Katharudroopanishad in Hindi Spiritual Stories by GANESH TEWARI 'NESH' (NASH) books and stories PDF | कठरुद्रोपनिषद

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कठरुद्रोपनिषद

कठरुद्रोपनिषद कठरुद्रोपनिषद् कृष्ण यजुर्वेद से सम्बद्ध संन्यास-उपनिषद् है। उपलब्ध पाठ में आरम्भिक ब्रह्मविद्या-उपदेश के बाद सन्यासी के आचार और अन्ततः आत्म-ब्रह्मज्ञान का विवेचन है। पाठ की परम्परागत गणना में ४२ श्लोक मिलते हैं।॥ कठरुद्रोपनिषत् ॥मंगलाचरणपरिव्रज्याधर्मपूगालङ्काराः यत्पदं ययुः ।तदहं कठविद्यार्थं रामचन्द्रपदं भजे ॥अर्थ:जिन महान् परिव्राजकों ने संन्यास-धर्म के अनेक आचरणों और साधनों से जिस परम पद को प्राप्त किया, उस कठ-विद्या के वास्तविक तत्त्व को समझने के लिए मैं श्रीरामचन्द्र के चरणों का भजन करता हूँ।शान्तिपाठॐ सह नाववतु ।सह नौ भुनक्तु ।सह वीर्यं करवावहै ।तेजस्विनावधीतमस्तु मा विद्विषावहै ॥ॐ शान्तिः शान्तिः शान्तिः ॥अर्थ:हे परमात्मन्! हम दोनों—गुरु और शिष्य—की रक्षा करें। हम दोनों का पालन करें। हम दोनों मिलकर सामर्थ्यपूर्वक अध्ययन और साधना करें। हमारा अध्ययन तेजस्वी और फलदायक हो। हम परस्पर द्वेष न करें। तीनों प्रकार की बाधाओं की शान्ति हो।॥ ब्रह्मविद्या का उपदेश ॥हरिः ॐ ॥देवा ह वै भगवन्तमब्रुवन्—अधीहि भगवन् ब्रह्मविद्याम् ।स प्रजापतिरब्रवीत्—सशिखान् केशान् निष्कृत्य विसृज्य यज्ञोपवीतं निष्कृत्य पुत्रं दृष्ट्वा—त्वं ब्रह्मा, त्वं यज्ञः, त्वं वषट्कारः,त्वमोङ्कारः, त्वं स्वाहा, त्वं स्वधा,त्वं धाता, त्वं विधाता, त्वं प्रतिष्ठासि—इति वदेत्।अर्थ:देवताओं ने भगवान् प्रजापति से कहा—“हे भगवन्! हमें ब्रह्मविद्या का उपदेश दीजिए।”तब प्रजापति ने कहा—संन्यास ग्रहण करने वाला साधक शिखा सहित अपने केशों का त्याग करे और यज्ञोपवीत का भी परित्याग करे। फिर अपने पुत्र को देखकर उससे कहे—“तुम ब्रह्मा हो, तुम यज्ञ हो, तुम वषट्कार हो, तुम ॐकार हो, तुम स्वाहा हो, तुम स्वधा हो, तुम धाता हो, तुम विधाता हो और तुम ही प्रतिष्ठा हो।”इसके बाद पुत्र भी कहता है—अहं ब्रह्मा, अहं यज्ञः,अहं वषट्कारोऽहमोङ्कारः,स्वाहाहं, स्वधाहं,धाताहं, विधाताहं,त्वष्टाहं, प्रतिष्ठास्मीति।अर्थ:“मैं ब्रह्मा हूँ, मैं यज्ञ हूँ, मैं वषट्कार हूँ, मैं ॐकार हूँ, मैं स्वाहा हूँ, मैं स्वधा हूँ, मैं धाता हूँ, मैं विधाता हूँ, मैं त्वष्टा हूँ और मैं प्रतिष्ठा हूँ।”