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मोदीजी के भाषण - मम बिज़नेस बेस्ट मार्केट

मर्म बिजनेस बेस्ट मार्केट

एनालिस्ट अवॉर्ड

24 जुलाई, 2013

विरेन्द्र बघेल



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र्मम बिजनेस बेस्ट मार्केट एनालिस्ट अवॉर्ड

24 जुलाई, 2013

सामान्य रूप से ऐसे कार्यक्रम मुंबई में ही होते हैं, और इसके कारण इस प्रकार के कार्यक्रम को ऑर्गनाइज करने का भी मुंबई का स्वभाव है और ऑडियंस को भी आदत होती है....। लेकिन मैं सुभाष जी का आभारी हूँ कि उन्होंने इस कार्यक्रम के लिए गुजरात को चुना...। अगर आप एक बार अहमदाबाद में सफल हो गए, तो फिर आपकी गाड़ी कहीं रुकती नहीं है...। हम अहमदावादियों की पहचान है, ‘सिंगल फेयर, डबल जर्नी'...। और ये आपका क्षेत्रा ऐसा है जिसमें हर कोई अपने इन्वेस्टमेंट का कुछ न कुछ रिवॉर्ड चाहता है और इसलिए रुपये की कीमत क्या होती है, रुपये का माहात्म्य क्या होता है, वो शायद अहमदाबादी से अधिक कोई नहीं जानता है। और हमारे अहमदाबादियों के लिए इस प्रकार के काफी चुटकुले भी बने हुए हैं। और उस शहर में फाइनेंशियल वर्ल्ड के लोगों का इस प्रकार से एकत्रा आना और इस समारोह को यहाँ संपन्न करना, इसके लिए मैं फिर एक बार जी ग्रुप के सभी मित्राों को धन्यवाद देता हूँ और आभार व्यक्त करता हूँ।

आप लोग इस विषय के काफी जानकार भी हैं और चिंतित भी हैं। अगर फाइनेंशियल मार्केट बहुत तेजी में होता, तो शायद आज के समारोह में तालियाँ भी ज्यादा बजतीं। लेकिन मैं देख रहा हूँ मुश्किल से तालियाँ बज रही हैं और उसका मूल कारण मार्केट की स्थिति है। अगर मार्केट की स्थिति अच्छी होती है, तो शायद आप भी बड़े उमंग से भरे हुए होते, लेकिन मार्केट की स्थिति अच्छी होती, तो शायद आप भी बड़े उमंग से भरे हुए होते, लेकिन मार्केट की स्थिति अच्छी नहीं है इसके लिए आप सुबह—शाम एनालिसिस करते होंगे। आप सोचते भी होंगे कि यार, कुछ भी हो, इस स्थिति से बाहर निकलें...। ये आपके सबके मन में चलता होगा। ये बात सही है कि देश की आर्थिक स्थिति बहुत ही चिंताजनक है। किसी भी देश के जीवन में उतार—चढ़ाव तो आते हैं। कभी अच्छी स्थिति भी आती है, तो कभी बुरे दिन भी आते हैं। कभी हम टॉप पर भी होते हैं, तो कभी लो पर भी पहुँच जाते हैं। लेकिन नीति निर्धारक जब आत्मविश्वास खो चुके होते हैं, इफ दे लूज देयर कॉन्फिडेंस, तो वो निर्णय नहीं कर सकते। उन्होंने निर्णय करने का सामर्थ्य खो दिया है। कभी—कभी देश में चर्चा होती है कि चुनाव बहुत जल्दी आ जाएँगे, समय पर चुनाव नहीं होंगे। तो मुझसे कुछ लोगों ने बात की थी। मैंने कहा, देखिए भाई, चुनाव जल्दी भी अगर लाने हैं तो सरकार को निर्णय करना पड़ता है। जो नौ साल में कोई निर्णय नहीं कर पाए, वो ये निर्णय कैसे कर सकेंगे? तो आप मानकर चलिए कि मजबूरन स्थितियाँ जहाँ चाहेंगी, वहाँ जाएगी। कोई ले जाने वाला नहीं है, कोई दिशा तय करने वाला नहीं है, कोई निर्णय करने वाला नहीं है....! और सवा सौ करोड़ का देश इस स्थिति में जब होता है, तब हर प्रकार के संकट अपने आप बढ़ते चले जाते हैं।

