Mafia’s possession chapter 8 in Hindi Women Focused by Luna Rinn books and stories PDF | Mafia’s possession chapter 8

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Mafia’s possession chapter 8

अब तक

मैनेजर ने अपना सर हां में हिला दिया। वह जाते हुए यह सोचने लगा कि आखिर फ़ना में ऐसा क्या है कि मिस्टर भारद्वाज को उसके हाथ से ड्रिंक पीनी है, क्योंकि जब से मिस्टर भारद्वाज आए थे, उन्होंने किसी से भी ड्रिंक सर्व करने के लिए नहीं कहा था और कोई भी उनके पास आता, तो वह उसे गुस्से से यूं देखेते, जैस उसकी जान ले लेंगे। जैसे वह शख्स अभी 2 मिनट में यहां से नहीं गया तो।

मिस्टर भारद्वाज ने अपनी वॉच की तरफ देखा। 20 मिनट हो गए थे, लेकिन फ़ना अभी तक नहीं आई थी। जिससे उनका गुस्सा सातवें आसमान पर पहुंच गया। उन्होंने जोर से वाइन की बोतल टेबल पर पटक दी।

अब आगे-

विक्रम भारद्वाज इस वक्त गुस्से में अपनी लाल आंखें लिए मैनेजर को घूर रहा था और मैनेजर को ऐसा फील हुआ कि मिस्टर भारद्वाज उसकी इसी वक्त जान ले लेंगे।

मैनेजर ने गुस्से से अपना फोन निकाला और उस पर फ़ना का नंबर डायल कर दिया।

लेकिन फ़ना कॉल पिक नहीं कर रही थी। मैनेजर के तो पसीने छूट गए थे। अगर मिस्टर भारद्वाज इस लड़की के लिए यहां पर नहीं आते, तो वह कब का इस लड़की को यहां से दफा कर देता, ना की इसके भाव झेलता। लेकिन मजबूरी थी उसकी, क्योंकि फ़ना के हाथ में उसकी जान थी। मैनेजर किसी को बयान भी नहीं कर सकता था कि उसे कितना डर लग रहा था। क्योंकि जिस तरीके से उन्होंने फ़ना के साथ, उस दिन सबके सामने हैवानियत की थी और आगे जाकर किसी ने भी उसकी हेल्प नहीं की। वह तो यही देखकर हैरान था कि फ़ना अभी तक जिंदा कैसे है।

इस बार मैनेजर ने देखा कि फ़ना ने उसका कॉल कट कर दिया। यह देखकर मैनेजर का माथा ठनक गया। क्योंकि अब जो वह फ़ना को पैसे देने वाला था, वह सारे कट कर लेगा और उसका बोनस भी।

"कहां रह गई यह लड़की" मैनेजर ने खुद से दांत पीसते हुए कहा।

उधर विक्रम वाइन की बोतल को एक तक देखे जा रहा था।

तभी उसके अंदर, उसे किसी की छोटी सी परछाई दिखाई दी। विक्रम ने अपनी नजरे उठाकर सामने देखा, तो फ़ना अपने धीरे-धीरे कदमों से उसकी तरफ आ रही थी।

यह देखकर विक्रम के भाव सख्त हो गए और उसका जबड़ा कसा हुआ था। फ़ना, जो विक्रम की तरफ आ रही थी, उसने जब विक्रम का डरावना सा फेस देखा, तो एक पल के लिए उसके कदम ठहर गए। उसने अपनी स्कर्ट को कसकर पकड़ लिया। उसे चेंज करने का भी टाइम नहीं मिला था, क्योंकि वह डायरेक्ट एंटर हुई और विक्रम की तरफ आने लगी।

इधर मैनेजर को रोना आ रहा था। वह बार-बार फ़ना को कॉल कर रहा था। लेकिन फ़ना थी कि वह कॉल पिक ही नहीं कर रही थी। फ़ना बेचारी कॉल पिक भी कैसे करती, क्योंकि वह तो विक्रम की तरफ जा रही थी ना। मैनेजर दूसरी तरफ था, इसलिए वह यह नहीं देख पाया।

विक्रम फ़ना को ऊपर से नीचे तक एनालाइज कर रहा था। फ़ना के कदम, जो फ्रिज हो गए थे, यह देखकर विक्रम की आंखें तीखी हो गई।

