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मनुस्मृति

मनु-स्मृति

मनु की आँखें बंद थी. अपने गिटार पर कल रात को लिखे गए गाने सुर छेड़ता वह, संगीत के गहरे समुन्दर में गोेते लगा रहा था. बचपन के प्यार संगीत को उसने अब अपने जीने का सहारा और कमाई का जरिया बना लिया था. भगवान ने न सिर्फ उसे खूबसूरत आवाज़ दी बल्कि सुरों की अच्छी समझ, संगीत की पहचान और आकर्षक व्यक्तित्व से भी नवाज़ा है. अपने आप में मगन उसे वो गीत गुनगुनाते हुए, गिटार बजाते हुए करीब आधा घंटा बीत गया जिसके बोल कुछ यूं थे –

"मोहे प्यार की राग सिखा दे सजना

अंग अंग झंकार सजा लूँ

नैनों को बस तू ही सुहाए

इनमे तेरा प्यार सजा लूँ

जी में आये...प्रेम की धुन में

आज अभी तोहे अपना बना लूँ "

अपने इस गीत के बोलों को बरबस बार बार गुनगुनाता वह एक 'परफेक्ट' राग की तलाश में था. बंद आँखें उसके संगीत के दीवानेपन में बराबर साथ दे रही थी. तभी स्मृति आ गयी और उसे संगीत में रत देखकर जरा ठिठक गयी. उसे बीच में रोककर उसकी तन्द्रा भंग करना स्मृति ने उचित न समझा और पास ही रखी कुर्सी पर बिना कोई आवाज किये बैठ गयी. अब मनु अपने संगीत की राग में डूबा हुआ था और स्मृति मनु में. वह कभी उसके माथे पर गाने के दौरान बनती बिगड़ती सलवटों को देखती तो कभी गिटार पर दौड़ती उसकी उँगलियों को.. कभी उसके धुन गुनगुनाते होठों को तो कभी होठों के ऊपर उभर आई पसीने की बूंदो को. .

अंततः मनु की तन्द्रा टूटी...और सामने नीली आँखों वाली उस खूबसूरत लड़की को देखकर वह जरा हड़बड़ा गया.

"वेरी वेल डन सर. आपकी सुरीली आवाज़ की तारीफ दूसरों से कई बार सुनी थी पर आज खुद सुनकर अहसास हुआ की वे तारीफ में कुछ कम ही कहते थे" स्मृति ने हलकी सी स्माइल के साथ मनु के गाने की सराहना की.

मनु स्मृति से पहले नही मिला था, उस पर पहली मुलाक़ात में ही इतनी खूबसूरत लड़की से अपनी तारीफ सुनकर उसे समझ नही आ रहा था की क्या उत्तर दे. वह जवाब में बस मुस्कुरा दिया और सम्हालते हुए बोला, "अ..आ..आपकी तारीफ?"

"सर, मेरा नाम स्मृति है. मैं जयपुर से लखनऊ एक म्यूज़िक कम्पटीशन में हिस्सा लेने आई हु. मेरी सहेली अमीषा ने मुझे आपके बारे में बताया था और आपका पता भी दिया था सो मैं आपसे मिलने चली आई" स्मृति ने सहज भाव से कहा.

मनु थोड़ा सा सहज होते हुए बोला, "बहुत अच्छा किया आपने जो आप मिलने चली आई. मुझे भी संगीत से बाहर आकर आपसे 2-4 बातें करने का मौका मिल गया" मनु ने हँसते हुए चुटीले अंदाज में कहा. वह मन ही मन स्मृति की खूबसूरती का कायल हो गया था.

इसके बाद बातों का सिलसिला शुरू हो गया. स्मृति मनु के संगीत के ज्ञान की कायल हो चुकी थी और मनु उसकी खूबसूरती का. बातों बातों में कब शाम हो गयी, दोनों को पता ही न चला.

"सर, बहुत वक़्त हो गया. अब मुझे जाना चाहिए..." स्मृति ने थोड़ा चिंतित होते हुए कहा.

"अरे इसमें इतना परेशान होने वाली क्या बात है.. आज रात तुम यही मेरे घर पर रुक जाओ. मैं तुम्हारे कॉम्पिटिशन की तैयारी भी करवा दूंगा" मनु ने सहजता से कहा.

