Skandani Chudail in Hindi Horror Stories by Vedant Kana books and stories PDF | Skandani Chudail

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Skandani Chudail

सुनील उस शाम ऑफिस की खिड़की के पास बैठा अपनी फाइलें देख रहा था। ऑफिस में रोज की तरह लोग अपने काम में लगे हुए थे, लेकिन पिछले कई दिनों से एक चीज उसे लगातार परेशान कर रही थी। उसका दोस्त रमेश ऑफिस नहीं आ रहा था। पहले सुनील ने सोचा था कि शायद रमेश बीमार होगा, लेकिन जब पांच दिन बीत गए और उसकी कोई खबर नहीं मिली तो उसे चिंता होने लगी। रमेश ऐसा आदमी नहीं था जो बिना बताए इतने दिनों तक गायब रहे।

शाम करीब छह बजे ऑफिस का काम खत्म होने लगा। सुनील अपनी फाइल बंद ही कर रहा था कि उसके पीछे से आवाज आई, "सुनील, तुम्हारा दोस्त रमेश आजकल ऑफिस क्यों नहीं आ रहा?"

सुनील ने पीछे मुड़कर देखा। उसका दूसरा दोस्त सुभाष खड़ा था। सुभाष के चेहरे पर हल्की मुस्कान थी।

सुनील ने कहा, "पता नहीं यार। पहले दो दिन लगा कि तबीयत खराब होगी। अब तो पांच दिन हो गए हैं। फोन भी नहीं उठा रहा। घर जाकर पूछने का सोच रहा हूं।"

सुभाष कुछ देर चुप रहा। फिर धीरे से बोला, "तुम्हें पता है रमेश के साथ क्या हुआ है?"

सुनील ने उसकी तरफ देखा। "क्या हुआ?"

सुभाष ने आवाज धीमी कर दी। "कुछ दिन पहले उसने एक ऐसी गलती कर दी थी, जिसके बारे में हमारे इलाके के पुराने लोग आज भी किसी को नहीं बताते।"

सुनील हंस पड़ा। "अब क्या कर दिया उसने?"

सुभाष ने कहा, "उसने स्कंदनी चुड़ैल का नाम लेकर उसे बुलाया था।"

कमरे में बैठे दो तीन लोग अचानक उनकी तरफ देखने लगे। सुनील ने इसे मजाक समझा, लेकिन सुभाष का चेहरा बिल्कुल गंभीर था।

"स्कंदनी चुड़ैल?" सुनील ने हंसते हुए कहा। "ये कौन सी नई कहानी है?"

सुभाष ने कुर्सी खींचकर उसके पास बैठते हुए कहा, "नई नहीं है। बहुत पुरानी कहानी है। हमारे गांव के बाहर जो पुराना रास्ता है, उसके पास पहले एक बड़ा जंगल हुआ करता था। उसी जंगल में स्कंदनी नाम की एक औरत रहती थी। लोग कहते हैं कि उसकी मौत के बाद उसकी आत्मा वहीं रह गई। रात के समय अगर कोई उसका नाम लेकर उसे बुलाता है, तो वह जवाब जरूर देती है। लेकिन उसके बाद उस आदमी की जिंदगी में सब कुछ बदल जाता है।"

सुनील ने हंसते हुए कहा, "और रमेश ने उसका नाम लिया था?"

"हां।"

"और फिर?"

सुभाष ने कुछ पल चुप रहने के बाद कहा, "फिर अगले दिन से वह ऑफिस नहीं आया।"

सुनील की हंसी धीरे धीरे रुक गई।

उसने पूछा, "तुम्हें ये बात किसने बताई?"

सुभाष ने कहा, "रमेश के पड़ोसी ने। उसने बताया कि घटना वाली रात रमेश अपने घर में अकेला था। आधी रात को उसने किसी औरत की आवाज सुनी। पहले उसने सोचा कोई पड़ोसी होगा। फिर उसे याद आया कि कुछ दिन पहले दोस्तों के बीच मजाक करते हुए उसने स्कंदनी का नाम लिया था।"

सुनील ने पूछा, "फिर?"

