Mahak Utha Mogara in Hindi Short Stories by Jahnavi Suman books and stories PDF | महक उठा मोगरा

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महक उठा मोगरा

महक उठा मोगरा

-----सुमन शर्मा

jahnavi.suman7@gmail.com

महक उठा मोगरा

"अजी सुनते हो?" बिमला रसोई घर का काम करते - करते , अपने पति रघुवर के पास ड्राईंग रूम में आती है।

"क्या हुआ ?" कहकर रघुवर ने अनमने भाव से टीवी का रिमोट उठाकर कर ,टीवी की आवाज़ धीमी करते हुए बिमला से पूछा।"

बिमला ने कहा, 'अपना कूड़ा उठाने वाला जो रंजू है ना, इस महीने से,वह पगार बढ़ाने के लिए कह रहा है। वरना वह कूड़ा नहीं उठाएगा। "

"दिमाग खराब हो गया है, क्या इस रंजू का ? पहले से ही सौ रुपए ले रहा है। अब क्या जान लेगा हमारी।" यह कहते- कहते रघुवर का मुँह गुस्से से लाल हो गया।

"अजी ! शुभ -शुभ बोलो , मरे आपके दुश्मन।" पर आप यह भी तो देखिये कि, हमारा कूड़ा पहले से अधिक बढ़ गया है। बहु- बेटा और उनका परिवार जब से मुंबई से यहाँ आएं है, कूड़ेदान भी एक के स्थान पर दो- दो भरने लगे हैं।"

"नहीं -नहीं एक भी पैसा और नहीं दूँगा। काम छोड़ कर जाता है, तो जाए।''

रघुवर अपनी ज़िद पर अड़ा रहा और एक दिन रंजू काम छोड़ कर चला गया।

दो तीन दिन यूहीं निकल गए। रघुवर को उम्मीद थी, कि रंजू काम पर लौट आएगा। मगर रंजू नहीं लौटा। घर में यत्र तत्र कूड़े की दुर्गन्ध फैलने लगी। सावन की ठंडी पुरवइया कभी इस घर के आँगन को मोगरे की खुशबू से महका देती थी, मगर आज सारा परिवार नाक पर कपड़ा रखे बैठा था।

रघुवर ने रात में अँधेरा होते ही अपने घर का सारा कूड़ा गली के बीचों बीच बने पार्क में डाल दिया। सुबह तक गाय और कुत्तो ने कुछ खाकर और कुछ फैला कर तितर बितर कर दिया।

रघुवर को अब कूड़े से छुटकारा पाने का आसान उपाय मिल गया था। बिमला ने उसे लाख समझाने की कोशिश की, कि यह ठीक नहीं ,अपना घर साफ़ करके कूड़ा आस -पास बिखेर दिया जाए। लेकिन रघुवर हमेशा बिमला को फटकार दिया करता, "पैसे क्या पेड़ पर उगते हैं? स्वयं कमाने जाओ तो पता चले। एक -एक रुपया जुटाने के लिए पसीना बहाना पड़ता है। " बिमला कड़वा घूंट पीकर रह जाती।

धीरे- धीरे पार्क में कूड़ा, बढ़ने लगा और वहाँ सुबह -शाम सैर करने वालों को स्वच्छ वायु के स्थान पर प्रदूषित वायु मिलने लगी। लोगों के बीच कूड़े की चर्चा बढ़ने लगी।

सभी यह जानना चाहते थे, कि आखिर यहाँ कूड़ा कौन फैंकता है ? लोग चौकन्ने रहने लगे ,कहीं दूसरे मौहल्ले से तो कोई कूड़ा नहीं फेंक जाता?

