उपनिषद in Hindi Spiritual Stories by GANESH TEWARI 'NESH' (NASH) books and stories PDF | शाट्यायनी उपनिषद

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शाट्यायनी उपनिषद

शाट्यायनी उपनिषद -- नीचे शुक्ल यजुर्वेदान्तर्गत शाट्यायनीय उपनिषद् का मूल संस्कृत पाठ क्रमशः दिया जा रहा है और प्रत्येक मंत्र/श्लोक के नीचे उसका सरल हिन्दी अर्थ है। उपलब्ध पाठ-स्रोत इसे संन्यास-उपनिषद् के रूप में वर्गीकृत करता है और इसमें कुल ३७ मंत्र हैं।॥ शाट्यायनीयोपनिषत् ॥मंगलाचरणशाट्यायनीब्रह्मविद्याखण्डाकारसुखाकृति ।यतिवृन्दहृदागारं रामचन्द्रपदं भजे।।अर्थ:मैं उन भगवान् श्रीरामचन्द्र के चरणों का भजन करता हूँ, जो शाट्यायनी ब्रह्मविद्या के अखण्ड आनन्दस्वरूप हैं और संन्यासियों के हृदय में निवास करते हैं। ॐ पूर्णमदः पूर्णमिदं पूर्णात्पूर्णमुदच्यते ।पूर्णस्य पूर्णमादाय पूर्णमेवावशिष्यते ॥अर्थ:वह परम ब्रह्म पूर्ण है और यह जगत् भी उसी पूर्ण ब्रह्म से प्रकट हुआ है। पूर्ण से पूर्ण की अभिव्यक्ति होने पर भी पूर्ण ही शेष रहता है।ॐ शान्तिः शान्तिः शान्तिः ॥हरिः ॐ ॥१--मन एव मनुष्याणां कारणं बन्धमोक्षयोः ।बन्धाय विषयासक्तं मुक्त्यै निर्विषयं स्मृतम् ॥ १॥अर्थ:मनुष्य के बन्धन और मोक्ष—दोनों का कारण मन ही है। विषयों में आसक्त मन बन्धन का कारण बनता है और विषयों से रहित मन मोक्ष का कारण माना गया है।२--समासक्तं सदा चित्तं जन्तोर्विषयगोचरे ।यद्येवं ब्रह्मणि स्यात्तत्को न मुच्येत बन्धनात् ॥ २॥अर्थ:जीव का चित्त यदि सदा विषयों में लगा रहता है तो वह बन्धन में रहता है। यदि वही चित्त ब्रह्म में लग जाए, तो फिर कौन बन्धन से मुक्त न हो जाएगा?३--वित्तमेव हि संसारस्तत्प्रयत्नेन शोधयेत् ।यच्चित्तस्तन्मयो भवति गुह्यमेतत्सनातनम् ॥ ३॥अर्थ:वित्त अर्थात् चित्त ही संसार का मूल है; इसलिए प्रयत्नपूर्वक चित्त को शुद्ध करना चाहिए। जिसका चित्त जिस वस्तु में लगा रहता है, मनुष्य उसी के स्वरूप का हो जाता है। यह सनातन और गूढ़ सत्य है।४--नावेदविन्मनुते तं बृहन्तंनाब्रह्मवित्परमं प्रैति धाम ।विष्णुक्रान्तं वासुदेवं विजान-न्विप्रो विप्रत्वं गच्छते तत्त्वदर्शी ॥ अर्थ:जो वेद को नहीं जानता, वह उस महान् परम सत्य को नहीं समझ सकता और जो ब्रह्म को नहीं जानता, वह परम धाम को प्राप्त नहीं होता। जो सर्वव्यापक वासुदेव को जान लेता है, वही तत्त्वदर्शी ब्राह्मण अपने वास्तविक ब्राह्मणत्व को प्राप्त करता है। ५--अथाह यत्परमं ब्रह्म सनातनंये श्रोत्रिया अकामहता अधीयुः ।