"नही सर, दरअसल हमारा पूरा ग्रुप आया हुआ है और होटल में मेरे फ्रेंड्स मेरा इंतजार कर रहे होंगे. सो...मुझे जाना होगा" स्मृति को मनु के इस अचानक निमंत्रण से जरा घबराहट हुई.

"ठीक है भई, जैसी आपकी मर्जी" मनु ने दरवाजे की तरफ इशारा करते हुए कहा और बाहर लॉन तक स्मृति को छोड़ने आया.

स्मृति जैसे ही जाने को हुई, अचानक तेज बारिश शुरू हो गयी और ताजा हवाएं चलने लगीं.

"लगता है मौसम को भी आपका यूं जाना पसंद नही आया और बारिश भी चाहती है की आज आप यहीं रुक जाएँ" मनु ने स्मृति को फिर अंदर आने का अनकहा आमंत्रण दिया.

"शायद आप सही कह रहे हैं, अब तो मुझे रुकना ही होगा" स्मृति घर पर यहाँ वहां देखने लगी जैसे कि घर पर रहने वाले दूसरे लोगों के बारे में जायजा ले रही हो.

"घर पर मेरे अलावा कोई नही रहता. मेरी फैमिली में मम्मी, पापा और भाई हैं जो कानपूर में रहते हैं" मनु ने उसकी उत्सुकता को भांपते हुए कहा.

घर पर वे दोनों अकेले हैं, ये सुनकर स्मृति कुछ असहज हो गयी.

"आपके लिए गेस्ट रूम उस तरफ है, जाकर फ्रेश हो जाइये" मनु ने उसे सहज करना चाहा.

"ओके" स्मृति गेस्ट रूम कि तरफ चली गयी.

स्मृति गेस्ट रूम में जाकर वाशबेसिन पर अपना चेहरा धोने लगी. आज पहली बार वह इतने गौर से खुद को आईने में निहार रही थी. कितने बड़े संगीतकार से मिली हूँ आज. क्या मैं इस लायक भी हूँ. वह मनु के लिए अपने अंदर आकर्षण का अनुभव करने लगी थी. मनु कि आवाज़ उसके कानो में लगातार गूँज रही थी. वह सहसा गुनगुना उठी.

‘मोहे प्यार की राग सिखा दे रे सजना

अंग अंग झंकार सजा लूँ'

प्यार की राग भी सीख लेना मैडम, अभी कॉफ़ी तैयार है और आपका इंतजार कर रही है.

बाहर से वही सुरीली आवाज़ आई. स्मृति को अंदाज़ा नही था कि मनु उसकी गुनगुनाने की आवाज़ सुन लेंगे और वह शर्मा गयी.

किसी तरह खुद को सम्हालकर बाहर आई.

"आपने क्यों तकलीफ की, कॉफ़ी मैं बना देती"

"अरे ये क्या बात हुई. मेज़बान मैं हूँ तो कॉफ़ी आप क्यों बनाएंगी" कहते हुए मनु ने स्मृति को कॉफ़ी का कप थमा दिया.

स्मृति ने मुस्कुराते हुए कप पकड़ा और कॉफ़ी कि चुस्कियों के बीच एक बार फिर गपशप का दौर चालू हुआ. अचानक बिजली गुल हो गयी.

"ओ गॉड, बारिश में यहाँ पर ये अक्सर हो जाता है" मनु ने हलके अंदाज में कहा.

स्मृति कुछ परेशान हो गयी.

"आप फ़िक्र मत करो, मैं अभी कैंडल लेकर आता हूँ" मनु कहते हुए उठा तो बीच में ही टेबल से टकरा गया. उसका बैलेंस बिगड़ा और अँधेरे में स्मृति ने उसे सम्हालना चाहा तो मनु ने उसका हाथ ज़ोर से पकड़ लिया. इस गहमागहमी में दोनों एक दूसरे के काफी करीब आ गए थे. स्मृति दूर जाना चाहती थी पर मनु कि बाहों की कशिश ने रोक लिया. कुछ कहना चाहती थी तो मनु ने उसके होठों पर हाथ रख दिया. स्मृति सर से पाँव तक बर्फ हुई जा रही थी और मनु सर से पाँव तक लावा.

