Aurat ka marm in Hindi Women Focused by surinder Kumar Gupta books and stories PDF | औरत का मर्म

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औरत का मर्म

यह खबर जंगल की आग की तरह पूरी कॉलोनी में फैल गई थी कि कमला के पैर भारी हैं।

कल तक जो कमला कॉलोनी की औरतों के बीच सहानुभूति और स्नेह की पात्र बनी हुई थी, अचानक ही उनके लिए एक कुलटा औरत बन गई थी।

और होती भी क्यों न? उसके पति को गुजरे अभी डेढ़ साल भी तो नहीं हुए थे।

अब कॉलोनी की औरतों के बीच रोज के आपसी किस्सों की जगह “कमला पुराण” ने ले ली थी।

एक औरत दूसरी से कहती—

“देखिए बहनजी, इस कमला को। कैसी घाघ निकली! पति का साथ छूटा नहीं कि न जाने किसके साथ टाँका भिड़ा लिया।”

दूसरी ने धीरे से कहा—

“पर बहनजी, एक बात समझ में नहीं आती। सुबह से रात तक तो कमला कॉलोनी के ही घरों में काम करती रहती है। फिर जो पाप वह अपने पेट में लिए फिर रही है, वह तो कॉलोनी के ही किसी मर्द का होगा न?”

“हाँ, हो भी सकता है। पर यह बदजात बताती भी तो नहीं। जी तो चाहता है कि अभी उसे घर से निकाल बाहर करूँ, पर मजबूरी है। घर का काम कौन करेगा?”

सच तो यह था कि कॉलोनी की किसी भी औरत ने उस आदमी का नाम उगलवाने के लिए कमला पर कोई खास दबाव नहीं डाला था। शायद इसलिए कि कहीं उसने उसी के पति का नाम ले लिया तो?

मगर उस शहर में नौकर या नौकरानी का मिल पाना इतना आसान भी तो नहीं था। इसलिए मजबूरी में उन्हें कमला को ही झेलना पड़ रहा था—और केवल झेलना ही नहीं, उसके खूबसूरत चेहरे में अपनी-अपनी सौत की कल्पना भी करनी पड़ रही थी।

कमला जिन चार घरों में नियमित रूप से काम करती थी, उन सभी घरों की औरतों के मन में यह संदेह घर कर गया था कि कहीं कमला ने उनके ही पति को तो नहीं फँसा रखा है।

अब उन घरों में रोज सुबह-शाम पति-पत्नी के बीच खटपट होने लगी थी।

“आप किसी दूसरी नौकरानी का इंतजाम क्यों नहीं करते? मुझे तो लगता है, आप चाहते ही नहीं कि कमला इस घर से जाए।”

“क्यों? मैं भला ऐसा क्यों चाहूँगा?”

“कहा न, मेरा मुँह मत खुलवाइए।”

“देखो, रोज-रोज की यह खिचखिच मुझे पसंद नहीं। साफ-साफ कहो कि तुम कहना क्या चाहती हो।”

“क्या? मैं ही खिचखिच करती हूँ? और यह कमला? कैसे हमें मुँह चिढ़ाती हुई सीना तानकर कॉलोनी में घूमती है! आप मर्दों में से ही तो किसी के साथ उसका…”

और फिर वही अधूरी बात, वही शक और वही झगड़ा।

आखिर एक दिन यह सारी खिचखिच समाप्त हो गई, जब उन औरतों ने मिलकर दूसरी नौकरानी तलाश ली।

न कोई पूर्व सूचना, न कोई मुआवजा—सभी ने उसी क्षण कमला को काम से निकाल बाहर किया।

बेचारी कमला रोती-गिड़गिड़ाती रह गई, लेकिन किसी को उस पर दया नहीं आई।

कुछ दिनों तक उसका गुजारा पहले कमाए और बचाए हुए पैसों से चलता रहा। लेकिन जब उसकी सारी जमा-पूँजी समाप्त हो गई, तो वह पास-पड़ोस के घरों के दरवाजे खटखटाकर काम माँगने लगी।

इसी तरह उसके दिन कटते रहे।

और जब प्रसव का समय आया तो वह खैराती अस्पताल में भर्ती हो गई।

उसी कॉलोनी में कुछ ऐसे घर भी थे जहाँ नियमित नौकर रखे गए थे। उन्हीं में एक घर रमण बाबू का था। वहाँ रामा नाम का बारह वर्ष का लड़का काम करता था।

एक दिन अचानक रामा का पिता आया और उसे हमेशा के लिए अपने साथ ले गया।

अब घर की झाड़ू-पोंछा, बरतन और कपड़े धोने आदि का काम अकेली कमलाजी से कैसे हो पाता?

