last knock in Hindi Horror Stories by kantilal Rathod Badamiya books and stories PDF | आख़िरी दस्तक

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आख़िरी दस्तक

📖 आख़िरी दस्तक

एक ऐसा दरवाज़ा… जिसे रात के बाद कभी नहीं खोलना था।

✍️ लेखक

कान्तिभाई राठौड़ 'बदामिया'

---

🌑 भूमिका

रात के सन्नाटे में जब पूरा गाँव सो जाता है, तब कभी-कभी कुछ आवाज़ें ऐसी होती हैं जिन्हें सुनकर इंसान अपने ही घर में खुद को अजनबी महसूस करने लगता है।

दरवाज़े पर दस्तक…

घड़ी की टिक-टिक…

बाहर किसी के चलने की आहट…

और फिर अचानक किसी की धीमी आवाज़—

“दरवाज़ा खोलो…”

हम अक्सर कहते हैं कि भूत-प्रेत जैसी कोई चीज़ नहीं होती।

लेकिन अगर एक रात…

आपके बंद दरवाज़े के बाहर कोई ऐसा व्यक्ति खड़ा हो जाए, जिसकी मौत कई साल पहले हो चुकी हो?

और अगर वह आपका नाम लेकर पुकारे?

तो क्या आप दरवाज़ा खोलेंगे?

या डर के मारे अपनी साँसें रोककर बैठे रहेंगे?

यह कहानी है अर्जुन की।

एक साधारण युवक, जो शहर की भागदौड़ से दूर अपनी बूढ़ी माँ के साथ अपने पुश्तैनी गाँव चाँदपुर लौटता है।

गाँव में उनका एक पुराना मकान था।

बहुत बड़ा नहीं…

लेकिन उसके पीछे एक बंद कमरा था।

उस कमरे के दरवाज़े पर वर्षों से ताला लगा था।

माँ हमेशा कहती थी—

“अर्जुन, रात में अगर उस कमरे से कोई आवाज़ आए… तो जवाब मत देना।”

अर्जुन हँस देता।

उसे लगता था कि माँ केवल डरती हैं।

लेकिन एक रात…

उसे पता चला कि माँ डरती नहीं थीं।

वह किसी ऐसी चीज़ को जानती थीं…

जिसके बारे में अर्जुन को कुछ भी पता नहीं था।

---

🕯️ भाग 1

बंद कमरा

चाँदपुर गाँव में शाम बहुत जल्दी उतरती थी।

सूरज ढलते ही गलियाँ खाली होने लगतीं।

पुराने पेड़ों की शाखाएँ हवा में हिलतीं और उनके साये दीवारों पर ऐसे दिखाई देते जैसे कोई चुपचाप चल रहा हो।

अर्जुन लगभग दस साल बाद गाँव लौटा था।

शहर में नौकरी चली गई थी और माँ की तबीयत भी ठीक नहीं रहती थी।

इसलिए उसने सोचा—

कुछ दिन गाँव में रहकर माँ का ध्यान रखेगा।

मकान वैसा ही था।

पुराना आँगन।

लकड़ी की खिड़कियाँ।

दीवार पर लगी पुरानी घड़ी।

और पीछे…

वह कमरा।

जिसे देखकर अर्जुन बचपन से ही डरता था।

कमरे के दरवाज़े पर मोटा लोहे का ताला लगा था।

अर्जुन ने पूछा—

“माँ, यह कमरा अब तक बंद क्यों है?”

माँ कुछ पल चुप रहीं।

फिर बोलीं—

“बस… ऐसे ही।”

“लेकिन इसमें है क्या?”

माँ ने उसकी ओर देखा।

उनकी आँखों में अचानक डर दिखाई दिया।

“कुछ चीज़ें बंद ही रहें तो अच्छा होता है।”

अर्जुन हँस पड़ा।

“माँ, आप अभी भी वही पुरानी बातें करती हैं।”

माँ ने धीरे से कहा—

“मैं मज़ाक नहीं कर रही, अर्जुन।”

