Episode 20 – शादी से पहले की खामोशियाँ
शादी की तारीख तय हो चुकी थी।
कोई ढोल-नगाड़े नहीं बजे थे,
ना ही किसी ने अचानक मिठाइयाँ बाँटी थीं।
बस दोनों परिवारों के बीच
एक शांत-सी सहमति बन गई थी
कि अब यह रिश्ता
नाम से आगे बढ़ चुका है।
Priyam को यह सब अचानक नहीं लगा।
फिर भी, मन के किसी कोने में
एक हल्की-सी घबराहट
धीरे-धीरे जगह बना रही थी।
वह अपने कमरे में अकेली बैठी थी।
अलमारी खुली थी।
अंदर रखे कपड़े अब सिर्फ कपड़े नहीं लग रहे थे—
हर रंग, हर सिलवट
जैसे आने वाले दिनों की कहानी कह रही हो।
उसने एक साड़ी को हाथ में लिया,
फिर वापस टाँग दिया।
आज किसी चीज़ को चुनने का मन नहीं था।
“क्या मैं सच में तैयार हूँ?”
यह सवाल
बार-बार मन में उठ रहा था।
उसी समय माँ ने दरवाज़े पर हल्की-सी दस्तक दी।
“अंदर आऊँ?”
“हाँ माँ।”
माँ अंदर आईं और
बिना कुछ कहे
उसके पास बैठ गईं।
कुछ पल
कमरे में सिर्फ साँसों की आवाज़ थी।
फिर माँ ने बहुत धीरे पूछा—
“डर लग रहा है?”
Priyam ने जवाब देने में देर नहीं की।
उसने सिर हिला दिया।
“थोड़ा… नहीं, काफी।”
माँ मुस्कुराईं,
लेकिन आँखों में समझ थी।
“डर होना गलत नहीं है,”
उन्होंने कहा।
“डर तो इस बात का सबूत है
कि तू इस रिश्ते को हल्के में नहीं ले रही।”
Priyam की आँखें नम हो गईं।
“सब कुछ बदल जाएगा न, माँ?”
माँ ने उसका हाथ अपने हाथों में ले लिया।
“बहुत कुछ बदलेगा।
लेकिन तू वही रहेगी
जो तू है।”
यह सुनकर
Priyam का दिल थोड़ा हल्का हुआ।
दूसरी ओर,
Yaman अपने घर की बालकनी में खड़ा था।
शाम की हवा ठंडी थी,
लेकिन उसके मन में एक अजीब-सी गर्मी थी।
टेबल पर
शादी से जुड़े काग़ज़ फैले हुए थे—
तारीख, व्यवस्थाएँ, जिम्मेदारियाँ।
वह सब देख रहा था,
पर ध्यान कहीं और था।
“अब सिर्फ मैं नहीं हूँ,”
उसने सोचा।
“अब हम हैं।”
उसके पिता कमरे में आए।
“बहुत सोच में डूबे हो।”
Yaman ने हल्की मुस्कान दी।
“थोड़ा।”
पिता उसके पास आकर बैठ गए।
“Priyam को लेकर?”
Yaman कुछ पल चुप रहा,
फिर पहली बार
खुद के डर को शब्दों में बदला।
“मैं चाहता हूँ
कि वो कभी खुद को अकेला न महसूस करे।
मैं बहुत बोल नहीं पाता,
लेकिन मैं हमेशा वहाँ रहना चाहता हूँ।”
पिता ने गहरी साँस ली।
“बोलना हर बार ज़रूरी नहीं होता।
कभी-कभी चुपचाप साथ देना
सबसे बड़ी ताकत होता है।”
Yaman ने सिर झुका लिया।
यह बात
उसके दिल में उतर गई।
दिन बीतने लगे।
कभी रिश्तेदारों की कॉल,
कभी कपड़ों की चर्चा,
कभी रस्मों की बातें।
सब कुछ अपनी जगह था।
लेकिन Priyam के अंदर
खामोशी बढ़ती जा रही थी।
रात को नींद टूट जाती।
कभी अचानक आँखें भर आतीं।
एक रात
वह खुद को संभाल नहीं पाई।
फोन उठाया।
स्क्रीन पर नाम चमका— Yaman
कुछ सेकंड
उसने फोन को देखा।
फिर कॉल लगा दी।
“Priyam?”
दूसरी तरफ से आवाज़ आई।
उस आवाज़ में
कोई हैरानी नहीं थी,
कोई सवाल नहीं।
बस अपनापन था।
Priyam की आँखों से
आँसू बह निकले।
“मैं परेशान कर रही हूँ?”
उसने बहुत धीमे से पूछा।
“नहीं,”
Yaman ने तुरंत कहा।
“आप ठीक हैं?”
वह कुछ बोल नहीं पाई।
बस सिसकती रही।
Yaman ने कुछ नहीं कहा।
कोई सवाल नहीं,
कोई सलाह नहीं।
बस कॉल पर बना रहा।
कुछ देर बाद
Priyam बोली—
“डर लग रहा है…
सब कुछ छोड़ने का।”
Yaman ने शांत स्वर में कहा—
“आप कुछ नहीं छोड़ रहीं।
आप बस एक जगह से
दूसरी जगह जा रही हैं।”
Priyam ने पहली बार
अपने डर को किसी के सामने खोला—
खुद को खो देने का डर,
अपनी पहचान बदल जाने का डर।
Yaman ध्यान से सुनता रहा।
फिर बोला—
“मैं वादा नहीं करूँगा
कि सब आसान होगा।
लेकिन मैं ये ज़रूर कह सकता हूँ
कि मैं हमेशा आपकी तरफ खड़ा रहूँगा।”
उस पल
Priyam को लगा
कि वह अकेली नहीं है।
शादी से दो दिन पहले
एक छोटी-सी रस्म रखी गई।
कोई भव्य तैयारी नहीं,
बस करीबी लोग।
Priyam तैयार होकर आई।
चेहरे पर थकान थी,
लेकिन आँखों में ठहराव था।
Yaman ने उसे देखा।
और पहली बार
साफ़ महसूस किया
कि वह कितनी मज़बूत है।
उनकी नज़रें मिलीं।
Yaman ने बस होंठ हिलाए—
“सब ठीक है।”
Priyam ने कुछ नहीं कहा।
बस हल्का-सा सिर हिलाया।
रात को
Priyam खिड़की के पास खड़ी थी।
बाहर चाँद साफ़ दिखाई दे रहा था।
“कल नहीं,”
उसने मन में कहा,
“लेकिन बहुत पास।”
उसने डर को भी स्वीकार किया
और उम्मीद को भी।
दूसरी तरफ,
Yaman ने कमरे की लाइट बंद की।
उसके मन में
कोई फिल्मी सपना नहीं था।
बस एक सीधी-सी चाह—
कि वह Priyam का
भरोसा निभा पाए।