Jine ki vo kashmkash in Hindi Short Stories by Vinita Shukla books and stories PDF | जीने की वो कशमकश

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जीने की वो कशमकश

जीने की वो कशमकश

विनीता शुक्ला

मुकुन्दन नायर कंप्यूटर पर अपने प्रोजेक्ट की रूपरेखा बना रहा था कि विशम्भरन सर जोर जोर से उसका नाम पुकारते हुए वहां आ गये. नायर चौंक उठा. आखिर ऐसी कौन सी जरूरत आन पड़ी विशम्भरन सर को, जो ऐसे उतावले हो रहे थे. उसने कंप्यूटर कक्ष से निकलकर कहा, “मैं यहाँ हूँ सर. कोई जरूरी काम था क्या?

“हाँ...जल्द से जल्द एक आर्टिकल लिखना होगा तुम्हें”

“आर्टिकल?” मुकुन्दन अनिच्छा से बोला. कंप्यूटर पर मगजमारी के बाद, उसका कुछ भी करने को दिल नहीं कर रहा था. पर उसके वरिष्ठ अधिकारी विशम्भरन तो अपनी ही धुन में थे, “मुकुन्दन हेड ऑफिस ने हाल में ही एक सर्वे किया था. उसके हिसाब से, केरल में आत्महत्या की दर बढती ही जा रही है. देश के अन्य भागों की तुलना में, इन मौतों की संख्या... लगभग तीन गुनी है.”

“ओह!” मुकुन्दन सिहर उठा. उसकी इस प्रतिक्रिया से, विशम्भरन उत्साहित हो गये. “यू नो, हर रोज २८ लोग मर जाते हैं यहाँ- इस तरह. तो क्यों न... इन आंकड़ों के साथ, तुम्हारा एक जोरदार लेख भी हो जाये? आफ्टर आल- यू आर द बेस्ट, एट राइटिंग सच काइंड ऑफ़ स्टफ!” कहकर वे हंस पड़े. उनकी वो हंसी, नश्तर बनकर, उसे भीतर तक, चीरती चली गयी. हंसी के साथ साथ, कुछ चीखें भी सुनाई पड़ने लगी थीं. चीखें- जिन्हें केवल वो ही सुन सकता था! संभलने की कोशिश में, अपने सर को झटक दिया था उसने. विशम्भरन जा चुके थे, मुकुन्दन को एक विचित्र मनोदशा में अकेला छोड़कर.

मलयाली समाज में व्याप्त वह आत्मघाती प्रवृत्ति, विषाद से टूटते हुए लोग...दम तोडती हुई जिजीविषा – इन सबको कलमबद्ध कर पाना सहज नहीं था. अवसाद- केरल की दौडती- भागती हुई जिन्दगी का कडवा सच! किसी को, दूसरे के दुखदर्द के लिए, समय नहीं. मशीनी तर्ज़ पर जीते हुए, सम्वेदनाएँ भी सुन्न पड़ जाती हैं. खिन्नता के लक्षण, वयस्कों ही नहीं, किशोरों और बच्चों में भी पाए जाते हैं; और जब बचपन ही अवसादग्रस्त हो तो फिर भविष्य...! इस विचार के साथ, लेख की अच्छी शुरुआत की जा सकती थी लेकिन यह ख्याल तो, बवंडर की शक्ल, अख्तियार कर चुका था. अवचेतन में पुनः कोई चीत्कार गूँज उठी. तीन साल के अप्पू की चीत्कार; जो चिल्ला चिल्ल़ाकर कह रहा था, “अम्मा मुझे यहाँ मत छोडो. नहीं रहना मुझे यहाँ. मैं...मैं तुम्हारे साथ चलूँगा” माँ का चेहरा पल भर को नर्म पड़ता है, पर पुनः कठोर हो जाता है, “अप्पूसे, बोला ना- जिद नहीं करते. फैक्ट्री से लौटते वक़्त, गुब्बारा लेती आऊँगी तुम्हारे लिए” और फिर वह चोरों की तरह नजर चुराते हुए आगे बढ़ जाती है. शिशुगृह में उसका बेटा अकेला छूट जाता है, रोते बिसूरते और पैर पटकते हुए...”