अब आज देखिए आप, रुपये की कीमत जिस तेजी से गिर रही है। और कभी—कभी तो लगता है कि दिल्ली सरकार और रुपये के बीच कम्पीटीशन चल रहा है। किसकी आबरू तेजी से गिरती चली जा रही है, कौन आगे जाएगा...इसकी कम्पीटीशन चल रही है। देश जब आजाद हुआ तब एक डॉलर एक रुपये के बराबर था। एक रुपये में एक डॉलर बिकता था। जब अटल जी की सरकार थी, अटल जी ने जब पहली बार सरकार बनाई तब तक मामला पहुँच गया था 42 रुपए तक और अटल जी ने जब छोड़ा तब 44 पर पहुँचा था। चार प्रतिशत का फर्क आया था। लेकिन इस सरकार के और अर्थशास्त्राी प्रधानमंत्राी के कालखंड में ये 60 रुपये पर पहुँच गया है। मित्राो, अगर थोड़ा इतिहास की ओर नजर करें, और आप तो इस आर्थिक जगत की दुनिया से जुड़े हुए लोग हैं....। हिंदुस्तान 1200 साल की गुलामी के बाद 15 अगस्त, 1947 को जब आजाद हुआ, तो उस समय उसके पास ब्रिटिश गवर्नमेंट से वन थाउजेंड मिलियन पाउंड लेना उधार था। यानी हम लेनदार थे, ब्रिटिश गवर्नमेंट कर्जदार थी। सैकेंड वर्ल्ड वॉर में भारत से जो कुछ भी गया था, वो कर्ज ब्रिटिश सरकार को हिंदुस्तान को चुकाना था। यानी 1200 साल की गुलामी के बाद भी आजादी का प्रारंभ आर्थिक संकट से नहीं हुआ, आर्थिक संपन्नता के साथ हुआ था। इतना ही नहीं, विदेशों से कर्ज लेने का प्रारंभ पंडित नेहरू ने किया। आजादी के कुछ ही समय में फर्स्ट फाइव इयर प्लान आया, तो विदेशों से कर्ज लेना शुरू किया। और तब वर्ल्ड बैंक का स्वतंत्रा स्वरूप नहीं था, अमेरिका की गवर्नमेंट की इच्छा से चलता था। और उस समय पंडित नेहरू के जमाने में पहली बार कर्ज लिया गया। आज जरूरत है उस बात को समझने की, कि जब वो पहली बार कर्ज लिया गया, तो उसमें दो शर्तें थीं। आज डॉलर साठ रुपये पर क्यों बिकता है उसका जवाब वहाँ मिलता है। दो शर्तें थीं। एक शर्त ये थी कि वो जो अमेरिका ने पैसे दिए हैं, उन पैसों का उपयोग हिन्दुस्तान के रिसर्च स्कॉलर को अमेरिका में पढ़ने भेजने के लिए स्कॉलरशिप के रूप में खर्च होंगे। देखिए, कितना बुद्धिमानी का काम अमेरिका ने किया। अमेरिका जिसको चुने वो स्कॉलर, और वो स्कॉलर पढ़ेंगे कहाँ? अमेरिका में। पैसे कौन से? जो पैसे अमेरिका ने कर्ज में दिए, वो पैसे। मतलब आजाद हिन्दुस्तान की पहली स्कॉलर पीढ़ी जो तैयार हो, वो अमेरिका की छाया वाली तैयार हो, ताकि वो गीत अमेरिका के गाएँ, इस प्रकार का पहला प्रयास हुआ। और दूसरा निर्णय किया था कि ये रुपये तब देंगे कि जब आप रुपये की कीमत कम करोगे। और उस लोन लेने के कारण पंडित नेहरू के समय में पहली बार रुपये की ताकत कम हुई और वो सिलसिला चलता रहा। मित्राो, कोई भी देश गलत नीतियों के कारण कहाँ जाकर के गिरता है, उसका हम अंदाजा कर सकते हैं।

मैं आज भी मानता हूँ कि भारत जैसा देश, सारी दुनिया की नजर हिन्दुस्तान पे अगर एक बाजार के तौर पर हो और ये देश अगर एक बाजार बनकर के रह जाए, तो ये देश कभी भी आर्थिक संपन्नता प्राप्त नहीं कर सकता। पूरा विश्व अपना माल हिन्दुस्तान के अंदर जितनी बड़ी मात्राा में डम्प कर सकता है, करना चाहता है। इतना बड़ा कन्ज्यूमर मार्केट अवेलेबल है, मित्राो! अगर ये सिलसिला चलता ही रहा और देश का इम्पोर्ट बढ़ता ही गया तो पता नहीं देश की आर्थिक स्थिति कहाँ जाकर रुकेगी। मित्राो, आज तेजी से इम्पोर्ट बढ़ रहा है और एक्सपोर्ट में हम पहले से भी नीचे आ गए हैं, यानी स्टेबल भी नहीं रहे, हम जहाँ थे उससे भी नीचे आ गए, और उसके कारण हमारी करेंट अकाउंट डेफिसिट बढ़ती चली गई, जिसने पूरी आर्थिक स्थिति पर एक नया बोझ डाल दिया है....।