उसकी आंखों में कुछ ऐसा था, जिससे फ़ना डर गई और वह बिना सोचे समझे विक्रम की तरफ आने लगी। विक्रम फ़ना से बहुत लंबा था, क्योंकि फ़ना की हाइट तो सिर्फ 5 फुट 1 इंच थी, वही विक्रम 6 फुट 3 इंच का था। विक्रम अपनी जगह से खड़ा हो गया था और फ़ना जब उसके सामने आकर खड़ी हुई, तो वह उसके सामने छोटी बच्ची लग रही थी।

 विक्रम की वह बड़ी, लेकिन खतरनाक आंखें एनालाइज कर रही थी कि आखिर फ़ना कहां रह गई थी, जो वह आज इतनी लेट हो गई।

विक्रम ने अपना हाथ आगे बढ़ते हुए फ़ना को अपने एक ही हाथ से उठा लिया। विक्रम का हाथ इतना बड़ा था कि फ़ना उसके एक ही हाथ में सिमट गई। विक्रम फ़ना को लेकर बैठ गया और फिर उसका चेहरा अपनी तरफ करते हुए, उसके होठों पर जोर से बाइट कर दी, "आह्ह.!"

"तुम कहां थी और किसके साथ थी, अभी तक।"

विक्रम के क्वेश्चन में, जो वार्निंग थी, उसे भांप गई थी फना। उसने धीरे से कहा, "सॉरी, आज के बाद से लेट नहीं होगा।"

यह सब कुछ बोलते हुए फ़ना सहमी हुई थी। विक्रम ने उसे अपनी गोद में बैठा रखा था और फ़ना वाइन की बोतल उठा कर, विक्रम के ड्रिंक के गिलास में वाइन सर्व करने लगी। ऐसा करते हुए वह कांप रही थी।

फ़ना के दिमाग में कुछ ओर ही चल रहा था, क्योंकि उसके पास वक्त कम था। कल तक वह इतने पैसों का इंतजाम कैसे करेगी। यह सोच सोच कर ही उसकी जान निकल रही थी और हाथ, पैर, दिमाग काम ही नहीं कर रहे थे। जिस वजह से फ़ना ने वह ड्रिंक टेबल पर गिरा दी। उसे होश ही नहीं था, जब ड्रिंक बाहर गिरने लगी, गिलास से ओवर होकर। यह विक्रम देख रहा था कि कहीं ओर ही खोई हुई थी वह, दिमाग से यहां पर प्रजेंट ही नहीं थी। विक्रम ने उसकी कमर पर अपनी पकड़ टाइट की।

पर फ़ना को अभी तक होश नहीं आया था। उसकी आंखों से आंसू बह रहे थे और बार-बार उसकी आंखों के सामने उसके भाई का चेहरा आ रहा था। उसके कानों में डॉक्टर के कह गए शब्द गूंज रहे थे कि सिर्फ कल तक का वक्त है, तुम्हारे पास, अगर तुमने पैसे का इंतजाम नहीं किया, तो तुम अपने भाई की डेड बॉडी घर ले जा सकती हो।

फ़ना जोर से चिल्लाई, "नो डॉक्टर, प्लीज।"

तभी फ़ना को रियलाइज हुआ कि वह कहां बैठी हुई है और वह किसके साथ है। उसने जल्दी से उस वाइन की बोतल को देखा, जो पूरी खाली हो चुकी थी और ड्रिंक टेबल से नीचे गिर रहा था। गिलास कब का फुल हो चुका था।

फ़ना डर से थूक घटकी और फिर डरते हुए विक्रम के चेहरे की तरफ देखा। विक्रम का चेहरा देखते ही फ़ना की चीख निकल गई। वह जोर से चिल्लाते हुए कूद कर विक्रम से दूर हो गई। उसने सर झुका कर कहा, "सर सॉरी।"

 विक्रम इस वक्त इतना डरावना लग रहा था कि फ़ना के कदम लड़खड़ाने लगे थे और थर-थर उसके पैर कांपते हुए विक्रम भी देख रहा था। "इतना डर लगता है तुम्हें मुझसे, तो फिर क्यों ऐसी हरकत करती हो, जिससे मैं गुस्सा हो जाऊं और तुम्हें पनिश करूं।