यहाँ कथन का आशय अहंकार को बढ़ाना नहीं, बल्कि आत्मा की सर्वव्यापक ब्रह्मरूपता का बोध कराना है। अगला उपदेश--संन्यासी के लिए बाहरी पहचान और कर्मकाण्ड से ऊपर उठकर आत्मतत्त्व में स्थित होने का निर्देश मिलता है। आगे कहा गया है कि वह अग्नि, जल अथवा महाप्रस्थान आदि के द्वारा शरीर-त्याग की स्थिति में जा सकता है और संन्यास के पश्चात् पुनः गृहस्थाश्रम में नहीं लौटे। वह अध्यात्म-मन्त्रों का पाठ करे और“स्वस्ति सर्वजीवेभ्यः”अर्थात् “सभी जीवों का कल्याण हो”—ऐसा कहकर अपने आत्मस्वरूप का ध्यान करे। वह अनिकेत अर्थात् किसी एक घर को अपना स्थायी निवास न मानते हुए विचरण करे और भिक्षा से जीवन-निर्वाह करे। जीवों की रक्षा के लिए चलते समय भी सावधान रहे। संन्यासी के त्याग का स्वरूपश्लोक १कुण्डिकां चमसं शिक्यं त्रिविष्टमुपानहौ ।शीतोपघातिनीं कन्थां कौपीनाच्छादनं तथा ॥१॥अर्थ:संन्यासी को कुण्डिका, चमस, शिक्य, त्रिविष्ट, पादुकाएँ, शीत से बचाने वाली कन्था तथा कौपीन आदि वस्तुओं के प्रति भी आसक्ति नहीं रखनी चाहिए। श्लोक २--पवित्रं ज्ञानशाटीं च उत्तरासङ्गमेव च ।यज्ञोपवीतं वेदांश्च सर्वं तद्वर्जयेद्यतिः ॥२॥अर्थ:यति को बाहरी पवित्रता के उपकरणों, ज्ञान की शाटी, उत्तरासंग, यज्ञोपवीत तथा वेदों के बाहरी कर्मकाण्डीय आश्रयों तक का त्याग कर आत्मज्ञान में स्थित होना चाहिए। यहाँ “वेदों का त्याग” वेदज्ञान का निषेध नहीं, बल्कि बाह्य साधनों से परे ब्रह्मज्ञान में प्रतिष्ठा का संकेत है। श्लोक ३--स्नानं पानं तथा शौचमद्भिः पूताभिराचरेत् ।नदीपुलिनशायी स्याद्देवागारेषु वा स्वपेत् ॥३॥अर्थ:वह शुद्ध जल से स्नान, पान और शौच आदि करे। नदी के किनारे बालुका पर या देवालय में विश्राम करे। श्लोक ४नात्यर्थं सुखदुःखाभ्यां शरीरमुपतापयेत् ।स्तूयमानो न तुषेत निन्दितो न शपेत्परान् ॥४॥अर्थ:संन्यासी को अत्यधिक सुख या दुःख के कारण शरीर को पीड़ित नहीं करना चाहिए। कोई उसकी प्रशंसा करे तो अत्यधिक प्रसन्न न हो और कोई निन्दा करे तो दूसरे को शाप न दे।श्लोक ५--ब्रह्मचर्येण सन्तिष्ठेदप्रमादेन मस्करी ।दर्शनं स्पर्शनं केलिः कीर्तनं गुह्यभाषणम् ॥५॥अर्थ:मस्करी अर्थात् संन्यासी को पूर्ण सावधानी से ब्रह्मचर्य में स्थित रहना चाहिए। स्त्री-संबंधी दर्शन, स्पर्श, क्रीड़ा, प्रशंसा/कीर्तन तथा गुप्त वार्तालाप आदि से भी सावधान रहना चाहिए। श्लोक ६--सङ्कल्पोऽध्यवसायश्च क्रियानिर्वृत्तिरेव च ।एतन्मैथुनमष्टाङ्गं प्रवदन्ति मनीषिणः ॥