यादों की सहेलगाह - रंजन कुमार देसाई in Hindi Fiction Stories by Ramesh Desai books and stories PDF | यादों की सहेलगाह - रंजन कुमार देसाई

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यादों की सहेलगाह - रंजन कुमार देसाई

                       : प्रकरण -6 : 

तब मैं जूनियर बी ए में पढता था. कोलेज का पहला सत्र शुरू हुआ था. उस वक़्त बारिश भी शुरू हो गईं थी. इस स्थिति में मेरे पिताजी मेरे लिये नया छाता खरीद लाये थे.सत्र शुरू हो चूका था. एक सप्ताह भी बीत गया था.और मैं अपना नया छाता लेकर कोलेज गया था. रिशेष के दौरान मैं अपना नया छाता बेंच के पीछे लटका कर दोस्तों के साथ चाय नास्ता करने के लिए कैंटीन में गया था. वापस आकर देखा तो मेरा छाता अपनी जगह पर नहीं था. इस बात से मानो मेरे होंश उड़ गये थे. मेरे मुंह से निकल गया था." हे भगवान मेरा छाता कहाँ चला गया? "तब मेरी आगे की बेंच पऱ बैठी लड़की की आवाज मेरे कानो से टकराई थी." क्या यह छाता आप का हैं? उस के हाथो में मेरा छाता था. यह देखकर मेरे होंश संभले थे.मैंने ' हां कहकर छाता अपने हाथो में लेकर उस का शुक्रिया अदा कर के अपनी बेंच के पीछे ऱख दिया था.रिशेष के पहले हम अगली बेंच पर बैठे थे क्यों की वह खाली थी. उस पर हम जैसी लड़कियां बैठती थी जिन्होंने साइकोलॉजी विषय लिया था उस के लिये दूसरे कक्ष में बैठना होता था.इस वजह से यह तनाव पैदा हुआ था.उस को देखकर ना जाने पहली नजर में मुझे उस से कुछ लगाव हो गया था. और मैंने ठान लिया था. अब की बार मैं पीछे नहीं हटूँगा. मैं उस का नाम जानना चाहता था. लेकिन सीधे सीधे उस को पुछने की हिम्मत जता नहीं पाया था. उस लिये मैंने कहां था." एक्सक्यूज़ मी! "उस ने पीछे मुंह कर के सवाल किया था." हा! कहिये क्या बात हैं? "" क्या आप सभी विषयो की नोट्स लिखती हो? "" सभी तो नहीं केवल साइकोलॉजी की.. वह मेरा फेवरिट विषय हैं.. "" वाह! कैसा इत्तेफ़ाक़ हैं. मुझे भी यह विषय बेहद पसंद था. लेकिन दोस्तों की तरह मैंने पोलिटिकल सायन्स चुनने की गलती की हैं .""फिर भी मुझे साइकोलॉजी से बहुत लगाव हैं. क्या आप अपनी नोट्स मुझ से शेयर कर सकती हो ? "" स्योर! अभी ले लो. आज फ्राइडे हैं. मुझे मन डे को लौटा देना. "" ओ के. " कहकर मैंने उस की नोट बुक मेरे हस्तक ले ली थी.और तुरंत ही नोट बुक का पहला पन्ना खोलकर देखा था.' गरिमा देसाई. 'उस का नाम पढ़कर मेरा पहला मिशन पूरा हो गया था.. वह भी मेरी बिरादरी से थी. जिसने मुझे आगे बढ़ने को उत्साहित किया था.उस ने मेरी जिंदगी में कदम रखकर मुझे काफ़ी बदल दिया था.मैं नकारात्मक माहौल में जी रहा था.. सब कुछ गलत सोचता था.. लेकिन गरिमा से मिलकर मानो सचमुच एक बड़ा चमत्कार हुआ था. और रातो रात मैं सकारात्मक बन गया था. अपने को सर्व गुण संपन्न मानने को उतारू हो गया था.. गरिमा की उपस्थिति ने सचमुच बहुत चमत्कार किया था.मैं अपने आप की सुपर स्टार, भगवान में गिनती करने लगा था. एक ही रात में मुकेश, मोहमद रफी, मन्ना डे, हेमंत कुमार.. के एल सईगल इत्यादि से आगे बढ़ गया था. मेरे गले में मानो सब की आवाजे बस गईं थी.