कहां थी तुम आज, तुमने मुझे जवाब नहीं दिया इसका, किसके साथ थी, अपने बॉयफ्रेंड के साथ।"

विक्रम के सवाल पर फ़ना ने सर नीचे कर लिया और धीरे से बोली, "सॉरी सर, लेकिन मेरा बॉयफ्रेंड नहीं है। मैं लेट हो गई थी क्योंकि मैं बारिश में भीग गई थी और कोई रीज़न नहीं है।"

तुम जानती हो ना कि मैं यहां पर तुम्हारा वेट कर रहा था। तुम मिस्टर विक्रम भारद्वाज को वेट करवाओगी। अब तुम्हारी इतनी औकात हो गई। तुम अपनी औकात से बाहर जा रही हो, क्योंकि तुम्हारी औकात यह है कि तुम मेरे जूते पर अपना सर रगड़ो, तुम्हें इस लायक भी नहीं समझता मैं।"

 विक्रम फ़ना को जिस तरीके से देख रहा था, फ़ना ने अपने हाथों की मुट्ठियां बना ली। फिर वह दोबारा जाकर विक्रम की गोद में बैठते हुए अपनी स्कर्ट ठीक करने लगी। वही विक्रम का हाथ तो फ़ना की टॉप के अंदर धीरे-धीरे मूव करने लगा। जिससे फ़ना को इतना हम बुरा फील होने लगा कि उसने धीरे से रोते हुए कहा, "सर, प्लीज, यहां पर कुछ मत करिए, मैं वैसी लड़की नहीं हूं।"

"यहां पर तुम अपनी बॉडी सेल करती हो, छोटे कपड़े पहन कर लोगों को रिझाने का काम करती हो और फिर तुम कहती हो कि तुम शरीफ लड़की हो। शरीफ घराने की लड़कियां बार में नहीं मिला करती, रात में।"

विक्रम के इल्जाम अंदर तक घायल कर गए फ़ना को। फ़ना की आंखों से आंसू बह रहे थे और इसके सिवा वो कर भी क्या सकती थी। उसके सामने खड़े इंसान को वह जवाब तो नहीं दे सकती थी, वरना उसे कहीं दोबारा से उस रात की तरह टॉर्चर ना करें, यह इंसान।

फना विक्रम से बहुत डरती थी।

"सर, मैं यहां पर पैसों के लिए काम करती हूं। लेकिन मैं सिर्फ वेट्रेस हूं। अभी कुछ ही दिन हुआ है, ज्वाइन किए हुए, आप मुझे गलत लड़की समझ रहे हैं। अगर आपको वह सब कुछ चाहिए, तो यहां पर बहुत सी लड़कियां है, जो जो आपको खुश कर सकती हैं।" फ़ना अपनी लड़खड़ाती हुई जबान में बोली।

"तुम्हारी जुबान बहुत ज्यादा चलने लगी है, अब तुम्हारी यह मजाल कि तुम मुझे जवाब दोगी।"

"सर" इतना बोलते ही फ़ना चुप हो गई क्योंकि अब वह विक्रम को ओर गुस्सा नहीं दिलाना चाहती थी।

फ़ना विक्रम के चेहरे को देखने लगी। विक्रम उसकी मासूम सी आंखों में देख रहा था। जिसमें वह दुनिया भर की परेशानियों से झुझ रही थी।

इधर मैनेजर विक्रम को एक्सप्लेन करने आ रहा था। लेकिन जब उसने विक्रम की गोद में फ़ना को देखा तो उसे झटका लगा और उसकी खुशी का ठिकाना ही नहीं था। उसका तो मन नाचने लगा कि यह लड़की यहां पर पहुंच गई। कोई खुश था, इसलिए क्योंकि आज उसके जान बच गई थी।

विक्रम की डांट सुनने के बाद फ़ना ने दोबारा अपना मुंह नहीं खोला।

वह वैसे भी ज्यादा नहीं बोलती थी। विक्रम ने फ़ना का चेहरा अपनी तरफ किया और उसके होठों से अपने होठ मिला दिए। विक्रम फ़ना को रूडली किस कर रहा था।

वही मैनेजर ने जब मिस्टर विक्रम को फ़ना को किस करते हुए देखा, तो उसकी आंखें फटी की फटी रह गई।