शान्तो दान्त उपरतिस्तितिक्षुहु-र्योऽनूचानो ह्यभिजज्ञौ समानः ॥ अर्थ:सनातन परम ब्रह्म का ज्ञान वे लोग प्राप्त करते हैं जो शास्त्रों के ज्ञाता हैं, कामनाओं से आहत नहीं हैं, शान्त हैं, इन्द्रिय-संयमी हैं, विषयों से उपरत हैं और सुख-दुःख आदि द्वन्द्वों को सहन करने वाले हैं।६--त्यक्तेषणो ह्यनृणस्तं विदित्वामौनी वसेदाश्रमे यत्र कुत्र ।अथाश्रमं चरमं सम्प्रविश्ययथोपपत्तिं पञ्चमात्रां दधानः ॥ अर्थ:समस्त सांसारिक इच्छाओं को त्यागकर और ऋणों से मुक्त होकर उस परम सत्य को जानने वाला मुनि जहाँ उचित हो वहाँ निवास करे। अन्तिम आश्रम अर्थात् संन्यास में प्रवेश करके अपनी आवश्यकता के अनुसार जीवन-निर्वाह के साधन रखे।७--त्रिदण्डमुपवीतं च वासः कौपीनवेष्टनम् ।शिक्यं पवित्रमित्येतद्विभृयाद्यावदायुषम् ॥ ७॥अर्थ:संन्यासी त्रिदण्ड, यज्ञोपवीत, वस्त्र, कौपीन, शिक्य और पवित्र आदि आवश्यक वस्तुएँ जीवनपर्यन्त धारण करे।८--पञ्चैतास्तु यतेर्मात्रास्ता मात्रा ब्रह्मणे श्रुताः ।न त्यजेद्यावदुत्क्रान्तिरन्तेऽपि निखनेत्सह ॥ ८॥अर्थ:ये पाँच वस्तुएँ संन्यासी के जीवन-निर्वाह की आवश्यक मात्राएँ कही गई हैं और ब्रह्मविद्या की परम्परा में उनका उल्लेख है। जीवन के अन्त तक इन्हें न छोड़े; मृत्यु के समय इन्हें शरीर के साथ ही त्याग दे।९--विष्णुलिङ्गं द्विधा प्रोक्तं व्यक्तमव्यक्तमेव च ।तयोरेकमपि त्यक्त्वा पतत्येव न संशयः ॥ ९॥अर्थ:विष्णु का लिङ्ग दो प्रकार का कहा गया है—व्यक्त और अव्यक्त। इनमें से किसी एक को भी त्यागने पर साधक के पतन की बात कही गई है।१०-=त्रिदण्डं वैष्णवं लिङ्गं विप्राणां मुक्तिसाधनम् ।निर्वाणं सर्वधर्माणामिति वेदानुशासनम् ॥ १०॥अर्थ:त्रिदण्ड वैष्णव संन्यास का चिह्न है और ब्राह्मण के लिए मुक्ति का साधन माना गया है। समस्त धर्मों का परम लक्ष्य निर्वाण है—ऐसा वेद का उपदेश है।११--अथ खलु सौम्य कुटीचको बहूदको हंसः परमहंसइत्येते परिव्राजकाश्चतुर्विधा भवन्ति । सर्व एते विष्णुलिङ्गिनःशिखिनोपवीतिनः शुद्धचित्ता आत्मानमात्मना ब्रह्मभावयन्तः शुद्धचिद्रूपोपासनरता जपयमवन्तोनियमवन्तः सुशीलिनः पुण्यश्लोका भवन्ति । तदेतदृचाभ्युक्तम् ।कुटीचको बहूदकश्चापि हंसःपरमहंस इव वृत्त्या च भिन्नाः ।सर्व एते विष्णुलिङ्गं दधानावृत्त्या व्यक्तं बहिरन्तश्च नित्यम् ।