Khwabo ki Kimmat in Hindi Fiction Stories by Khushi Saifi books and stories PDF | ख़्वाबों की क़ीमत

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ख़्वाबों की क़ीमत

ख़्वाबों की क़ीमत – पार्ट 1

अवनि दुल्हन बनी घर के दरवाज़े पर खड़ी थी जो अभी लाल गुलाब के फूलों से सजी मर्सटीज़ से उतरी थी.. उसके चारो तरफ न जाने कौन कौन लोग खड़े थे बस कानों में तरह तरह की आवाज़ें आ रही थी जिससे वो माहौल का अंदाज़ा लगाने की कोशिश कर रही थी। कोई कह रहा था “अरे कलश तैयार करो दुल्हन आ गयी है” पास से आवाज़ आयी “मम्मी जी कलश तैयार है, मैं लाती हूँ”

“सौरभ कहाँ गया” फिर अवनि के कानों में आवाज़ पड़ी। “दोस्त को दरवाज़े तक छोड़ने गया है” कोई मरदाना आवाज़ काम में गुंजी।

“ये दोस्त से मिलने का वक़्त है क्या, बुलाओ उसे.. ग्रह प्रवेश की रस्म करनी है” काफी नाराज़गी वाले अंदाज़ में कही गयी बात सुनाई पड़ी, अवनि को लगा ये शायद उसकी सास की आवाज़ है, कहने को वो घूंघट में थी पर सब चहल-पहल महसूस कर रही थी। आवाज़ों से अंदाज़े लगाती अवनि के हाथ को अचानक किसी हाथ ने थाम लिया। अवनि ने गुंघट से नीचे झांक कर देखा तो सफेद शेरवानी में सुनहरे दबके का काम हुई आस्तीन में किसी का हाथ दिखा.. अवनि को जैसे ही हाथ पकड़ने वाले का अंदाज़ा हुआ वो समझ गयी कि ये कोई और नही बल्कि उसका पति सौरभ था। उसे मालूम था सौरभ ने ही इस तरह की शेरवानी पहनी है, बारात के स्वागत के वक़्त ऊपर कमरे की खिड़की से सहेलियों के साथ सौरभ को देख लिया था।

सौरभ के हाथ पकड़ने पर अवनि को यूँ महसूस हुआ मानो किसी अपने का साथ मिल गया, इतने सारे अंजान लोगो में एक जाना पहचाना कोई अपना सा आ मिला।

“देवर जी, केवल आपको साथ खड़ा होना है हाथ नही पकड़ना” किसी ने बहुत शरारती अंदाज़ में कहा और साथ ज़ोर से हँसी भी।

“भाभी, कुछ घंटे पहले ही इस हाथ को पकड़ने के सारे राइट्स मुझे मिल गए हैं” अवनि ने महसूस किया जैसे सौरभ ने अपने हाथ की पकड़ और मज़बूत कर दी, अवनि के मन में ख़ुशी की एक अनकही बे नाम सी लहर दौड़ गयी.. पर अचानक ही उसका हाथ उस मज़बूत गिरफ्त से छूट गया।

“सौरभ दुल्हन के इस तरफ आ कर खड़ा हो” सौरभ का हाथ अपने हाथ से छूटते ही एक आवाज़ कान में पड़ी.. उसकी सास की आवाज़.. “शायद इसी लिए सौरभ ने हाथ छोड़ दिया, लगता है बहुत इज़्ज़त करते हैं अपनी माँ की” अवनि ने मन में सोचा।

“आओ बहु, ये हल्दी की थाली में हाथ लगा कर यहाँ लगा दो” अवनि की सास ने एक तरफ इशारा कर के कहा।

अवनि ने हल्दी की थाली में हाथ भिगो कर दीवार पर लगा दिए, जहाँ पहले भी हल्दी के हाथ लगे हुए थे। अवनि हल्दी के हाथ लगा चुकी तो फिर उसकी सास ने बोला “आओ अब इस चावल के कलश को पैर से गिराओ फिर महावर की थाली में दोनों पैर रख कर अंदर आ जाओ” अवनि अपनी सास के कहे हुक्म पर कदम बढाती जा रही थी।