विक्रम भारद्वाज तो फ़ना के ऊपर लट्टू हो गया था। वह यहां पर सिर्फ और सिर्फ फ़ना के लिए आते थे। यह तो साफ पता चल चुका था।

फ़ना के हाथ मिस्टर विक्रम की चेस्ट पर थे, क्योंकि विक्रम जिस तरीके से फ़ना के ऊपर झुक गया था, फ़ना नीचे दबती जा रही थी।

विक्रम ने जब फ़ना को किस करना बंद किया तो फ़ना धीरे-धीरे सांस ले रही थी।

विक्रम ड्रिंक कर रहा था और उसने दोबारा फ़ना को नहीं देखा। इस वक्त वह इतने गुस्से में था कि वह फ़ना की गर्दन तोड़ सकता था।

विक्रम कुछ देर ड्रिंक करने के बाद वहां से चला गया। फ़ना भी घर जाने के लिए आज जल्दी निकलने वाली थी। मैनेजर भी उसे रोका नहीं, क्योंकि अब फ़ना विक्रम भारद्वाज की पर्सनल प्रॉपर्टी थी। अगर उसने फ़ना को कुछ भी उल्टा सीधा कह दिया, तो कहीं विक्रम भारद्वाज उसकी जुबान ना खींच ले।

फना थोड़ी हैरान हो रही थी कि मैनेजर उसे पर चिल्लाया नहीं, क्योंकि पिछली बार तो मैनेजर ने उसे खींचकर थप्पड़ मार दिया था।

आज वह मैनेजर की डांट सुनने के लिए तैयार थी। फ़ना अंदर से पहले ही टूटी हुई थी और उसे ज्यादा फर्क नहीं पड़ रहा था, किसी से भी।

इधर कोई और भी था, जो फ़ना को देख रहा था और उसे पाना चाहता था। इतनी जल्दी फ़ना का वहां से जाना, उसे शख्स को पसंद नहीं आ रहा था। इसलिए वह एकदम उसके सामने आकर खड़ा हो गया। यह कोई और नहीं, रमन था।

रमन ने फ़ना को ऊपर से नीचे तक देखा और बोला, "कहां जा रही हो तुम छम्मक छल्लो, इतनी भी क्या जल्दी है। अभी हमारी तो खातिरदारी कर दो। अब जब तुम विक्रम भारद्वाज का बिस्तर गर्म कर सकती हो, तो हमारे क्यों नहीं।"

फ़ना की आंखों में आंसू आ गए कि हर कोई उसे खिलौने की तरह क्यों देख रहा है।

फ़ना ने अपना पर्स कसकर पकड़ लिया और रमन को अवॉयड कर वहां से जाने लगी। रमन ने गुस्से से पीछे से उसके बाल पकड़ लिए और उसे अपनी तरफ खींचते हुए चिल्ला कर बोला, "तुम्हारी इतनी हिम्मत, दो कौड़ी की लड़की, तुम मुझे भाव दिखाओगी। तुम जैसी लड़कियों को मैं रोज अपने बिस्तर पर तोड़ता हूं और उन्हें कुचल देता हूं।"

फ़ना का चेहरा लाल पड़ गया। तभी मैनेजर रमन के पास आया और बोला, "हेलो मिस्टर रमन मित्तल, देखिए उसे जाने दीजिए। उसकी तबीयत ठीक नहीं है। जिस वजह से मैंने उसे आज जल्दी छुट्टी दे दिया।"

विक्रम की पकड़ जैसे ही फ़ना पर ढीली हुई, फ़ना वहां से दौड़कर भाग गई। उसे जाते हुए देखकर रमन ने अपने गुस्से से, अपने दूसरे हाथ पर मुक्का मारते हुए मैनेजर से कुछ कहने लगा।

इधर फ़ना रोती हुई सड़क पर चल रही थी और कुछ दूर जाकर वह एक बेंच पर बैठ गई। उसकी आंखों से आंसू बह रहे थे। किस्मत को कोर्स रही थी, वह अपनी।

कुछ वक्त बाद जब वह घर पहुंचती है, तो वहां पर निशु पहले से ही थी।

निशु 1 दिन के लिए शहर से बाहर गई हुई थी। उसे फ़ना की बहुत फिक्र हो रही थी। फ़ना को ठीक देखकर निशु को काफी अच्छा महसूस हुआ।