पञ्चयज्ञा वेदशिरःप्रविष्टाःक्रियावन्तोऽमी सङ्गता ब्रह्मविद्याम् ।त्यक्त्वा वृक्षं वृक्षमूलं श्रितासःसंन्यस्तपुष्पा रसमेवाश्नुवानाः ।विष्णुक्रीडा विष्णुरतयो विमुक्ताविष्ण्वात्मका विष्णुमेवापियन्ति अर्थ:हे सौम्य! परिव्राजक संन्यासियों के चार प्रकार बताए गए हैं—कुटीचक, बहूदक, हंस और परमहंस। ये सभी विष्णु के चिह्न धारण करने वाले, शिखा और यज्ञोपवीत से युक्त, शुद्धचित्त, आत्मा को आत्मा द्वारा ब्रह्मरूप में चिन्तन करने वाले, उपासना, जप, संयम और सदाचार में लगे हुए होते हैं।इनके बाहरी आचरण भिन्न हो सकते हैं, परन्तु इनका लक्ष्य ब्रह्मविद्या है। वृक्ष के नीचे अथवा उसके मूल में निवास करते हुए, संसार के बाहरी आकर्षणों को छोड़कर वे परम सत्य के आनन्द का अनुभव करते हैं और अन्ततः विष्णुस्वरूप परमात्मा में ही लीन होते हैं। १२--त्रिसन्ध्यं शक्तितः स्नानं तर्पणं मार्जनं तथा ।उपस्थानं पञ्चयज्ञान्कुर्यादामरणान्तिकम् ॥ १२॥अर्थ:सामर्थ्य के अनुसार तीनों सन्ध्याओं में स्नान, तर्पण, मार्जन और उपस्थान तथा पाँच यज्ञ जीवन के अन्त तक करने चाहिए।१३--दशभिः प्रणवैः सप्तव्याहृतिभिश्चतुष्पदा ।गायत्रीजपयज्ञश्च त्रिसन्ध्यं शिरसा सह ॥ १३॥अर्थ:तीनों सन्ध्याओं में प्रणव (ॐ), सात व्याहृतियों और चार पदों वाली गायत्री के जप का यज्ञ श्रद्धापूर्वक करना चाहिए।१४--योगयज्ञः सदैकाग्रभक्त्या सेवा हरेर्गुरोः ।अहिंसा तु तपोयज्ञो वाङ्मनःकायकर्मभिः ॥ १४॥अर्थ:मन को सदा एकाग्र करके किया गया साधन योगयज्ञ है। भगवान् और गुरु की सेवा भी साधना है। वाणी, मन और शरीर से अहिंसा का पालन तपोयज्ञ है।१५-/नानोपनिषदभ्यासः स्वाध्यायो यज्ञ ईरितः ।ॐइत्यात्मानमव्यग्रो ब्रह्मण्यग्ना जुहोति यत् ॥ १५॥अर्थ:विभिन्न उपनिषदों का अध्ययन स्वाध्याय-यज्ञ कहा गया है। जो साधक एकाग्र होकर ‘ॐ’ के द्वारा अपने आत्मभाव को ब्रह्मरूपी अग्नि में अर्पित करता है, वह श्रेष्ठ साधना करता है।१६--ज्ञानयज्ञः स विज्ञेयः सर्वयज्ञोत्तमोत्तमः ।ज्ञानदण्डा ज्ञानशिखा ज्ञानयज्ञोपवीतिनः ॥ १६॥अर्थ:ज्ञानयज्ञ को सभी यज्ञों में श्रेष्ठतम समझना चाहिए। ज्ञानी के लिए ज्ञान ही दण्ड है, ज्ञान ही शिखा है और ज्ञान ही यज्ञोपवीत है।१७--शिखा ज्ञानमयी यस्य उपवीतं च तन्मयम् ।ब्राह्मण्यं सकलं तस्य इति वेदानुशासनम् ॥ १७॥