नायर ने स्वयम को सहेजा और लिखना शुरू किया, “बाजारवाद की माया में पड़कर, समाज का निचला तबका, हैसियत न होने के बावजूद, सुख- सुविधा के सामान जुटा लेता है. बदले में पाता है भारी भरकम क़र्ज़ की सौगात; जो अंततः उनके गले का फंदा बन जाता है. ऐसी कई घटनाएँ देखने सुनने में आई हैं, जब लोगों ने अपने बच्चों को जहर देकर, खुद की भी इहलीला समाप्त कर ली. कारण- उधार चुकाने में असफल होना. आत्महत्या की घटनाओं में, उधारचक्र की एक बड़ी भूमिका है.

मुकुन्दन ने गहरी सांस ली. लेख पर एक सरसरी निगाह डालने पर लगा कि यहाँ उसने, निम्नवर्ग और निम्नमध्यम वर्ग की दुश्वारियों की चर्चा ही नहीं की. वे मजदूर, जो दिन भर हाड़तोड़ मेहनत करने के बाद भी, मोटे चावल और रसम पर गुजारा करते हैं, या किसी सस्ते होटल में चाय के साथ मैदे का पराठा गटक लेते हैं. वे औरतें जो घर घर बर्तन मांजती हैं और शाम को अपने शराबी, नाकारा पतियों के हाथों धुन दी जाती हैं. बड़ी बड़ी डिग्रियों के बावजूद; चतुर्थ श्रेणी की नौकरी, करने पर मजबूर इंसान. शराब की लत में घरबार लुटाते हुए नशेड़ी. शराब...हाँ ये अच्छा सूझा! मुकुन्दन ने अब पियक्कड़ों के बारे में लिखना शुरू किया, “ केरल में पियक्कड़ों की संख्या कहीं अधिक है. यह प्रांत, इस मामले में पंजाब और हरियाणा को भी पीछे छोड़ देता है. इसलिए इसे ‘गॉड्स ओन कंट्री’ के बजाय ‘एल्कोहल्स ओन कंट्री’ कहना शायद ज्यादा मुनासिब होगा. इस तरह धीरे धीरे करके उसने डेढ़ पेज लिख लिए.

‘गनीमत है’ नायर ने सोचा, ‘लग रहा था कि कुछ भी नहीं लिखा जाएगा. चलो...कम से कम एक खाका तो बन गया दिमाग में- कि कैसे लिखा जाना है.’ उसने फिर आर्टिकल को जांचा. अंतिम चंद पंक्तियों को पढ़कर, वह स्वयम से बोला, ‘वाकई पीने की आदत ने, बहुतेरे घर उजाड़ दिए हैं यहाँ’ ऐसा विचारते ही, उसे पुनः अप्पू की चीखें सुनाई पड़ने लगीं, “अच्चन(पिता), स्कूल में मुझे पी. टी. मिस ने मारा! आप जाकर प्रिंसिपल से शिकायत क्यों नहीं करते?” अप्पू के अच्चन, जो एक सेल्समैन थे... उस दिन कुछ ज्यादा ही ‘चढ़ाये हुए’ थे; मैनेजर की डांट से, खीज जो गये थे. वही गुबार, बेटे पर, कहर बनकर टूट पड़ा,”तू यहां से जाता है कि टीचर की तरह मैं भी जमाऊँ दो चार हाथ!” अच्चन की गर्जना सुनकर, अम्मा झट से आयीं और अप्पू को वहां से ले गयीं. बोली, “कितनी बार कहा है, छोटी छोटी बातों के लिए अच्चन को परेशान मत कर. कितना थके हुए आते हैं दफ्तर से.”

