दास्तान-ए-अश्क -16

" खामोश रहने से दम घुटता है !
और बोलने से जुबान छिलती है
डर लगता है नंगे पांव चलने से
पांव के नीचे कोई  कब्र हिलती है!"

           दास्तान....

आज सुबह से ही उसका सर बहुत भारी था! उसने जैसे ही उठने की कोशिश की चक्कर आए... उल्टी जैसा हुवा ! बडी मुश्किल से उठकर भारी कदमों से वो अपनी सास के पास आई! गभराहट के साथ डरती डरती बोली..!
"मम्मी जी..  पता नही आज मुझे  क्या हो रहा है! मेरा सर बहोत भारी हो गया है लगता है जैसे उल्टी हो जायेगी!!"
उसकी सासुमा एकटुक उसे देखते हुई कुछ समझने की कोशिश करती हैं!
फिर धीमे से उसका हाथ पकड़ कर अपने रूम में ले जाती है!
उसको बेड पर बैठा कर पूछती है.. "कितने दिन हुये..?"
उसको शर्म आती है फिर भी मन ही मन संभलकर बोलती है
ईस बार लगता है 15- 20 दिन ऊपर हो गये है!
उसका हाथ अपने हाथों में लेकर सासु मां कहती हैं!
"देखो बेटी ये बात सिर्फ हम दोनों के बीच में रहनी चाहिए ! फिलहाल इस बात को तू किसी को बताएगी नहीं!
"ऐसा क्यों मम्मी ? क्या हुआ है?"
"जितना कहु ईतना कर.. जाकर अपने कमरे में आराम कर..! "
उसको गभराहट हो जाती है..!
पता नही क्या हुवा होगा?  क्यो सासुजी ने आराम करने को बोला..?
उन्होने फिर से सावधानी बरतने का हुक्म देते हुए कहा!
"अभी तुझे कोई भी काम करने की जरूरत नहीं है! मैं तेरा नाश्ता और दवाई ऊपर लेकर आती हूं !
वो कदमों पर बोझ लिए अपने कमरे में चली आई!
इसकी मासूम बालिश समझ में ये बात नहीं आ रही थी की मम्मी जी के व्यवहार में अचानक तब्दीली आजाने की वजह क्या थी?" 
ऐसी क्या बात हुई थी जो मम्मी उस पर इतनी मेहरबान हो रही थी?
सारा दिन उसे अपने इशारों पर नचाने वाली सास अचानक इतनी कोमल ह्रदयी कैसे हो गई?
सासु मां में आए बदलाव का आश्चर्य उसके चेहरे से अभी गायब नहीं हुआ था कि किसी भारी कदमों की आहट से वो सलीके से बेड पर लेट गई!
सासु मां एक नर्स को लेकर कमरे में आई! उनके साथ वाली औरत काफी बुजुर्ग थी!
दोनों उसके करीब आई तो उसने संभलकर बैठने की कोशिश की तभी उस बुढी औरत ने कहा !
"अरे नहीं नहीं बेटी ..तूम लेटी रहो..! "
उसके पेट पर वह हाथ फेरती है उसकी अनुभवी निगाहोने जैसे कुछ जांचा परखा ! उसकी नब्ज और आँखे देखी!
फिर जिर्रीयां से भरा उसका चेहरा खील उठा! खुशहाल होकर वो कुछ उम्मीद भरी निगाहों से सासु मां की ओर देख कर वो बोली!
"बधाई हो बहनजी आप दादी बनने वाली हो..! बहुरानी पेट से है!"
सासुजी का चहेरा खील कर गुलाब हो गया!
लेकिन वो हैरान हो जाती है !
"क्या..!?"
जैसे तसल्ली करना चाहती थी उस बात की अभी भी ! अपनी छोटी उम्र के कारन डर उसके मस्तिष्क पर काबिज हो गया!
"हा बेटी..!
तजुर्बेकार नर्स ने उसकी आंखे पढ ली!