एफ.डी.आई. और एफ.आई.आई. दोनों के तराजू पर हम संतुलन नहीं कर पा रहे हैं और उसका मूल कारण है हमारी नीतियाँ। लोग कहते हैं एफ.डी.आई. नहीं आया, फॉरेन डायरेक्ट इन्वेस्टमेंट नहीं आया...क्यों नहीं आया? कोई भी व्यक्ति हिन्दुस्तान के अंदर धन तब लगाता है जब उसको अपनी पूँजी की सिक्योरिटी महसूस हो। उसको लगे कि हाँ, ये मैं इतना लगा रहा हूँ तो मुझे प्रॉफिट मिलेगा, मुझे गुड गवर्नेंस की अनुभूति हुई है तो मुझे एफिशिएंट गवर्नेंस मिलेगा, मुझे सिंगल विंडो क्लियरेंस मिलेगा, तो वो हिम्मत करेगा....। लेकिन अगर पॉलिसी पैरालिसिस है तो उसकी कितनी ही आवश्यकता होगी, लेकिन वो हिन्दुस्तान की तरफ मुँह नहीं फेरेगा। अगर हमारे यहाँ फॉरेन डायरेक्ट इन्वेस्टमेंट नहीं आता है और अगर हम मैन्युफैक्चरिंग सेक्टर में दुर्बल होते चले जाते हैं, तब जाकर के हम इम्पोर्ट करते हैं, एक्सपोर्ट करने के दरवाजे बंद होते चले जाते हैं और आर्थिक स्थिति और लुढ़कती चली जाती है।

मित्राो, आप स्टॉक मार्केट की दुनिया से जुड़े हुए लोग हैं। सरकार अगर तीन चीजों को बैलेंस रूप से आगे न बढ़ाए, तो मैं मानता हूँ कि किसी भी इन्वेस्टर का विश्वास कभी भी नहीं रहेगा....। अब आप देखिए कि आज हमारा ट्रांजेक्शन कितना होता है? मैं समझता हूँ, मुझे जो बताया गया है कि वो 15 और 20 परसेंट के बीच में आ गया है। और उसमें भी फ्यूचरिस्टिक वाली संख्या ज्यादा है, रियल ट्रांजेक्शन की संख्या कम होती चली जा रही है। रियल ट्रांजेक्शन इसलिए नहीं हो रहा है कि उसका कॉन्फिडेंस लेवल टूट चुका है। अगर ये स्थिति बनती है तो आप कल्पना कर सकते हैं कि हम कहाँ जाकर के खड़े रहेंगे। और इसलिए स्टॉक मार्केट में भी एक रिटेल का क्षेत्रा है, दूसरा इंस्टीट्‌यूशनल इन्वेस्टमेंट है और तीसरा एफ.आई.आई. का है, इन तीनों को इक्वल बैलेंस होना चाहिए। आज मित्राो, अगर एफ.आई.आई. का शेयर बढ़ गया और जस्ट बिकॉज दुनिया का कोई देश अपना इंट्रेस्ट रेट बढ़ा दे और अचानक एफ.आई.आई. की बहुत बड़ी अमाउंट चली जाए तो पूरा स्टॉक मार्केट नीचे गिर जाएगा और उसके कारण सामान्य मानवी को कोई भरोसा नहीं रहेगा।