६॥अर्थ:संकल्प, प्रयास, कर्म में प्रवृत्ति तथा उससे सम्बन्धित अन्य मानसिक-वाचिक व्यवहार—इन सबको मनीषियों ने मैथुन के आठ अंगों के रूप में बताया है। इसलिए ब्रह्मचर्य केवल शारीरिक संयम नहीं, बल्कि मन, वाणी और व्यवहार का संयम भी है। श्लोक ७--विपरीतं ब्रह्मचर्यमनुष्ठेयं मुमुक्षुभिः यज्जगद्भासकं भानं नित्यं भाति स्वतः स्फुरत् ॥७॥अर्थ:मोक्ष की इच्छा रखने वालों को इन प्रवृत्तियों के विपरीत पूर्ण ब्रह्मचर्य का पालन करना चाहिए। जो प्रकाश सम्पूर्ण जगत् को प्रकाशित करता है और जो स्वयं अपने स्वरूप से नित्य प्रकाशित है, उसी आत्मप्रकाश का चिन्तन करना चाहिए। श्लोक ८--स एव जगतः साक्षी सर्वात्मा विमलाकृतिः ।प्रतिष्ठा सर्वभूतानां प्रज्ञानघनलक्षणः ॥८॥अर्थ:वही आत्मा सम्पूर्ण जगत् का साक्षी है। वही सबका आत्मस्वरूप है और निर्मल है। वही समस्त प्राणियों की आधारभूत प्रतिष्ठा है तथा उसका स्वरूप प्रज्ञानघन, अर्थात् शुद्ध चैतन्य है। श्लोक ९--न कर्मणा न प्रजया न चान्येनापि केचित् ।ब्रह्मवेदनमात्रेण ब्रह्माप्नोत्येव मानवः ॥ ९॥अर्थ:न कर्मों के द्वारा, न संतान के द्वारा और न किसी अन्य बाहरी साधन के द्वारा मनुष्य परम ब्रह्म को प्राप्त करता है। ब्रह्म को यथार्थ रूप में जान लेने मात्र से मनुष्य ब्रह्म को प्राप्त कर लेता है।श्लोक १०--तद्विद्या विषयं ब्रह्म सत्यज्ञानसुखाद्वयम् ।संसारे च गुहावाच्ये मायाज्ञानादिसंज्ञके ॥ १०॥अर्थ:जिस ब्रह्म का ज्ञान प्राप्त करना है, वह सत्य, ज्ञान और अद्वैत आनन्दस्वरूप है। वही ब्रह्म इस संसाररूपी गुहा में, माया और अज्ञान आदि के आवरण से छिपा हुआ प्रतीत होता है।श्लोक ११--निहितं ब्रह्म यो वेद परमे व्योम्नि संज्ञिते ।सोऽश्नुते सकलान्कामान्क्रमेणैव द्विजोत्तमः ॥ ११॥अर्थ:जो साधक उस परम आकाशरूप, परम स्थान में स्थित ब्रह्म को जान लेता है, वह क्रमशः अपनी समस्त कामनाओं की पूर्णता को प्राप्त करता है। यहाँ परम तृप्ति का आशय बाहरी इच्छाओं की पूर्ति से अधिक आत्मज्ञानजनित पूर्णता है।श्लोक १२--प्रत्यगात्मानमज्ञानमायाशक्तेश्च साक्षिणम् ।एकं ब्रह्माहमस्मीति ब्रह्मैव भवति स्वयम् ॥ १२॥अर्थ:जो अपने भीतर स्थित आत्मा को, अज्ञान और माया-शक्ति के साक्षी के रूप में जानता है और दृढ़तापूर्वक अनुभव करता है—“मैं वही एक ब्रह्म हूँ”,वह स्वयं ब्रह्मस्वरूप हो जाता है।श्लोक १३--ब्रह्मभूतात्मनस्तस्मादेतस्माच्छक्तिमिश्रितात् ।