फिर उन्होंने अप्पू को एक चॉकलेट देते हुए ताकीद की, “स्कूल में तो ये सब चलता ही है. भूल जाओ. जाओ मिट्टाई (मिठाई) खाओ और मौज करो.” माँ के पास कुछ और कहने सुनाने का वक़्त नहीं था, सो वो रसोईं में चली गयीं. अप्पू ने अपनी लाल हथेलियों पर नजर डाली, जिन पर टीचर ने खड़े स्केल से वार किया था. उसकी हिम्मत नहीं पड़ी, उन्हें अम्मा को दिखाने की. इसी से, जब वे उसे चॉकलेट दे ही थीं तो उसने अपने हाथ पीछे कर लिए थे. माँ समझीं कि बेटा रूठा है और मिठाई उसके मुंह में ठूंसकर चली गयीं. पर बात तो कुछ और ही थी. बेटे ने देख लिया था कि उसकी माँ खुद ही फैक्ट्री से अपने हाथ जलाकर आई थी. उन जले हुए हाथों से वह, उसकी हथेलियों को भला कैसे सहलाती? फैक्ट्री में काजू बनाने की प्रक्रिया बड़ी कठिन थी. कच्चे काजुओं से जो तेजाब जैसा द्रव टपकता रहता, वह अक्सर हाथों को जला देता था. मुकुन्दन ने खुद को झिड़का. लेख में मैन को एकाग्र करने के बजाय, वो अपनी एक अलग समानांतर सोच लेकर बैठ जाता है! खैर...आत्महत्या से जुड़ा दूसरा प्रकरण, साक्षरता का था.

वह फिर लिखने लगा, “ सौ प्रतिशत साक्षरता होना इस प्रांत के लिए गर्व की बात है. पर विद्यालय, महाविद्यालय तो, औसत दर्जे के छात्रों को पैदा करने की इंडस्ट्री हैं; कॉलेज के बाद, जिन्हें नौकरी तक के लाले पड़ने लगते हैं. निरुद्देश्य इधर- उधर घूमना, बेखुदी में एकाध पैग चढ़ा लेना और सिगरेट फूंककर जी हलकान करना, इनमें से कइयों के शगल होते हैं. ऐसे में युवा एक अंतहीन भटकाव के शिकार बन जाते हैं. हताशा और इच्छाशक्ति की कमी, इन्हें ले डूबती है और खुदकुशी के लिए उकसाती है.” लिखते हुए मुकुन्दन ने अचानक, अपने कंधे पर किसी का हाथ महसूस किया. पलटकर देखा तो विश्म्भरन सर, खड़े मुस्करा रहे थे. वह उत्साहित होकर आगे लिखने लगा, “साक्षर होना अच्छी बात है पर यही साक्षरता, यहाँ के श्रमिक वर्ग का दुर्गुण बनी हुई है. पढ़े- लिखे होकर भी ये लोग, समाज में हेय समझा जाने वाला धंधा करने पर मजबूर हैं. इनकी यही खीज और अपने काम के प्रति अश्रद्धा, यहाँ के उद्योगों पर बुरा असर डालती है और उद्योगों का सीधा सम्बन्ध बेरोजगारी से है. यहाँ मजदूरों की, बड़ी बड़ी यूनियनें हैं और ये बात बात पर अपना कम्युनिस्ट वाला झंडा लेकर खड़े हो जाते हैं; जिसके चलते कई उद्योगपति केरल से अपना काम समेटकर, कहीं और जमा लेते हैं.” अगला मुद्दा स्वतः ही, बेरोजगारी से जुड़ गया था.

