सर...उस समय ड्यूटी डॉक्टर रुद्र नही डॉक्टर अनन्या थी""अनन्या.....मैने रुद्र को कहा भी था की अनन्या को दूर रखना मेरे केस से ...फिर भी"प्रकाश ने गहरी सांस ली, खुद को संभालने की कोशिश की।"सिस्टर , वो होश मे थे? मेरे बारे मे पूछ रहे थे?उनके आख़िरी पल… कैसे थे?”सिस्टर ने हिचकिचाते हुए कहा—"सर पूरे होश मे थे आपको भी पूछ रहे थे और हां बार बार फिर से जलेबी मांग रहे थे ।"प्रकाश अनमने मन से वापिस मुड़ने लगे तभी सिस्टर ने रोक कर कहा“सर… अनन्या ने उन्हें जलेबी खिला दी थी… बस उसी के बाद…”ये सुनते ही प्रकाश का चेहरा सख़्त हो गया।उसकी आँखों में गुस्सा भर आया जैसे किसी ने आग मे घी डाल दिया हो---“क्या? इतनी हालत खराब थी उनकी, लिवर और किडनी बिल्कुल फेल थे… और उसने जलेबी खिला दी? ये कैसी गैर-जिम्मेदारी है!”वो गुस्से में बाहर निकला और सीधे अनन्या के पास पहुँचा।“अनन्या!.... तुम्हें ज़रा भी समझ है? तुम डॉक्टर हो, तुम्हारा काम मरीज को जिंदा रखना है, न कि उनकी जिद पूरी करना! तुम्हें अंदाज़ा है, ये तुम्हारी लापरवाही कितनी बड़ी गलती है?!”अनन्या सिर झुकाए खड़ी रही। उसकी आँखों में आँसू थे लेकिन आवाज़ शांत थी—“डॉक्टर प्रकाश … मैंने उनकी तड़प देखी थी। वो दो दिन से सिर्फ एक जलेबी के लिए तरस रहे थे। मुझे लगा… कम से कम आख़िरी वक्त में उनकी ये छोटी-सी इच्छा पूरी हो जाए। मैंने… मैंने इंसानियत की खातिर किया।”प्रकाश ने गुस्से में कहा—“इंसानियत? हर कोई ऐसे सोचने लगे तो इलाज कौन करेगा? हम डॉक्टर और नर्स का काम किसी की भावनाओं पर नहीं, उनकी जान पर होता है!”उसका स्वर कठोर था, जैसे भीतर उमड़ता दुःख गुस्से का रूप ले चुका हो।अनन्या रो पड़ी, लेकिन उसने धीरे से कहा—“सर… वो चेहरे की मुस्कान देखकर गए। मुझे नहीं लगता मैंने गलत किया।”कमरे में कुछ देर तक सिर्फ सन्नाटा गूंजता रहा। प्रकाश के दिल में दर्द और गुस्से की आग दोनों एक साथ सुलग रही थीं।प्रकाश का गुस्सा सातवें आसमान पर था।“अनन्या! तुमने अपने आप को समझ क्या रखा है? कितनी जिद्दी हो तुम? ये अस्पताल है, कोई घर नहीं! यहाँ मरीजों की जान बचाई जाती है, उनकी जिद पूरी नहीं की जाती! तुम्हारी इस हरकत से उनका जाना तेज़ हो गया—समझीं तुम?!”अनन्या, जो अब तक चुपचाप गुस्सा और दुःख सह रही थी, अचानक फूट पड़ी। उसकी आँखें लाल हो गईं और आवाज़ में दर्द झलकने लगा।“बस, डॉक्टर प्रकाश , अब बहुत हो गया… आपने मुझे डांटने से पहले मेरी जगह खड़े होकर सोचा है कभी? मैं डॉक्टर हूं, लेकिन इंसान भी हूं। वो बाबा जी… मुझे अपने दादा जी जैसे लगे थे। उनके अंदर मैं अपने दादा जी को देखा था।”प्रकाश चौंक गया, पर अनन्या रुकने वाली नहीं थी। आँसू गालों पर ढुलकते हुए भी वो दृढ़ स्वर में बोली—“मेरे दादा जी भी आख़िरी दिनों में मीठा खाने को तड़पते रहे… बार-बार कहते थे, ‘बेटा, ज़रा-सी मिठाई दे दो।’ पर सबने मना कर दिया। मैं भी डर गई… और उन्होंने बिना खाए ही दम तोड़ दिया। उनकी आँखें खुली रह गईं… शायद उस एक मीठे स्वाद के इंतज़ार में। डॉक्टर प्रकाश, वो दर्द मैं आज तक भूल नहीं पाई। जब बाबा जी ने वही तड़प दिखाई… तो मैं खुद को रोक ही नहीं पाई।”वो सिसकते हुए बोली—“आप कह सकते हैं मैंने गलती की… पर मुझे लगा अगर आज मैंने उन्हें वो मिठास नहीं दी, तो उनकी आत्मा भी अधूरी रह जाएगी… जैसे मेरे दादा जी की रह गई थी।”कमरे में सन्नाटा छा गया।