उस रात दोनों ने खाना खाया।

माँ जल्दी सो गईं।

अर्जुन मोबाइल लेकर अपने कमरे में चला गया।

रात के लगभग बारह बजे…

ठक…

अर्जुन ने मोबाइल से नजर उठाई।

कुछ क्षण सन्नाटा रहा।

फिर—

ठक… ठक…

आवाज़ पीछे वाले कमरे की तरफ से आई थी।

अर्जुन उठकर बैठ गया।

उसने सोचा शायद कोई लकड़ी हिली होगी।

वह फिर लेट गया।

कुछ देर बाद…

ठक… ठक… ठक…

इस बार आवाज़ साफ थी।

जैसे कोई अंदर से दरवाज़ा खटखटा रहा हो।

अर्जुन के शरीर में सिहरन दौड़ गई।

वह धीरे-धीरे कमरे से बाहर निकला।

गलियारे में अंधेरा था।

उसने मोबाइल की टॉर्च जलाई।

आवाज़ फिर आई—

ठक… ठक…

वह पीछे वाले कमरे के पास पहुँच गया।

ताला बाहर लगा था।

अर्जुन ने टॉर्च दरवाज़े पर डाली।

तभी…

अंदर से एक धीमी आवाज़ आई—

“अर्जुन…”

उसके हाथ से मोबाइल लगभग गिर गया।

वह पीछे हट गया।

कुछ सेकंड तक उसका दिल इतनी तेज़ धड़कता रहा कि उसे अपनी धड़कन खुद सुनाई दे रही थी।

फिर आवाज़ आई—

“अर्जुन… दरवाज़ा खोलो…”

वह आवाज़ किसी बूढ़े आदमी की थी।

लेकिन अर्जुन उस आवाज़ को पहचानता था।

उसका चेहरा सफेद पड़ गया।

वह आवाज़ उसके पिता की थी।

उसके पिता की मृत्यु को बारह साल हो चुके थे।

अर्जुन काँपते हुए पीछे हट गया।

उसी समय माँ की आवाज़ आई—

“अर्जुन!”

माँ तेजी से वहाँ पहुँचीं।

उन्होंने उसका हाथ पकड़ा और उसे खींचकर कमरे से दूर ले गईं।

“तुम यहाँ क्यों आए?”

अर्जुन हकलाया—

“माँ… अंदर पापा थे।”

माँ का चेहरा अचानक पीला पड़ गया।

उन्होंने उसके मुँह पर हाथ रख दिया।

“चुप!”

“उनका नाम भी मत लेना।”

अर्जुन ने पूछा—

“लेकिन माँ, मैंने उनकी आवाज़ सुनी।”

माँ की आँखों से आँसू निकल आए।

“मुझे पता है।”

“क्या मतलब?”

माँ ने दरवाज़े की तरफ देखा।

फिर फुसफुसाकर बोलीं—

“हर साल वह यही करता है।”

अर्जुन के पैरों तले जमीन खिसक गई।

“हर साल?”

माँ ने सिर हिलाया।

“तुम्हारे पिता की मौत वाली रात से।”

अर्जुन ने पूछा—

“लेकिन क्यों?”

माँ ने जवाब नहीं दिया।

वह उसे कमरे में ले गईं।

दरवाज़ा बंद किया।

कुंडी लगाई।

और बोलीं—

“आज रात चाहे जो आवाज़ आए…”

“दरवाज़ा मत खोलना।”

“और अगर वह तुम्हें तुम्हारे बचपन का कोई ऐसा राज बताए, जो सिर्फ तुम्हारे पिता जानते थे…”

“तब भी नहीं।”

अर्जुन ने घबराकर पूछा—

“माँ, आखिर उस कमरे में है क्या?”

माँ ने उसकी ओर देखा।

उनके होंठ काँप रहे थे।

उन्होंने सिर्फ इतना कहा—

“तुम्हारे पिता नहीं… उनकी मौत का सच।”

उसी क्षण पीछे वाले कमरे से फिर आवाज़ आई—

ठक… ठक… ठक…

और फिर—

“अर्जुन… तुम्हारी माँ ने तुमसे झूठ कहा है…”

अर्जुन ने माँ की ओर देखा।

माँ की आँखों में डर नहीं…

अपराधबोध था।

🩸 भावुक डरावना स्लोगन

“हर बंद दरवाज़े के पीछे भूत नहीं होता…
कभी-कभी वहाँ किसी इंसान का छुपाया हुआ सच होता है।”

---

🌘 भाग 2

वह कौन था?

सुबह होने तक अर्जुन सो नहीं पाया।

माँ भी पूरी रात चुप बैठी रहीं।

सुबह जब सूरज निकला तो रात की घटना जैसे किसी बुरे सपने जैसी लगने लगी।

अर्जुन ने माँ से फिर पूछा—

“पापा की मौत कैसे हुई थी?”