मित्राो, आज चिदंबरम जी ये कहते हैं कि लोग सोना न खरीदें। लेकिन लोग सोना खरीदने के लिए मजबूर क्यों हुए? मुझे मालूम है, हमारे यहाँ गुजरात में स्टॉक मार्केट में इन्वेस्ट करना यानि एक पिओन होगा वो भी सुबह—शाम देखता है कि मार्केट का क्या हाल है। हमारे यहाँ एक अखबार तो सिर्फ स्टॉक मार्केट के रेट के ऊपर ही चलता है, पूरा का पूरा अखबार...और लोग उसी को खरीदते हैं क्योंकि उनको उसी में इंटरेस्ट होता है। लेकिन आज उसका इंट्रेस्ट नहीं रहा, क्योंकि उसको भरोसा नहीं है कि उसको जो कुछ भी इन्वेस्ट करना है, उसको वो वापस मिलेगा या नहीं मिलेगा। तो फिर उसके बाद दो रास्ते बच जाते हैं, रियल एस्टेट में डालो या फिर गोल्ड में डालो। रियल एस्टेट में डालने के लिए मिडिल क्लास, लोअर मिडिल के पास उतना अमाउंट नहीं होता, इसलिए उसमें डाल नहीं पाता है। तो क्या करेगा? चलिए भाई, 10 ग्राम, 20 ग्राम, 50 ग्राम, 100 ग्राम गोल्ड ले लो, पैसा बढ़ जाएगा। अकेले 2012 के वर्ष में 1 लाख करोड़ रुपयों का गोल्ड इस देश में इम्पोर्ट हुआ है, एक साल में। और बताया जाता है कि आज हिन्दुस्तान में 18 लाख करोड़ रुपयों का गोल्ड पड़ा हुआ है। नॉन प्रॉडक्टिव ऐसेट है। मित्राो, अगर ये स्थिति रही तो हमारी सारी आर्थिक व्यवस्था कैसे चलेगी। और ये क्यों हो रहा है, क्योंकि व्यक्ति को एक ही जगह पर सिक्योरिटी लगती है कि यार, लेकर के रखो, ज्यादा पैसे मिलें या ना मिलें, लेकिन पैसे तो बच जाएँगे। या तो उसको लगता है कि रियल एस्टेट। मित्राो, रियल एस्टेट में भी जाने का कारण क्यों बना है? हमारी इकॉनोमी पर ब्लैक मनी की इकॉनोमी डोमिनेंट करने लग गई है। और जब ब्लैक मनी की इकॉनोमी डोमिनेट करती हो, पैरलल इकॉनोमी चलती हो, तो स्वाभाविक है कि लोगों को रियल एस्टेट में जाने का रास्ता ठीक लगता है। और जैन्यूइन आदमी अगर रियल एस्टेट में जाना चाहता है, तो वो एंटर नहीं कर पा रहा है क्योंकि ब्लैक मनी नहीं है। एक ऐसे विश्यस सर्कल को देश में चलाया जा रहा है, जिसके कारण देश का पूरा अर्थतंत्रा आज स्थितियों को बिगाड़ता चला जा रहा है।

एशिया की एक विशेषता रही है, सदियों से कि एशियन कंट्रीज का कल्चरली एक—दूसरे पर काफी प्रभाव रहा है। सेविंग ये वैस्टर्न वर्ल्ड के नेचर में नहीं है, सेविंग ये एशियन कल्चर में है, और भारत उसमें लीड करता रहा है। हमारे यहाँ बचत करना, पैसे बचाना और उसमें महिलाओं का बहुत बड़ा रोल रहता है। गरीब से करीब महिला होगी, गरीब परिवार की होगी, लेकिन कुछ ना कुछ बचाने की कोशिश करेगी। मित्राो, ये सेविंग का जो स्वभाव है, तो वो पहले स्टॉक मार्केट के अंदर इन्वेस्ट करता था, और उसके कारण हमारी इकॉनोमी को बहुत बड़ा पुश मिलता था, ड्राइविंग फोर्स बन जाता था। मिडिल क्लास, लोअर मिडिल क्लास, जिसके पास सोना खरीदने की ताकत नहीं है, फ्लैट खरीदने की ताकत नहीं है, जमीन में पैसा नहीं लगा सकता है, वो पाँच—दस रुपये वाले दस—बीस शेयर लेने की कोशिश करता था, क्योंकि उसके पास उतने ही पैसे थे। लेकिन महँगाई के कारण मिडिल क्लास, लोअर मिडिल क्लास के लिए अपना घर चलाने में दिक्कत हो गई है, सेविंग खत्म हो चुका है और सेविंग खत्म होने के कारण स्टॉक मार्केट में उसकी एंट्री बंद हो गई है। अगर ये स्थिति बनी रही, तो हमारी पूरी फाइनेंशियल स्थिति और दुर्दशा की ओर चली जाएगी।

