यादों की सहेलगाह - रंजन कुमार देसाई in Hindi Fiction Stories by Ramesh Desai books and stories PDF | यादों की सहेलगाह - रंजन कुमार देसाई

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यादों की सहेलगाह - रंजन कुमार देसाई

                          : प्रकरण -12 :

राम कुमार चाहते हुए भी मेरा कुछ बिगाड़ नहीं सके थे.

मुझे अपने एक रिश्तेदार की मदद से ' शेठ ब्रदर्स ' में जोब मिला था.

कुछ दिनों के बाद स्टेनो टाइपिस्ट के जोब के लिये फ्लोरा को नियुक्त किया गया था.

उस के जोब के पहले देने वह मुझे ओफिस के विजिटर्स कक्ष में मिल गई थी.

उस ने मुझे गुड मोर्निंग विश किया था. मैंने भी उसे विश किया था.

ओफिस में ओपरेटर क़ो छोड़कर सब से पहले मेरा उस से परिचय हुआ था.

पांच मिनिट में ही मैंने अपना एक अरजेंट लेटर टाइप करवाने के लिये ऑपरेटर काजल के जरिये उसे संदेशा भेजा था.

" नई लड़की को मेरे पास भेजो. "

और वह शोर्ट हेंड बुक लेकर तुरंत मेरे पास आकर ख़डी हो गई थी.

उस ने गुजराती स्टाइल में साड़ी परिधान की थी. जिस ने मुझे उस का गलत परिचय दिया था.

वह गुजराती हैं!!

मैंने उसे अपने सामने की कुर्सी पर बैठने को कहां था. और औपचारिकता से सवाल किया था.

" तुम्हारा शुभ नाम कया हैं? "

" फ्लोरा दिसूज़ा. "

सुनकर मुझे अचरज हुआ था.

मैंने लेटर का ड्राफ्ट उस को देते हुए पूछा था.

" आप यह लेटर टाइप कर सकती हो? "

" स्योर! उसी के लिये तो मुझे हायर किया गया हैं. "

" आप स्टेनो हैं. फिर भी मैं आपको डिकटेट नहीं कर सकता हूं. आय एम सोरी फोर धेट "

" नो प्रॉब्लेम! "

वह ड्राफ्ट लेकर अपने टेबल की ओर आगे बढ़ रही थी.

मुझे संदेह था. वह मेरी राइटिंग वह ठीक से समझ नहीं पायेगी. इस लिये मैंने उसे रोकते हुए कहां था.

" कुछ समझ ना आये पूछ लेना. "

" ओ. के. " कहकर वह अपनी सीट पर चली गई थी.

अगली तीन मिनिट में ही वह मेरा ड्राफ्ट लेकर वापस मेरे पास आई थी.

" यह कया लिखा हैं? " उस ने सवाल किया था.

. मैंने उसे बताया था. और वह थैंक्स कहकर चली गई थी. और दस मिनिट में लेटर टाइप कर के खुद मेरे पास आई थी.

मैंने सौजन्य जताते हुए कहां था.

" तुमने क्यों तकलीफ ली? किसी प्युन के साथ भेज सकती थी. "

" ठीक हैं. यह मेरा पहला काम था तो मुझे ऐसा करना उचित नहीं लगा. "

"थैंक्स फोर योर कमिटमेंट."

दिन गुजरते गये और हम ईश्वर की मर्जी से काफ़ी निकट आ गये थे . हम दोनो खुलकर बातें करने भी लग गये थे.

वह किसी लडके से प्यार करती थी, जो अपनी बिरादरी का नहीं था. वह फ्लोरा को बहुत चाहता था. उस का ख्याल रखता था. हप्ते में एक दो बार फ्लोरा को घुमाने लेने जाने क़ो ओफिस में आता था. उस ने अपने मंगेतर से मेरा परिचय भी करवाया था.

उस का नाम परमेश्वर था. मेरी तरह उस की अपनी मा भी चल बसी थी. वह सौतेली मा और भाई बहनो के साथ रहता था.

उन के साथ परमेश्वर अपने आपको सुरक्षित नहीं समझता था.

वह अभ्यास पूर्ण कर के नौकरी में लगा था. उसी वक़्त वह अपने परिवार से अलग हो गया था. उस ने भाड़े पर जगह ली थी.

फ्लोरा ने ' शेठ ब्रदर्स ' ज्वोइन किया था और तीन महिनो में उस की शादी हो गई थी. उस के पहले मेरा और बाद में फ्लोरा का भी जन्म दिन आया था.

मैंने अपने जन्म दिन के अगले दिन फ्लोरा को बताया था: और उस की मंजूरी लेकर एक नया नाम दिया था.

' कीसी '

जिस तरह चुम्बन के दौरान दो होंठ नजदीक आ जाते हैं, ठीक उसी तरह हमारे दिल एक दूसरों के बिल्कुल नजदीक आ गये थे.

और उन दोनों को जन्म दिन की ट्रीट देने के ख्याल में उसे बिनती की थी..

" कल परमेश्वर को ओफिस में बुलाना. मैं तुम दोनों को छोटी सी पार्टी देना चाहता हूं.. "

सुनकर उसने बड़े उत्साहित होकर कहां था.

