Apne hone ki kimat in Hindi Women Focused by surinder Kumar Gupta books and stories PDF | अपने होने की कीमत

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अपने होने की कीमत

रिया अभी अठारह वर्ष की ही हुई थी, लेकिन उसे देखकर कोई भी पहली नजर में यही कहता कि वह अपनी उम्र से कुछ अधिक समझदार और आत्मविश्वासी लड़की है।

उसकी सबसे बड़ी विशेषता उसका रूप था। गोरा, शांत चेहरा, बड़ी-बड़ी आंखें और लंबे काले बाल। मगर रिया की खूबसूरती केवल उसके चेहरे तक सीमित नहीं थी। पढ़ाई में भी वह अपने कॉलेज की मेधावी छात्राओं में गिनी जाती थी। उसे किताबों से विशेष लगाव था और वह अपने भविष्य को लेकर बहुत स्पष्ट सपने देखा करती थी।

वह बी.एससी. प्रथम वर्ष की छात्रा थी।

रिया का परिवार शहर के एक अच्छे इलाके में रहता था। परिवार को ऊपरी-मध्यवर्गीय कहा जा सकता था। उसके पिता रमेश अग्रवाल का अपना छोटा-सा व्यवसाय था। आमदनी अच्छी थी और परिवार की जरूरतें आराम से पूरी हो जाती थीं। उसकी मां रेणु लगभग चालीस वर्ष की थीं और घर की व्यवस्था पूरी तरह उनके हाथों में थी।

घर में रिया से पांच वर्ष छोटा उसका भाई रोहन भी था। वह पंद्रह साल का था और अभी स्कूल में पढ़ रहा था।

परिवार में पिता कम बोलते थे। व्यापार और बाहर की दुनिया में व्यस्त रहने के कारण घर के अधिकांश मामलों में वह अपनी पत्नी पर भरोसा करते थे।

इसलिए घर में किसी भी बड़े निर्णय का अंतिम शब्द अक्सर रेणु का ही होता था।

कौन-सा सामान खरीदा जाएगा।

रोहन किस स्कूल में आगे पढ़ेगा।

रिया को कौन-सा विषय लेना चाहिए।

किस रिश्तेदार के यहां जाना है।

किससे कितना संबंध रखना है।

यहां तक कि रिया को किस तरह के कपड़े पहनने चाहिए और किस समय घर लौटना चाहिए—इन बातों पर भी रेणु की अपनी राय होती थी।

रिया अपनी मां से प्रेम करती थी, लेकिन कई बार उसे लगता कि मां उसे बेटी कम और अपनी बनाई हुई किसी योजना का हिस्सा अधिक समझती हैं।

एक शाम रिया अपनी पढ़ाई की मेज पर बैठी थी। सामने किताब खुली थी, लेकिन उसका ध्यान पन्नों पर नहीं था।

वह खिड़की से बाहर देख रही थी।

सूरज डूब चुका था। सामने वाले पार्क में बच्चे खेल रहे थे। कुछ लड़%कियां अपने कॉलेज के बारे में बातें करती हुई गुजर रही थीं।

रिया ने धीरे से किताब बंद कर दी।

उसके मन में एक सवाल उठा—

“मैं आगे क्या बनना चाहती हूं?”

उसने खुद से ही उत्तर दिया—

“बहुत कुछ।”

वह केवल किसी की पत्नी बनकर रह जाना नहीं चाहती थी। वह पढ़ना चाहती थी। उच्च शिक्षा प्राप्त करना चाहती थी। अपने पैरों पर खड़ा होना चाहती थी। उसे अध्यापन में रुचि थी और कभी-कभी वह कल्पना करती कि एक दिन वह कॉलेज में पढ़ा रही है और विद्यार्थी उसे सम्मान से “मैडम” कहकर संबोधित कर रहे हैं।

लेकिन इन सपनों को उसने कभी अपनी मां के सामने पूरी तरह नहीं रखा था।

उसे मालूम था कि रेणु के लिए बेटी का भविष्य मुख्य रूप से एक अच्छे विवाह से जुड़ा हुआ था।

उस दिन भी रेणु कमरे में आईं।

“रिया, पढ़ाई खत्म हुई?”