सो, उनके घर में भी नौकर या नौकरानी की तलाश शुरू हो गई।

कमलाजी की बेटी को तो अपनी पढ़ाई से ही फुरसत नहीं मिलती थी कि वह घर के काम में माँ का हाथ बँटा सके। देखते ही देखते दो ही दिनों में घर गंदा दिखाई देने लगा।

एक सुबह ड्राइंगरूम की गंदगी रमण बाबू से देखी नहीं गई। उन्होंने खुद ही झाड़ू उठा ली।

यह देखकर कमलाजी अपनी बेटी पर बुरी तरह तिलमिला उठीं—

“छी! शर्म नहीं आती तुम्हें? पापा झाड़ू दे रहे हैं और तुम…”

बेटी भी भड़क उठी—

“बोल तो ऐसे रही हैं मम्मी, जैसे मैं इस घर की नौकरानी हूँ। अगर यही सब करवाना था तो मुझे पढ़ाने की क्या जरूरत थी? बचपन में ही मेरे हाथ में झाड़ू थमा देतीं।”

अभी बात और आगे बढ़ती कि तभी दरवाजे पर दस्तक हुई।

रमण बाबू ने कहा—

“अरे, देखो तो कौन है।”

दरवाजा खोला गया।

सामने कमला खड़ी थी। उसकी गोद में एक नवजात बच्चा था।

कमलाजी को उसे देखते ही जैसे पुरानी सारी कड़वाहट याद आ गई।

“तू… तू क्यों आई है यहाँ?”

कमला हाथ जोड़कर गिड़गिड़ा उठी—

“कल से एक दाना भी पेट में नहीं गया है, मालकिन। छाती से दूध भी नहीं उतर रहा। मैं तो भूखी रह भी लूँगी, पर इस बच्चे के लिए थोड़ा दूध दे देतीं तो…”

कमलाजी उसे दुत्कारने ही वाली थीं कि तभी उनकी नजर घर के बिखरे हुए सामान और ढेर सारे काम पर पड़ी।

मन की सारी खटास जैसे पल भर में धुल गई।

उन्होंने कहा—

“जो किया है, उसका फल तो भुगतना ही पड़ेगा। खैर, दूध देती हूँ। बच्चे को पिला दे। रात की रोटी पड़ी है, तू भी खा ले। और हाँ, घर की थोड़ी साफ-सफाई कर देगी तो दिन का खाना भी खा लेना। बोल, कर देगी?”

कमला का चेहरा खिल उठा।

थोड़ी ही देर में उसने घर को झाड़-पोंछकर चमका दिया। बरतन माँजकर किचन में करीने से सजा दिए।

चंद घंटों में ही कमला ने कमलाजी का मन जीत लिया।

शाम को जब कमला वहाँ से जाने लगी तो कमलाजी ने उसे रोक लिया।

“वैसे तो तुझ जैसी औरत को कोई भी अपने घर में घुसने नहीं देगा, लेकिन मैं तुझे एक मौका देना चाहती हूँ। मन हो तो मेरे यहाँ काम शुरू कर दे। डेढ़ सौ रुपये माहवार दूँगी। खाना और तेरे बच्चे के लिए दूध भी।”

इतना सुनते ही कमला सीधे कमलाजी के पैरों पर झुक गई।

इस प्रकार पूरी कॉलोनी में “कुलक्षिणी” के नाम से बदनाम कमला को कमलाजी के घर में काम मिल गया।

इसके लिए कमलाजी को कॉलोनी की औरतों के कई कटाक्ष भी सहने पड़े, लेकिन जरूरत के समय “गधे को भी बाप” मान लेने वाली कहावत का अर्थ कमलाजी अच्छी तरह समझती थीं।

