दास्तान-ए-अश्क - 15






"चल्ल बुल्लिया..  चल उथ्थे चल्लिये..
जिथ्थे सारे अन्ने..  ना कोई साड्डी
जात पहचाने... ना कोई सान्नु मन्ने..

( पंजाब के एक मशहूर कवि कहते हैं
"चल रे बलमा हम ऐसी जगह पर चले जाते हैं जहां सारे लोग अंधे हो कोई नात जात  को पहचानता ना हो! जिनके लिए सब लोग एक जैसे हो!)


जिंदगी ने मायुस कर दीया उसे.. 
अभी तो उसके सजने संवरने के दिन थे!
सपनो की जगह आंखे अश्क से उभरने लगी थी!  छोटी सी उम्र थी!
इस छोटी सी उम्र में मासूम दिल को कांच की तरह चुभने वाली किरचो से भरा सफर.. जिस पर चल पड़ी थी वो.. रास्ता जैसे दलदल से भरा था!
उस दलदल में जानबूझकर अपनी मर्जी के खिलाफ भी उतर जाना है! 

जिंदगी को तबाह कर देना है!
"देख बेटा..!
उसका उतरा हुआ मुंह देखकर मा ने नसीहत दी..!
अपनी बिरादरी में एक बार शादी हो जाती है फिर उसे निभानी पड़ती हैं!  सामने  जैसा भी इंसान हो उसी के साथ जीवन गुजारना पड़ता है!
रिश्ते को छोड़ना यहां काफी मुश्किल है ! समाज में जीना मुश्किल हो जाता है! अभी तक ऐसा दौर नहीं आया कि  कोई भी स्त्री अपनी बिरादरी में सर उठा कर अपनी मनमर्जी से जी सकें..!
मैं जानती हूं तू बहुत समझदार है मगर तू अपने बच्चों की परवरिश अपने तरीके से करना..!उनकी स्वतंत्रता कभी मत छीनना..!
तब तक शायद समाज में काफी बदलाव आएंगे ...!  लोगों की सोच बदलेगी!"
वह मां को बस देखती रही! 

मासूम चेहरे की दो आंखें बोल रही थी शिकायत कर रही थी ! 

