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अकबर बीरबल ४

अकबर — बीरबल


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टेढा सवाल

एक दिन बादशाह अकबर और बीरबल वन—विहार के लिए गए।

एक टेढे पेड़ की ओर इशारा करके बादशाह अकबर ने बीरबल से पूछा — यह दरख्त टेढा क्यों हैं?

बीरबल ने जवाब दिया— यह इसलिए टेढा हैं क्योंकि यह जंगल के तमाम दरख्तों का साला हैं।

बादशाह ने पूछा— तुम ऐसा कैसे कह सकते हो?

बीरबल ने कहा— दुनिया में यह बात मशहूर हैं कि कुत्ते की दुम और साले हमेशा टेढे होते हैं।

बादशाह अकबर ने पूछा— क्या मेरा साला भी टेढा है?

बीरबल ने फौरन कहा— बेशक जहांपनाह!

बादशाह अकबर ने कहा फिर मेरे टेढे साले को फांसी चढा दो!

एक दिन बीरबल ने फांसी लगाने के तीन तख्ते बनवाए— श्एक सोने का, एक चांदी का और एक लोहे का।

उन्हें देखकर बादशाह अकबर ने पूछा— तीन तख्ते किसलिए?

बीरबल ने कहा— श्गरीबनवाज, सोने का आपके लिए, चांदी का मेरे लिए और लोहे का तख्ता सरकारी साले साहब के लिए।

बादशाह अकबर ने अचरज से पूछा— मुझे और तुम्हे फांसी किसलिए?

बीरबल ने कहा— क्यों नहीं जहांपनाह, आखिर हम भी तो किसी के साले हैं।

बादशाह अकबर हंस पडे, सरकारी साले साहब के जान में जान आई। वह बाइज्जत बरी हो गया।

खाने के बाद लेटना

किसी समय बीरबल ने बादशाह अकबर को यह कहावत सुनाई थी कि खाकर लेट जा और मारकर भाग जा—यह सयाने लोगों की पहचान है। जो लोग ऐसा करते हैं, जिंदगी में उन्हें किसी भी प्रकार का दुख नहीं उठाना पड़ता।

एक दिन बादशाह अकबर को अचानक ही बीरबल की यह कहावत याद आ गई।

दोपहर का समय था। उन्होंने सोचा, बीरबल अवश्य ही खाना खाने के बाद लेटता होगा। आज हम उसकी इस बात को गलत सिद्ध कर देंगे। उन्होंने एक नौकर को अपने पास बुलाकर पूरी बात समझाई और बीरबल के पास भेज दिया। नौकर ने बादशाह अकबर का आदेश बीरबल को सुना दिया।

बीरबल बुद्धिमान तो थे ही, उन्होंने समझ लिया कि बादशाह ने उसे क्यों तुरंत आने के लिए कहा है।

इसलिए बीरबल ने भोजन करके नौकर से कहा — ‘ठहरो, मैं कपड़े बदल कर तुम्हारे साथ ही चल रहा हूं।

उस दिन बीरबल ने पहनने के लिए चुस्त पायजामा चुना। पाजामे को पहनने के लिए वह कुछ देर के लिए बिस्तर पर लेट गए। पाजामा पहनने के बहाने वे काफी देर बिस्तर पर लेटे रहे। फिर नौकर के साथ चल दिए।

जब बीरबल दरबार में पहुंचे तो बादशाह अकबर ने कहा — ‘कहो बीरबल, खाना खाने के बाद आज भी लेटे या नहीं?'

‘बिल्कुल लेटा था जहांपनाह।'

बीरबल की बात सुनकर बादशाह अकबर ने क्रोधित स्वर में कहा— ‘इसका मतलब, तुमने हमारे हुक्म की अवहेलना की है।

हम तुम्हें हुक्म उदूली करने की सजा देंगे। जब हमने खाना खाकर तुरंत बुलाया था, फिर तुम लेटे क्यों?

‘बादशाह सलामत!