कमला के घर में काम पर आने से रमण बाबू की गृहस्थी की गाड़ी फिर पहले की तरह चलने लगी।

लेकिन कमला का आना रमण बाबू के लिए किसी दूसरी परेशानी की शुरुआत भी था।

जब तक रमण बाबू घर में रहते, अपनी पत्नी, यहाँ तक कि अपनी बेटी की नजरों में भी संदिग्ध बने रहते।

धीरे-धीरे हालात ऐसे हो गए कि दिनभर में न जाने कितनी बार उन्हें कमला को लेकर कभी पत्नी की तो कभी बेटी की झिड़की सुननी पड़ती।

आखिर एक दिन अपने शयनकक्ष के एकांत में उन्होंने कमलाजी से पूछ ही लिया—

“मैं चरित्रहीन हूँ क्या? जब से यह कमला आई है, तुम और तुम्हारी बेटी मेरे पीछे हाथ धोकर क्यों पड़ी रहती हो?”

कमलाजी बोलीं—

“कमला के बारे में तो आप जानते ही हैं। आप ही बताइए, जिन घरों में वह पहले काम किया करती थी, उन घरों के मर्द कहीं से बदचलन दिखते थे? नहीं न? लेकिन कमला का संबंध उनमें से किसी न किसी से रहा ही होगा।”

रमण बाबू चुप रहे।

कमलाजी आगे बोलीं—

“मैं उस मर्द को भी दोष नहीं देती। असल में कमला है ही इतनी सुंदर कि उसे देखकर किसी भी मर्द का मन डोल जाए। इसीलिए आपको थोड़ा सचेत करती रहती हूँ। खैर, आपको बुरा लगता है तो अब से ऐसा नहीं करूँगी। पर आप खुद ही उससे थोड़ा दूर रहिएगा।”

कमला को रमण बाबू के घर में काम करते हुए लगभग एक वर्ष हो चुका था। इस बीच उसने एक दिन की भी छुट्टी नहीं की थी।

तभी एक दिन उसे मोहन से पता चला कि उसकी माँ गाँव में बीमार है।

माँ का हाल सुनते ही कमला की आँखों में आँसू आ गए। माँ के पास जाने के लिए उसका मन मचल उठा।

लेकिन तभी उसे अपने बच्चे का खयाल आ गया।

बच्चे के बारे में वह क्या कहेगी? समाज के लोग तो पूछ-पूछकर परेशान कर देंगे।

बहुत सोच-विचार के बाद उसने कमलाजी से सप्ताह भर की छुट्टी माँगी।

कमलाजी ने आश्चर्य से पूछा—

“क्या? एक सप्ताह?”

कमलाजी अभी आगे कुछ बोलतीं कि उनकी बेटी ने अपनी माँ को इशारे से बुलाया।

“मम्मी, जरा इधर तो आइए।”

उसने न जाने अपनी माँ के कान में क्या कहा कि कमलाजी लौटकर आईं तो उन्होंने सहर्ष कमला को गाँव जाने की अनुमति दे दी।

कमला के जाने के बाद कमलाजी ने अपने पति से कहा—

“कमला एक सप्ताह के लिए अपने गाँव जा रही है। अगर आप कहें तो हम लोग भी इस बीच पटना घूम आएँ। काफी दिन हो गए माँ-बाबूजी को देखे।”

रमण बाबू बोले—

“देखो, मैं तो नहीं जा सकूँगा। यहाँ मुझे कुछ जरूरी काम है। तुम चाहो तो बच्चों के साथ हो आओ।”

उसी रात कमलाजी दोनों बच्चों के साथ पटना के लिए रवाना हो गईं।

कमलाजी को गए अभी दूसरा ही दिन था कि अचानक रात में रमण बाबू को तेज बुखार, खाँसी और सिरदर्द ने घेर लिया।

सारी रात वह बुखार में तपते रहे।

सुबह भी बुखार कम नहीं हुआ। चाय की तलब जोर से लग रही थी, लेकिन उठकर चाय बनाने का साहस नहीं था।