रघुवर की कूड़ा फेंकने की कठिनाई दिन प्रतिदिन बढ़ती जा रही थी। फिर भी वह रात के अँधेरे में कूड़ा ठिकाने पर लगा देता था। बिमला को बाहर निकलने में भी झिझक होने लगी। वह अड़ोस -पड़ोस से नज़रें चुराने लगी।

एक बार रघुवर की कार के दो टायर पंचर हो गए। पड़ोस वाले अपनी छत पर कम ही जाया करते थे , सो रघुवर ने टायर पड़ोस की छत पर फेंक दिए। बिमला ने फिर टोका , "देखिये आप यह ठीक नहीं कर रहे। " इस बार रघुवर ने उसकी शिक्षा पर ताना कसा, "एम एस सी तक की पढाई करके क्या समझने लगी हो तुम खुद को?" मुझे क्या बावला समझा है?

कुछ दिनों बाद बारिश का पानी टायरों में भर गया।

उस वर्ष शहर में डेंगू का आतंक मचा था। रघुवर का पोता 'अक्षित' डेंगू की चपेट में आ गया। हालत इतनी बिगड़ गई, कि अस्पताल में भर्ती करवाना पड़ा। डॉक्टर ने जब यह बताया कि अक्षित की बचने की संभावना नहीं है. तो पूरा परिवार बिलख -बिलख कर रो पड़ा।

डेंगू प्रतिरोधक दस्ते ने उनके घर के आस- पास, डेंगू के मच्छरों की जाँच पड़ताल की तो पड़ोस की छत पर पड़े टायरों में डेंगू के मच्छर पाये गये । पड़ोसियों ने कर्चारियों को लाख समझाने की कोशिश की , कि यह टायर उनकी कार के नहीं हैं। फिर भी डेंगू प्रतिरोधक दस्ते ने उनकी एक न सुनी। उन्हें एक हज़ार रुपए का जुर्माना भरना पड़ा।

रघुवर को अपने पोते से उसे बेहद लगाव था। वह ईश्वर से मन ही मन माफ़ी मांग रहा था। पोते के साथ तो इस घर की सारी खुशियां जुडी थीं। वह तो उसे खोने की कल्पना मात्र से सिहर उठता था। उसके शरीर की शक्ति क्षीण होती जा रही थी। वह अपने किये पर बहुत पछता रहा था। न जाने वह कौन से अशुभ घड़ी थी जब उसने टायर पड़ोसियों की छत पर फेंके थे।

एक सुबह वह निढाल सा बाहर आँगन में कुर्सी पर बैठा था ,तभी उसका मोबाइल बजने लगा। किसी अनहोनी की आशंका से उसका शरीर काँप गया। काँपते हाथों से वह मोबाइल कानों तक ले गया। "हैलो पापा !" रघुवर का बेटा अस्पताल से बोल रहा था। "हैलो " कहकर रघुवर की जीभ सुन हो गई। बेटे ने दूसरी और से कहा, "पापा अभी डॉक्टर ने अक्षित के खून की जाँच की,और बतया कि अक्षित की रिपोर्ट में बहुत सुधार आया है। अब वह खतरे से बाहर है। पापा आप सुन रहे हो न। " हाँ बेटा हाँ !" रघुवर को अपने कानों पर विश्वास नहीं हो रहा था। सबसे पहले उसने ईश्वर को धन्यवाद दिया। वह नहा -धोकर बैंक गया। बैंक से वह एक हज़ार रुपए निकाल कर लाया। पैसे लेकर पड़ोस के उस घर में पहुँचा जिनकी छत पर उसने टायर फेंके थे। उसने, उनकी छत पर टायर फेंकने की माँफी मांगते हुए उन्हें एक हज़ार रुपए की वह रकम लौटाई ,जो उन्हें डेंगू प्रतिरोधक दस्ते को देने पड़े थे।

उसने रंजू को कूड़ा उठाने के काम पर फिर से रख लिया। जी हाँ. बढ़ी हुई तनख्वाह के साथ।

पोता स्वस्थ हो कर घर लौट आया। रघुवर का आँगन फिर से मोगरे की महक से खिल उठा।

-----सुमन शर्मा

jahnavi.suman7@gmail.com

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