माँ ने कहा—

“तुम्हारे पिता का एक्सीडेंट हुआ था।”

“बस।”

“इसके अलावा कुछ नहीं।”

लेकिन अर्जुन को रात की आवाज़ याद थी।

“तुम्हारी माँ ने तुमसे झूठ कहा है…”

उसने गाँव के बुजुर्ग गोवर्धन काका से मिलने का फैसला किया।

गोवर्धन काका उसके पिता के पुराने दोस्त थे।

अर्जुन ने पूछा—

“काका, मेरे पिता की मौत वाली रात क्या हुआ था?”

गोवर्धन काका कुछ देर तक उसे देखते रहे।

फिर बोले—

“तेरी माँ ने तुझे कुछ नहीं बताया?”

“नहीं।”

काका ने लंबी साँस ली।

“तो शायद अब समय आ गया है।”

उन्होंने बताया कि बारह साल पहले उसके पिता रात में उसी पुराने कमरे में गए थे।

उस कमरे में गाँव के पुराने कागज़ और कुछ सामान रखा था।

उसी रात घर में आग लग गई थी।

लोगों ने आग बुझाई।

लेकिन अर्जुन के पिता अंदर फँस गए।

अर्जुन ने पूछा—

“फिर आग लगी कैसे?”

काका चुप हो गए।

“किसी को नहीं पता।”

“और माँ?”

काका ने नजरें झुका लीं।

“तेरी माँ उस रात घर पर थीं।”

अर्जुन का दिल जोर से धड़कने लगा।

“क्या उन्होंने पापा को अंदर बंद किया था?”

काका ने जवाब नहीं दिया।

लेकिन उनका मौन ही बहुत कुछ कह रहा था।

अर्जुन घर लौट आया।

माँ आँगन में बैठी थीं।

अर्जुन ने सीधे पूछा—

“माँ… उस रात आपने पापा को कमरे में बंद किया था?”

माँ के हाथ से कप गिर गया।

कुछ देर तक वह जमीन देखती रहीं।

फिर रोते हुए बोलीं—

“हाँ।”

अर्जुन पीछे हट गया।

“क्यों?”

माँ बोलीं—

“क्योंकि तुम्हारे पिता मुझे मारने वाले थे।”

“क्या?”

“उस रात हमारा बहुत बड़ा झगड़ा हुआ था।”

“उन्होंने गुस्से में मुझे कमरे में बंद कर दिया।”

“मैं किसी तरह बाहर आई।”

“लेकिन उसी समय बाहर से आग लग गई।”

अर्जुन ने पूछा—

“तो आपने उन्हें बचाया क्यों नहीं?”

माँ की आँखों से आँसू बहने लगे।

“मैंने कोशिश की थी।”

“लेकिन…”

“मैं डर गई थी।”

“मैंने दरवाज़ा खोलने की कोशिश की।”

“लेकिन आग बहुत तेज़ थी।”

अर्जुन चुप था।

माँ ने काँपते हुए कहा—

“मैंने उस रात तुम्हारे पिता की चीख सुनी थी।”

“और फिर…”

“सन्नाटा।”

कमरे में भारी खामोशी छा गई।

उसी रात फिर…

ठक… ठक…

अर्जुन की नींद खुल गई।

इस बार आवाज़ उसके कमरे के बाहर से आ रही थी।

उसने धीरे से पूछा—

“कौन?”

कोई जवाब नहीं।

फिर…

ठक… ठक…

दरवाज़े के नीचे से एक काली परछाईं दिखाई दी।

अर्जुन का शरीर जम गया।

बाहर से आवाज़ आई—

“अर्जुन… मैं तुम्हारा पिता हूँ।”

अर्जुन ने आँखें बंद कर लीं।

“तुम सच में मेरे पिता हो?”

बाहर से आवाज़ आई—

“अगर विश्वास नहीं है तो दरवाज़ा खोल।”

अर्जुन ने कुंडी की ओर हाथ बढ़ाया।

तभी माँ ने पीछे से उसका हाथ पकड़ लिया।

“नहीं!”

“माँ!”

“दरवाज़ा मत खोलना!”