वह हिम्मत जुटाकर बिस्तर से उठने ही वाले थे कि तभी दरवाजे पर दस्तक हुई।

उन्होंने किसी तरह उठकर दरवाजा खोला।

सामने कमला खड़ी थी।

वह चौंक पड़े।

कमला ने स्वयं ही कहा—

“बाबूजी, जब मैं गाँव पहुँची तो माँ एकदम ठीक हो गई थीं। फिर वहाँ रुककर क्या करती? यहाँ मालकिन को दिक्कत होती या नहीं, यही सोचकर चली आई।”

रमण बाबू ने कहा—

“पर यहाँ तो कोई है ही नहीं। सभी पटना गए हैं…”

उसी समय उन्हें जोर की खाँसी उठी और वह खाँसते-खाँसते सोफे पर बैठ गए।

कमला ने चिंतित होकर पूछा—

“तबीयत तो ठीक है, मालिक?”

उन्होंने कहा—

“देख न, कल रात से ही बुखार है। खाँसी और सिरदर्द भी है।”

कमला ने आगे बढ़कर उनके माथे पर अपनी हथेली रखी।

“बुखार तो काफी है, मालिक। कुछ दवा वगैरह ली आपने?”

रमण बाबू ने धीरे से कहा—

“एक कप चाय बना देगी?”

बस, फिर तो चाय क्या—कमला पूरी तरह उनकी सेवा में जुट गई।

रमण बाबू ने फोन करके डॉक्टर को बुला लिया। डॉक्टर ने जो दवाइयाँ लिखीं, कमला खुद भागकर ले आई।

डॉक्टर की हिदायत के अनुसार वह रमण बाबू के माथे पर ठंडे पानी की पट्टियाँ रखती रही। अपना खाना-पीना तक भूल गई। अपने बच्चे को भी तभी दूध पिलाती, जब वह भूख से रोने लगता।

दो ही दिनों में उसकी देखभाल से रमण बाबू काफी स्वस्थ हो गए।

लेकिन इसी दौरान रमण बाबू के मन में एक दूसरा ही विचार जन्म लेने लगा।

घर का एकांत और कमला की निकटता ने उनके मन को विचलित कर दिया।

उस रात घर का सारा काम निबटाने के बाद कमला बोली—

“अब मैं जाती हूँ, मालिक। मालकिन बुधवार की रात को आएँगी। मैं बृहस्पतिवार की सुबह आ जाऊँगी। आपकी तबीयत भी अब ठीक है।”

रमण बाबू ने अचानक कहा—

“अरे कहाँ! आज तो तबीयत पहले से भी ज्यादा खराब है।”

“जी?”

कमला चौंककर उनके पास आई और उनके माथे पर हथेली रख दी।

“नहीं, कहाँ है बुखार?”

वह उनके माथे से अपनी हथेली हटाती, उससे पहले ही रमण बाबू ने झपटकर उसकी कलाई पकड़ ली।

“तू भी कमाल की है। अंदर का बुखार कहीं ऊपर से पता चलता है?”

कमला एक पल में समझ गई कि उसके मालिक पर अब कौन-सा बुखार सवार है।

उसके चेहरे पर घृणा उभर आई।

उसने झटके से अपना हाथ छुड़ाया और बोली—

“छि: मालिक! आप भी?

आप मर्दों के लिए तो औरत अपनी जान भी दे दे, फिर भी वह आपके लिए इंसान नहीं, केवल मांस का एक टुकड़ा है!”

अपने बच्चे को उठाकर वह तेजी से बाहर निकल गई।

बृहस्पतिवार की सुबह कमला जल्दी-जल्दी तैयार होकर रमण बाबू के घर पहुँची।

कमलाजी की नजर उस पर पड़ी तो वह दाँत पीसती हुई बोलीं—

“आ गई महारानी? तुझ जैसी औरत पर भरोसा करके मैंने बहुत बड़ी भूल की।”

कमला समझ तो गई थी कि मालकिन क्यों नाराज हैं, फिर भी पूछ बैठी—

“मुझसे कोई भूल हो गई, मालकिन?”