" वाह कया बात हैं? दो दिन बाद मेरा भी बर्थडे हैं. "

मेरे कहने पर दूसरे दिन परमेश्वर शाम को ओफिस छुटते समय आ गया था. मैं तुरंत पेक अप कर उन के साथ निकल गया था.

चर्च गेट स्टेशन की बगल में एक होटल में मैंने उन दोनों को छोटी सी ट्रीट दी थी.

हमने मैसूर मसाला खाया था.. बाद में टोमेटो आमलेट मंगवाया था. हम दोनों ने कॉफी मंगवाई थी. और फ्लोरा के लिये मैंगोला ओर्डर किया था.

करीब एक घंटे हम तीनो साथ में थे. उस दौरान परमेश्वरने मुझे बताया था. उस ने पासपोर्ट के लिये अप्लाई किया हैं. उस का दुबई जाने का प्लान हैं.

यह सुनकर मैंने खुशी महसूस की थी. उसे शुभेच्छा व्यक्त की थी.

परमेश्वर ने फ्लोरा के जन्म दिन की पार्टी में हम सब को बुलाया था. आरती के मायके में कोई प्रसंग था. वह बच्चों को लेकर जाने वाली थी. इस लिये वह लोग नहीं आ सकते थे .. मैंने उस बात का मैंने जिक्र कर के क्षमा मांगी थी.

और फ्लोरा की पार्टी के लिये ठीक समय चर्च गेट स्टेशन पहुंच गया था.

उस दिन इतवार था.. मैं घर से सीधा नियत समय पर चर्च गेट स्टेशन पहुंच गया था..लेकिन एक जैसी दो होटल के नाम की वजह से बहुत बड़ा घोटाला हो गया था. और हम नहीं मिल पाये थे.

दूसरे दिन सच्चाई जानकर हम दोनो ने आपस में माफ़ी याचना की थी.

मैं उसी की लिये रोजाना सोते समय ईश्वर से प्रार्थना करता था.

" प्लीझ! मेक माय सिस्टर ' ' कीसी' ओलराइट"

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एक दिन शाम को ओफिस छुटते समय मुझे क्लियरिंग एजेंट की ओफिस में जाना था. उस वक़्त फ्लोरा ने शिकायत की थी.

" मेरी तबियत ठीक नहीं हैं. "

जोगानुजोग मैं भी टेक्सी में उसी इलाके में जा रहा था, जहाँ फ्लोरा रहती थी. मैं इस लिये मैंने उसे लिफ्ट दी थी. मैं तो उसे घर तक पहुंचाने को तैयार था. लेकिन उस ने मना किया था.

"मेरी मम्मी पसंद नहीं करेगी. "

और मैंने उसे गली के नुक्कड़ पर छोड़ दिया था.

दूसरे दिन वह दफ्तर में नहीं आई थी. इस लिए मुझे चिंता हुई थी. मैंने ईश्वर से प्रार्थना की थी.

दो महिनो के बाद दोनों ने शादी केथलिक रीति रिवाज़ से चर्च में शादी की थी. उस वक़्त मैं ओफिस से सुशील भाई की अनुमति लेकर शादी में हाजिर होने के लिये माहिम चर्च पहुंच गया था.

और शाम को सुजाता और बच्चों के लेकर सत्कार समारोह में भी शामिल होने के लिये दादर गया था.

दोनों ने अलग से अपने कार्ड्स देकर हमें आमंत्रित किया था. हम ने भी दोनों को अलग गिफ्ट देकर जवाब दिया था, अपना कर्तव्य निभाया था.

फ्लोरा के आगमन से मेरे जीवन में अजीब बदलाव आ गया था.

दो महिने बीत गये थे.

एक दिन उस ने मुझे खुश खबरी सुनाई थी.

सुनकर मुझे बहुत ख़ुशी हुई थी.

" I am carrying!"

उस वक़्त फ्लोरा ने मुझे अनुरोध किया था.

" कया हम लोग सुबह शाम स्टेशन से ओफिस और ओफिस से स्टेशन तक साथ आ जा सकते हैं? "

आने वाली प्रसूति से उसे कुछ तकलीफ हो रही थी. वह कमजोरी महसूस करती थी, उसे चककर भी आते थे.. शायद इसी लिये उस ने मुझे ऐसा अनुरोध किया था. जो मैंने बिना क़ोई सवाल के स्वीकार लिया था और फिर तो वह हमारा दैनिक क्रम बन गया था.

परमेश्वर को इस बात को लेकर कोई समस्या नहीं थी. उसे तो हम लोग साथ में फ़िल्म देखने जाये उसे समस्या नहीं थी.

लेकिन ओफिस में कुछ लोगो को यह बात पसंद नहीं आई थी. वह लोग पीठ के पीछे कुछ ना कुछ बकवास करेंगे. यह सोचकर मना कर दिया था.

सुहानी की जगह फ्लोरा ने, 'कीसी ' ने संभाल ली थी. उस ने मेरे दिल में एक बहन का स्थान ग्रहण कर लिया. मैंने चिट्ठी के जरिये फ्लोरा को अनुरोध किया था.

                 00000000 ( क्रमशः)