अपञ्चीकृत आकाशसंभूतो रज्जुसर्पवत् ॥ १३॥अर्थ:उस ब्रह्मस्वरूप आत्मा से, माया-शक्ति के संयोग से, अपञ्चीकृत आकाश की उत्पत्ति मानी जाती है। जैसे रस्सी में अज्ञान के कारण साँप का आभास होता है, वैसे ही ब्रह्म में जगत् का आभास होता है।श्लोक १४--आकाशाद्वायुसंज्ञस्तु स्पर्शोऽपञ्चीकृतः पुनः ।वायोरग्निस्तथा चाग्नेराप अद्भ्यो वसुन्धरा ॥ १४॥अर्थ:अपञ्चीकृत आकाश से वायु उत्पन्न हुई; वायु से अग्नि, अग्नि से जल और जल से पृथ्वी की उत्पत्ति हुई—ऐसा तत्त्वविचार यहाँ बताया गया है।श्लोक १५--तानि भूतानि सूक्ष्माणि पञ्चीकृत्येश्वरस्तदा ।तेभ्य एव विसृष्टं तद्ब्रह्माण्डादि शिवेन ह ॥ १५॥अर्थ:ईश्वर ने उन सूक्ष्म पंचमहाभूतों का पंचीकरण करके उनसे स्थूल जगत् की रचना की। उन्हीं से ब्रह्माण्ड आदि की सृष्टि भगवान् शिव द्वारा हुई।श्लोक १६--ब्रह्माण्डस्योदरे देवा दानवा यक्षकिन्नराः ।मनुष्याः पशुपक्ष्याद्यास्तत्तत्कर्मानुसारतः ॥ १६॥अर्थ:ब्रह्माण्ड के भीतर देवता, दानव, यक्ष, किन्नर, मनुष्य, पशु, पक्षी आदि अनेक प्रकार के जीव अपने-अपने कर्मों के अनुसार उत्पन्न होते हैं और अपने कर्मों के अनुसार जीवन प्राप्त करते हैं।श्लोक १७अस्थिस्नाय्वादिरूपोऽयं शरीरं भाति देहिनाम् ।योऽयमन्नमयो ह्यात्मा भाति सर्वशरीरिणः ॥ १७॥अर्थ:हड्डी, स्नायु आदि से बना यह स्थूल शरीर सभी देहधारियों में दिखाई देता है। अन्न से निर्मित यह शरीर अन्नमय आत्मा कहलाता है।श्लोक १८--ततः प्राणमयो ह्यात्मा विभिन्नश्चान्तरः स्थितः ।ततो मनोमयो ह्यात्मा विभिन्नश्चान्तरः स्थितः ।ततो विज्ञान आत्मा तु ततोऽन्यश्चान्तरः स्वतः ॥ १८॥अर्थ:इस अन्नमय शरीर के भीतर उससे भिन्न प्राणमय आत्मा स्थित है। उसके भीतर उससे भिन्न मनोमय आत्मा है। उसके भीतर उससे भी सूक्ष्म विज्ञानमय आत्मा स्थित है।श्लोक १९आनन्दमय आत्मा तु ततोऽन्यश्चान्तरस्थितः ।योऽयमन्नमयः सोऽयं पूर्णः प्राणमयेन तु ॥ १९॥अर्थ:विज्ञानमय के भीतर उससे भी अन्तर में आनन्दमय आत्मा स्थित है। अन्नमय शरीर प्राणमय से पूर्ण और व्याप्त है।श्लोक २०--मनोमयेन प्राणोऽपि तथा पूर्णः स्वभावतः ।तथा मनोमयो ह्यात्मा पूर्णो ज्ञानमयेन तु ॥ २०॥अर्थ:प्राणमय भी स्वभावतः मनोमय से पूर्ण और व्याप्त है। उसी प्रकार मनोमय आत्मा विज्ञानमय से पूर्ण है।श्लोक २१--आनन्देन सदा पूर्णः सदा ज्ञानमयः सुखम् ।तथानन्दमयश्चापि ब्रह्मणोऽन्येन साक्षिणा ॥ २१॥