मैंने आपके हुक्म की अवहेलना कहां की है।

मैं तो खाना खाने के बाद कपड़े पहनकर सीधा आपके पास ही आ रहा हूं। आप तो पैगाम ले जाने वाले से पूछ सकते हैं। अब यह अलग बात है कि यह चुस्त पायजामा पहनने के लिए ही मुझे लेटना पड़ा था।' बीरबल ने सहज भाव से उत्तर दिया।

बादशाह अकबर बीरबल की चतुरता को समझ गए और मुस्करा पड़े।

जल्दी बुलाकर लाओ

बादशाह अकबर एक सुबह उठते ही अपनी दाढ़ी खुजलाते हुए बोले, अरे, कोई है?' तुरंत एक सेवक हाजिर हुआ।

उसे देखते ही बादशाह बोले— जाओ, जल्दी बुलाकर लाओ, फौरन हाजिर करो।'

बीरबल सुबह घूमने निकले थे। उन्होंने बादशाह के निजी सेवकों को भाग—दौड़ करते देखा तो समझ गए कि जरूर बादशाह ने कोई अनोखा काम बता दिया होगा, जो इनकी समझ से बाहर है।

सेवक हज्जाम को बुला लाया और उसे बादशाह के सामने हाजिर कर दिया।

बादशाह सोचने लगे, श्मैंने इससे यह तो बताया ही नहीं था कि किसे बुलाकर लाना है। फिर यह हज्जाम को लेकर कैसे हाजिर हो गया ?'

बादशाह ने सेवक से पूछा, श्सच बताओ। हज्जाम को तुम अपने मन से ले आए हो या किसी ने उसे ले आने का सुझाव दिया था?'

सेवक घबरा गया, लेकिन बताए बिना भी तो छुटकारा नहीं था।

बोला, श्बीरबल ने सुझाव दिया था, जहांपनाह!'

बादशाह बीरबल की बुद्धि पर खुश हो गया।

खाने के बाद लेटना

किसी समय बीरबल ने बादशाह अकबर को यह कहावत सुनाई थी कि खाकर लेट जा और मारकर भाग जा—यह सयाने लोगों की पहचान है। जो लोग ऐसा करते हैं, जिंदगी में उन्हें किसी भी प्रकार का दुख नहीं उठाना पड़ता।

एक दिन बादशाह अकबर को अचानक ही बीरबल की यह कहावत याद आ गई।

दोपहर का समय था। उन्होंने सोचा, बीरबल अवश्य ही खाना खाने के बाद लेटता होगा। आज हम उसकी इस बात को गलत सिद्ध कर देंगे। उन्होंने एक नौकर को अपने पास बुलाकर पूरी बात समझाई और बीरबल के पास भेज दिया। नौकर ने बादशाह अकबर का आदेश बीरबल को सुना दिया।

बीरबल बुद्धिमान तो थे ही, उन्होंने समझ लिया कि बादशाह ने उसे क्यों तुरंत आने के लिए कहा है।

इसलिए बीरबल ने भोजन करके नौकर से कहा — ‘ठहरो, मैं कपड़े बदल कर तुम्हारे साथ ही चल रहा हूं।

उस दिन बीरबल ने पहनने के लिए चुस्त पायजामा चुना। पाजामे को पहनने के लिए वह कुछ देर के लिए बिस्तर पर लेट गए। पाजामा पहनने के बहाने वे काफी देर बिस्तर पर लेटे रहे। फिर नौकर के साथ चल दिए।

जब बीरबल दरबार में पहुंचे तो बादशाह अकबर ने कहा — ‘कहो बीरबल, खाना खाने के बाद आज भी लेटे या नहीं?'

‘बिल्कुल लेटा था जहांपनाह।'

बीरबल की बात सुनकर बादशाह अकबर ने क्रोधित स्वर में कहा— ‘इसका मतलब, तुमने हमारे हुक्म की अवहेलना की है।

हम तुम्हें हुक्म उदूली करने की सजा देंगे। जब हमने खाना खाकर तुरंत बुलाया था, फिर तुम लेटे क्यों?

‘बादशाह सलामत!

मैंने आपके हुक्म की अवहेलना कहां की है।

मैं तो खाना खाने के बाद कपड़े पहनकर सीधा आपके पास ही आ रहा हूं। आप तो पैगाम ले जाने वाले से पूछ सकते हैं। अब यह अलग बात है कि यह चुस्त पायजामा पहनने के लिए ही मुझे लेटना पड़ा था।' बीरबल ने सहज भाव से उत्तर दिया।

बादशाह अकबर बीरबल की चतुरता को समझ गए और मुस्करा पड़े।

कुंए का पानी

एक बार एक आदमी ने अपना कुंआ एक किसान को बेच दिया।

अगले दिन जब किसान ने कुंए से पानी खिंचना शुरू किया तो उस व्यक्ति ने किसान से पानी लेने के लिए मना किया। वह बोला, श्मैंने तुम्हें केवल कुंआ बेचा है ना कि कुंए का पानी।

