यादों की सहेलगाह - रंजन कुमार देसाई in Hindi Fiction Stories by Ramesh Desai books and stories PDF | यादों की सहेलगाह - रंजन कुमार देसाई

Featured Books
  • Money Vs Me - Part 35

      उन्होंने मुझ पर अपने फैसले नहीं थोपे थे। उन्होंने मुझे अपन...

  • Mafia saiya chapter 10

    अध्याय 10 : हवेली का भूत और पहली किसपूरा कमरा अंधेरे में डूब...

  • CRAVE - Part - 14

    दृश्य वहीं से शुरू होता है...फ्लाइट के अंदर... ️जुशेंग अपनी...

  • तुम मिले, जब मैं खुद से बिछड़ गई - 21

    सुबह Aashi कॉलेज की लाइब्रेरी में बैठी अपनी नई कहानी के लिए...

  • Perfectly Imperfect - Part 3

    ऐसे ही दिन बीतते गए। हमारी eye contact अब थोड़ी ज़्यादा होने...

Categories
Share

यादों की सहेलगाह - रंजन कुमार देसाई

                       :  प्रकरण - 7::

उस वक़्त गरिमा कुछ काम से बाहर आई थी. वह अनुराग को पहचानती थी. उस के पूछने पर अनुराग के दोस्त ने सारी परिस्थिति समझाई थी.

और उस ने फोन पर मुझ से बात की थी.

जिस से मैं अपना आपा खो बैठा था. मैंने कुछ अनाप शनाप बातें की थी

सुनकर वह मुझ पर वह भड़क गई थी. उस ने मुझे रोकते हुए साफ चेतावनी दी थी.

" ऐसी बातें करोंगे तो मैं नहीं आउंगी.. "

मैंने उस की माफ़ी मांगी थी. और दूसरे दिन दो बजे मुझे मिलने का वादा किया था.

यह सुनकर मैं हवा में उड़ने लगा था..

00000000000

दूसरे दिन ठीक दो बजे अपनी सहेली और अनुराग के साथ वह मेरे बिल्डिंग के प्रांगण में दाखिल हुई थी.

उस वक़्त आकाश वाणी रेडियो पर पसारित गीत ने उस का स्वागत किया था.

बहारो फूल बरसाओ मेरा महबूब आया हैं हवा ओ रागनी गाओ मेरा महबूब आया हैं

इस गीत के जरिये खुद भगवान ने भी उसे आवकार दिया था.

यह कोई चमत्कार था या महज इत्तेफ़ाक़!?

उससे मेरी आश मजबूत बनी थी. हौसला बढ़ गया था.

हमारी निश्चिन्त रूप से शादी हो जायेगी.

इस बात ने मेरी उम्मीद को आसमान की बुलंदी पर पहुंचा दिया था.

मैंने ऐसा महसूस किया था. भगवान भी यही चाहता हैं.

मैंने सन्मान पूर्वक उस का आदर सत्कार किया था.

" आओ! गरिमा मेरे घर मैं तुम्हारा स्वागत हैं. मैं बिल्कुल ठीक हूं. यहाँ आने के लिये बहुत बहुत शुक्रिया. "

मेरी इस बात पर उस ने कोई कमेंट नहीं की थी. क़ोई प्रतिभाव भी व्यक्त नहीं किया था.

मैंने सीधे ही उसे गुजारिश की थी :

" अंदर चलो हम ईश्वर का आशीर्वाद अर्जित कर लेते हैं.."

अनन्या उस वक़्त मौजूद थी. उस ने मुझे ब्रेक लगाते हुए कहां था.

" गरिमा कुछ कहना चाहती हैं. "

" हा बोलो! क्या कहना चाहती हो? "

" मेरी सगाई हो गई हैं! "

उस पर अनन्या ने मुझे सवाल किया था :

" अब तो गरिमा तुम्हारी बहन हुई ना? "

" उस में संदेह का कोई अवकाश नहीं हैं."

मैं तुरंत भीतर गया था. ईश्वर की छबि के सामने नत मस्तक होकर माफ़ी मांगकर कहां था.

" गरिमा मेरी बहन हैं! "

कहकर मैं बाहर आया था. और सब की मौजूदगी में गरिमा के सिर पर हाथ रखकर शपथ लिये थे.

" आज से तुम मेरी बहन हो. मैं कभी तुम्हे अन्य नजर से नहीं देखूंगा.. अगर ऐसा हुआ तो वह दिन मेरी जिंदगी का आखिरी दिन होगा. "

" मैं जाती हूं. "

कहकर वह राखी कठघरे पऱ छोड़कर चली गई थी.. उस का मुझे बड़ा झटका लगा था. उस ने मुझे भाई के काबिल नहीं समझा था.

तब गीता बहनने मुझे समझाया था.