अर्थ:ज्ञानमय आत्मा आनन्द से सदा पूर्ण रहता है। और आनन्दमय भी अपने से परे स्थित ब्रह्मरूप साक्षी से व्याप्त है।श्लोक २२सर्वान्तरेण पूर्णश्च ब्रह्म नान्येन केनचित् ।यदिदं ब्रह्मपुच्छाख्यं सत्यज्ञानद्वयात्मकम् ॥ २२॥अर्थ:सबसे भीतर स्थित ब्रह्म ही सबको पूर्ण करता है; उसे किसी अन्य वस्तु की आवश्यकता नहीं। यही ब्रह्म-पुच्छ, अर्थात् अन्तिम आधार, सत्य और ज्ञानस्वरूप अद्वैत ब्रह्म है।श्लोक २३--सारमेव रसं लब्ध्वा साक्षाद्देही सनातनम् ।सुखी भवति सर्वत्र अन्यथा सुखता कुतः ॥ २३॥अर्थ:जब देहधारी जीव उस सनातन आत्मतत्त्व के साररूप आनन्द को प्रत्यक्ष प्राप्त कर लेता है, तब वह सर्वत्र सुखी हो जाता है। उसके अतिरिक्त वास्तविक सुख का स्रोत और कहाँ हो सकता है?श्लोक २४--असत्यस्मिन्परानन्दे स्वात्मभूतेऽखिलात्मनाम् ।को जीवति नरो जन्तुः को वा नित्यं विचेष्टते ॥ २४॥अर्थ:यदि सभी जीवों के अपने आत्मस्वरूप में स्थित वह परम आनन्द न होता, तो कोई मनुष्य या प्राणी जीवित कैसे रह सकता और निरन्तर कर्म कैसे कर सकता है।श्लोक २५--तस्मात्सर्वात्मना चित्ते भासमानो ह्यसौ नरः ।आनन्दयति दुःखाढ्यं जीवात्मानं सदा जनः ॥ २५॥अर्थ:इसलिए वह परम आत्मतत्त्व सभी के चित्त में प्रकाशित होकर दुःख से घिरे हुए जीवात्मा को भीतर से आनन्द प्रदान करता रहता है।श्लोक २६--यदा ह्येवैष एतस्मिन्नदृश्यत्वादिलक्षणे ।निर्भेदं परमाद्वैतं विन्दते च महायतिः ॥ २६॥अर्थ:जब महान् यति उस अदृश्य, इन्द्रियों से परे आत्मतत्त्व में भेदरहित परम अद्वैत का साक्षात्कार कर लेता है, तब उसकी आत्मिक यात्रा पूर्ण होती है।श्लोक २७----तदेवाभयमत्यन्तकल्याणं परमामृतम् ।सद्रूपं परमं ब्रह्म त्रिपरिच्छेदवर्जितम् ॥ २७॥अर्थ:वही अद्वैत ब्रह्म परम अभय है, परम कल्याण है और अमृतस्वरूप है। वह सत्स्वरूप परम ब्रह्म है और देश, काल तथा वस्तु—इन तीनों प्रकार की सीमाओं से रहित है।श्लोक २८--यदा ह्येवैष एतस्मिन्नल्पमप्यन्तरं नरः ।विजानाति तदा तस्य भयं स्यान्नात्र संशयः ॥ २८॥अर्थ:जब मनुष्य उस परम अद्वैत में थोड़ा-सा भी भेद देखता है, तब उसके भीतर भय उत्पन्न होता है। इसमें कोई संशय नहीं।श्लोक २९अस्यैवानन्दकोशेन स्तम्बान्ता विष्णुपूर्वकाः ।भवन्ति सुखिनो नित्यं तारतम्यक्रमेण तु ॥ २९॥अर्थ:इसी आनन्दमय तत्त्व के कारण तृण से लेकर विष्णु आदि उच्चतम देवताओं तक सभी प्राणी अपने-अपने स्तर के अनुसार सुख का अनुभव करते हैं।श्लोक ३०तत्तत्पदविरक्तस्य श्रोत्रियस्य प्रसादिनः ।