यादों की सहेलगाह - रंजन कुमार देसाई in Hindi Fiction Stories by Ramesh Desai books and stories PDF | यादों की सहेलगाह - रंजन कुमार देसाई

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यादों की सहेलगाह - रंजन कुमार देसाई

                     : प्रकरण -10 :

मौके का फायदा उठाने में हसमुख माहिर था.

ललिता पवार ने खुद उसे ' लागू प्रसाद ' की उपाधि देती थी .

वह पुष्पा बहन के भाई का लड़का था. उन का भतीजा होने के नाते वह अपनी कुछ खूबियों की वजह से ललिता पवार के घर का पसंदीदा सदस्य बन गया था..

वह मीठा बोलता था, गंदे- बिभत्स जोक्स सुनाने में माहिर था. और काफ़ी लोगो से पहचान होने की वजह से चीज वस्तु खरीदने में ललिता पवार को बहुत फायदा करवाता था.

इस लिये ललिता पवार ने पालतू कुत्ते की तरह उसे घर में बिना पट्टे बांध रखा था.

और उसे पूरी आझादी मिल गई थी.

जिस की वजह से उस का बड़ा गुमान होता था.

उस क़ो हर चीज में हाथ मारने की बूरी आदत थी.

हम दोनों में अहम फर्क था. मैं कम बोलता था.. कम लोगो क़ो पहचानता था. किसी से काम निकालने का मुझ में महारथ नहीं था.

वह मेरे और सुहानी के रिश्ते की आड़े आ गया था..मानो एक खलनायक बनकर रह गया था.

मैंने अपने और ससुराल के परिवार के लिये फ़िल्म ' अमर प्रेम ' की टिकट बुक की थी. मैं उसे शामिल नहीँ करना चाहता था. इस लिये उस के बारे में कोई बात नहीं की थी. लेकिन मा बेटी ने यह बताई थी.. और उसे भी फ़िल्म देखने आमंत्रित किया था. और शायद दूसरे दिन जाकर वह टिकिट बुक कर आया था.

जिस के बारे में मुझे किसी ने बताना भी जरूरी नहीं समझा नहीं था.

और वह शो शुरु होने से पहले हम से पहले अपनी बीवी को लेकर थिएटर पहुंच गया था..

हमें देखकर उस ने बड़ी बेशर्मी के साथ नफ़फ़टाई का प्रदर्शन करते हुए कहां था.

" हमें एक्स्ट्रा टिकिट मिल गया. "

इस बात में क़ोई तथ्य नही था.

इतना ही नहीँ उन्हें हमारी रो में ही सीट भी मिला था.

मेरी कुछ समझ में नहीं आया था.

उन्हें देखकर मेरा फ़िल्म देखने का मूड ख़राब हो गया था.

बात का यहाँ अंत नहीं हुआ था . हसमुख ने सुहानी को इशारा कर के अपनी बाजु में बुला लिया था. और बाजु की खाली सीट पर उसे बिठा दिया था.

अब ज़ब थियेटर हाउस फुल था. तो वह सीट खाली कैसे रह गईं थी? . ऊस का एक ही मतलब होता था. ऊसने तीन टिकिट अलग से बुक की थी.

इस हालत में मुझे बड़ा गुस्सा आया था.

फ़िल्म के गीत की पंक्तिया मेरे जख्मो को कुरेद रही थी :

क़ोई दुश्मन ठेस लगाये तोमन मीत जिया बहलाये मन मीत जो घाव लगाए उसे कौन मिटाये

दोनो को मैंने अपना माना था. उन पर विश्वास किया था. हसमुख तो ठीक गैर था. लेकिन सुहानी बिना बताये उन के पास चली गई थी. यह देखकर मुझे बहुत बुरा लगा था. सुहानी पढ़ी लिखी थी. मैंने सब के लिये टिकिट बुक किया था और वह पूछे बिना उन के पास चली गई थी.

फ़िल्म छूटने के बाद हम लोग चौपाटी घूमने गये थे. तब मैंने सुहानी को बहुत कुछ सुनाया था. मैं एंजोय करने के लिये फ़िल्म की टिकिट लाया था. और हसमुख ने ऊस में शामिल होकर सारा मजा किरकिराया कर दिया था.

वह शिक्षक था. फिर भी ऊस में क़ोई तमीज नहीं थी.

ऊस को कुछ कहने का मतलब नहीँ था. क्यों की वह अपनी विधविध करतूतों से ससुराल का लाडला बन गया था. इस लिये वह हसमुख को सदा साथ रखते थे.

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कुछ दिन बाद बड़ी मा का जन्म दिन था. ऊस अवसर पर उन्होंने मिनी पिकनिक आयोजित किया था. हसमुख उन के छोटे भाई का लड़का था. बड़ी मा उसे पसंद नहीँ करती थी. लेकिन वह कैसे भी मेरे ससुराल में घूस गया था.

वह उसे पिकनिक में शामिल नहीँ करना चाहते थे.

लेकिन मेरी सासुमा ने अपनी जेठानी को पूछे बिना उसे पिकनिक में आमंत्रित कर दिया था.

" इस इतवार को तुम्हारी बीवी को लेकर 6 बजे चर्नी रोड स्टेशन पहुंच जाना. "

बड़ी मा को यह अच्छा नहीं लगा था. लेकिन वह अपनी बदमिजाजी देवरानी को कुछ कह नहीं पाये थे. इस लिये उन्होंने ने चुपकीदी साध ली थी.