अनन्या की आँखों से आँसू लगातार बह रहे थे। उसने भर्राए स्वर में अपनी बात पूरी की, लेकिन प्रकाश का चेहरा अब भी सख़्त था। उसकी आँखों में कोई नरमी नहीं आई।प्रकाश ने ठंडे, कठोर स्वर में कहा—“अनन्या, तुम्हारी भावनाओं का कोई असर नहीं है मुझ पर। ये अस्पताल भावनाओं से नहीं, नियम और अनुशासन से चलता है। अगर हर कोई अपने रिश्ते ढूँढने लगे मरीजों में, तो यहाँ इलाज नहीं, ड्रामा होगा। पिछले कई सालो से इलाज कर रहा था उनका..दादा जी जैसे बन चुके थे मेरे लिए पर ऐसी हरकत...अनन्या सजा तो तुम्हे मिलेगी।अनन्या ने स्तब्ध होकर उनकी ओर देखा। उसकी साँसें भारी हो गईं, जैसे विश्वास ही न कर पा रही हो कि प्रकाश उसके दर्द को समझने के बजाय इतनी कठोर बात कह देगा।प्रकाश ने एक कदम पीछे हटते हुए कहा—“अब ये मामला मेरे हाथ में नहीं है। तुम्हें हॉस्पिटल के डीन ही देखेंगे कि तुम्हें यहाँ डॉक्टर रखना है या नहीं। मैंने रिपोर्ट भेज दी है।”ये कहते ही प्रकाश ने नज़रें फेर लीं और कमरे से बाहर निकल गया।अनन्या वहीं खड़ी रह गई—आँसूओं से भीगा चेहरा, आँखों में गुस्सा और गहरा आघात। उसने महसूस किया कि एक तरफ़ इंसानियत निभाने के लिए उसने साहस किया, और दूसरी तरफ़ उसी इंसानियत ने उसकी नौकरी दाँव पर लगा दी।डीन की केबिन में डॉक्टर अनन्या की शिकायत पहुँच चुकी थी।डीन ने माहौल को गंभीर होते देख कहा –“देखो प्रकाश, ये अस्पताल का मामला है। यहाँ की प्रतिष्ठा सबसे ऊपर है। तुम दोनों ही काबिल डॉक्टर हो… इस बहस को यहीं खत्म करो। बाहर ये बात जाएगी तो हॉस्पिटल की इमेज खराब होगी।”डीन की बात सुनकर अनन्या थोड़ी संतुष्ट नज़र आई, पर प्रकाश का चेहरा उतर गया।उसके भीतर जैसे किसी ने आग लगा दी हो।वह सोचने लगा –"गलती चाहे जिसकी भी हो, सच चाहे मेरे पक्ष में हो… पर यहाँ सच से ज़्यादा नाम और शोहरत मायने रखते हैं। क्या मेरी मेहनत, मेरा ईमान सब व्यर्थ है?"डीन ने उसे फिर शांत करने की कोशिश की –“प्रकाश, अभी तुम चुप रहो। वक्त के साथ सब ठीक हो जाएगा। किसी बात को तूल देने से अच्छा है उसे जाने दो।”"मै अब इस हॉस्पिटल मे काम नही कर सकता...अभी आपको मेरा रेजिग्नेशन मिल जायेगा।"प्रकाश यह कर गुस्से मे बाहर तो निकल आया, मगर भीतर गहरा आघात ले चुका था।उसकी आँखों में निराशा और भीतर गहरी कसक थी –"क्या मैं इस अस्पताल के लिए सिर्फ एक मोहरा हूँ? जहाँ सच की कोई कद्र नहीं?"" प्रकाश मेरी बात सुन...इतना गुस्सा ठीक नही यार" रुद्र ने रोक कर कहा"रुद्र तू मुझसे बात ना कर ...तुझे मैने मना किया था की अनन्या को जिम्मेदारी नही देना...तूने भी मुझे धोखा दिया है । और एक फोन करके भी नही बताया तूने...क्यो?" प्रकाश गुस्से मे बोला"तू अंकल ऑन्टी के साथ था बड़े दिन बाद इसलिए तुझे डिस्टर्ब नही किया और श्री, मुझे लगा की अनन्या बाबा का ध्यान रखेगी तो तेरी गुड बुक्स मे उसका भी नाम आ जायेगा. ...रात को मुझे सिस्टर अनिता का फोन आया था की बाबा के बचने के चांस बहुत कम है...अनन्या ने जो किया गलत था ,पर....." रूद्र ने प्रकाश को समझाते हुए कहा" पर जो भी था ,गलत था रूद्र...या तो वो रहेगी इस हॉस्पिटल मे या मै. ...बस" कह कर पैर पटकते हुए डॉक्टर प्रकाश बाहर कोरिडोर की तरफ चले गये।क्या डॉक्टर प्रकाश हॉस्पिटल छोड़ देंगे?या जिद्दी और अपनी मर्जी करने वाली अनन्या माफी मांग लेगी?.......to be continued MTNL की घंटी