लेकिन फ़ना की आंखों में आंसू देख कर, उसे समझ में नहीं आया। फ़ना उसे पकड़ कर जोर जोर से रोने लगी।

"क्या हुआ है तुझे फ़ना" नीशू ने उसकी फिक्र करते हुए पूछा। फ़ना उसे रोते हुए अपने सारे दर्द की कहानी बयां कर देती है।

यह सुनकर निशु के भी होश उड़ गए थे कि इतनी बड़ी रकम वो लोग कैसे ला सकते हैं। कहीं से भी, उनके लिए तो अपना खाने का गुजारा ही करना इतना मुश्किल हो रहा है।

नीशू ने फ़ना को पानी का गिलास देते हुए कहा, "रिलैक्स, पहले तो रोना बंद कर, वरना तेरी तबीयत ज्यादा खराब हो जाएगी।"

फना ने पानी पीने से मना कर दिया और रोते हुए बोली, "मैं क्या करूं, मुझे कुछ भी समझ नहीं आ रहा है, निशु।"

तभी फ़ना के दिमाग में एकदम से कुछ हिट हुआ और उसने अपनी शर्ट के अंदर हाथ डाला। उसे कार्ड मिला।

उसे कार्ड को देखते ही फ़ना की रूह कांप गई और उसने उस कार्ड को दूर फेंक दिया।

दोबारा उस कार्ड को देखने में भी डर लग रहा था उसे। लेकिन फ़ना ने फिर भी अपनी आंखें बंद की और खुद से ही बोली, "मुझे यह करना ही होगा।"

"तुझे क्या करना होगा।"

नीशू ने जब फ़ना से सवाल किया, तो फ़ना ने निशु से कहा, "मुझे खुद का सौदा करना होगा।

मैं अपने भाई को मरने नहीं दे सकती और इतनी बड़ी रकम का इंतजाम करना इंपॉसिबल हैं।"

"तेरा दिमाग खराब हो गया है। यह क्या बोल रही है तू, खुद का सौदा करेगी, अपनी जिंदगी जीते जी नरक बनानी है तुझे।"

"मैं कुछ भी नहीं कर सकती, इसके सिवाय।" फ़ना ने जोर-जोर से रोते हुए कहा, "मुझे यह करना ही पड़ेगा, वरना सब कुछ खत्म हो जाएगा।"

"ऐसा मत कर फ़ना, क्यों खुद की जिंदगी दांव पर लगा रही है तू, उस राक्षस के पास क्यों जाना चाहती है। हम कोई और तरीका ढूंढ लेंगे।"

"अब कुछ नहीं हो सकता निशु" फ़ना ने निराश होकर आंखों में आंसू लिए कहा।

फ़ना उस Card को उठा लेती हैं। उसकी उंगलियां कांप रही थी और दिल की धड़कनें तेजी से धड़क रही थी। उसने अपना फोन निकाला और उसे पर नंबर डायल करने लगी।

फ़ना ने जब उस नंबर पर कॉल किया तो कोई कॉल पिक नहीं कर रहा था।

फ़ना को लगा कि कॉल काटने ही वाला है, तभी कॉल पिक हो गया और दूसरी तरफ से उसे एक गंभीर आवाज सुनाई दी, "हम्म."

इधर फ़ना की तो कुछ बोलने की हिम्मत ही नहीं हुई। फ़ना की सांसों की आवाज फोन पर मौजूद वह शख्स सुन रहा था।

आखिर तुम मान ही गई, आ गई अपनी औकात पर, तुम जैसी बाजारू लड़कियां अपना असली रंग जल्दी दिखा देती हो। शरीफ बनने का फिर चाहे कितना ही नाटक क्यों ना करती हो तुम।" उसे आदमी के लहजे में नफरत और कड़वाहट दोनों झलक रही थी।

फ़ना ने फोन को कसकर पकड़ लिया और धीमी और रूंधी आवाज़ में बोली, " सर." आगे के शब्द नहीं बोल पा रही थी, फ़ना।

"सर सर. क्या हम मिल सकते हैं?"

"हम्म. Okk i'm coming बार के सामने मेरा वेट करो."