बाहर से अचानक जोरदार हँसी सुनाई दी।

फिर आवाज़ बदली।

अब वह उसके पिता की नहीं थी।

वह किसी और की आवाज़ थी।

बहुत धीमी…

बहुत भारी…

“बारह साल से तुमने मुझे अंदर बंद कर रखा है…”

माँ काँपने लगीं।

अर्जुन ने पूछा—

“कौन है?”

बाहर से उत्तर आया—

“जिसे तुम्हारी माँ ने उस रात नहीं बचाया।”

माँ चीख उठीं।

“नहीं!”

अर्जुन ने उनकी ओर देखा।

“माँ… आपने मुझसे क्या छुपाया है?”

माँ रोने लगीं।

“मैंने तुम्हारे पिता को नहीं मारा…”

“लेकिन उस रात…”

“तुम्हारे पिता अकेले नहीं थे।”

अर्जुन के चेहरे का रंग उड़ गया।

“कौन था उनके साथ?”

माँ ने काँपते हुए कहा—

“तुम्हारा छोटा भाई।”

अर्जुन स्तब्ध रह गया।

“मेरा… भाई?”

“मेरा कोई भाई नहीं था।”

माँ ने सिर हिलाया।

“था।”

“तुमसे तीन साल छोटा।”

“उस रात आग में…”

“तुम्हारे पिता के साथ वह भी अंदर था।”

अर्जुन के कानों में जैसे विस्फोट हुआ।

“तो आपने मुझे कभी बताया क्यों नहीं?”

माँ ने कहा—

“क्योंकि…”

“तुम्हारे पिता की मौत के बाद…”

“तुम्हारा भाई नहीं मिला।”

अर्जुन ने फुसफुसाकर पूछा—

“नहीं मिला मतलब?”

माँ ने दरवाज़े की ओर देखा।

बाहर फिर दस्तक हुई।

इस बार बहुत धीमी।

ठक…

और फिर एक बच्चे की आवाज़ आई—

“भैया…”

अर्जुन की आँखों में आँसू आ गए।

बाहर से आवाज़ आई—

“भैया… मुझे घर ले चलो…”

माँ ने अपने कान बंद कर लिए।

अर्जुन धीरे-धीरे दरवाज़े की ओर बढ़ा।

माँ चिल्लाईं—

“अर्जुन! मत खोलना!”

लेकिन इस बार अर्जुन रुक नहीं पाया।

उसने कुंडी खोल दी।

दरवाज़ा धीरे-धीरे खुला।

बाहर कोई नहीं था।

सिर्फ जमीन पर…

एक पुरानी बच्चों की चप्पल पड़ी थी।

और उसके नीचे खून से लिखे तीन शब्द—

“कमरा खोलो, भैया।”

🩸 भावुक डरावना स्लोगन

“कुछ आत्माएँ बदला लेने नहीं लौटतीं…
वे सिर्फ चाहती हैं कि कोई उनकी अधूरी कहानी सुन ले।”

---

🌑 भाग 3

आख़िरी दस्तक

उस रात अर्जुन ने फैसला कर लिया।

वह बंद कमरे का ताला खोलेगा।

माँ उसे रोकती रहीं।

“अर्जुन, मत कर।”

“वहाँ जो है… वह इंसान नहीं है।”

अर्जुन ने कहा—

“अगर वहाँ मेरा भाई है तो?”

माँ रोने लगीं।

“वह अब तुम्हारा भाई नहीं रहा।”

“बारह साल बहुत होते हैं।”

“कुछ चीज़ें मरने के बाद बदल जाती हैं।”

अर्जुन ने पुरानी चाबी निकाली।

चाबी उसके पिता की अलमारी से मिली थी।

रात के ठीक बारह बजे वह बंद कमरे के सामने खड़ा था।

माँ पीछे थीं।

अर्जुन ने ताले में चाबी डाली।

क्लिक।

ताला खुल गया।

दरवाज़ा धीरे-धीरे चरमराया।

अंदर से सड़ी हुई लकड़ी और धुएँ की गंध आई।

कमरा लगभग खाली था।

एक पुरानी मेज।

एक टूटी कुर्सी।

दीवार पर काले धुएँ के निशान।

और जमीन पर…

एक छोटा-सा लोहे का डिब्बा।

अर्जुन ने डिब्बा खोला।

अंदर पुराने कागज़ थे।

एक तस्वीर थी।

तस्वीर में उसके पिता थे।

उनकी गोद में एक छोटा बच्चा था।

अर्जुन की आँखों से आँसू निकल आए।

“माँ…”

माँ पीछे हट गईं।

अर्जुन ने तस्वीर पलटी।

पीछे लिखा था—

“मेरे दोनों बेटों के लिए।”

तभी कमरे का दरवाज़ा अपने आप बंद हो गया।

धड़ाम!

