अनकहा सच____
हितेश को यह सब बताने के बाद....
राजू ने अपनी आँखों से बहते आँसुओं को पोंछते हुए कहा, "इसीलिए हितेश... मेरे पापा की यह हालत है। वे मेरी बहन को बिल्कुल पसंद नहीं करते। वे अक्सर नशे में धुत होकर उसपे चिल्लाते हैं, उसे भला - बुरा कहते हैं— उससे कहते रहते हैं कि 'उस दिन जैसे तेरा भाई चला गया, वैसे ही तू भी क्यों नहीं चली गई? चली जाती यहाँ से, तो कम से कम मेरी आँखों के सामने तो नहीं रहती!' उस हादसे के बाद से पापा का दिमाग जैसे काम करना बंद कर चुका है। वे ऐसे सदमे में गए कि आज तक उससे बाहर नहीं निकल पाए... और हमारे घर की हालत ऐसी हो गई।"
इतना बोलते-बोलते राजू पूरी तरह टूट गया। उसकी घबराहट और सीने में दबा दर्द साफ़ दिख रहा था।
हितेश ने राजू को संभाला, उसे गले से लगाया और ढांढस बंधाया। दोनों ने कुछ देर शांत बैठकर खुद को सँभाला और फिर भारी मन से अपने-अपने घर के लिए निकल गए।
उस रात हितेश अपने कमरे में बिस्तर पर लेटा रहा, लेकिन उसकी आँखों में नींद का नामो-निशान नहीं था। उसके दिमाग में बस राजू, उसकी बिखरी हुई जिंदगी, उसके पिता की नफ़रत, उसकी लाचार बहन और उसकी गायब माँ-भाई की बातें ही घूम रही थीं। हितेश अपने दोस्त की इस तकलीफ से बहुत परेशान था।
उसे यूँ गुमसुम और परेशान देखकर हितेश की माँ उसके कमरे में आईं। उन्होंने प्यार से उसके सिर पर हाथ रखा और पूछा, "क्या बात है बेटा? रोज तो तू हँसता-खिलखिलाता रहता है, आज ऐसे शांत और परेशान क्यों बैठा है?"
हितेश ने अपनी माँ की तरफ देखा। पहले तो वह सोचता रहा कि राजू के घर की यह बात माँ को बताए या न बताए, लेकिन उससे रहा नहीं गया। अपने दोस्त का दर्द उसके दिल में उमड़ रहा था। उसने हिचकिचाते हुए अपनी माँ को राजू, उसके परिवार और उस भयानक अतीत के बारे में सब कुछ बता दिया...
जब हितेश ने अपनी माँ को राजू के परिवार और उसके घर की पूरी कहानी सुनाई, तो यह सुनते ही उसकी माँ के चेहरे की रंगत उड़ गई। वे अचानक बेहद परेशान हो गईं।
उन्होंने हड़बड़ाते हुए पूछा, "क्या?! यह... यह कब की बात है?"
हितेश ने थोड़ा हिसाब लगाते हुए कहा, "जब राजू सात साल का था तब की बात है मम्मी... मैं भी उस वक्त करीब चार-पांच साल का रहा हूँगा, मतलब राजू मुझसे दो साल बड़ा है ना, तो आप लगा लो अंदाज़ा कि यह कितने साल पुरानी बात होगी!"
यह सुनते ही हितेश की माँ के चेहरे पर चिंता की गहरी लकीरें उभर आईं। उन्होंने खुद को सँभालते हुए हितेश से कहा, "अच्छा ठीक है... तू अब ज़्यादा मत सोच। जो हुआ सो हुआ, तू अब सो जा और फालतू परेशान मत हो।"
उन्होंने हितेश को तो किसी तरह समझा-बुझाकर सुला दिया, लेकिन खुद गहरी सोच और परेशानी में डूब गईं।
जब वे अपने कमरे में पहुँचीं, तो उनकी यह घबराहट और चिंता देखकर हितेश के पापा ने पूछ ही लिया, "क्या हुआ? इतनी परेशान क्यों लग रही हो?"
हितेश की माँ ने उनकी तरफ देखा और बहुत ही धीमी आवाज़ में राजू, उसकी गायब हुई माँ और उसके सात-आठ दिन के छोटे भाई के बारे में सब बता दिया।
यह सुनते ही हितेश के पापा के चेहरे का रंग सफ़ेद पड़ गया। जैसे बीते कल का कोई भयानक सच अचानक उनके सामने आकर खड़ा हो गया हो। वे गहरी सोच में डूब गए।
हितेश की माँ ने काँपती आवाज़ में कहा, "हाँ, हितेश तो यही बता रहा था कि राजू की माँ और उसका छोटा भाई—जो मुश्किल से सात-आठ दिन का ही रहा होगा—अचानक गायब हो गए और फिर कभी वापस नहीं आए। लोग तो यही कहते हैं कि..."
हितेश के पापा ने एक गहरी सांस ली और कहा, "हाँ... सुना तो था उसी गाँव के बारे में। और राजू के पापा की दिमागी हालत के बारे में भी.....पर..."
हितेश के पापा बोलते-बोलते अचानक रुक गए।
हितेश की माँ ने उनकी तरफ देखा और भारी आवाज़ में कहा, "...पर जी, जो बात गाँव वाले कहते हैं, क्या सच में वही बात है?"
दोनों एक-दूसरे की आँखों में देखने लगे। उस कमरे में एक खौफनाक खामोशी छा गई, जैसे उन दोनों के मन में कोई ऐसा गहरा राज़ दबा हो, जिसे दुनिया से छुपाया गया था...