सुभाष ने कहा, "उसने कमरे के आईने के सामने खड़े होकर उसका नाम लिया था।"

"कितनी बार?"

सुभाष ने उसकी आंखों में देखते हुए कहा, "पांच बार।"

सुनील ने कुछ नहीं कहा।

सुभाष आगे बोला, "लोग कहते हैं कि स्कंदनी का नाम सिर्फ एक बार लेना भी खतरनाक है। लेकिन पांच बार उसका नाम आईने के सामने लेकर बुलाना मतलब खुद उसके सामने जाने जैसा है।"

सुनील ने फिर हंसने की कोशिश की।

"तुम लोग भी न। हर बात में भूत चुड़ैल ले आते हो।"

सुभाष ने कहा, "मैंने भी पहले यही सोचा था। लेकिन मैंने रमेश के घर के बाहर जो देखा, उसके बाद मैं मजाक नहीं करता।"

"क्या देखा?"

सुभाष ने जवाब देने से पहले कमरे में चारों तरफ देखा। ऑफिस लगभग खाली हो चुका था।

"उसके कमरे की खिड़की पर अंदर की तरफ से पांच उंगलियों के निशान थे।"

सुनील ने कहा, "तो?"

"वे उंगलियों के निशान धूल में नहीं थे। वे कांच पर ऐसे थे जैसे किसी ने अंदर से नहीं, बाहर से कांच को पकड़कर खींचा हो।"

सुनील कुछ देर चुप रहा।

तभी सुभाष ने मुस्कुराते हुए कहा, "लेकिन तुम तो इन बातों पर विश्वास नहीं करते।"

सुनील ने उसकी तरफ देखा।

सुभाष ने कहा, "अगर इतना ही विश्वास नहीं है तो आज रात करके देख लो। आईने के सामने खड़े होकर पांच बार उसका नाम लो। फिर देखना क्या होता है।"

सुनील ने सिर हिलाया। "मैं पागल नहीं हूं।"

सुभाष हंस पड़ा। "डर गए?"

सुनील ने उसकी बात का जवाब नहीं दिया।

लेकिन सुभाष लगातार उसे चिढ़ाता रहा।

"क्या हुआ सुनील? अभी तो बड़ी बातें कर रहे थे। बोलो स्कंदनी चुड़ैल को बुलाओगे?"

आखिर सुनील ने गुस्से में कहा, "ठीक है। अगर तुम्हें इतना ही विश्वास है तो मैं आज रात करके देखता हूं।"

सुभाष की मुस्कान उसी पल गायब हो गई।

उसने गंभीर होकर कहा, "मैं मजाक कर रहा था। मत करना।"

सुनील ने कहा, "अभी तो तुम कह रहे थे कि कुछ नहीं होगा।"

सुभाष ने कोई जवाब नहीं दिया।

उस रात करीब ग्यारह बजे सुनील अपने कमरे में अकेला बैठा था। बाहर पूरा मोहल्ला शांत था। हवा के कारण खिड़की के लकड़ी के पल्ले कभी कभी हिल रहे थे। कमरे में एक पुराना आईना रखा था जो उसके पिता के समय से घर में था।

सुनील आईने के सामने खड़ा हो गया।

उसे अचानक सुभाष की बात याद आई।

उसने धीरे से कहा, "स्कंदनी।"