मनु ने स्मृति के होठों पर रखे हुए अपने हाथ पर अपने होठ रख दिए और धीरे धीरे अपना हाथ हटा दिया. स्मृति को इसके आगे कुछ याद नही. उसने खुद को मनु को सौंप दिया.

अगली सुबह स्मृति कि आँखे खुली तो उसने खुद को मनु के बिस्तर पर पाया. वह अभी भी गहरी नींद में सो रहा था. स्मृति घबराई पर पिछली रात की मीठी यादें उसे भीतर तक गुदगुदा रही थी. वह सच में मनु से प्यार करने लगी थी और ये सोचकर और भी खुश थी कि मनु को भी उस से प्यार है.

वह जल्दी से उठी और तैयार होकर कॉफ़ी बनाने लगी. इतने में मनु कि भी नींद खुल गयी और बैडरूम से बाहर आकर जब उसने स्मृति को देखा तो पिछली रात वाली बात को लेकर कुछ शर्मसार हो गया. नजरें मिलते ही कुछ असहज महसूस किया उसने. स्मृति उसकी मनोस्थिति समझ रही थी.

"आप फ्रेश होकर आ जाइये, कॉफी तैयार है" उसके शब्दों में मिठास थी.

मनु फ्रेश होकर आया और कॉफ़ी टेबल की तरफ बढ़ा तो देखा वह एक बड़े दिल के आकार में काटे गए पेपर पर सुनहरे अक्षरों में 'मनुस्मृति' लिखा हुआ था. ये देखकर वह चौक गया. वह स्मृति की तरफ पलटा तो स्मृति उस से लिपट गयी.

"आई लव यू मनु" कहते हुए उसने अपनी उंगलिया मनु कि पीठ पर दौड़ा दी.

मनु ये सुनकर बुरी तरह चौंक गया. उसने लगभग खीचकर स्मृति को खुद से अलग किया.

"ये तुम क्या कह रही हो स्मृति. प्यार... कैसा प्यार? क्या एक रात साथ बिता लेने का मतलब प्यार होता है. तुम जैसी साधारण कालेज की लड़कियों का न यही प्रॉब्लम है. कोई प्यार से दो बातें क्या कर ले, छू ले, गलती से चूम ले तो उसे ही तुम लोग प्यार समझ लेती हो" उसके होठों पर खिसियाई हुई हंसी थी.

स्मृति का चेहरा सफ़ेद पड़ चुका था. उसका शरीर का सारा खून जम गया था. आँखों से आंसू बहते हुए गालों पर ढुलक गए थे.

"तो क्या आपको मुझसे प्यार नही है? फिर कल रात" स्मृति कि आवाज भर्राई हुई थी.

"कल रात क्या? कल रात जो भी हुआ स्मृति वो तुम्हारी भी मर्जी से हुआ था. इसका मतलब ये तो नही कि मैं तुमसे प्यार करता हूँ." मनु के लहजे में बेशर्मी थी.

"पर मैं तो आपसे प्यार करती हूँ" स्मृति की स्थति दयनीय हो गयी थी.

"जानती कितना हो तुम मुझे. हमें मिले अभी कुल २४ घंटे भी नही हुए हैं और तुम मुझसे प्यार करने लगी, वाह ये अच्छा है. किसी वेल सेटल्ड लड़के से प्यार का झूठा इज़हार करो और अपनी लाइफ सेटल करो ग्रेट" मनु कि आवाज़ में कठोरता थी.

स्मृति अब इस से आगे एक शब्द भी सुनने कि हिम्मत नही जुटा पा रही थी. जैसे तैसे खुद को सम्हाल कर उसने अपना बैग उठाया और तेज कदमों से बाहर कि तरफ चली गयी.

मनु बेपरवाही से उसे जाता हुआ देखता रहा और फिर अख़बार लेकर लिविंग रूम में जाकर पढ़ने लगा.

8 साल बाद ................

लखनऊ के सबसे बड़े ऑडिटोरियम में बहु-चर्चित म्यूज़िक इवेंट का आयोजन.

"आइये स्वागत करते हैं इस कार्यक्रम के चीफ गेस्ट, मनु रमन बजाज का" मंच पर उद्घोषक के इन शब्दों के साथ ही पूरा हॉल तालियों की गड़गड़ाहट से गूँज गया.