“बस मम्मी, थोड़ा और पढ़ना है।”

“हर समय पढ़ती ही रहती हो। नीचे आओ। आज तुम्हारे मामा का फोन आया था।”

रिया ने किताब बंद कर दी।

“क्या कह रहे थे?”

“तुम्हारी पढ़ाई के बारे में पूछ रहे थे।”

रिया मुस्कराई।

“तो आपने क्या कहा?”

रेणु ने सहज भाव से कहा—

“मैंने कहा कि हमारी बेटी पढ़ने में बहुत अच्छी है।”

रिया का चेहरा खिल गया।

“सच?”

“हां, लेकिन मैंने यह भी कहा कि पढ़ाई के साथ-साथ जिंदगी के दूसरे फैसलों के बारे में भी समय पर सोचना चाहिए।”

रिया की मुस्कान थोड़ी फीकी पड़ गई।

“मतलब?”

रेणु उसके पास बैठ गईं।

“मतलब यह कि बेटियां हमेशा घर में नहीं रहतीं।”

रिया कुछ नहीं बोली।

रेणु ने उसके बालों पर हाथ फेरते हुए कहा—

“अभी तुम्हारी उम्र ही क्या है? लेकिन समय बहुत जल्दी निकल जाता है। इसलिए मैं चाहती हूं कि तुम पढ़ाई करो, लेकिन जीवन की वास्तविकताओं को भी समझो।”

रिया ने मां की ओर देखा।

“मम्मी, क्या पढ़ाई और शादी दोनों साथ नहीं हो सकते?”

रेणु हंस पड़ीं।

“क्यों नहीं हो सकते? बिल्कुल हो सकते हैं। लेकिन शादी के लिए भी तो सही समय देखना पड़ता है।”

“सही समय कौन तय करेगा?”

रेणु ने उसकी आंखों में देखते हुए कहा—

“तुम्हारी मां।”

रिया कुछ क्षण चुप रही।

फिर हंसकर बोली—

“और अगर बेटी की अपनी भी कोई राय हो?”

रेणु ने तुरंत उत्तर नहीं दिया।

उन्होंने केवल इतना कहा—

“राय रखना अच्छी बात है, लेकिन जिंदगी केवल राय से नहीं चलती।”

यह बात उस समय रिया के मन में कहीं गहरे उतर गई।

उसे पता नहीं था कि आने वाले वर्षों में यही एक वाक्य उसके जीवन के अनेक निर्णयों के सामने बार-बार खड़ा होगा।

उस रात रिया देर तक सो नहीं सकी।

उसने भविष्य के बारे में सोचा।

उसे लगा कि मां शायद गलत नहीं कह रही थीं।

लेकिन उसके भीतर एक और आवाज थी।

वह आवाज कह रही थी—

“मेरी जिंदगी का फैसला आखिर मेरा क्यों नहीं हो सकता?”

रिया उस प्रश्न का उत्तर नहीं जानती थी।

लेकिन उसे यह जरूर मालूम था कि वह अपनी पढ़ाई किसी भी कीमत पर नहीं छोड़ेगी।

उसने मेज पर रखी अपनी किताब उठाई।

अगले दिन उसकी परीक्षा थी।

उसने मन लगाकर पढ़ना शुरू किया।

उसे क्या पता था कि आने वाले कुछ वर्षों में उसकी जिंदगी की किताब में ऐसे अध्याय जुड़ने वाले थे, जिनके बारे में उसने कभी सपने में भी नहीं सोचा था।

वह अभी केवल अठारह वर्ष की थी।

उसे प्रेम का अर्थ भी पूरी तरह मालूम नहीं था।

उसे विवाह की वास्तविकता का अनुभव भी नहीं था।

उसे आर्थिक स्वतंत्रता का महत्व केवल किताबों से पता था।

और उसे यह भी नहीं मालूम था कि एक दिन उसे इन तीनों—प्रेम, विवाह और स्वतंत्रता—के बीच स्वयं अपना रास्ता चुनना पड़ेगा।