कमरे में कोई बदलाव नहीं हुआ।

सुनील ने दूसरी बार नाम लिया।

फिर तीसरी बार।

चौथी बार नाम लेते समय उसे लगा जैसे कमरे की हवा अचानक ठंडी हो गई हो।

उसने कुछ पल रुककर आईने में देखा।

आईने में उसका चेहरा दिखाई दे रहा था।

लेकिन उसके पीछे कमरे का दरवाजा खुला हुआ दिखाई दे रहा था।

सुनील तुरंत पीछे मुड़ा।

दरवाजा बंद था।

उसका दिल तेजी से धड़कने लगा।

वह वापस आईने की तरफ देखने लगा।

अब आईने में दरवाजा भी बंद था।

सुनील ने खुद को समझाया कि शायद डर के कारण उसे भ्रम हुआ है।

फिर उसने पांचवीं बार स्कंदनी का नाम लिया।

कुछ सेकंड तक कुछ नहीं हुआ।

फिर आईने के अंदर उसकी परछाई ने अपना सिर उठाया।

सुनील बिल्कुल स्थिर खड़ा था।

लेकिन आईने में दिखाई देने वाली उसकी परछाई धीरे धीरे मुस्कुराने लगी।

सुनील पीछे हट गया।

उसकी परछाई नहीं हिली।

वह अभी भी आईने के अंदर खड़ी थी।

फिर आईने के अंदर उस परछाई ने अपना हाथ उठाया और आईने पर पांच बार थपथपाया।

ठक।

ठक।

ठक।

ठक।

ठक।

सुनील के मुंह से आवाज नहीं निकली।

अचानक आईने की सतह पर धुंध जमने लगी।

उस धुंध के बीच धीरे धीरे एक औरत का चेहरा दिखाई दिया।

उसके बाल चेहरे पर बिखरे हुए थे।

चेहरा बहुत पीला था।

और उसकी आंखें सीधे सुनील को देख रही थीं।

सुनील पीछे हटते हुए गिर पड़ा।

जब उसने दोबारा आईने की तरफ देखा तो सब कुछ सामान्य था।

लेकिन उसी समय कमरे के बाहर से किसी ने बहुत धीमी आवाज में उसका नाम लिया।

"सुनील..."

वह आवाज किसी औरत की थी।

सुनील ने दरवाजा नहीं खोला।

कुछ देर बाद फिर आवाज आई।

"सुनील..."

इस बार आवाज दरवाजे के बिल्कुल पास से आई।

सुनील पूरी रात अपने कमरे में बैठा रहा।

सुबह होते ही वह सीधे सुभाष के घर पहुंचा।

सुभाष ने उसे देखते ही पूछा, "तुमने कर दिया?"

सुनील ने कोई जवाब नहीं दिया।

उसने पूरी घटना बता दी।

सुभाष का चेहरा पीला पड़ गया।

उसने कहा, "मैंने तुम्हें मना किया था।"

सुनील ने कहा, "अब क्या होगा?"

सुभाष कुछ देर चुप रहा।

फिर उसने कहा, "एक बाबा हैं। शायद वही कुछ कर सकते हैं।"

दोनों उसी दिन शहर से काफी दूर एक पुराने गांव में रहने वाले बाबा के पास पहुंचे। बाबा बहुत बूढ़े थे। उनके कमरे में पुराने दीपक जल रहे थे और चारों तरफ धार्मिक ग्रंथ रखे थे।

सुनील ने सारी बात बता दी।

बाबा ने ध्यान से उसकी बात सुनी।

फिर उन्होंने पूछा, "तुमने आईने के सामने कितनी बार नाम लिया?"

सुनील ने कहा, "पांच बार।"

बाबा ने आंखें बंद कर लीं।

काफी देर तक वह कुछ नहीं बोले।

फिर उन्होंने कहा, "अब बहुत देर हो चुकी है।"

सुनील के हाथ कांपने लगे।

"बाबा, कोई उपाय तो होगा?"

बाबा ने सिर हिलाया।

"कुछ आत्माएं ऐसी होती हैं जिन्हें बुलाने के बाद वापस भेजना इंसान के हाथ में नहीं रहता।"

सुनील ने कहा, "लेकिन आपने तो कहा था कि आप मदद कर सकते हैं।"

बाबा ने उसकी तरफ देखा।

"मैं तुम्हें बचाने की कोशिश कर सकता हूं, लेकिन तुम्हारे पीछे जो आया है, वह सिर्फ एक आत्मा नहीं है।"

सुभाष ने घबराकर पूछा, "फिर क्या है?"