ग्रह प्रवेश और कुछ रस्मों के बाद सब अवनि के इर्द गिर्द बैठ गये और हँसी मज़ाक करने लगे.. कोई अवनि को छेड़ता तो कोई दूर बैठे सौरभ का ज़िक्र कर उसे चुटकी भरता। अवनि के लिए सब बिलकुल नया था क्योंकि अपने मायके में उसने ये सब नही देखा था.. घर में पहली शादी अवनि की हुई बाकि दो छोटे भाई अभी पढ़ रहे थे।

***

हँसी मज़ाक का दौर ख़त्म हुआ तो अवनि की बड़ी नन्द उसे दूसरे कमरे में ले गयी। वो शायद सौरभ का कमरा था जिसे गुलाबों के फूलों से सजाया गया था, उसके दहेज़ में आये डबल बेड को भी लाल और सफ़ेद फूलों की लड़ियों से सजाया गया था, बेड के बीच में लाल फूलों से एक बड़ा सा दिल बना हुआ था। कमरे में सब तरफ से गुलाबो की ख़ुशबू आ रही थी मानो वो एक गुलाब के फूलों के बगीचे में आ खड़ी हुई हो और सौरभ उसके साथ बगीचे में टहल रहा है।

“अवनि तुम यहाँ बेठो, मैं सौरभ को भेजती हूँ” अचानक अपनी नन्द की आवाज़ से अवनि ख़्वाबों से निकल कर हक़ीक़त की दुनिया में आ गयी और बड़ी नन्द के कहे अनुसार बैठ गयी।

नन्द के जाने के बाद अवनि कमरे को चारों तरफ से देख रही थी, कमरे में उसके दहेज़ में आये फर्नीचर को काफी सलीके से रखा गया था.. सब सामान अपनी अपनी जगह रखा जच रहा था। कमरे के बाहर किसी के आने की आहट हुई तो अवनि दिल की हलचल और सजे सँवरे चेहरे को गुंघट में छुपा कर सही हो कर बैठ गयी।

“सौरभ सुन ज़रा मेरी बात” सौरभ की माँ ने आवाज़ लगायी।

“हाँ मम्मी क्या हुआ”

“अवनि का खास ख्याल रखना है, वजह तुझे पता है... और याद रहे वो बात कभी अवनि को पता नही चलनी चाहिए” सौरभ की माँ ने राजदारी से कहा।

“मुझे पता है मम्मी, आप बेफिक्र रहो.. मैं भाई की तरह बेवक़ूफ़ नही हूँ” सौरभ ने माँ को तसल्ली दिलायी।

“तुमारा भाई वाकई तुम्हारी तरह नही, पर याद रहे अगर मेरा हिस्सा गोल करने की कोशिश की तो तुम सब जानते हो मैं क्या कर सकती हूँ” पास से गुज़रती भाभी ने सौरभ और सास की बातें सुनी तो बोले बिना नही रह सकी।

“चुप कर बहु, ज़्यादा पैर फैलाने की ज़रूरत नही है” सौरभ की माँ ने बड़ी बहु को घूरा।

“ठीक है बेटा तू अंदर जा और बहू तू मेरे साथ आ.. बहुत काम पड़ा है अभी” माँ और भाभी चली गयी और सौरभ कमरे की तरफ बढ़ गया। दुल्हन बनी अवनि को कुछ समझ नही आया बस कुछ खट पट और किसी के आने की आहट.. अन्दर आने वाला सौरभ था जो हाथ में एक छोटा सा गिफ्ट ले कर अंदर आ गया, अवनि के पास बैठ कर उसका गुंघट उठाया तो कुछ पल के लिए उसकी खूबसुरती में खो गया और यूँ ही कुछ खामोश खूबसूरत लम्हे गुज़र गये। अवनि ने थोड़ा सा पहलु बदला तो उसकी चूड़ियों की खनखनाहट की आवाज़ से सौरभ संभल गया।

“एक खूबसूरत गुलाब के लिए छोटा सा तोहफा मुझ नाचीज़ की तरफ से” सौरभ ने एक बहुत ख़ूबसूरत सोने की अंगूठी अवनि के नाजुक सी ऊँगली में डाल दी।

“थैंक यू, बहुत प्यारी अंगूठी है” अवनि ने हाथ में पड़ी अंगूठी की तरफ देखते हुए धीमे लहज़े में कहा।