आप देखिए, इम्पोर्ट! ये तो हम समझ सकते हैं कि नेचुरल रिसोर्सिंग में हमारी कुछ सीमाएँ होंगी। पेट्रोलियम, गैस और डीजल के इम्पोर्ट के लिए आज हमारे पास कोई रास्ता नहीं होगा, मजबूरन ही सही, लेकिन हमको लेना पड़ेगा। लेकिन क्या कारण है कि इलेक्ट्रॉनिक गुड्‌स, मोबाइल फोन, वगैरह में हमारा अरबों—खरबों रुपयों का इम्पोर्ट बढ़ता चला जा रहा है। क्या हमारा देश मोबाइल फोन मैन्युफैक्चरिंग में एक बहुत बड़ा जंप नहीं लगा सकता है? हम अपने इम्पोर्ट को कम करने का रास्ता नहीं खोज सकते हैं? हमें मालूम है कि हिन्दुस्तान में इलेक्ट्रॉनिक गुड्‌स का एक बहुत बड़ा मार्केट है और इलेक्ट्रोनिक गुड्‌स के मैन्युफैक्चरिंग के लिए कोई आसमान से बहुत बड़ा स्काई रॉकेट इंजीनियरिंग लाने की जरूरत नहीं है, वो बहुत सामान्य प्रकार की टैक्नोलॉजी है। लेकिन हमने उस पर बल नहीं दिया और उसके कारण आज हिन्दुस्तान में सबसे ज्यादा इम्पोर्ट करने वाले जो तीन सेक्टर हैं, उनमें से एक क्षेत्रा है इलेक्ट्रानिक गुड्‌स। हाँ, यदि कोई मेडिकल इक्विपमेंट के लिए कोई बहुत बड़ी एक्स्ट्रा ऑर्डिनरी चीज आती है तो वन कैन अंडरस्टेंड, लेकिन रुटीन में हमारे यहाँ कम्प्यूटर नहीं बन पा रहा है, हम यहाँ लाकर के एसेंबल करते हैं। हम अगर अपने देश में योजनाबद्ध तरीके से करें कि भाई, दस साल के अंदर इस सैक्टर के अंदर इम्पोर्ट करने की स्थिति से हम बाहर आ जाएँगे। हम क्वालिटी मैटीरियल प्रोवाइड करेंगे, सफिशिएंट मैटीरियल प्रोवाइड करेंगे, तो देश की स्थितियाँ नहीं बदलेंगी? लेकिन हमारी नीतियाेंं की कमी के कारण ये हाल हुआ है। हमारा मैन्युफैक्चरिंग कॉस्ट इफेक्टिव नहीं हो रहा है। क्यों नहीं हो रहा है? अगर हमें दुनिया के सामने टिकना है, तो उत्पादन के क्षेत्रा में हमारे लोगों को जरूरत है कि वो कॉस्ट इफैक्टिव हो। तो उसके लिए क्या चाहिए? आज देखिए, हिन्दुस्तान में बीस हजार मेगावाट से ज्यादा के बिजली के कारखाने बंद पड़े हैं। कोई देश ऐसा देखा है आपने कि जिसके पास कोयले के खदान हैं, वो अंधेरे में जी रहा है, लोगों को बिजली चाहिए, बिजली के ग्राहक मौजूद हैं और जिसके पास बीस हजार मेगावाट से अधिक बिजली पैदा करने वाले कारखाने तैयार हों। जस्ट, लीडरशिप नहीं है, पॉलिसी पैरालिसिस है और इसलिए कोयले के निर्णय हो नहीं रहे हैं, खदान में से कोयला निकल नहीं रहा है, कोयला बिजली के कारखाने तक पहुँच नहीं रहा है और देश अँधेरे में डूब रहा है। मैन्युफैक्चरिंग सैक्टर को सफिशिएंट बिजली मिल नहीं रही है, फॉर्मर को सफिशिऐंट बिजली नहीं मिल रही है और उसके कारण हमारा ग्रोथ कम हो रहा है, हमारे विकास की यात्राा कम हो रही है।