अर्थ:जिसकी शिखा और यज्ञोपवीत ज्ञानमय हैं, उसका सम्पूर्ण जीवन ब्राह्मणत्व से परिपूर्ण है—ऐसा वेद का उपदेश है। १८--अथ खलु सौम्येत परिव्राजका यथा प्रादुर्भवन्तितथा भवन्ति । कामक्रोधलोभमोहदम्भदर्पासूया-ममत्वाहङ्कारादींस्तितीर्य मानावमानौ निन्दास्तुतीच वर्जयित्वा वृक्ष इव तिष्ठासेत् । छिद्यमानो नब्रूयात् । तदैवं विद्वांस इहैवामृता भवन्ति । तदेतदृचाभ्युक्तम् ।बन्धुपुत्रमनुमोदयित्वा-नवेक्ष्यमाणो द्वन्द्वसहः प्रशान्तः ।प्राचीमुदीचिं वा निर्वर्तयंश्चरेतपात्री दण्डी युगमात्रावलोकी ।शिखी मुण्डी चोपवीती कुटुम्बीयात्रामात्रं प्रतिगृह्णन्मनुष्यात् ॥ अर्थ:परिव्राजक को काम, क्रोध, लोभ, मोह, दम्भ, दर्प, ईर्ष्या, ममता और अहंकार आदि को पार करना चाहिए। मान-अपमान, निन्दा-स्तुति आदि द्वन्द्वों को छोड़कर वृक्ष के समान स्थिर रहना चाहिए। कोई उसे काटे तब भी उसे कटु वचन नहीं कहना चाहिए। ऐसा ज्ञानी इसी जीवन में अमृतत्व को प्राप्त होता है।वह सम्बन्धियों से अनुमति लेकर, द्वन्द्वों को सहन करता हुआ और शान्तचित्त होकर जीवन व्यतीत करे। वह आवश्यकता भर ही भिक्षा ग्रहण करे।१९--अयाचितं याचितं वोत भैक्षंमृद्दार्वलाबूफलपर्णपात्रम् ।क्षीणं क्षौमं तृणं कन्थाजिने च पर्ण-माच्छादनं स्यादहतं वा विमुक्तः ॥अर्थ:संन्यासी बिना माँगे या माँगकर प्राप्त हुई भिक्षा से जीवन चला सकता है। मिट्टी, लकड़ी, लौकी, फल या पत्ते के पात्र का उपयोग कर सकता है। पुराने वस्त्र, तृण, कन्था, मृगचर्म या पत्तों आदि से शरीर ढक सकता है। उसका जीवन सादगी और आवश्यकता-भर की वस्तुओं पर आधारित होना चाहिए।२०--ऋतुसन्धौ मुण्डयेन्मुण्डमात्रंनाधो नाक्षं जातु शिखां न वापयेत् चतुरो मासान्ध्रुवशीलतः स्या-त्स यावत्सुप्तोऽन्तरात्मा पुरुषो विश्वरूपः ।अन्यानथाष्टौ पुनरुत्थितेऽस्मि-न्स्वकर्मलिप्सुर्विहरेद्वा वसेद्वा ॥ अर्थ:ऋतु के परिवर्तन पर संन्यासी सिर का मुण्डन कराए। निर्धारित संन्यास-विधि के अनुसार शिखा आदि के विषय में नियमों का पालन करे। वर्षा ऋतु में चार मास एक स्थान पर स्थिर रहना और शेष समय अपनी साधना के अनुसार विचरण या निवास करना बताया गया है।२१--देवाग्न्यगारे तरुमूले गुहायांवसेदसङ्गोऽलक्षितशीलवृत्तः ।अनिन्धनो ज्योतिरिवोपशान्तोन चोद्विजेदुद्विजेद्यत्र कुत्र ॥ २१॥अर्थ:संन्यासी देवालय, अग्निशाला, वृक्ष के नीचे अथवा गुफा में आसक्तिरहित होकर रहे। उसका आचरण सरल और दिखावे से रहित हो। बिना ईंधन की शान्त अग्नि की तरह वह शान्त रहे और किसी स्थान पर भयभीत न हो।22--आत्मानं चेद्विजानीयादयमस्मीति पूरुषः ।