ऊस दिन मुझे सुहानी का नया रूप देखने को मिला था. ऊस ने एक बार खुद इस बात का ढिंढोरा पीटा था.

" मैं अपनी बड़ी दीदी को बेतहाशा प्यार करती हूं. "

लेकिन ऊस दिन वह जिस तरह हसमुख की बीवी के पीछे दिवानी हो गई थी, यह देखकर उस की बात पर यकीन नहीं हुआ था. ऊस ने सुजाता को नहीं बल्कि हसमुख की बीवी को अपनी बहन बना लिया था.

हम लोग विहार लेक गये थे. वहाँ सुहानी की हरकतों ने मुझे परेशान कर दिया था.

हम सब लोग साथ बैठकर अंताक्षरी खेल रहे थे. ऊस वक़्त सुहानी हसमुख की बीवी की गोद में सिर रखकर सो गई थी.

ऊस के नोन वेज जोक्स सुनने में मशगुल हो गई थी.

सुहानी का व्यवहार देखकर मैं परेशान हो गया था. फिर एक बार हसमुख और ऊस की बीवी की मौजूदगी ने मेरा मूड ख़राब कर दिया था.

मैंने उसे ठीक करने के लिये दूसरे ग्रुप से सम्मिलित होने की कोशिश की थी. मैंने फ़िल्म शहीद का गीत गाया था :

मेरा रंग दे बसंती चौला मेरा रंग दे बसंती चौला

दम निकले इस देश की खातिरबस इतना अरमान हैं (2)एक बार इस राह में मरनासो जन्मों के समान हैंदेख के वीरों की क़ुरबानी (2)अपना दिल भी डोला.. मेरा रंग दे

जिस चोले को पहन शिवाजी निकले अपनी शान से जिसे पहन झाँसी की रानीमीट गई अपनी आन पेआज उसी को पहन के निकला (2)हम बच्चों का टोला.. मेरा रंग दे

ग्रुप ने इस गाने में मेरा साथ दिया था. लेकिन मैं अस्वस्थ हो गया था. इस हालत में गीत को ठीक पूरा नहीं कर पाया था. ऊस बात का ग्रुप को भी बड़ा अचरज हुआ था.

दोपहर को सब लोग खाना बैठे थे. ऊस समय भी सुहानी हमें छोड़कर हसमुख दम्पति को ज्यादा प्राधान्य दे रही थी. जो मुझे कांटे की तरह चुभ रहा था.

पूरा दिन मेरा बेकार हुआ था. मैंने किसी से बात नहीं की थी. बड़ी मा के जन्म दिन की खुशी को सुहानी ने अपनी बेवकूफी से ख़राब कर दी थी.

मैं हसमुख और ऊस की बीवी की मौजूदगी से परेशान हो रहा था. ऊस बात का उसे क़ोई इल्म नहीं था.

वापस लौटते समय हम लोग टांगे में बैठे थे. ऊस वक़्त मेरी सुहानी से मचमच हो गई थी. ऊस ने हसमुख की तरफदारी की थी. ऊस की वजह से मेरा गुस्सा ज्वाला बन गया था. सुहानी को मेरी क़ोई फ़िक्र चिंता नहीं थी. ऊस बात का मुझे बेहद रंज हुआ था.

मैंने रात का खाना भी नहीं खाया था. भूखे पेट बिस्तर पर पड़ा था. देर रात तक मुझे नींद नहीं आई थी. किसी से बातें भी नहीं की थी.

ओफिस जाने का भी मूड नहीं बचा था. मैंने घर में भी किसी से बातें नहीं थी. काम पर भी जा नहीं गया था.

सुहानी तो सुबह सुबह ही कोलेज चली गई थी. उसे मेरे बारे में कुछ पता नहीं चला था.

शाम को वह कॉलेज से लौटी थी.

मैं बाहर खुर्सी में उदास चित बैठा था. मुझे देखकर वह मेरे पास आई थी. मेरे दोनो गालों को हथेलियों के बीच दबोच कर सवाल किया था :

" बहुत बुरा लग गया जीजू? "

ऊस के इस सवाल से मेरा गुस्सा बर्फ की तरह पिघला दिया था.

ऊस के ऐसे व्यवहार ने एक उम्मीद जगाई थी.

हर बार वह मुझे इस तरह मनायेगी.

जो किताबी बात बनकर रह गई थी.

000000000 ( क्रमशः)

: प्रकरण 11 :

प्रकाश के जन्म पहले मैं एक छोटी सी कंपनी में काम करता था. उस में कोई भविष्य नहीं था. मैं दूसरा जोब तलाश कर था. तब वहाँ एक परिचित बुजुर्ग व्यकित आती जाती रहती थी.

उन की सिफारिश से मुझे ' प्रेम सन इंटरप्राइज ' में काम मिल गया था.

प्रकाश के जन्म के एक महिने के भीतर ही मुझे यह जोब मिला था. मैं पहले जहाँ काम करता था, वहाँ 175 रूपये मिलते थे और प्रेम सन का जोब मैंने 150 में स्वीकार किया था. मेरे पास उस के अलावा क़ोई विकल्प नहीं था.

हकीकत में मैंने पढ़ाई के दौरान एक पार्ट जोब किया था, रोजाना चार घंटे काम करने के बाद मुझे केवल 75 रूपये मिलते थे.

मैं शादी सुदा था. एक बच्चे का बाप भी था. ईस बात को समझते हुए कंपनी के जूनियर पार्टनर श्याम कुमार ने महिने के अंत में ही खुद मुझे कहां था.