यादों की सहेलगाह - रंजन कुमार देसाई in Hindi Fiction Stories by Ramesh Desai books and stories PDF | यादों की सहेलगाह - रंजन कुमार देसाई

Featured Books
Categories
Share

यादों की सहेलगाह - रंजन कुमार देसाई

                        : प्रकरण 13 :

" कीसी ! तुम मुझे राखी बांधोगी? "

उस की बिरादरी में यह त्यौहार मनाया नहीं जाता था. फिर भी उस ने मेरा प्रस्ताव ख़ुशी ख़ुशी कबूल कर लिया था.

लेकिन उस ने एक शर्त रखी थी.

" मैं यक़ीनन हर साल आप को राखी बांधूगी. लेकिन इस बार आप को मेरे घर आना होगा. "

और दूसरे दिन छुट्टी भी थी. और मैं राखी बंधवाने के लिये तैयार हो गया था.

और दूसरे दिन उस के घर भी गया था.

लेकिन उस के घर में ताला लगा हुआ था . उसे देखकर मेरे चेहरे पर मायूसी छा गई थी.

पड़ोसी को पूछने पर मालूम हुआ था.

" फ्लोरा की तबियत ठीक नहीं हैं, उस लिये उस का पति उसे मा के घर ले गया हैं. "

मैं उस के घर गया था. उस की मा ने मेरा आदर सत्कार किया था. मुझे चाय भी पिलाई थी. और सहज भाव से घर आने की वजह पूछी थी.

मैंने उन्हें बताया था : " आज रक्षाबंधन हैं, मैं फ्लोरा से राखी बंधवाने आया था.. उस के लिये उस के घर भी गया था. वहाँ से खबर मिली तो यहाँ आ गया. "

" लेकिन आज बुधवार हैं. नोवीना का दिन हैं, वह अभी तो शायद डोक्टर के पास गई होगी. लेकिन उस के पहले मौसी के पास गई होगी. "

" ठीक हैं! "

कहकर मैं घर से बाहर निकला था.

और मैं उस की मौसी के घर गया था.

सीढ़ी पर रायजी मिल गया था.. वह भी उसी बिल्डिंग में रहता था, जहाँ फ्लोरा की मौसी रहती थी.

उस ने मुझे अपने घर में आमंत्रित किया.. मैं जल्दी में हूं ऐसा कहकर मैंने उस पर ध्यान नहीं दिया था.

और मौसी क़ो मिलने उन के घर गया था.

फ्लोरा तो नोविना के लिये निकल चुकी थी.. इस स्थिति में मुझे वहाँ भी मायूसी मिली थी.. और मैं वहाँ से भी निकल आया था.

उस समय मैं रास्ते से गुजर रहा था.

किसी होटल में रेडियो पर गीत बज रहा था.

' रंग बिरंगी राखी लेकर आई बहनाराखी बंधवा ले मेरे वीर चंदाराखी बंधवाले मेरे वीर '

सुनकर मेरे पैर रुक गये थे.

गीत आगे बढ़ रहा था.

कभी भैया यह बहना ना पास होगीकहीं परदेश बैठी उदास होगी,बहना उदास होगी मिलने की आश होगीजाने कौन बिछड़ जाये कब भाई बहना

मेरा पूरा दिन बेकार गया था.

मैं घर लौट आया था. और शाम को परमेश्वर का फोन आया था. मैं राखी बंधवाने की चाहत में इधर उधर भटका था. यह जानकर उन्हों ने अफ़सोस व्यकत किया था. और दूसरे दिन मुझे घर बुलाया था.

और मैं ओफिस से सीधा उस के घर पहुंच गया था.दोनों ने तहेदिल से मेरी माफ़ी मांगी थी.

और फ्लोरा ने मेरी कलाई पर राखी बांधी थी.

उस वक़्त रेडियो पर गीत बज रहा था.

" भैया मेरी राखी के बंधन को निभाना "

बाद में उस ने मेरा चरण स्पर्श किया था. मैंने उसे आशीर्वाद देकर रक्षा बंधन की रस्म निभाई थी.. और यह सिलसिला हर साल नोन स्टोप जारी हो गया था.

हम लोगो का रिश्ता दिन प्रतिदिन मजबूती पकड़ रहा था.

हम लोग साथ में फिल्मे देखने जाते थे. कभी मैं पैसा देता था तो कभी परमेश्वर.

हमने हमारे दो परिवार को लेकर एक मिनी पर्यटन भी आयोजित किया था. जिस में परमेश्वर के भाई बहन और फ्लोरा के छोटे भाई बहन भी शामिल थे.

उस दिन 6 बजे सुबह में हम लोग जमा हुए थे. वहाँ से बस में गेटवे ओफ इंडिया पहुंचे थे.