नायर को जमुहाई आ गयी. उसने अपने हाथ ऊपर को फैलाकर, उन्हें थोड़ा आराम दिया. समय कम था, लिहाज वो फिर से कलम लेकर जुट गया, “केरल में शिक्षित बेरोजगारों की एक बड़ी फ़ौज है. नौकरी न मिलने की स्थिति में, ये अन्य प्रदेशों में जाकर बस जाते हैं ...’ ...आदि आदि. बेरोजगारी के कारण आत्महत्या करने वालों की चर्चा के साथ, मुकुन्दन ने विषय बदल दिया, “एकल परिवारों की बढती हुई संख्या भी इस समस्या का कारण है. एकल परिवार में रहने के कारण, बच्चों का सम्पूर्ण विकास नहीं हो पाता. माँ- बाप दोनों के काम पर जाने से, घर में उन्हें देखने वाला कोई नहीं होता. उचित देखभाल के अभाव में उनमें धैर्य, सहनशीलता जैसे गुणों की कमी होती जाती है.” सहसा मुकुन्दन को कुछ याद आ गया और उसने अपने कान बंद कर लिए. अप्पू की चीख पुनः उसकी चेतना पर दस्तक देने लगी थी.

अच्चन अप्पू को डांट रहे थे, “किताब फट कैसे गयी?”

“मेरे क्लास में वो बालू है ना...अरे वही, जो बार बार मुझसे लड़ाई करता है...उसी ने”

“”ये तेरी ही गलती है...टीचर से क्यों नहीं कहा?! खुद अपनी चीजों का ख़याल नहीं रख पाता...बहाने गढ़ता है”

“मैंने टीचर से कहा...पर वो सुनती कहाँ हैं!”

“अच्छा जाओ यहाँ से...भेजा मत खाओ. छुट्टी के दिन भी लडका, चैन से नहीं बैठने देता!...” अच्चन बड़बड़ाये और अप्पू चुपचाप सर झुकाकर, वहां से चला गया. यह अप्पू की आखिरी चीख थी. उसकी जरा ज़रा सी शिकायतों को, सिरे से नकार दिया जाता. उसने तय किया कि अब वो कभी शिकायत नहीं करेगा. वह अपने में ही गुम रहने लगा और धीरे धीरे अंतर्मुखी बनता गया. मुकुन्दन बुदबुदाया- अप्पू उर्फ़ कृष्णन नायर और वो खुद उसका बड़ा भाई, उसका चेट्टा मुकुन्दन नायर. अप्पू की हर परेशानी को गहराई से महसूस किया था उसने. उसकी हर पीड़ा को अपने भीतर जिया था. तभी तो रह रहकर, उसका आर्तनाद सुन सकता है वो!

सबसे ज्यादा उसने ही तो जाना था, छोटे भाई का दुःख!! उसी के साथ बांटता था, वह सारे संताप. उनके माँ- बाप को, बच्चे का दुखड़ा सुनने के लिए; न समय था, न धैर्य. ‘नोन तेल लकड़ी’ के झमेले में फंसकर रह गये थे दोनों. बचपन से बस चेट्टा( बड़ा भाई) ही मिला कृष्णन को, साथ चलने के लिए. जब संगी साथी उसे काका(कौवा) कहकर चिढाते तो चेट्टन उन्हें डांट दिया करता. उसके आंसू भी अपने रूमाल से पोंछ देता. मुकुन्दन, कृष्णन से पूरे सात साल बड़ा था पर चाहकर भी, उसका पिता नहीं बन पाया. अचम्मा(दादी) की बहुत याद आती है मुकुन्दन को. दस बरस की उमर तक, उन्होंने उसे पाला था. वे सदा उसके लिए, भावनात्मक सम्बल बनी रहीं.