स्वरूपभूत आनन्दः स्वयं भाति परे यथा ॥ ३०॥अर्थ:जो श्रोत्रिय साधक विभिन्न पदों और सांसारिक उपलब्धियों से विरक्त होकर अन्तःकरण को निर्मल करता है, उसके भीतर उसका अपना आत्मस्वरूप आनन्द स्वयं प्रकाशित होने लगता है।श्लोक ३१निमित्तं किञ्चिदाश्रित्य खलु शब्दः प्रवर्तते ।यतो वाचो निवर्तन्ते निमित्तानामभवतः ॥ ३१॥अर्थ:शब्द तभी प्रकट होता है जब वह किसी कारण या निमित्त पर आश्रित हो। परम ब्रह्म में ऐसा कोई सीमित निमित्त नहीं है; इसलिए वहाँ पहुँचकर वाणी लौट जाती है।श्लोक ३२--निर्विशेषे परानन्दे कथं शब्दः प्रवर्तते ।तस्मादेतन्मनः सूक्ष्मं व्यावृतं सर्वगोचरम् ॥ ३२॥अर्थ:जो परम आनन्दस्वरूप और निर्विशेष है, उसके लिए शब्द कैसे प्रयुक्त हो सकता है? इसलिए मन को भी समस्त बाहरी विषयों से हटाकर उस सूक्ष्म तत्त्व की ओर ले जाना चाहिए।श्लोक ३३--यस्माच्छ्रोत्रत्वगक्ष्यादिखादिकर्मेन्द्रियाणि च ।व्यावृत्तानि परं प्राप्तुं न समर्थानि तानि तु ॥ ३३॥अर्थ:कान, त्वचा, आँख आदि ज्ञानेन्द्रियाँ तथा कर्मेन्द्रियाँ बाहरी विषयों से निवृत्त हुए बिना उस परम तत्त्व को प्राप्त करने में समर्थ नहीं हैं। अतः आत्मज्ञान के लिए इन्द्रियों का अन्तर्मुखी होना आवश्यक है।श्लोक ३४--तद्ब्रह्मानन्दमद्वन्द्वं निर्गुणं सत्यचिद्घनम् ।विदित्वा स्वात्मरूपेण न बिभेति कुतश्चन ॥ ३४॥अर्थ:जो उस द्वन्द्वरहित, निर्गुण, सत्य और चैतन्यस्वरूप ब्रह्मानन्द को अपने ही आत्मस्वरूप के रूप में जान लेता है, उसे फिर किसी भी वस्तु से भय नहीं रहता।श्लोक ३५--एवं यस्तु विजानाति स्वगुरोरुपदेशतः ।स साध्वासाधुकर्मभ्यां सदा न तपति प्रभुः ॥ ३५॥अर्थ:जो साधक अपने गुरु के उपदेश से इस आत्मतत्त्व को जान लेता है, वह शुभ और अशुभ कर्मों के बन्धन से ऊपर उठ जाता है और उनके फल से उसी प्रकार संतप्त नहीं होता।श्लोक ३६--ताप्यतापकरूपेण विभातमखिलं जगत् ।प्रत्यगात्मतया भाति ज्ञानाद्वेदान्तवाक्यजात् ॥ ३६॥अर्थ:जो सम्पूर्ण जगत् कभी दुःख भोगने वाले और दुःख उत्पन्न करने वाले रूप में दिखाई देता है, वही वेदान्त के महावाक्यों से प्राप्त ज्ञान द्वारा अन्तरात्मा के रूप में प्रकाशित होता है।श्लोक ३७--शुद्धमीश्वरचैतन्यं जीवचैतन्यमेव च ।प्रमाता च प्रमाणं च प्रमेयं च फलं तथा ॥ ३७॥अर्थ:व्यवहार की दृष्टि से शुद्ध ईश्वर-चैतन्य, जीव-चैतन्य, ज्ञाता (प्रमाता), ज्ञान का साधन (प्रमाण), ज्ञेय वस्तु (प्रमेय) और ज्ञान का फल—इनका विवेचन किया जाता है।