वहाँ से हम बोट में अजंता इलौरा गये थे.

वहाँ पहुंच कर सब से पहले हम लोग ने चाय नास्ता किया था. बाद में जहाँ भी जाना था वहाँ पहुंच गये थे.

लंच में सब लोग खाना खाने बैठे थे. आरती ने थेपला और आलू का शाक बनाया था. फ्लोरा भी अपने हिसाब से ढोसा और इडली बनाकर लाई थी.

खाना खाने के बाद हम बैठी खो खेले थे. जिसे थप्पा भी कहते हैं.

उस वक़्त आरती के कहने से फ्लोरा ने गुजराती ढब से साड़ी पहनी थी. मैंने कैमरे में दोनो का फोटो क्लिक किया था. जिस से परमेश्वर बहुत भावुक हो गया था.

दोनों के भाई बहनों ने भी पिकनिक बहुत एंजोय किया था.

यह गेम पूर्ण होने पर हम लोग अंताक्षरी खेलना शुरू किया था जो एक मेरे और परमेश्वर के बीच एक सीधा मुकाबला बन गया था.

शुरुआत मैंने की थी :

तेरे प्यार का आसरा चाहता हूवफ़ा कर रहा हूं वफ़ा चाहता हूं

हम तो तेरे आशिक हैं सदियों पुरानेचाहे तुं माने चाहे ना माने

ना कोई उमंग हैं ना कोई तरंग हैंमेरी जिंदगी हैं कया एक कटी पतंग हैं

हर दिल जो प्यार करेगा वह गाना गायेगादीवाना सेकंडो में पहचाना जायेगा

गाता रहे मेरा दिल तू ही मेरी मंज़िलकहीं बीती जाये रैना कहीं बीत जाये दिन

न तू जमी के लिये न आसमान के लियेतेरा वजूद हैं सिर्फ इम्तिहान के लिये

यह दौर काफ़ी लंबा ही चला था.

मैं यह खेल जीत सकता था. मुझे परमेश्वर की हार पसंद नहीं थी. इस लिये मैंने जान बूझकर हार कर उसे जिताया था.. और किसी को इस बात की भनक नहीं लगी था, लेकिन चालाक फ्लोरा ने मेरी चोरी पकड़ ली थी.

मैंने इस बारे में इशारा कर के उसे चुप रहने की मिन्नत की थी.

हमारे बीच बहुत सारी बातें हुई थी.

परमेश्वर को किस बात का बुरा लग गया था. वह भी मेरी तरह आसानी से छोटी छोटी बातों पर गुस्सा हो जाता था. कुछ समय किसी से बात नहीं करता था. फिर गुस्सा पिघलने पर माफ़ी भी मांगता था. उस का दिल बिल्कुल साफ था.

खाना खाने के बाद परमेश्वर ने सिगरेट सुलगाई थी.. उस बात से फ्लोरा नाराज हो गई थी. उस ने पति को ताना मारा था.

" तुम से तो मेरा भाई अच्छा हैं. मेरी सारी बातें मानता हैं. "

कोई भी पति यह बात नहीं सह सकता की उस की बीवी उस के सामने किसी गैर मर्द की प्रशंसा करे.

थोड़ी देर मे उस का मूड ठीक हो गया था. यह देखकर मुझे बहुत ख़ुशी मिली थी. उस वक़्त मैं परमेश्वर के बदले आयने मे खुद को देख रहा था. उस वक़्त मुझे याद आया था.

0000000000

एक दिन 12-45 के आसपास मुझे एक लेटर टाइप g

मैंने प्यून के जरिये उस को बुलाया था.

आने में उस ने समय लगाया था. उस से मैं नाराज हो गया था. उस को आते देखकर मैंने उसे सवाल किया था.

"कया कर रही थी? मैं कब से तुम्हे बुला रहा हूं. "

" मेरी तबियत ठीक नहीं तो थोड़ा सा ब्रेक ले रही थी. आप को कुछ काम था तो पूजा से करवा लेते. "

उस ने पहली बार मुझ से इस तरह की बात की थी. यह सुनकर मेरा मूड ख़राब हो गया था. मेरी भूख भी मर गई थी.

मैंने खाने से मना कर दिया था.

उस वक़्त ' कीसी' के कहने पर सब लोग मानो हड़ताल पर उतर गये थे. उन्हों ने खाना खाने से मना कर दिया था. यह देखकर मेरा मूड ठिकाने आ गया था.

मैंने ' कीसी ' के लंच बोक्स से बोइल्ड अंडा उठाकर मुंह मे लेकर भोजन का प्रारम्भ किया था.

                   0000000 ( क्रमशः )