किसान बहुत दुखी हुआ और उसने बादशाह अकबर के दरबार में गुहार लगाई।

उसने दरबार में सबकुछ बताया और बादशाह अकबर से इंसाफ मांगा।

बादशाह अकबर ने यह समस्या बीरबल को हल करने के लिए दी।

बीरबल ने उस व्यक्ति को बुलाया जिसने कुंआ किसान को बेचा था।

बीरबल ने पूछा, तुम किसान को कुंए से पानी क्यों नहीं लेने देते? आखिर तुमने कुंआ किसान को बेचा है।

उस व्यक्ति ने जवाब दिया, श्बीरबल, मैंने किसान को कुंआ बेचा है ना कि कुंए का पानी। किसान का पानी पर कोई अधिकार नहीं है।

बीरबल मुस्कुराया और बोला, श्बहुत खूब, लेकिन देखो, क्योंकि तुमने कुंआ किसान को बेच दिया है, और तुम कहते हो कि पानी तुम्हारा है, तो तुम्हे अपना पानी किसान के कुंए में रखने का कोई अधिकार नहीं है।

अब या तो अपना पानी किसान के कुंए से निकाल लो या फिर किसान को किराया दो।श्

वह आदमी समझ गया, कि बीरबल के सामने उसकी दाल नहीं गलने वाली और वह माफी मांग कर वहां से खिसक लिया।

अब तो आन पड़ी है

बादशाह अकबर को मजाक करने की आदत थी। एक दिन उन्होंने नगर के सेठों से कहा— आज से तुम लोगों को पहरेदारी करनी पड़ेगी। सुनकर सेठ घबरा गए और बीरबल के पास पहुंच कर अपनी फरियाद रखी।

बीरबल ने उन्हें हिम्मत बंधाई— तुम सब अपनी पगडियों को पैर में और पायजामों को सिर पर लपेटकर रात्रि के समय में नगर में चिल्ला—चिल्ला कर कहते फिरो, अब तो आन पड़ी है।

उधर बादशाह भी भेष बदलकर नगर में गश्त लगाने निकले। सेठों का यह निराला स्वांग देखकर बादशाह पहले तो हंसे, फिर बोले— यह सब क्या है?

सेठों के मुखिया ने कहा— जहांपनाह, हम सेठ जन्म से गुड़ और तेल बेचने का काम सीखकर आए हैं, भला पहरेदारी क्या कर पाएंगे, अगर इतना ही जानते होते तो लोग हमें बनिया कहकर क्यों पुकारते?

बादशाह अकबर बीरबल की चाल समझ गए और अपना हुक्म वापस ले लिया।

अंधों की संख्या

यहां पर हमने अकबर—बीरबल के बीच हुए संवादों, घटनाओं को बे ही मजेदार तथा रोचक तरीके से प्रस्तुत करने का प्रयास किया है। जिन्हें अकबर—बीरबल के किस्सों के नाम से जाना जाता है।

एक दिन बादशाह अकबर ने बीरबल से पूछा— बीरबल जरा बताओ तो उस दुनिया में किसकी संख्या अधिक है, जो देख सकते हैं या जो अंधे हैं?

बीरबल बोले, इस समय तुरंत तो आपके इस सवाल का जबाब देना मेरे लिए संभव नहीं है लेकिन मेरा विश्वास है की अंधों की संख्या अधिक होगी बजाए देख सकने वालों की।

बादशाह ने कहा— तुम्हें अपनी बात सिद्ध करके दिखानी होगी, बीरबल ने भी खुशी—खुशी बादशाह की चुनौती स्वीकार कर ली।

अगले दिन बीरबल बीच बाजार में एक बिना बुनी हुई चारपाई लेकर बैठ गए और उसे बुनना शुरू कर दिया, उसके अगल—बगल दो आदमी कागज—कलम लेकर बैठे हुए थे।

थोडी ही देर मे वहां भीड़ इकट्‌ठी हो गई, यह देखने के लिए कि यहां हो क्या रहा है।

वहां मौजूद हर व्यक्ति ने बीरबल से एक ही सवाल पूछा— बीरबल तुम क्या कर रहे हो?

बीरबल के अगल—बगल बैठे दोनों आदमी ऐसा सवाल करने वालों का नाम पूछ—पूछ कर लिखते जा रहे थे, जब बादशाह के कानों तक यह बात पहुंची कि बीच बाजार बीरबल चारपाई बुन रहे हैं, तो वो भी वहां जा पहुंचे और वही सवाल किया— यह तुम क्या कर रहे हो?

