सुबह उठा तो शरीर बेहद हल्का लग रहा था। सोचा शायद रात भर नींद अच्छी आई है, इसलिए ताज़ा महसूस कर रहा हूँ। उठकर खिड़की का पर्दा हटाया और बाहर भागती दुनिया के दर्शन किए। पर जब पलटकर देखा, तो मैं अपने ही बिस्तर पर मृत पड़ा था। अचंभित होकर शरीर में वापस प्रवेश करने की कोशिश की, पर असफल रहा। तभी एक झटके में समझ आया—मैं इस दुनिया को हमेशा के लिए अलविदा कह चुका हूँ।
मेरे सारे अधूरे काम याद आने लगे। मीटिंग्स, प्रमोशन और सेट किया हुआ टाइम-टेबल धरा का धरा रह गया। आज ही तो इंश्योरेंस एजेंट को बुलाकर टर्म प्लान का चेक देना था। बड़ी बहन के साथ जायदाद का मसला भी था, सोचा था इस दिवाली उसे बुलाकर हल कर लूँगा। पर मौत ने किसी योजना का इंतज़ार नहीं किया।
तभी बेडरूम का दरवाज़ा खुला और मेरी पत्नी अंदर आई। कोई जवाब न पाकर वह चीख पड़ी और बेटे को बुलाने लगी। शोर सुनकर पड़ोसी डॉक्टर देसाई आ गए। उन्होंने नब्ज़ देखी और गंभीर स्वर में कहा, "माफ़ करें भाभी, राकेश हमें छोड़कर हमेशा के लिए चला गया है।" पूरे घर में रोना-चिल्लाना शुरू हो गया।
मृत्यु के बाद भटकाव के ये तीन दिन बीत चुके थे। जो आम तौर पर सुना था, वैसा कुछ नहीं हो रहा था। न कोई मृत्यु का देवता मुझे लेने आया, न कोई दूत। मैंने पहले ही इच्छा जताई थी कि मेरी अस्थियां कुछ खास जगहों पर बिखरेंगी। जलगाँव की चिता ने शरीर को जलाकर हिसाब पूरा कर दिया था, पर रूह के हिस्से अभी बाकी थे।
पहला हिस्सा: जन्मस्थान की नदी
अस्थियां मेरे जन्मस्थान ले जाई गईं। गाड़ी में सन्नाटा था। पत्नी आँखें पोंछ रही थी और मैं खामोशी से सब देख रहा था। जैसे ही गाड़ी ने जन्मस्थान की सीमा में प्रवेश किया, क्रिकेट का मैदान, स्कूल और कॉलेज सब याद आने लगा। जैसे ही मेरी राख छोटी सी नदी में डाली गई, उसने ताना मारा, "अब आया है? क्या यही बनने के लिए शहर छोड़ा था—राख बनने के लिए?" मैंने बोझिल आँखों से अपने शहर को अलविदा कहा।
दूसरा हिस्सा: पुणे का अधूरा इश्क़
अगला पड़ाव पुणे था। दफ़्तर, छोटा सा कमरा और पीएमटी बसों की भीड़ आँखों के सामने घूमने लगी। और फिर... वो प्रेमिका, जिसकी शादी किसी और से हुई थी। रूह की आँखें उस भीड़ में उसे ही खोज रही थीं। नदी के पुल से जब बेटे ने राख का दूसरा हिस्सा पानी में छोड़ा, तो लगा जैसे मेरा अधूरा इश्क़ और पीएमटी के वो सफर हमेशा के लिए बह गए।
तीसरा हिस्सा: मुंबई का समंदर
लोकल ट्रेन की धड़-धड़ और सपनों के पीछे भागती मुंबई का असीम समंदर सामने था। बेटे ने राख का तीसरा हिस्सा अरब सागर में बहा दिया। समंदर ने बड़ी शालीनता से मेरी मुट्ठी भर राख को अपनी गहराई में समा लिया, मानो कह रहा हो—कितने बड़े सपने लेकर आए थे, पर अंत में खाली हाथ चले गए।
चौथा हिस्सा: गुरुस्थान और परम शून्यता
कलश में थोड़ी सी राख अभी भी बाकी थी। अगले दिन शाम को बेटा मुझे मेरे गुरुस्थान ले गया। वहाँ कोई भव्य आश्रम नहीं था, न मूर्ति, न अगरबत्ती का धुआँ, और न ही कोई शोर। वहाँ था तो बस एक गहरा, अनंत मौन। बेटे ने राख का आखिरी हिस्सा वहाँ की शांत मिट्टी में बिखेर दिया।
उस सादी मिट्टी में मिलते ही मुझे ब्रह्मांड का आखिरी सच समझ आया। मीटिंग्स, टर्म प्लान, जायदाद का झगड़ा और अधूरा इश्क़—यह सब ज़िंदगी के इस रेगिस्तान का एक 'ओसिस' (मृगतृष्णा) था। हम इसी भ्रम को अपनी दुनिया मान बैठते हैं। गुरुस्थान की मिट्टी में मिलते ही मैं उस ओसिस के भ्रम से हमेशा के लिए आज़ाद हो गया। अब कोई 'राकेश' नहीं था, बस एक शाश्वत शांति और असीम मौन था।