किमिच्छन्कस्य कामाय शरीरमनुसंज्वरेत् ॥ २२॥अर्थ:यदि मनुष्य जान ले कि “मैं यह आत्मा हूँ”, तो फिर वह किस इच्छा के लिए और किसके भोग के लिए शरीर को कष्ट देगा?२३--तमेव धीरो विज्ञाय प्रज्ञां कुर्वीत ब्राह्मणः ।नानुध्यायाद्बहूञ्छब्दान्वाचो विग्लापनं हि तत् ॥ २३॥अर्थ:धीर पुरुष उस आत्मतत्त्व को जानकर उसी में अपनी बुद्धि को स्थिर करे। बहुत-से शब्दों और विवादों में उलझकर वाणी को व्यर्थ थकाना उचित नहीं है।२४--बाल्येनैव हि तिष्ठासेन्निर्विद्य ब्रह्मवेदनम् ।ब्रह्मविद्या च बाल्यं च निर्विद्य मुनिरात्मवान् ॥ २४॥अर्थ:ब्रह्मज्ञान प्राप्त करने के बाद साधक बालक के समान सरल और निष्कपट रहे। ब्रह्मविद्या और बाल्यभाव—दोनों को आत्मसात् करके वह आत्मवान् मुनि बनता है।२५--यदा सर्वे प्रमुच्यन्ते कामा येऽस्य हृदि श्रिताः ।अथ मर्त्योऽमृतो भवत्यत्र ब्रह्म समश्नुते ॥ २५॥अर्थ:जब मनुष्य के हृदय में स्थित सभी कामनाएँ पूर्णतः समाप्त हो जाती हैं, तब वह मर्त्य होकर भी अमृतस्वरूप हो जाता है और इसी जीवन में ब्रह्म का अनुभव करता है। २६--अथ खलु सौम्येदं परिव्राज्यं नैष्ठिकमात्मधर्मंयो विजहाति स वीरहा भवति । स ब्रह्महा भवति । स भ्रूणहाभवति । स महापातकी भवति । य इमां वैष्णवीं निष्ठांपरित्यज्यति । स स्तेनो भवति । स गुरुतल्पगो भवति । स मित्रध्रुग्भवति ।स कृतघ्नो भवति । स सर्वस्माल्लोकात्प्रच्युतो भवति ।तदेतदृचाभ्युक्तम् ।स्तेनः सुरापो गुरुतल्पगामीमित्रध्रुगेते निष्कृतेर्यान्ति शुद्धिम् ।व्यक्तमव्यक्तं वा विधृतं विष्णुलिङ्गंत्यजन्न शुद्ध्येदखिलैरात्मभासा ॥ अर्थ:हे सौम्य! यह परिव्राजक-धर्म और आत्मधर्म अत्यन्त निष्ठापूर्वक पालन करने योग्य है। जो इसे जान-बूझकर छोड़ देता है, उसके लिए उपनिषद् अत्यन्त कठोर चेतावनी देता है। विभिन्न पापों से प्रायश्चित्त द्वारा शुद्धि सम्भव कही गई है, परन्तु विष्णु-निष्ठा और संन्यास-धर्म को त्यागने वाले के लिए आत्मज्ञान से ही शुद्धि का मार्ग बताया गया है।२७--त्यक्त्वा विष्णोर्लिङ्गमन्तर्बहिर्वायः स्वाश्रमं सेवतेऽनाश्रमं वा ।प्रत्यपत्तिं भजते वातिमूढोनैषां गतिः कल्पकोट्यापि दृष्टा ॥ अर्थ:जो विष्णु के बाहरी अथवा आन्तरिक चिह्न और निष्ठा को त्यागकर अपने पूर्वाश्रम या अनाश्रम जीवन में लौटता है, उसे उपनिषद् अत्यन्त अनुचित और अज्ञानपूर्ण आचरण बताता है।२८--त्यक्त्वा सर्वाश्रमान्धीरो वसेन्मोक्षाश्रमे चिरम् ।