छोटे बच्चे को सहारे की दरकार होती है; ताकि जब वो हँसे, कोई उसके साथ हँसे; दुखित हो तो उसे दिलासा दे और लडखडाने पर, हाथ बढ़ाकर थाम ले. बालमन कोमल होता है और रिश्तों के प्रति संवेदनशील भी. अचम्मा की सलाह पर ही, उसके माता- पिता ने. दूसरे बच्चे को जन्म देने का निश्चय किया. अफ़सोस! अप्पू के तीन साल का होते होते, वे चल बसीं. अगर वे होतीं तो कृष्णन के जीवन की नींव, इतनी खोखली न होती! उनका प्रेम, उनकी आस्था उसे भीतर से इतना मजबूत कर देते कि वो कभी टूटता नहीं. अगर मुकुंदन में भी वैसी परिपक्वता होती,...तो बेशक वह कृष्णन को संभाल लेता – ठीक उनकी ही तरह. पर कैसे?! वो तो खुद एक बच्चा था. बड़ों जैसी समझ कहाँ से लाता!! अप्पू का उसके सहपाठियों से तालमेल न होना, पढाई की दिक्कतें और अध्यापकों का दुर्व्यवहार- कितनी ऐसी समस्याएं, जिन्हें कोई बड़ा ही सुलझा सकता था.

मुकुन्दन ने तय किया कि अब वह कुछ नहीं सोचेगा, अप्पू की चीखों को सुनकर भी अनसुना कर देगा. वह ध्यानरत होकर, लेख को पूरा करने में लग गया. लेख को आकार देने के बाद, उसने आंकड़ों को जांचने के लिए इन्टरनेट खोला. इन्टरनेट की जानकारी से उसे याद आया कि वह बेरोजगारी वाले मुद्दे पर, एक बात लिखना तो भूल ही गया; यह कि कार्यक्षेत्र में महिलाओं की भागीदारी ज्यादा होने से, पुरुष वर्ग को, सेवा के अवसर कम ही मिल पाते हैं. परन्तु इस जानकारी से, उसे कुछ और भी याद आ गया- वह था कृष्णन की महिला मित्र रम्या का चेहरा. वो अप्पू से कह रही थी, “कृष्णन मेरे घरवाले, तुम्हारी नौकरी लगने का, अब और इंतज़ार नहीं कर सकते. वो मेरी शादी कहीं और तय कर रहे हैं”

“क्यों? उनके पास तो तुम्हें ब्याहने के लिए दहेज तक नहीं था...कोई गड़ा खजाना हाथ लग गया है क्या?!” अप्पू के स्वर में व्यंग्य उभर आया था.

“खजाना तो नहीं, एक नौकरी जरूर हाथ लग गयी है मेरे! और तुम तो जानते हो, केरल में नौकरीशुदा दुल्हन की वकत दहेज़ से कहीं ज्यादा है”

“तो अब तुम मुझमें कोई दिलचस्पी नहीं रखतीं...”

“बी प्रैक्टिकल कृष्णन...मैं अपने माँ बाप को निराश कैसे करूं? आखिर उन्होंने मुझे जन्म दिया है...मुझे पाला पोसा है” रम्या का लहजा, आत्मकेंद्रित हो चला था. “तुम और तुम्हारे माँ बाप- सब मतलबी हैं- मौकापरस्त हैं...खुदगर्ज हैं “ कृष्णन फट पड़ा. “माइंड योर लैंग्वेज कृष्णन...तुम इस तरह बात, कैसे कर सकते हो?...आगे से मुझसे, बोलने की भी कोशिश मत करना” रम्या ने निर्दयता से कहा...फिर चलती बनी. और परिणाम...चीखें वापस सुनाई देने लगी थीं. पर इस बार वो चीखें अप्पू की न होकर, अम्मा की थीं. अम्मा पछाड़ें खा खाकर, अप्पू की निस्पंद देह पर गिर रही थीं. सम्पूर्ण परिदृश्य ही बदल गया था. पहले तो कृष्णन बिलखता था अम्मा के लिए, लेकिन आज सब उलट पुलट हो गया था. आज अम्मा बिलख रही थीं अप्पू के लिए ...और वो पाषाण हो गया था- अम्मा की तरह!! मुकुन्दन सर पकड़कर बैठ गया. नहीं! अब वह कुछ और नहीं लिख सकेगा !

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