कोई जबाब दिए बिना बीरबल ने अपने बगल में बैठे एक आदमी से बादशाह अकबर का भी नाम लिख लेने को कहा, तभी बादशाह ने आदमी के हाथ में थमा कागज का पुलिंदा ले लिया उस पर लिखा था— अंधे लोगों की सूची

बादशाह ने बीरबल से पूछा इसमें मेरा नाम क्यों लिखा है?

बीरबल ने कहा जहांपनाह, आपने देखा भी कि मैं चारपाई बुन रहा हूं, फिर भी आपने सवाल पूछा कि— मैं क्या कर रहा हूं।

बादशाह ने देखा उन लोगों की सूची में एक भी नाम नहीं था जो देख सकते थे, लेकिन अंधे लोगों की सूची का पुलिंदा बेहद भारी था...।

बीरबल ने कहा— हुजूर, अब तो आप मेरी बात से सहमत हो गए होंगे की दुनिया में अंधों की तादाद ज्यादा है।

बीरबल की इस चतुराई पर बादशाह मंद—मंद मुस्करा दिए।

जोरू का गुलाम

बादशाह अकबर और बीरबल बातें कर रहे थे।

बात मियां—बीवी के रिश्ते पर चल निकली तो बीरबल ने कहा— श्अधिकतर मर्द जोरू के गुलाम होते हैं और अपनी बीवी से डरते हैं।'

मैं नहीं मानता। बादशाह ने कहा।

हुजूर, मैं सिद्ध कर सकता हूं। बीरबल ने कहा।

सिद्ध करो?'

ठीक है, आप आज ही से आदेश जारी करें कि किसी के भी अपने बीवी से डरने की बात साबित हो जाती है तो, उसे एक मुर्गा दरबार में बीरबल के पास में जमा करना होगा।'

बादशाह ने आदेश जारी कर दिया।

कुछ ही दिनों में बीरबल के पास ढेरों मुर्गे जमा हो गए।

तब उसने बादशाह से कहा— हुजूर, अब तो इतने मुर्गे जमा हो गए हैं कि आप मुर्गी खाना खोल सकते हैं। अतः अपना आदेश वापस ले लें।

बादशाह को न जाने क्या मजाक सूझा कि उन्होंने अपना आदेश वापस लेने से इंकार कर दिया।

खीजकर बीरबल लौट गया।

अगले दिन बीरबल दरबार में आया तो बादशाह अकबर से बोला— हुजूर, विश्वसनीय सूत्रों से पता चला है कि पड़ोसी राजा की पुत्री बेहद खूबसूरत है, आप कहें तो आपके विवाह का प्रस्ताव भेजूं?'

यह क्या कह रहे हो तुम, कुछ तो सोचो, जनानाखाने में पहले ही दो हैं, अगर उन्होंने सुन लिया तो मेरी खैर नहीं। बादशाह ने कहा।

हुजूर, दो मुर्गे आप भी दे दें। बीरबल ने कहा।

बीरबल की बात सुनकर बादशाह झेंप गए। उन्होंने तुरंत अपना आदेश वापस ले लिया।

जीत किसकी

बादशाह अकबर जंग में जाने की तैयारी कर रहे थे। फौज पूरी तरह तैयार थी। बादशाह भी अपने घोड़े पर सवार होकर आ गए। साथ में बीरबल भी था। बादशाह ने फौज को जंग के मैदान में कूच करने का निर्देश दिया।

बादशाह आगे—आगे थे, पीछे—पीछे उनकी विशाल फौज चली आ रही थी।

रास्ते में बादशाह को जिज्ञासा हुई और उन्होंने बीरबल से पूछा— क्या तुम बता सकते हो कि जंग में जीत किसकी होगी?

हुजूर, इस सवाल का जवाब तो मैं जंग के बाद ही दूंगा। बीरबल ने कहा।

कुछ देर बाद फौज जंग के मैदान में पहुंच गई। वहां पहुंचकर बीरबल ने कहा— हुजूर, अब मैं आपके सवाल का जवाब देता हूं और जवाब यह है कि जीत आपकी ही होगी।

यह तुम अभी कैसे कह सकते हो, जबकि दुश्मन की फौज भी बहुत विशाल है। बादशाह ने शंका जाहिर की।