मोक्षाश्रमात्परिभ्रष्टो न गतिस्तस्य विद्यते ॥ २८॥अर्थ:धीर पुरुष सभी सांसारिक आश्रम-बंधन छोड़कर मोक्षाश्रम में स्थित रहे। मोक्ष के इस मार्ग से पतित होने पर उसकी आध्यात्मिक गति बाधित होती है।२९--पारिव्राज्यं गृहीत्वा तु यः स्वधर्मे न तिष्ठति ।तमारूढच्युतं विद्यादिति वेदानुशासनम् ॥ २९॥अर्थ:जो संन्यास स्वीकार करने के बाद अपने संन्यास-धर्म में स्थित नहीं रहता, उसे अपने स्वीकार किए हुए मार्ग से गिरा हुआ समझना चाहिए—ऐसा वेद का उपदेश है।३०--अथ खलु सौम्येमं सनातनमात्मधर्मं वैष्णवींनिष्ठां लब्ध्वा यस्तामदूषयन्वर्तते स वशी भवति ।स पुण्यश्लोको भवति । स लोकज्ञो भवति । स वेदान्तज्ञो भवति ।स ब्रह्मज्ञो भवति । स सर्वज्ञो भवति । स स्वराड् भवति ।स परं ब्रह्म भगवन्तमाप्नोति । स पितॄन्सम्बन्धिनोबान्धवान्सुहृदो मित्राणि च भवादुत्तरयति । तदेतदृचाभ्युक्तम् शतं कुलानां प्रथमं बभूवतथा पराणां त्रिशतं समग्रम् ।एते भवन्ति सुकृतस्य लोकेयेषं कुले संन्यसतीह विद्वान् ॥ अर्थ:जो सनातन आत्मधर्म और वैष्णवी निष्ठा को प्राप्त करके उसका निष्कलंक पालन करता है, वह संयमी और पुण्यवान् होता है। वह लोक और वेदान्त को जानने वाला, ब्रह्मज्ञानी तथा अन्ततः परम ब्रह्म को प्राप्त करने वाला कहा गया है। उसके संन्यास से उसके कुल और सम्बन्धियों के उद्धार का भी वर्णन किया गया है।३१--त्रिंशत्परास्त्रिंशदपरांस्त्रिंशच्च परतः परान् ।उत्तरयति धर्मिष्ठः परिव्राडिति वै श्रुतिः ॥ ३१॥अर्थ:श्रुति में कहा गया है कि धर्मनिष्ठ परिव्राजक अपने पूर्वजों और आगे आने वाली पीढ़ियों का भी कल्याण करता है।३२--संयस्तमिति यो ब्रूयात्कण्ठस्थप्राणवानपि ।तारिताः पितरस्तेन इति वेदानुशासनम् ॥ ३२॥अर्थ:जो व्यक्ति संन्यास के वास्तविक धर्म को समझकर उसका पालन करता है, उसके द्वारा उसके पितरों के उद्धार की बात वेद के उपदेश में कही गई है।३३--अथ खलु सौम्येमं सनातनमात्मधर्मं वैष्णवींनिष्ठां नासमाप्य प्रब्रूयात् । नानूचानायनानात्मविदे नावीतरागाय नाविशुद्धाय नानुपसन्नायनाप्रयतमानसायेति ह स्माहुः । तदेतदृचाभ्युक्तम् ।विद्या ह वै ब्राह्मणमाजगामगोपाय मां शेवधिष्टेऽहमस्मि ।असूयकायानृजवे शठायमा मा ब्रूया वीर्यवती तथा स्याम् ॥ ३३॥अर्थ:--हे सौम्य! इस सनातन आत्मधर्म और वैष्णवी निष्ठा का उपदेश ऐसे व्यक्ति को नहीं देना चाहिए जो इसके योग्य न हो—जो शास्त्र-अध्ययन से रहित हो, आत्मतत्त्व को न जानता हो, वैराग्यहीन, अशुद्ध, गुरु के समीप समर्पित न हुआ हो अथवा जिसका मन संयमित न हो।