औरत की जिंदगी भी क्या जिंदगी है ? उसे हर हाल में अपनी जिंदगी को दूसरों के हवाले कर देना पड़ता है!
खिलौने की तरह जिसका जितना मन चाहा खेल लिया!
उस को खामोश देखकर कहीं ना कहीं मां भी अंदर तक टूट गई थी!
बिरादरी में अपनी इज्जत को लेकर पापाजी भी कोई हंगामा खड़ा नहीं करना चाहते थे ! उनसे कुछ गलती जरूर हुई है! उस बात का एहसास उन्हें तब हुआ जब उसने अपने पति के घर जाने से इंकार कर दिया था!
बिजली की तरह वह बात उनके दिलों दिमाग पर गिरी थी!
साइलेंट अटैक नहीं  पूरे परिवार को हिला कर रख दिया!
डॉक्टर ने पिताजी का चेकअप करके बताया!
इनको सदमा लगे ऐसी कोई बात या कोई घटना ना घटे इस बात का ख्याल रखना वरना आप लोग घर के एक जिम्मेदार व्यक्ति को खो देंगे!"
वह अपने पिता को खोना नहीं चाहते थे फिर चाहे क्यों न उसकी पूरी जिंदगी बर्बाद हो  जाए यह जिंदगी भी तो उन्होंने ही दी थी!
वो चूप हो गई थी मगर इसका दिल बहुत रो रहा था! तडप रहा था!
अपना हुलिया ठीक कर ले तेरे ससुराल से आज कोई तुझे लेजाने आने वाला है! मां की बात सुनकर वह अपने कमरे में चली जाती है!
आज उसका मन सब कुछ छोड़ कर भाग जाने को कर रहा था!
बहुत दूर इतनी दूर की जहां कोई उसे जानता ना हो!  जहां कोई उसका अपना ना हो!
लेकिन जाओ भी तो जाऊं कहां किसके भरोसे जब अपने ही साथ छोड़ चुके हैं तो गैरों से क्या उम्मीद करनी?
फिर भी वह अपने मां पापा को दुख देना नहीं चाहती!   उनकी इज्जत को अपनी जिंदगी से बढ़कर माना था उसने!
बेटी का घर से भाग जाना समाज में ऐसा कलंक होता है जो सात पुश्तो तक हमारा पीछा नहीं छोड़ता!
एक बेटी जो बेटी ना हो कर घर की इज्जत थी  पापा जी की पगड़ी थी! पगड़ी यानी सर का ताज!
तो फिर कैसे वो  पापा जी के सर के ताज को मिट्टी में रोंद कर जाती?
फिर वह अपने मन को समझा देती है जो अपनी किस्मत में होगा देखा जाएगा! कितना ही उछल कूद क्यों ना करना मगर विधि विधानो से भागकर कहां जाएंगे हम!  जैसे आज वह अपने आप से हार कर किस्मत के हवाले हो जाती है!
लिखना दूसरों को नसीहत देना समाज में बदलाव लाने की बात करना बहोत ही आसान है!  पर जब इन अपने खुद पर ही मुश्किलें आती है तब इंसान को तोड़ने वाले उसके अपने ही होते हैं!
कभी भी कोई गैर किसी को दबाता नहीं है! उसके साथ भी वही हुआ अपनों ने ही उसके वजूद को मिटा दिया
आज वह एक बेटी थी बहू थी लड़की थी मगर उसके अंदर से इंसान मर चुका था!
वह खुद को बहते हुए बहाव में छोड़ देती है!
तभी उसका पति यमदूत की तरह प्रवेश करता है!
वो चाय पानी लेकर आती है!  अपने मन के भाव चेहरे पर ना आ जाए उसके लिए वह काफी मशक्कत करती है!
उसकी नजरों के सामने एक भोला सा खुशहाल चेहरा था! मगर उस चेहरे के पीछे छुपे शैतान को कोई देख नहीं सकता था सिवाय उसके!
सारी जिंदगी उसे ऐसे भेड़िए जैसे इंसान के साथ रहना था यह सोचकर ही उसका दम घुटने लगता है!
मम्मी पापा के सामने कितना भोला बन रहा था वह उसकी हकीकत वो जानती थी !
अब कर भी क्या सकती थी.?
जब जन्म देने वालों ने ही उसका हाथ पकड़ कर उस दरिंदे के हाथों में थमा दिया! फिर क्या करती वो..?
मन में एक बोझ लिए वह घर से विदा लेती है!
उसे शिकायत रब से थी कि उसको इस घर में जन्म दिया जहां कोई उसका हाथ पकड़ कर यह कहने वाला नहीं था कि 'बेटा तेरी मुस्कान कहां गायब हो गई ?'
वो उसके साथ चल देती है एक नई जंग के लिए!  नई जिंदगी नहीं एक जंग जो उसे हर पल हर दिन लड़नी थी ! अपने वजूद को बचाने के लिए!
नये घर  आने के बावजूद उसका मन कहीं नहीं लग रहा था काफी चिड़चिड़ी हो गई थी वह!  समय की चक्की में पीस में लगी थी वही माहौल था जो हर घर में होता है सुबह जल्दी उठना सब की फरमाइश है पूरी करने में लग जाना
सारा दिन सास और जेठानी की इशारों पर चुपचाप नाचना!
रोज रात को उसकी हैवानियत को सहना!
ये सारे मंजर उसकी जिंदगी का हिस्सा बन चुके थे!
उसके सारे अरमान तो कब से ही दम तोड़ चुके थे!

कोई भी बात , कोई विचार, कोई काम कुछ भी उसको नहीं छू रहा था!
अपना ही भविष्य उसे अंधकार में नजर आ रहा था!
जिंदगी पर बोझ बन गए एक एक पल कट रहे थे की एक दिन..  एक जैसी जिंदगी ने अचानक करवट ली..!
वह काफी हद तक घबरा गई ! मासूम हिरनी की तरफ उसका बदन कांप रहा था!
माथे पर एक ऐसा बोज था!
एक चोक्कस दिशा की और वो भागी..?
             ( क्रमश:)

कभी-कभी मैं खुद सोचता हूं एक इंसान की जिंदगी में ऊपरवाला इतने सारे दर्द कष्ट एक साथ देकर क्या साबित करना चाहता होगा ? क्या वह उसकी सहनशीलता को नाप रहा होगा?
इसका जवाब नहीं है मेरे पास मेरी आंखें भर आई है आप ही सोचे क्या हुआ है कहानी की नायिका के साथ..!
                   -साबिरखान

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