माँ चीख उठीं।

अंधेरे में किसी बच्चे की हँसी सुनाई दी।

फिर एक आवाज़—

“भैया…”

अर्जुन ने टॉर्च घुमाई।

कोने में एक छोटा बच्चा खड़ा था।

सफेद कपड़े।

काला चेहरा।

और हाथ में वही पुरानी चप्पल।

अर्जुन की साँस रुक गई।

बच्चे ने कहा—

“भैया… मुझे बहुत ठंड लगती है।”

अर्जुन रोते हुए बोला—

“तुम कौन हो?”

बच्चा मुस्कुराया।

“आप मुझे भूल गए।”

अर्जुन की आँखों से आँसू बहने लगे।

“मुझे माफ कर दो।”

बच्चे ने सिर हिलाया।

“आपने मुझे नहीं भुलाया।”

“माँ ने आपको बताया ही नहीं।”

फिर कमरे की दीवार पर अचानक आग की लपटें दिखाई देने लगीं।

अर्जुन ने देखा—

बारह साल पहले की पूरी घटना उसके सामने जैसे चलचित्र की तरह चलने लगी।

उसके पिता कमरे में थे।

छोटा भाई उनके साथ था।

बाहर माँ खड़ी थीं।

झगड़ा हो रहा था।

अचानक दीपक गिरा।

आग फैल गई।

पिता बच्चे को उठाकर दरवाज़े की ओर भागे।

लेकिन दरवाज़ा बाहर से बंद था।

उन्होंने चिल्लाकर कहा—

“दरवाज़ा खोलो!”

माँ रो रही थीं।

लेकिन वह डर के कारण पीछे हट गईं।

कुछ ही क्षणों में आग ने पूरा कमरा घेर लिया।

पिता ने बच्चे को खिड़की से बाहर धकेलने की कोशिश की।

लेकिन खिड़की बंद थी।

फिर…

एक जोरदार धमाका हुआ।

दृश्य गायब हो गया।

अर्जुन फूट-फूटकर रो पड़ा।

“माँ…”

माँ जमीन पर बैठ गईं।

“मैं डर गई थी बेटा।”

“मैंने सोचा था आग बुझ जाएगी।”

“लेकिन…”

“मैंने अपने ही हाथों से…”

वह आगे कुछ नहीं बोल सकीं।

अर्जुन ने बच्चे की ओर देखा।

“तुम चाहते क्या हो?”

बच्चे ने धीरे से कहा—

“बस घर जाना है।”

“कहाँ?”

बच्चे ने माँ की ओर देखा।

“माँ के पास।”

माँ काँपने लगीं।

वह धीरे-धीरे बच्चे के पास गईं।

“बेटा…”

बच्चे ने हाथ आगे बढ़ाया।

माँ ने उसे पकड़ लिया।

अचानक कमरे की सारी आवाज़ें बंद हो गईं।

दीवारों की आग गायब हो गई।

हवा शांत हो गई।

और बच्चे के चेहरे पर पहली बार मुस्कान आई।

उसने अर्जुन की ओर देखा।

“भैया… अब मुझे डर नहीं लगता।”

फिर वह धीरे-धीरे धुएँ में बदल गया।

माँ ने आँखें बंद कर लीं।

जब उन्होंने आँखें खोलीं…

कमरा खाली था।

लेकिन फर्श पर दो चीज़ें पड़ी थीं—

एक पुरानी चप्पल…

और उसके पास पिता की घड़ी।

घड़ी बारह बजकर बारह मिनट पर रुकी हुई थी।

उस दिन के बाद उस कमरे से कभी कोई आवाज़ नहीं आई।

माँ ने मंदिर जाकर अपने दोनों बच्चों के नाम से दीपक जलाया।

अर्जुन ने घर की वह पुरानी दीवार नहीं तुड़वाई।

उसने कमरे को वैसे ही रहने दिया।

बस दरवाज़े के ऊपर एक छोटा-सा दीपक लगा दिया।

हर साल पिता और छोटे भाई की पुण्यतिथि पर वह दीपक जलाता।

लेकिन कहानी यहीं खत्म नहीं होती।

एक साल बाद…

रात के करीब बारह बजे…

अर्जुन उसी कमरे के पास बैठा था।

हवा बिल्कुल शांत थी।

दीपक जल रहा था।

अचानक…

ठक… ठक…

अर्जुन का दिल धड़क उठा।

फिर तीसरी दस्तक—

ठक…

उसने धीरे से पूछा—

“कौन?”

