अनकहा सच___
हितेश के मम्मी-पापा राजू से लगातार हाथ जोड़कर माफी मांगते रहते हैं। उनकी आँखों से लगातार आँसू गिर रहे होते हैं। राजू और हितेश उन्हें इस तरह रोते और माफी मांगते देखकर बहुत घबरा जाते हैं। वे बार-बार उनसे ऐसा न करने की विनती करते हैं।
राजू घबराहट के मारे बस यही कहता रहता है, "अंकल-आंटी... प्लीज, आप ऐसा मत कीजिए! प्लीज!"
फिर बड़ी मुश्किल से हितेश और राजू उन्हें संभालते हैं, शांत कराते हैं और उन्हें पानी पिलाते हैं।
पानी पीने के बाद हितेश घबराकर पूछता है, "पापा... क्या हुआ? आप अचानक ऐसे क्यों कर रहे थे? आप राजू से माफी क्यों मांग रहे थे? आपने ऐसा क्यों कहा?"
राजू भी घबराहट के मारे बस इन्हीं सवालों को दोहराने लगता है।
तभी हितेश के पापा खुद को संभालते हैं और एक गहरी सांस लेकर कहते हैं, "बेटा... मुझे तुमसे एक बात कहनी है... एक सच बताना है।"
हितेश और राजू एक साथ, एक स्वर में पूछते हैं, "बात? कैसी बात?" दोनों बहुत घबरा चुके थे।
हितेश के पापा कहते हैं, "तुम घबराओ मत, मुझे बस एक बात बतानी है..."
हितेश के पापा बोलने में घबराने लगते हैं, तो हितेश की माँ उनके कंधे पर हाथ रखकर उन्हें सहारा देती हैं और बोलने के लिए कहती हैं।
हितेश के पापा बोलना शुरू करते हैं, "राजू बेटा... हितेश ने हमें तुम्हारी माँ और भाई के बारे में बताया था। बस उसी बारे में तुमसे कुछ बात कहनी है।"
यह सुनते ही राजू पूरा सुन्न पड़ जाता है। माँ और भाई के बारे में अंकल-आंटी क्या बात करना चाहते हैं? राजू के मन में सवालों का बवंडर उठ खड़ा होता है। वह अचानक घबराकर पूछता है, "माँ और भाई के बारे में? क्या बात अंकल? कैसी बात?!"
वे कहते हैं, "तुम डरो मत राजू, हमें बस तुम्हें कुछ बताना है..."
हितेश राजू को संभालता है। राजू एक गहरी सांस लेता है। हितेश के पापा भी एक गहरी सांस लेते हैं और बताना शुरू करते हैं।
हितेश के पापा कहते हैं, "राजू बेटा, तुमने हितेश को अपने मम्मी और भाई के बारे में बताया था कि गाँव में उनके बारे में अफ़वाह उड़ी हुई है। बेटा... हमें तुम्हें यह बताना है कि..."
फिर वे बोलते-बोलते घबराने लगते हैं। एक गहरी सांस लेकर आगे बोलते हैं, "जिस साल की बात तुमने बताई है बेटा... उस वक्त हितेश बहुत छोटा था, कोई चार-पांच साल का होगा। उसी साल की बात है। मैं रात में अपने खेतों में ही सोने के विचार से वहीं रुक गया था। तभी अचानक रात को खेतों की तरफ से कुछ अजीब आवाज़ें आने लगीं।"
हितेश के पापा यह सब बताने में बहुत घबरा रहे थे। हितेश और उसकी माँ उनकी घबराहट को कम करने की कोशिश कर रही थी , खुद को भी संभाल रही थी।
हितेश के पापा आगे कहते हैं, "फिर मैंने आसपास के जो भी दो-तीन लोग थे, उन्हें इकट्ठा किया। जब हम तीन-चार लोगों ने जाकर देखा... तो हमने देखा कि खेत के पास वाली जगह पर एक औरत को किसी ने बड़ी बेरहमी से पत्थरों से कुचलकर मार दिया था! बहुत बेरहमी से हत्या की गई थी..."
राजू जैसे ही यह सुनता है, उसके हाथ-पैर काँपने लगते हैं। हितेश तुरंत उसे संभालता है।
तभी हितेश के पापा काँपती आवाज़ में आगे कहते हैं, "और... उस औरत के पास में ही एक छोटा सा बच्चा पड़ा हुआ था, जिसे भी पत्थरों से कुचलकर मारने की कोशिश की गई थी... एक अधमरा सा बच्चा..."
राजू की आँखों से आँसू बहने लगते हैं। हितेश के मम्मी-पापा उसे संभालने की कोशिश करते हैं।
हितेश के पापा कहते हैं, "फिर हितेश की माँ भी वहाँ आ गई थी। हम सब थे... पर हमें समझ नहीं आ रहा था कि हम क्या करें और क्या न करें! हम बहुत घबरा गए थे, बहुत डर गए थे..."
इतने में हितेश के पापा की ज़बान लड़खड़ाने लगती है। राजू कुछ सुन नहीं पा रहा था, वह सुन्न पड़ा था। हितेश की माँ राजू को संभालती हैं।
हितेश घबराकर जोर से पूछता है, "पापा! फिर क्या हुआ?! मम्मी, फिर क्या हुआ?!"