“अरे बेशर्म! भूल पूछती है? अब बरबाद करने के लिए तुझे मेरा ही घर मिला था? माँ बीमार है, छुट्टी चाहिए…”

कमला ने हाथ जोड़कर कहा—

“माँ सचमुच बीमार थीं, मालकिन। लेकिन जब मैं वहाँ पहुँची तो वह ठीक हो चुकी थीं। वहाँ रुकने से कोई फायदा नहीं था। मेरे मन में यह भी था कि यहाँ आपको दिक्कत हो रही होगी। इसीलिए वापस चली आई। यहाँ आकर देखा तो मालिक बहुत बीमार थे। आप लोग भी नहीं थे…”

“बस! मौका मिल गया तुझे मर्द पटाने का!”

“यह क्या बोल रही हैं मालकिन? मैं तो लौट ही जाती। लेकिन मालिक को उस हालत में छोड़ना ठीक नहीं लगा। उन्हें कुछ हो जाता तो?”

“चुप! चुप बेशर्म!”

कमलाजी का क्रोध बढ़ता जा रहा था।

“बोल तो ऐसे रही है जैसे वह मालिक न हुए कुछ और हो गए तेरे!”

यह सुनते ही कमला के भीतर दबा हुआ दर्द जैसे फट पड़ा।

“बस, मालकिन! बस!”

उसकी आवाज काँप रही थी, लेकिन उसमें वर्षों का दर्द था।

“अगर मालिक को कुछ हो गया होता तो क्या कर लेतीं आप आकर? पति का दर्द क्या होता है, यह आप क्या समझेंगी? आपके माथे पर तो सिंदूर चमक रहा है न!”

कमलाजी चुप हो गईं।

कमला बोलती गई—

“मुझसे पूछिए कि मर्द के बिना औरत की जिंदगी क्या होती है। आपने मुझे कैसी-कैसी गालियाँ नहीं दीं! सिर्फ इसलिए कि आज मेरे पति का हाथ मेरे सिर पर नहीं है।”

उसकी आँखों से आँसू बहने लगे थे।

“आज अगर मेरा पति जिंदा होता और मैं छिपकर किसी गैर मर्द से भी यह बच्चा पैदा कर लेती, तब कोई मुझे कुछ नहीं कहता। लेकिन यह बच्चा, जिसे पूरी कॉलोनी मेरा पाप समझती है—इसमें भी मेरी कोई गलती नहीं है।”

वह कुछ क्षण रुकी, फिर बोली—

“हम औरतें तो होती ही कमजोर हैं। बताइए मालकिन, आप ही बताइए—अगर कोई गैर मर्द किसी औरत की इज्जत जबरन लूट ले, तो कुलटा वह मर्द हुआ या औरत?”

कमलाजी के पास कोई उत्तर नहीं था।

कमला की आवाज अब और भर्रा गई थी—

“लेकिन हमारे समाज में गलत सिर्फ औरत होती है।”

उसने आँसू पोंछे।

“मर्द लोग औरत को जो समझते हैं, सो समझते ही हैं। पर दुख तो इस बात का है कि औरतें भी औरत का मर्म नहीं समझतीं।”

कमलाजी अब पूरी तरह शांत थीं।

कमला बोली—

“अच्छा मालकिन, मेरी गलती माफ कीजिएगा। मैं समझ गई कि मेरा दाना-पानी यहाँ से भी उठ गया है। लेकिन मालकिन, मैंने तो अपना धर्म निभाया है। अब ऊपर वाला जो सजा देगा, भुगत लूँगी।”

इतना कहते-कहते कमला फफक पड़ी।

कमलाजी उसकी एक-एक बात सुनती रहीं।

धीरे-धीरे उन्हें भी लगने लगा था कि कमला कुछ गलत नहीं कह रही।

कमला ने आँसू पोंछे और कहा—

“अच्छा तो मालकिन, मैं जाती हूँ। कहा-सुना माफ कीजिएगा।”

वह जाने के लिए पलटी ही थी कि पीछे से कमलाजी की आवाज आई—

“अरे, इतनी जल्दी तो देखो! थोड़ा रहन-सहन और चाल-चलन के लिए टोक क्या दिया, लगी बोरिया-बिस्तर समेटने। मैंने तुझसे जाने के लिए तो नहीं कहा है।”

कमला ने पलटकर उनकी ओर देखा।

कमलाजी ने इस बार नरम आवाज में कहा—

“देख, मैं भी औरत हूँ। औरत के मर्म को समझती हूँ। मैंने तो सिर्फ यही कहा था कि अकेले मर्द के घर में तुझे नहीं जाना चाहिए था। खैर, छोड़। अच्छा यह बता—क्या सचमुच किसी ने तेरे साथ जबरदस्ती की थी? अगर की थी तो तू उसका नाम क्यों नहीं बता देती?”