उस वक़्त हेमंत कुमार की आवाज पूरी तरह मेरे भीतर समा गईं थी.या दिल की सुनो दुनिया वालों या मुझ को अभी चुप रहने दो मैं गम को खुशी कैसे कह दूं?जो कहते हैं उन को कहने दो यह गीत मेरे दिलो दिमाग़, नसे नस में पूरी तरह बस चूका था.गीत का टोन नकारात्मक था. लेकिन मैंने उसे सकारात्मक भाषा का लिबाश पहनाया था.या दिल की सुनो दुनिया वालों या मुझ को अभी कुछ कहने दो मैं ख़ुशी को गम कैसे कह दू जो कहते हैं उस को कहने दो ' अनुपमा ' फ़िल्म मेरी फेवरिट फ़िल्म साबित हुई थी.गीत के अंत में हेमंत कुमार कहते हैं.इतना तो किसी में दर्द नहींवह दर्द नहीं हैं खुशी की हैं ड़गररोते हुए आंसू और बहे अबखुशी को होठों पर आने दोइतना ही नहीं क्रिकेट में भी अपने आप को सब से बड़ा खिलाडी मानने लगा था. हमारे देश में वेस्ट इण्डिज, ऑस्ट्रेलिया जैसे बड़े फ़ास्ट बोलर नहीं थे. उस वक़्त मुझ में सब से बड़ा बोलर होने का गरूर आ गया था.मैंने अपना नया रूप श्याम के सामने पैश किया था. मैंने सभी आवाजो का नमूना उस के सामने पैश किया था. सुनकर उस ने मेरी तारीफ के पुल बांधे थे. और मैं हवामे उड़ने लगा था.मैं गरिमा के साथ आगे बढ़ना चाहता था. लेकिन उस ने कभी सामने से मुझ को बुलाया नहीं था. फिर भी हर एक इम्तेहान में दूसरे रूम में सीट होते हुए भी वह मेरे रूम से गुजरकर पहले पेपर में मुझे विश करती थी.मैंने गरिमा के लिये फुटपाथ से साइकोलॉजी की एक जूनी किताब खरीदकर उसे दी थी. उस पर उस ने मेरा शुक्रिया अदा किया था.उस समय अनुराग मेरा खास दोस्त था. मैंने उसे अपने दिल की बात सुनाई थी. और उस ने मुझे कहां था. उस से मुझे बुरा झटका लगा था." गरिमा की सगाई हो गईं हैं. उस की कुछ दिन बाद छुट्टी में शादी भी होने वाली हैं. "उस हालत में पीछे हटने के सिवा मेरे पास कोई विकल्प नहीं था. यह तीसरी बार मैने प्यार मैं नाकामी हासिल की थी जो मेरी बर्दास्त के बाहर थी.अनुराग के साथ मेरे ओर दोस्त थे.. जो मेरे दोस्त होने का दावा करते थे. लेकिन मुझे कोई काम नहीं आये थे.उस समय श्याम ने भी उन सब के खिलाफ भड़काया था." वह लोग तुम्हारे सही मायने में दोस्त नहीं हैं. उन से बचकर रहना. "श्याम की इस जानकारी ने यह खबर झूठी होने का मेरे दिल में संदेह जगाया था.और मैं जिद पर उतर आया था. " गरिमा को बुलाओ. मेरे सामने लाओ. "मैंने रोते बिलखते हुए अनन्या के गले लिपटकर उसे बिनती की थी." अब तो तुम सचमुच मेरी बहन हो. जाओ गरिमा को बुला लाओ. "लेकिन वह खुद लाचार थी, वह पेटसे थी.उस समय अनुराग अपने दो दोस्त को लेकर, कोलेज क्लर्क से गरिमा का पता लेकर उस के घर पहुंचा था.लेकिन वहाँ का माहौल देखकर वह बेज़ुबान हो गये थे. उस वक़्त.. ? 0000000000000 ( क्रमशः): : प्रकरण - 7::उस वक़्त गरिमा कुछ काम से बाहर आई थी. वह अनुराग को पहचानती थी. उस के पूछने पर अनुराग के दोस्त ने सारी परिस्थिति समझाई थी.और उस ने फोन पर मुझ से बात की थी.जिस से मैं अपना आपा खो बैठा था. मैंने कुछ अनाप