“तुम से प्यारी नही” सौरभ ने प्यार भरी नज़रों से देखते हुए कहा जिसे सुन कर अवनि शर्मा गयी।

“इस लाल जोड़े में तुम भी एक लाल गुलाब लग रही हो.. मुझे लाल गुलाब बहुत पसंद हैं इसलिए इस कमरे को भी गुलाबो से सजाया है” सौरभ और अवनि घंटो बातें करते रहे और यूँ एक खूबसूरत रात की सुबह हो गयी।

***

अगली सुबह अवनि पगफेरे की रस्म के लिए सौरभ के साथ अपने मायके गयी। अपने माँ बाप से मिल कर उसे ऐसा लगा जैसे सदियों बाद मिलने आयी है, बहुत देर माँ के गले लग कर दिल में सुकून भरती रही। अपने पापा के चेहरे पर थकन साफ़ महसूस की उसने, सोचा कल शादी की वजह से शायद पापा थक गए हैं।

“अवनि तू खुश है बेटा” अवनि के पापा ने पूछा।

“हाँ पापा मैं बहुत खुश हूँ, सब बहुत अच्छे हैं वहां” अवनि ने खुश हो कर कहा।

“बेटा तेरी ख़ुशी के खातिर ही तो तेरे पापा ने.....”

“अरे क्या बातें ही करती रहोगी, अवनि को कुछ खिलाओ पिलाओ, शाम में दामाद जी भी आने वाले हैं उनके स्वागत के लिए कुछ इन्तेज़ाम किया है या नही” अवनि की माँ कुछ बोलना चाहती थी पर उसके पापा ने बीच में ही बोल कर उन्हें आगे बोलने से रोक दिया.. वो भी समझ गयी की अवनि के पिता नही चाहते कि कोई भी बात अवनि को पता चले इस लिए चुप हो गयी।

“हाँ, खाने का प्रोग्राम है.. साथ ही खीर पूरी भी बनायीं है” अवनि की माँ बोली।

“ठीक है... अच्छा सुन अवनि, अमेरिका कब तक जाना होगा तुम दोनों का” अवनि के पिता ने पूछा।

“बस पापा, ये कह रहे थे कि एक हफ्ता बाद विज़ा लग जायेगा मेरा, तो निकल जायँगे। अवनि ने कहा।

“ठीक है बेटा, मैं ज़रा बाजार से ज़रूरी सामान ले आऊं” अवनि के पिता के कर बाहर चले गए। पूरा दिन बातों और मौज मस्त से गुज़र गया, अवनि के दोनों भाई सौरभ से खूब घुल मिल गए थे और सौरभ भी बहुत मोहब्बत से सब से मिला। शाम में सौरभ अवनि को अपने साथ में घर ले आया।

सास का दुलार और सौरभ का प्यार अवनि के मन में ख़ुशी और सुकून भर देता, वो खुद को खुशनसीब समझती कि इतना प्यार करने वाले सास ससुर मिले जो बिलकुल उसे उसकी माँ बाप की तरह प्यार देते। एक महीना होने को आया शादी को और सास ने किसी काम को हाथ नही लगाने दिया। ऐसे ही ससुराल और पति के ख्वाब देखा करती थी अवनि जो पूरा हो गया था।

“अवनि, कहाँ हो यार.. देखो तुम्हारा विज़ा लग गया.. हम अब दोनों साथ में अमेरिका जायँगे” सौरभ अवनि को ढूंढता अंदर कमरे में आ गया और उसे खुशखबरी दी।

“क्या, सच कह रहे हैं आप” अवनि ने पेपर्स देखते हुए ख़ुशी और ताज्जुब के मिले जुले अंदाज़ में कहा।

“हाँ मेरी जान, बस अब तैयारी पकड़ो और पैकिंग शुरू कर दो” सौरभ ने अवनि को अपनी बाँहों में भरते हुए कहा।

“पैकिंग तो जब करुँगी जब आप छोड़ेंगे” अवनि ने खुद को छुड़ाते हुए कहा और अपनी सास को ये खुशखबरी सुनाने चली गयी।

.To be continue in part 2

“Dear readers, apko meri likhi kahani kysi lagi plz feel free to comment.. I’ll take ur comments as feedback.. Thank you..

-Khushi Saifi