6 से 14 साल के बच्चों के बीच होने वाली उस संगीत प्रतियोगिता में मनु को मुख्य अतिथि के रूप में आमंत्रित किया गया था. वह आज भी वैसा ही आकर्षक, संगीतभक्त, उत्साह से परिपूर्ण और हाँ बैचलर मनु था. संगीत को समर्पित अपने जीवन में वह अब तक किसी से प्यार और विवाह का फैसला नही ले पाया था. ऐसा नही था कि उसके जीवन में स्मृति के बाद लडकियां नही आई या उसे कोई पसंद नही आई, पर स्मृति कि तरह किसी ने उस से प्यार का इज़हार नही किया था. न ही उसे इस बात से कोई फर्क पड़ता था क्योंकि वह खुद ही विवाह के बंधन में न बंधकर खुद को पूर्ण रूप से संगीत का पूजक बना देना चाहता था.

लोगों को भीड़, आयोजको के स्वागत और प्रशंषकों के ऑटोग्राफ के लिए बढ़ते हाथों के बीच अचानक एक मधुर आवाज़ ने मनु को अंदर तक झिंझोड़ दिया.

मोहे प्यार की राग सिखा दे सजना

अंग अंग झंकार सजा लूँ

नैनों को बस तू ही सुहाए

इनमे तेरा प्यार सजा लूँ

जी में आये प्रेम की धुन में

आज अभी तोहे अपना बना लूँ

ये कौनसे बोल हैं, ये तो सिर्फ मैं जानता हूँ और .... और ... क्या नाम था उस लड़की का, वह सोच में पड़ गया. हाँ स्मृति... मेरा लिखा ये गाना सिर्फ स्मृति ने सुना है. इस गाने से जुडी उस शाम कि यादों को भुला देने के लिए मैंने कभी ये गाना फिर कहीं गाया ही नही. मनु सोच में पड़ गया. फिर ये..

उसने मंच कि ओर देखा 7 साल का वह मनमोहक व्यक्तित्व वाला बच्चा पूरे सुर ताल के साथ, एक एक राग जमा कर, बड़ी तल्लीनता से उसकी रचना को आकार दे रहा था.

पूरे गाने के दौरान वह नीली आँखों वाले उस बच्चे के चेहरे से आँखें नही हटा पाया था. उसके लिए अनजाने आकर्षण से भर उठा था. गाना ख़त्म करके जब वह बच्चा स्टेज से नीचे आया तो मनु भी धीरे से उठकर उसके पीछे पीछे चल दिया.

"बेटा, रुको" वह तेज कदमो से बच्चे के पीछे गया और उसे रोक लिया.

"आपका नाम क्या है" मनु अधीर हो उठा.

"मेरा नाम मनुज है और आपका?" बच्चे कि निश्छल मुस्कराहट मन मोह लेने वाली थी.

"मेरा नाम मनु है, आपको ये गाना किसने सिखाया" मनु से अब रहा नही जा रहा था.

"हमारे नेम्स कितने सेम हैं न अंकल" मुझे ये गाना मेरी मम्मा ने सिखाया है. वो अक्सर ये गाना गाती हैं और मुझे भी ये गाना बहुत पसंद हैं. मम्मा कहती हैं कि ये गाना मेरे पापा ने बनाया है और वही गाते थे. पर मैं तो उनसे कभी मिला ही नही...

मम्मा कहती हैं पापा दूर कही घूमने गए हैं इसलिए मुझे अब तक मिले नही.

इतना कहकर बच्चा दौड़कर पास खड़े एक नौजवान से जाकर लिपट गया.

"मामा, मामा मैंने अच्छे से गया न आपने सुना मम्मा बहुत खुश होगी है न?" बच्चा उस नौजवान से कहे जा रहा था.

"ओ स्मृति, ये तुमने क्या किया" मनु गहरे पश्चाताप से घिर गया

"कितना स्वार्थी, कितना लापरवाह हूँ मैं. तुम्हारे प्यार को नही समझ पाया. तुम्हारे अंदर मेरे लिए समर्पण को नही देख पाया और खुद को यूं कठोर बनाकर, संगीत के लिए समर्पित करके खुद को महान समझता रहा. उधर तुमने मेरी कठोरता के बाद भी मेरे प्यार को ज़िंदा रखा, उसे अपनी कोमल भावनाओं से सींचती रही." मनु क्षुब्ध हो उठा.

