी उसका फोन रिंग करता है।
आर्य एकदम से काँप उठता है, क्योंकि उसका फोन तो टूट चुका था, तो यह रिंग कहाँ से बज रही है?
आवाज़ बेड के नीचे से आ रही थी।
आर्य कमरे के कोने में ही बैठा होता है। वह पहले सोचता है कि कॉल न उठाए, लेकिन कॉल रिंग ही करती रहती है। वह डरते हुए बेड के पास जाता है और बेड के नीचे झाँकता है।
बेड के नीचे कुछ भी नहीं था।
रिंग फिर बजती है, लेकिन इस बार आवाज़ बेड के पास वाले ड्रॉअर में से आ रही थी।
वह डरते हुए ड्रॉअर की तरफ़ जाता है। उसका दिल ज़ोर से धड़क रहा था। वह धीरे से ड्रॉअर खोलता है।
वहाँ उसका फोन रखा हुआ था और वही चाकू, जिससे वह खुद को मारने वाला था, जिस दिन यह कॉल का सिलसिला शुरू हुआ था।
वह डरते हुए फोन उठाता है। उसका फोन बिल्कुल ठीक लग रहा था।
वह अपने हाथ में फोन लेता है। तभी फोन फिर रिंग करता है। एक पल को तो उसके हाथ से फोन छूटने वाला होता है, लेकिन आर्य उसे बचा लेता है और देखता है कि कॉल उसी अनजान नंबर से थी।
आर्य फोन उठाता है और कान से लगाता है।
आर्य — "हेलो... कौन है?"
दूसरी तरफ़ से कोई आवाज़ नहीं आती।
फिर आर्य कहता है—
"क्या तुम वही लड़की हो जिसे मैंने अभी देखा?"
दूसरी तरफ़ से कोई आवाज़ नहीं आती।
आर्य फिर डरते हुए कहता है—
"देखो, मैं ये भूत-वगैरह में नहीं मानता, लेकिन ये नॉर्मल बिल्कुल नहीं है। तुम हो कौन और क्या चाहती हो मुझसे?"
दूसरी तरफ़ से इस बार एक आवाज़ आती है—
"इंसाफ..."
आर्य को समझ नहीं आता। वह पूछता है—
"इंसाफ? किस चीज़ का इंसाफ?"
दूसरी तरफ़ से एक लड़की की आवाज़ आती है, जो बिल्कुल दबी हुई आवाज़ में बोलती है—
"इंसाफ... मेरी मौत का... मुझ पर हुए ज़ुल्म का..."
आर्य हताश होकर बोलता है
"तो तुम मुझसे क्या चाहती हो? मुझे क्यों परेशान कर रही हो?"
फिर आर्य के मन में एक ख़याल आता है।
"तो क्या तुम ही मेरे लिए खाना बना रही थी?"
दूसरी तरफ़ से बस "हम्म..." की आवाज़ आती है।
फिर आर्य बोलता है—
"तुम्हें क्या चाहिए मुझसे? मैं कैसे तुम्हें इंसाफ दिला सकता हूँ? और ये सब है क्या? क्या तुम कोई भूत हो?"
दूसरी तरफ़ से हल्के से हँसने की आवाज़ आती है।
"भूत... हम्म... तुम्हें पता है, इंसान अपने अंदर के डर को भूत-प्रेत का नाम दे देता है... लेकिन मैं भूत नहीं हूँ... आर्य... मैं भूत नहीं हूँ..."
इतना कहते-कहते वह लड़की रोने लगती है।
आर्य डर सा जाता है।
"अच्छा... तुम रोना बंद करो। ये तो बताओ तुम हो कौन?"
दूसरी तरफ़ रोने की आवाज़ बंद हो जाती है।
"तुम जानना चाहते हो मैं कौन हूँ? अगर सच में जानना चाहते हो तो..."
इसके बाद आवाज़ बहुत धीमी हो जाती है, जैसे कट रही हो।
आर्य को आवाज़ नहीं आ रही थी।
आर्य बोलता है—
"हे... हे... तुम्हारी आवाज़ कट रही है। मुझे कुछ सुनाई नहीं दे रहा।"
दूसरी तरफ़ से बस एक आवाज़ आती है—
"लाल..."
"लाल..."
आर्य को कुछ समझ नहीं आता कि लाल उस लड़की का नाम है क्या?
आर्य इससे पहले कुछ कहता, उसका फोन कट जाता है।
वह अपने कान से फोन हटाकर देखता है तो फोन में से तेज़ लाल रोशनी आ रही होती है।
आर्य को अपनी आँखों पर हाथ रखना पड़ता है रोशनी से बचने के लिए।
जब आर्य अपनी आँख खोलता है, वह अपने बिस्तर पर होता है!
वह उठकर बैठता है। देखता है कि वह सिर्फ एक सपना था।
वह अपने आस-पास देखता है। सब सामान्य था।
आर्य जल्दी से उठकर ड्रॉअर चेक करता है। उसका फोन वहाँ नहीं था।
तभी उसका पैर किसी चीज़ से टकराता है। वह देखता है तो उसका फोन टूटा हुआ वहीं पड़ा था, जहाँ वह कुछ दिन पहले गिरा था।
आर्य को कुछ समझ नहीं आता।
आर्य बेड पर बैठ जाता है और सोचने लगता है।
तभी उसका ध्यान शीशे पर जाता है और वह देखता है कि नीचे स्टैंड पर लिपस्टिक रखी है।
वही लिपस्टिक, जो वह लड़की उसके सपने में लगा रही थी।
आर्य का दिल ज़ोर से धड़कने लगता है।
मतलब यह सब कोई सपना नहीं था...
यह हक़ीक़त थी...
वह हक़ीक़त, जिसके अभी काफ़ी राज़ खुलने बाकी थे।
आर्य शीशे के पास जाता है और वह लिपस्टिक उठाता है। उसे खोलकर देखता है।
वह लिपस्टिक भी लाल थी।
आर्य शीशे में देखता है। वह खुद को पहचान ही नहीं पाता।
उसकी आँखों के नीचे के गड्ढे और गहरे हो गए थे, लेकिन जिस चीज़ पर उसका ध्यान जाता है, वह है लाल निशान, जो ठीक उसके कान के नीचे था, जो छूने में जल सा रहा था।
आर्य शीशे में देखता ही रहता है और सोचता है—
"आख़िर कौन है वो लड़की? क्यों परेशान कर रही है वो मुझे? और 'लाल' से उसका क्या लेना-देना..."