हुजूर, दुश्मन हाथी पर सवार हैं और हाथी तो सूंड से मिट्टी अपने ऊपर ही फेंकता है तथा अपनी ही मस्ती में रहता है, जबकि आप घोड़े पर सवार है और घोड़ों को तो गाजी मर्द कहा जाता है। घोड़ा आपको कभी धोखा नहीं देगा।' बीरबल ने कहा।

उस जंग में जीत बादशाह अकबर की ही हुई।

छोटा बांस, बड़ा बांस

एक दिन बादशाह अकबर एवं बीरबल बांग में सैर कर रहे थे। बीरबल लतीफा सुना रहा था और बादशाह अकबर उसका मजा ले रहे थे।

तभी बादशाह अकबर को नीचे घास पर पड़ा बांस का एक टुकड़ा दिखाई दिया। उन्हें बीरबल की परीक्षा लेने की सूझी।

बीरबल को बांस का टुकड़ा दिखाते हुए वह बोले, श्क्या तुम इस बांस के टुकड़े को बिना काटे छोटा कर सकते हो?'

बीरबल लतीफा सुनाता—सुनाता रुक गया और बादशाह अकबर की आंखों में झांका।

बादशाह अकबर कुटिलता से मुस्कराए, बीरबल समझ गया कि बादशाह सलामत उससे मजाक करने के मूड में हैं।

अब जैसा बेसिर—पैर का सवाल था तो जवाब भी कुछ वैसा ही होना चाहिए था।

बीरबल ने इधर—उधर देखा, एक माली हाथ में लंबा बांस लेकर जा रहा था।

उसके पास जाकर बीरबल ने वह बांस अपने दाएं हाथ में ले लिया और बादशाह का दिया छोटा बांस का टुकड़ा बाएं हाथ में।

बीरबल बोला, हुजूर, अब देखें इस टुकड़े को, हो गया न बिना काटे ही छोटा।'

बड़े बांस के सामने वह टुकड़ा छोटा तो दिखना ही था।

निरुत्तर बादशाह अकबर मुस्करा उठे बीरबल की चतुराई देखकर।

ऐसे थे बादशाह अकबर के नवरत्न बीरबल

मुगल बादशाह अकबर का नाम आए और बीरबल की बात न निकले ऐसा हो ही नहीं सकता। बीरबल की विनोदप्रियता और बुद्धिचातुर्य ने न केवल बादशाह अकबर, बल्कि मुगल साम्राज्य की प्रजा का भी मन मोह लिया था।

लोकप्रियता में बीरबल का कोई सानी नहीं था। वे उच्च कोटि के प्रशासक, और तलवार के धनी थे। पर शायद जिस गुण के कारण वे बादशाह अकबर को परम प्रिय थे, वह गुण था उनका उच्च कोटि का विनोदी होना।

वैसे तो बीरबल के नाम से प्रसिद्ध थे, परंतु उनका असली नाम महेशदास था। ऐसा विश्वास किया जाता है कि यमुना के तट पर बसे त्रिविक्रमपुर (अब तिकवांपुर के नाम से प्रसिद्ध) एक निर्धन ब्राह्मण परिवार में पैदा हुए थे।

लेकिन अपनी प्रतिभा के बल पर उन्होंने बादशाह अकबर के दरबार के नवरत्नों में स्थान प्राप्त किया था। उनकी इस अद्‌भुत सफलता के कारण अनेक दरबारी उनसे ईर्ष्‌या करते थे और उनके विरुद्ध षड्‌यंत्र रचते थे।

बीरबल सेनानायक के रूप में अफगानिस्तान की लड़ाई में मारे गए। कहा जाता है कि उनकी मृत्यु ईर्ष्‌यालु विरोधियों का परिणाम थी। बीरबल की मृत्यु के समाचार से बादशाह अकबर को कितना गहरा आघात पहुंचा था।

इसका परिणाम है उनके मुख से कविता के रूप में निकली ये पंक्तियां —

दीन जान सब दीन,

एक दुरायो दुसह दुख,

सो अब हम को दीन,

कुछ नहीं राख्यो बीरबल।

बहुत कम लोगों को पता होगा कि बीरबल एक कुशल कवि भी थे। वे ‘ब्रह्म' उपनाम से लिखते थे। उनकी कविताओं का संग्रह आज भी भरतपुर—संग्रहालय में सुरक्षित है।

बादशाह अकबर के लिए बीरबल सच्चे सखा, सच्चे संगी थे। बादशाह अकबर के नए धर्म दीन—ए—इलाही के मुख्य 17 अनुयायियों में यदि कोई हिंदू था, तो वे अकेले बीरबल।