सहसा उसने सर उठकर देखा तो वो नौजवान उस बच्चे को कार में बिठाकर अपने घर कि ओर रवाना हो चला था. मनु भी भाग कर अपनी गाडी की तरफ गया और उनका पीछा करने लगा.

"मैं एक बार तुम्हे खो चुका हूँ स्मृति किस्मत ने दुबारा तुम्हे अपनाने का मौका दिया है. मैं इस मौके को किस भी कीमत में हाथ से जाने नही दूंगा" उस छोटे से रास्ते में जाने कितनी दफा स्मृति कि वो मासूम मुस्कराहट उसकी आँखों के आगे घूम गयी थी.

आखिर रास्ता ख़त्म हुआ. बच्चा कार से उतरकर अपने मामा के साथ घर के दरवाजे की तरफ बढ़ा. मनु भी अपनी कार से उतरकर उनका पीछा करने लगा.

बच्चे के मामा ने कॉलबैल बजाई तो एक खूबसूरत मगर कमजोर सी दिखने वाली लड़की ने दरवाजा खोला.

"स्मृति, हाँ ये स्मृति ही है और ये, ये बच्चा मेरा बेटा मनुज" मनु की सारी कठोरता पिघलकर उसकी आँखों से बहने लगी. वो भागकर स्मृति और मनुज को गले लगा लेना चाहता था.

किसी तरह उसने खुद को सम्हाला. दरवाजा तब तक बंद हो चुका था. उसे किसी ने देखा नही था. वह धीरे धीरे भारी कदमो से दरवाजे कि तरफ बढ़ रहा था. उसके दिमाग में अनेको विचार आ-जा रहे थे.

"क्या पता स्मृति ने मेरे बिना ये 8 साल कैसे गुजारे होंगे?"

"दुनिया के सवालों का क्या जवाब दिया होगा?"

"क्या मनुज को मेरी सच्चाई पता होगी क्या सोचता होगा वह?"

"और सबसे बड़ी बात क्या स्मृति मुझे अपना लेगी?"

सोच विचार के सौंदर्य में गोते लगाता हुआ वह दरवाजे तक पहुंच गया और कांपते हाथों से उसने कॉलबैल बजाई.

स्मृति ने दरवाजा खोला और मनु को देखकर चौंक गयी.

"अ..आ..आप?" वह कुछ कहती इस से पहले ही मनु ने उसके होठो पर अपना हाथ रख दिया.

"कुछ मत कहो स्मृति...मुझे माफ़ कर दो...मैं तो माफ़ी के लायक भी नही हूँ" मनु की जुबान लड़खड़ा रही थी.

स्मृति को समझ नही आ रहा था कि वह इस लम्हे को कैसे जिए. ये ८ साल उसने कही न कही इसी उम्मीद में गुजारे थे कि एक न दिन मनु जरूर आएगा और आज जब वह दिन आ गया है तो स्मृति को कुछ समझ नही आ रहा है कि वह क्या करे.

मनु ने स्मृति को गले लगा लिया. मनुज को ये सब बहुत अजीब लग रहा है.

"मम्मा", वो स्मृति के पास आकर बोला. "ये चीफ गेस्ट अंकल आपको गले क्यों लगा रहे हैं"

मनु ने अपने घुटनो पर बैठकर उसे गले लगते हुए कहा, "बेटा, मैं आपका पापा हूँ."

मनुज ख़ुशी से भर उठा. "क्या आप मेरे पापा हो? आप बहुत बड़े म्यूज़िक स्टार हो न" उसने चहकते हुए कहा.

"तुम्हारे जितना अच्छा सिंगर नही हूँ बेटा" मनु ने उसके सर पर हाथ फेरते हुए कहा.

"आप मुझे अपना ऑटोग्राफ दो न पापा मनुज ने अपना हाथ आगे कर दिया.

मनु ने जेब से पेन निकालकर उसके हाथ पर "मनुस्मृति" लिख दिया.

स्मृति मुस्कुराती हुई कॉफ़ी बनाने चली गयी...

“मोहे प्यार की राग सिखा दे सजना

अंग अंग झंकार सजा लूँ"

मनु अपने बेटे को अपनी आवाज़ में सुना रहा था.