बाबा ने जवाब दिया, "स्कंदनी का नाम तुम लोगों ने गलत समझा है। स्कंदनी किसी एक चुड़ैल का नाम नहीं है। यह उस जगह से जुड़ी एक शक्ति का नाम है, जो हर बार किसी नए इंसान को अपना माध्यम बनाती है।"

कमरे में अचानक दीपक की लौ कांपने लगी।

बाबा ने कहा, "तुमसे पहले रमेश ने उसे बुलाया था। उससे पहले भी किसी ने बुलाया था। और हर बार उसके बाद एक इंसान गायब हुआ।"

सुनील ने घबराकर पूछा, "तो रमेश कहां है?"

बाबा ने उसकी तरफ देखा।

"रमेश अभी जिंदा है।"

सुनील की आंखों में उम्मीद जागी।

लेकिन बाबा ने तुरंत कहा, "लेकिन वह अब रमेश नहीं रहा।"

उसी रात सुनील और सुभाष वापस शहर लौट आए।

रास्ते भर दोनों ने कोई बात नहीं की।

घर पहुंचने के बाद सुनील ने दरवाजा बंद किया और खिड़कियां भी बंद कर दीं।

रात के करीब दो बजे अचानक आईने के अंदर से आवाज आई।

ठक।

सुनील ने आंखें खोल दीं।

ठक।

इस बार सुभाष भी जाग गया।

दोनों ने आईने की तरफ देखा।

आईना कमरे की दूसरी तरफ था।

उसके अंदर दोनों दिखाई दे रहे थे।

लेकिन उनके बीच एक तीसरा व्यक्ति भी खड़ा था।

वह रमेश था।

उसका चेहरा बिल्कुल शांत था।

उसने आईने के अंदर से हाथ उठाया और अपनी उंगली से कांच पर कुछ लिखने लगा।

सुनील धीरे धीरे आगे बढ़ा।

कांच पर शब्द दिखाई देने लगे।

भागो मत।

सुभाष ने कांपती आवाज में पूछा, "रमेश तुम्हें क्या बताना चाहता है?"

तभी आईने में रमेश के पीछे एक और परछाई दिखाई दी।

लंबे बाल।

झुका हुआ सिर।

और सफेद आंखें।

रमेश अचानक गायब हो गया।

अगले ही पल आईना टूटकर जमीन पर गिर गया।

कमरे में अंधेरा छा गया।

सुबह पड़ोसियों ने घर से कोई आवाज नहीं सुनी तो दरवाजा तोड़ा।

अंदर सुभाष जमीन पर बेहोश पड़ा था।

सुनील कमरे में नहीं था।

उसकी कोई खबर नहीं मिली।

कुछ दिनों बाद उसी ऑफिस में एक नया कर्मचारी आया।

वह उसी कुर्सी पर बैठा जहां सुनील बैठा करता था।

दोपहर में उसने सुभाष की पुरानी डायरी खोली।

डायरी के आखिरी पन्ने पर सिर्फ एक वाक्य लिखा था।

स्कंदनी को मत बुलाना।

नए कर्मचारी ने हंसते हुए वह बात पढ़ी।

फिर उसने मजाक में अपने साथ बैठे दोस्त से कहा, "ये स्कंदनी कौन है?"

ऑफिस में बैठे सुभाष ने तुरंत सिर उठाया।

उसके चेहरे का रंग उड़ गया।

उसने कांपती आवाज में कहा, "उसका नाम मत लेना।"

लेकिन तब तक बहुत देर हो चुकी थी।

ऑफिस की दीवार पर लगा पुराना आईना अपने आप धुंधला होने लगा।

उस धुंध के बीच धीरे धीरे पांच उंगलियों के निशान उभर आए।

और फिर आईने के अंदर से किसी औरत की बहुत धीमी आवाज आई।

"एक और मिल गया।"