कमला का चेहरा अचानक बेहद कातर हो उठा।

वह धीरे से बोली—

“उसका नाम बता दूँ तो मेरे माथे पर लगा दाग मिट जाएगा?”

वह कुछ पल चुप रही।

फिर बोली—

“मैं तो थाने-पुलिस भी कर देती, मालकिन। लेकिन अपनी गाँव की तारा को याद करके चुप हो गई।”

कमलाजी ध्यान से सुन रही थीं।

कमला ने कहा—

“मुखिया के बेटे ने तारा का वही हाल किया था जो मेरे साथ हुआ। उसने थाने में रिपोर्ट भी लिखवाई थी। पर हुआ क्या?”

उसकी आवाज काँपने लगी।

“रात भर तारा को ही थाने में बंद रहना पड़ा…”

वह आगे बोल नहीं पाई।

कुछ देर बाद उसने आँसू पोंछकर कहा—

“मुखिया का बेटा तो आज भी छाती तानकर घूम रहा है और बेचारी तारा को कुएँ में डूबकर अपनी जान देनी पड़ी।”

कमलाजी स्तब्ध थीं।

“मुझ पर ही लांछन लगाते कि सीधे-सादे मर्द को मैंने फँसा लिया। अच्छा मालकिन, बुरा तो लगेगा आपको… एक बात पूछूँ?”

“पूछ।”

“अगर आपके पीछे मालिक ने ही मेरे साथ बदसलूकी की होती और मैं आपसे कह देती, तो आप मुझे निकाल बाहर करतीं या मालिक को?”

कमलाजी चुप रहीं।

कमला ने स्वयं ही उत्तर दे दिया—

“मुझे ही न?”

उसकी आँखों में आँसू फिर भर आए।

“हाँ, दो-चार रोज मालिक से मुँह फुलाए रहतीं। फिर आप दोनों एक हो जाते… और मैं?”

वह अपनी बात पूरी न कर सकी।

फफक-फफककर रो पड़ी।

कमलाजी ने गौर से कमला के चेहरे को देखा।

कुछ देर तक वह उसे उसी तरह देखती रहीं।

जैसे पहली बार वह कमला को केवल एक नौकरानी के रूप में नहीं, बल्कि एक ऐसी औरत के रूप में देख रही थीं जिसने अकेले बहुत कुछ सहा था।

फिर जैसे उनका ध्यान टूटा।

उन्होंने धीमे स्वर में कहा—

“अच्छा, अब रोना-धोना छोड़। देख तो कितना समय हो गया है। सारे काम ज्यों के त्यों पड़े हैं।”

कमला ने उनकी ओर देखा।

कमलाजी ने कहा—

“चल, पहले नाश्ता कर ले। फिर दोनों मिलकर काम कर लेंगे।”

मालकिन के मुँह से इतना सुनना था कि एकबारगी कमला में फिर से फुर्ती आ गई।

उसने आँसू पोंछे और तेजी से रसोई की ओर बढ़ गई।

शायद उस दिन पहली बार किसी ने उसके दुख को समझने की कोशिश की थी।

और शायद उस दिन कमलाजी ने भी पहली बार जाना था—

औरत को समझने के लिए उसके चरित्र पर फैसला सुनाना नहीं, उसके दर्द को महसूस करना जरूरी है।

लेखक की बातयह कहानी किसी एक कमला की कहानी नहीं, बल्कि उन अनेक आवाज़ों की ओर संकेत करती है जिन्हें समाज अक्सर बिना पूरी सच्चाई जाने परख लेता है।

लेखक का प्रयास है कि हम किसी व्यक्ति के बारे में धारणा बनाने से पहले उसके संघर्ष और परिस्थितियों को समझने का प्रयास करें। विशेषकर स्त्री के चरित्र के संबंध में समाज के दोहरे मापदंडों पर विचार करना इस कहानी का केंद्रीय भाव है।

— SKGUPTA