तुमने जो व्यवहार गरिमा के साथ किया हैं उस से राखी बांधने की कोई गुंजाईश ही नहीं छोड़ी थी. लेकिन मेरा दिल यह मानने को तैयार नहीं था. मैंने क्रोधित होकर कपाट पर पैर पटककर रोना शुरू किया था.

इस हालत में भी मैंने उस के बारे में गलत नहीं सोचा था. मुझे महसूस हुआ था. मेरे रोने की आवाज सुनकर वह रुक गईं थी.

उस वक़्त उस की सहेली उस का हाथ पकडकर बिल्डिंग से बाहर ले गई होगी.

मेरी हालत काफ़ी बिगड गई थी. उस वक़्त मेरे पिताजी मुझे मनोचिकित्सक के पास ले गये थे.. उन्हों ने मुझे देखकर पिताजी को कहां था.

" आप का बेटा बहुत डिस्टर्बड हैं. उसे मानसिक इलाज की जरूरत हैं, उस के लिये अस्पताल में भर्ती करना होगा. "

. और तुरंत मुझे अस्पताल में भर्ती कर दिया गया था.

मुझ पर कठिनतम उपचार जारी किये गये थे.

मुझे इलेक्ट्रिकल शोक भी दिये जाते हैं. लेकिन 15 दिन तक मेरी तबियत में कोई सुधार नहीं आया था. उस पर मुझे हिल स्टेशन ले जाने की भी हिदायत दी गई थी.

और मेरे मात पिता कर्ज लेकर मुझे महाबलेश्वर ले गये थे.

हम लोग वहाँ पहुंच गये थे. और दो दिनों में एक नया शादी सुदा जोड़ा वहाँ आया था.. उसे देखकर मैं चौंक सा गया था. मैं जिस चीज से दूर रहना चाहता था. वही चीज भगवान ने मेरे सामने लाकर ख़डी कर दी थी.

गरिमा अपने पति के साथ महाबलेश्वर आई थी.

उस के साथ हादसा हुआ था. उस की एक टांग भी बेकार हो गई थी.

उस स्थिति में वह शादी तोड़ने को तैयार हो गई थी.

लेकिन गौरव ने उस के साथ शादी कर के एक नई मिशाल कायम की थी.

ऐसी स्थिति में गरिमा हिम्मत नहीं हारी थी..बाद में उस ने NGO की स्थापना क़र के काफ़ी लोगो को जीने का मकसद दिया था.. उन्हें मदद क़र के अपने पैरों पर खड़ा करने के लिये सक्षम बनाया था.

खबर मिलते ही मैं उसे मिलने NGO पहुंच गया था. उस की हालात देखकर मेरी आंखे नम हो गई थी..

यह देखकर उस ने मुझे आश्वस्त किया था.

उस का मुझ पर बड़ा एहसान था.

वह टेलिफोन पर अपनी सगाई की बात क़र सकती थी. फिर भी वह दोपहर की कड़ी धुप में मुझे सच्चाई से अवगत कराने के लिये खुद मेरे घर तक आई थी. यह उस का सब से बड़ा सौजन्य था, खानदानी की मिशाल थी . किसी पराई लड़की के साथ शादी के विचार कर के मैंने बहुत बड़ा अपराध किया था. इस लिये मैं अपने आप को माफ नहीं कर पा रहा था.

मैंने शपथ लेकर उसे बहन बनाने का वादा किया था.. ओर भगवान ने हमें सही मायने में भाई बहन बनने का मौका भी दिया था.

मैं अत्यंत संवेदनशील था. इस लिये गरिमा की ऐसी स्थिति के लिये मैं अपने आप को अपराधी समझ रहा था.

उस पर गरिमा ने मुझे समजाया था.

" किसी की गलत सोच दूसरे के जीवन में क़ोई तकलीफ पैदा नहीं क़र सकती. "

गरिमा ने मुझे बहुत बड़ी बात सिखाई थी.

गौरव कराटे सिखाता था. छोटी उम्र मे उस ने बड़ी उपलब्धि हांसिल की थी. कितने अवार्ड्स, पुरस्कार अर्जित किये थे उस के सहवास में गरिमा अपनी पंगुता को बिल्कुल भूल गई थी.

आदमी लाख चाहे कितना कमजोर हो, अपाहिज हो लेकिन उसे कभी इस बात को मन में संचित नहीं करना हैं. हमारी सोच ही हमारे जीवन निर्माण करती हैं.

कुछ भी हो, कुछ भी तकलीफ हो बीमार हो लेकिन कभी ऐसी सोच से दूर रहना निहायत जरूरी होता हैं..

' मन से कभी हारना नहीं चाहिये..'

' कोशिश करने वालों की कभी हार नहीं होती.

गरिमा अपाहिज होने के बावजूद हकारात्मक सोच की ऊँगली पकडकर चल रही थी.

यह अपने आप में बहुत बड़ी बात थी.

                       0000000000  ( क्रमशः )