मित्राो, छोटी—छोटी चीजें हैं, कोई बहुत बड़ी चीजों की जरूरत नहीं है, सामान्य चीजें....अगर इन पर भी हमने बल दिया होता, तो मैं नहीं मानता हूँ कि देश आज इतने बड़े आर्थिक संकट से गुजर रहा होता....। और ऐसा नहीं है कि इसके रास्ते नहीं हैं। अटल जी के समय की एन.डी.ए. सरकार के कार्यकाल की अगर हम विगत देख लें, तो सीना तान कर कोई भी कह सकता है। मित्राो, उन दिनों तो भारत ने न्यूक्लीयर टैस्ट किया था। पूरे विश्व ने सैंक्शंस लगा दिए थे, देश आर्थिक संकट में फँसा हुआ था। ऐसे विकट काल में भी अटल जी के नेतृत्व में हिन्दुस्तान में एन.डी.ए. की सरकार, वो भी 24 पार्टियाँ एक साथ सरकार चलाती थीं, एक पार्टी की सरकार नहीं थी, उसके बाद भी न महँगाई बढ़ने दी थी, न इम्पोर्ट बढ़ने दिया था, एक्सपोर्ट में कटौती नहीं आने दी थी। जब अटल जी की सरकार बनी तब हमारा सेविंग का रेशो 32÷ से ज्यादा था और आज वो 30÷ से भी कम हो गया है। कोई भी पैरामीटर ले लीजिए। भारत की इकॉनोमी में 21वीं सदी की विकास यात्राा के सपनों की मजबूत नींव अटल जी ने अपने शासल काल में रखी थी। लेकिन देखते ही देखते पिछले नौ साल में जो रखा था वो भी खत्म हो गया और नया कुछ अर्जित नहीं हुआ, ऊपर के नए बोझ और नए संकट हमारे देश पर आते गए और उसी के कारण आज हम संकट से गुजर रहे हैं। आपका तो पूरा मार्केट, पहले जो इन्वेस्टर था वो सुबह जब स्टॉक मार्केट खुलता था तो उसकी साँस ऊपर—नीचे होती थी। शेयर बाजार में जिसने बेचारे ने हजार—दो हजार रुपये लगाए होते थे, वो सोचता था कि यार, आज कुछ मिला या नहीं मिला। आज सांस आपकी ऊपर—नीचे हो रही है। ये पहली बार हो रहा है। और इसलिए इस चिंता की अवस्था में देश एक आत्मविश्वास के साथ कैसे आगे बढ़े, पॉलिसी पैरालिसिस में से देश बाहर कैसे आए?

प्रधानमंत्राी ने कहा था, पैसे पेड़ पर नहीं उगते हैं। प्रधानमंत्राी जी, आपके अर्थशास्त्रा में पैसे पेड़ पर उगते हों या न उगते हों, हम गुजरातियों की समझ है और हम मानते हैं कि पैसे खेत में भी उगते हैं, पैसे कारखाने में भी उगते हैं, पैसे मजदूर के पसीने से भी उग सकते हैं, आवश्यकता है सही नेतृत्व देकर नीतियों को बनाने की। हिंन्दुस्तान का किसान खेत में काम करता है तो वो पैसे उगाता है, एक मजदूर फैक्ट्री में मेहनत करता है तो वो पैसे उगाता है, और तभी तो देश की तिजोरी भरती है और तभी तो देश चलता है। ये जो निराशा का माहौल है उससे देश को बाहर लाया जा सकता है। मित्राो, गुजरात एक्सपीरियंस से मैं कहता हूँ कि निराशा की गर्त में डूबे रहने का कोई कारण नहीं है। जब मैं पहली बार मुख्यमंत्राी के रूप में आया, तब मेरे यहाँ रिवेन्यू डेफिसिट सिक्स थाउजेंड सेवन हंडरेड करोड़ रुपीज थी, आज हम रेवेन्यू सरप्लस हैं। मित्राो, हो सकता है, हमारी इलेक्ट्रिसिटी कंपनीज वार्षिक 2500 करोड़ रुपये का लॉस करती थी। आज मित्राो, वो प्रॉफिट करती है और हम 24 घंटे बिजली देते हैं और टेरिफ नहीं बढ़ाते हैं। कहने का तात्पर्य ये है मित्राो, अगर सही दिशा में निर्णय किए जाएँ तो देश की स्थिति बहुत बदल सकती है। और मैं बहुत आशावादी इंसान हूँ। इतना बड़ा देश, दुनिया के सामने सीना तान के खड़ा होने का सामर्थ्य है इस देश में। बारह सौ साल की गुलामी के बाद भी जो देश सरप्लस था वो देश आज कर्जदार क्यों बन गया, इसके जवाब हम खोज सकते हैं, इसके उपाय भी खोज सकते हैं, उस विश्वास को लेकर आगे बढ़ें।

मैं फिर एक बार सुभाष जी का बहुत आभारी हूँ कि आपके बीच आने का मुझे अवसर मिला। बहुत—बहुत धन्यवाद।