कुछ क्षण सन्नाटा रहा।

फिर बाहर से एक बहुत परिचित आवाज़ आई—

“दरवाज़ा मत खोलना…”

अर्जुन की आँखें फैल गईं।

यह आवाज़ उसके छोटे भाई की नहीं थी।

यह उसके पिता की आवाज़ थी।

और उसी क्षण उसके पीछे रखा आईना अपने आप टूट गया।

आईने के टूटे हुए टुकड़े में अर्जुन ने देखा—

उसके पीछे कोई खड़ा था।

लंबा…

काला…

और उसका चेहरा दिखाई नहीं दे रहा था।

अर्जुन ने पलटकर देखा।

वहाँ कोई नहीं था।

लेकिन दरवाज़े पर एक आखिरी बार दस्तक हुई।

ठक…

फिर एक फुसफुसाहट—

“अब मेरी बारी है…”

दीपक अचानक बुझ गया।

और पूरे घर में अंधेरा छा गया।

उसके बाद…

अर्जुन ने कभी उस कमरे का दरवाज़ा नहीं खोला।

लेकिन गाँव के लोग आज भी कहते हैं—

चाँदपुर के उस पुराने मकान के सामने से अगर कोई रात के बारह बजे गुजरे…

तो उसे अंदर से तीन दस्तक सुनाई देती हैं।

ठक…

ठक…

ठक…

और अगर कोई तीसरी दस्तक के बाद जवाब दे दे…

तो अगली रात…

उसके अपने घर के दरवाज़े पर दस्तक सुनाई देती है।

🩸 अंतिम डरावना स्लोगन

**“हर दस्तक का जवाब मत देना…

कुछ दरवाज़े खुल जाएँ तो जिंदगी फिर कभी पहले जैसी नहीं रहती।”**

🌘 अंतिम दो पंक्तियाँ

कभी-कभी अतीत दफन नहीं होता…
वह बस सही समय आने का इंतज़ार करता है।

और कुछ रहस्य ऐसे होते हैं, जिन्हें जानने से बेहतर है…
उन्हें हमेशा के लिए बंद दरवाज़े के पीछे रहने देना।

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✍️ लेखक की कलम से

डर हमेशा अंधेरे में नहीं होता।

कभी डर हमारे अपने घर की दीवारों में छिपा होता है।

कभी किसी पुराने कमरे में।

कभी किसी अधूरे रिश्ते में।

और कभी…

हमारे अपने अतीत में।

भूत से ज्यादा डरावनी चीज़ है—

अधूरा सच।

क्योंकि भूत शायद एक बार डराकर चला जाए…

लेकिन छुपाया हुआ सच इंसान को पूरी जिंदगी डराता रहता है।

शायद इसी वजह से कुछ दरवाज़े बंद रहते हैं।

कुछ तस्वीरें पुराने संदूकों में पड़ी रहती हैं।

कुछ नाम कभी नहीं लिए जाते।

और कुछ आवाज़ें…

रात के सन्नाटे में लौटकर पूछती हैं—

“क्या अब तुम सच सुनने के लिए तैयार हो?”

---

👤 लेखक परिचय

कान्तिभाई राठौड़ 'बदामिया'

जीवन, रिश्तों, संवेदनाओं और मानवीय भावनाओं को अपनी लेखनी के माध्यम से शब्द देने वाले लेखक।

उनकी कहानियों में केवल मनोरंजन नहीं, बल्कि भावनाओं के साथ कोई न कोई संदेश भी छिपा रहता है।

कभी रिश्तों की पीड़ा…

कभी माता-पिता का त्याग…

कभी इंसान की कमजोरियाँ…

और कभी रहस्य तथा भय के पीछे छिपा हुआ कोई अनकहा सच।

उनका मानना है—

“कहानी तब पूरी होती है, जब आखिरी पन्ना पढ़ने के बाद भी उसके पात्र पाठक के मन में कुछ देर तक जीवित रहें।”

— कान्तिभाई राठौड़ 'बदामिया'