विद्या स्वयं मानो ब्राह्मण से कहती है—“मेरी रक्षा करो; मैं अमूल्य निधि हूँ। मुझे ईर्ष्यालु, कपटी और असत्याचारी व्यक्ति को मत देना, अन्यथा मेरी शक्ति का दुरुपयोग हो सकता है।”३४--यमेव विद्याश्रुतमप्रमत्तंमेधाविनं ब्रह्मचर्योपपन्नम् ।अस्मा इमामुपसन्नाय सम्यक्परीक्ष्य दद्याद्वैष्णवीमात्मनिष्ठाम् अर्थ:इस आत्मविद्या को उसी योग्य शिष्य को देना चाहिए जो विद्या और शास्त्र का ज्ञाता हो, सावधान, बुद्धिमान और ब्रह्मचर्य-संयम से युक्त हो तथा गुरु के समीप श्रद्धापूर्वक आया हो। पहले उसकी परीक्षा करके ही उसे यह आत्मनिष्ठा प्रदान करनी चाहिए।३५--अध्यापिता ये गुरुं नाद्रियन्तेविप्रा वाचा मनसा कर्मणा वा ।यथैव तेन न गुरुर्भोजनीय-स्तथैव चानं न भुनक्ति श्रुतं तत् ॥अर्थ:जो शिष्य गुरु से शिक्षा प्राप्त करने के बाद वाणी, मन या कर्म से गुरु का सम्मान नहीं करते, उनके विषय में कहा गया है कि जैसे उन्होंने गुरु का सम्मान नहीं किया, वैसे ही गुरु भी उनके द्वारा दिए गए अन्न को ग्रहण नहीं करता।३६--गुरुरेव परो धर्मो गुरुरेव परा गतिः ।एकाक्षरप्रदातारं यो गुरुं नाभिनन्दति ।तस्य श्रुतं तथा ज्ञानं स्रवत्यामघटाम्बुवत् ॥ ३६॥अर्थ:गुरु ही परम धर्म है और गुरु ही परम गति का मार्ग है। जो गुरु से एक अक्षर का भी ज्ञान प्राप्त करके उसका सम्मान नहीं करता, उसका सुना हुआ ज्ञान ऐसे बह जाता है जैसे छेदयुक्त घड़े से पानी बह जाता है।३७--यस्य देवे परा भक्तिर्यथा देवे तथा गुरौ ।स ब्रह्मवित्परं प्रेयादिति वेदानुशासनम् ॥ ३७॥अर्थ:जिस साधक की परम भक्ति परमात्मा में है और जैसी भक्ति परमात्मा में है वैसी ही गुरु में भी है, वह ब्रह्म को जानने वाला होकर परम सत्य को प्राप्त करता है—ऐसा वेद का उपदेश है। उपनिषद् का समापनइत्युपनिषत् ॥ॐ पूर्णमदः पूर्णमिदं पूर्णात्पूर्णमुदच्यते ।पूर्णस्य पूर्णमादाय पूर्णमेवावशिष्यते ॥ॐ शान्तिः शान्तिः शान्तिः ॥हरिः ॐ तत्सत् ॥इति शाट्यायनीयोपनिषत्समाप्ता संक्षेप में इसका मुख्य संदेश: शाट्यायनी उपनिषद् मन की शुद्धि, विषय-वैराग्य, ब्रह्मज्ञान, संन्यास-धर्म, गुरु-भक्ति और आत्मसाक्षात्कार को एक-दूसरे से जोड़ता है। विशेष रूप से “मन एव मनुष्याणां कारणं बन्धमोक्षयोः” (१) और “यदा सर्वे प्रमुच्यन्ते कामाः...” (२५) इसके केंद्रीय शिक्षाओं को स्पष्ट करते हैं।------×------×------×------×-----