श्लोक ३८--इति सप्तविधं प्रोक्तं भिद्यते व्यवहारतः ।मायोपाधिविनिर्मुक्तं शुद्धमित्यभिधीयते ॥ ३८॥अर्थ:व्यवहार की दृष्टि से यह चैतन्य सात प्रकार का कहा जाता है। जब यह माया आदि उपाधियों से रहित होकर जाना जाता है, तब इसे शुद्ध चैतन्य कहा जाता है।श्लोक ३९--मायासंबन्धतश्चेशो जीवोऽविद्यावशस्तथा ।अन्तःकरणसंबन्धात्प्रमातेत्यभिधीयते ॥ ३९॥अर्थ:माया के सम्बन्ध से वही चैतन्य ईश्वर कहलाता है और अविद्या के वश होने पर जीव कहलाता है। अन्तःकरण के सम्बन्ध से वही प्रमाता अर्थात् ज्ञाता कहलाता है।श्लोक ४०--तथा तद्वृत्तिसंबन्धात्प्रमाणमिति कथ्यते ।अज्ञातमपि चैतन्यं प्रमेयमिति कथ्यते ॥ ४०॥अर्थ:अन्तःकरण की वृत्ति के सम्बन्ध से वही चैतन्य प्रमाण, अर्थात् ज्ञान का साधन, कहलाता है। और जो अभी अज्ञात है, वही ज्ञान का विषय होने पर प्रमेय कहलाता है।श्लोक ४१--तथा ज्ञातं च चैतन्यं फलमित्यभिधीयते ।सर्वोपाधिविनिर्मुक्तं स्वात्मानं भावयेत्सुधीः ॥ ४१॥अर्थ:जब वही चैतन्य ज्ञात हो जाता है, तब उसे ज्ञान का फल कहा जाता है। इसलिए बुद्धिमान साधक को सभी उपाधियों से मुक्त अपने वास्तविक आत्मस्वरूप का निरन्तर चिन्तन करना चाहिए।श्लोक ४२--एवं यो वेद तत्त्वेन ब्रह्मभूयाय कल्पते ।सर्ववेदान्तसिद्धान्तसारं वच्मि यथार्थतः ॥ ४२॥अर्थ:जो इस तत्त्व को यथार्थ रूप से जान लेता है, वह ब्रह्मभाव को प्राप्त होने योग्य हो जाता है। यही समस्त वेदान्त-सिद्धान्त का सार है—ऐसा उपनिषद् यथार्थ रूप में प्रतिपादित करता है। उपनिषद् का परम निष्कर्षस्वयं मृत्वा स्वयं भूत्वा स्वयमेवावशिष्यते ॥इत्युपनिषत् ॥अर्थ:मनुष्य अपने सीमित अहंकार और अज्ञान को स्वयं समाप्त करके, अपने वास्तविक ब्रह्मस्वरूप को स्वयं प्राप्त होकर, अन्त में अपने शुद्ध आत्मस्वरूप में ही स्थित रहता है।यही कठरुद्रोपनिषद् का अत्यन्त गूढ़ निष्कर्ष है—बाहरी त्याग का चरम लक्ष्य आत्मज्ञान और अद्वैत-ब्रह्म की अनुभूति है। मूल पाठ में इसके बाद शान्तिपाठ और “इति कठरुद्रोपनिषत्समाप्ता” आता है। शान्तिपाठ:ॐ सह नाववतु । सह नौ भुनक्तु । सह वीर्यं करवावहै ।तेजस्विनावधीतमस्तु मा विद्विषावहै ॥ॐ शान्तिः शान्तिः शान्तिः ॥अर्थ:हे परमात्मन्! हम गुरु-शिष्य दोनों की रक्षा करें, हमारा पालन करें, हम दोनों सामर्थ्यपूर्वक साधना करें, हमारा अध्ययन तेजस्वी हो और हम परस्पर द्वेष न करें। तीनों प्रकार के तापों की शान्ति हो। ----×------×------×------×----