तुम 'मां' बनने वाली हो..! 
दोनो के चहेरे चकाचौंध थे! 
सासुजी ने उसके चहेरे पर प्यार से हाथ फेरा..  !
फिर वो उस नर्स के साथ अपनी खुशी को दबाती हुई बाहर निकल गई!
कमरे मे वो अकेली थी..!
जैसे किसी बच्चे की सिसकियां उसे सूनाई दे रही है ! वो ईधर-उधर देखती है! कमरा सुना था !  उसकी हमदर्द तन्हाई के सिवा कुछ नही था यहां..!
फिर उसने अपने पेट पर हाथ रखकर उस नन्ही सी जान को महेसूस करने की कोशिश की..!
ये पल जीवन में अद्भुत थे!  उसकी आंखें झिलमिलाती है!
नमी से भरी धरती में अगर कोई बीज बोया जाता है तो वह बीज पनपता है! अंकुर फूटते हैं उसमें!  फिर चाहे क्यों ना उस धरती को कुरेद कर उसमें बीज बोए हो?
एक नए जीवन का संचार जरूर होता है! वो धरती लहलहा उठती है!  वैसे ही एक बीज ने  उसके जीवन में पनपना शुरू कर दिया था!
और मातृत्व का एहसास एक स्त्री के लिए अविस्मरणीय संजोग है! एक नन्हीं सी जान को अपनी कोख में पालना, एक एक पल उसका इंतजार करना, उसकी एक-एक आहट को सुनना, अपनी कोख में उसका स्पर्श और बदलती करवटें महसूस करना, उसकी जिंदगी में सही अर्थ में स्त्री होने के एहसास को  परिपूर्ण करता है!
उसके भीतर जैसे ममता का सैलाब उमड़ आया था!
ईस वक्त वो जख्म दर्द और टूटे हुए सपनो की किरचियां सब भूल गई!
उसे याद रहा तो सिर्फ आने वाली अपनी ही जिंदगी के एक अंश का लुभावना बालिश मंझर !
यह एहसास कुदरत ने सिर्फ एक ओरत को दिया है!
एक नन्नी सी जान को नौ महिने कोख में रखकर जन्म देना.. 'मां' बनना..!
           कहते है बहोत सी हड्डियां टूटने जितना दर्द एक बच्चे को जन्म देने में होता है!
वह सारा दर्द एक औरत सहती है ! एक नये जीवन को जन्म देती है ! ईस दुनिया मे लाती है!
             जबकी एक दायरे का मर्द औरत पर झुल्म करने में उसकी मजबूरी का फायदा उठाने में अपनी मर्दानगी देखता है!
औरत ऐसी पवित्र नदी की तरह है जो
अपने बहाव में मर्द की सारी कमझोरीयां सारी गलतियां बहाकर ले जाती है!
उसका हाथ बार बार पेट पर ईस लिये जा रहा था.. जैसे उसे दुखो से आजाद करने के लिए कोई मसिहा आने वाला था!  बालिश मन पर बडे होने का लेबल लग गया था!  आज वो खुद को बहोत बडा देख रही थी!
दरवाजे पर फिर आहट हुई!
वो संभल कर बैठ गई! उसने देखा की सामने उसके ससूर जी खडे थे!
वो धीमे से कुछ संकोच के साथ उनके पांव छूती है!
हमेशां उसके सर पर हाथ रखने वाले ससूर जी आज उसे अपने सिने से लगा लेते है!
उसका माथा चुमकर कहते है!
"बेटी अपना ख्याल रखना..! बरसो के बाद ईस धर में खुशी आने वाली है!
मैं नही चाहता अब कोई भी लापरवाही तेरे साथ बरती जाये..!
    उसके ससुर जी शहर की जानीमानी शख्शियत हैं! उनका रुतबा है शहर में
उनकी हाईट कम थी पर उनका कद समाज में उचांई के दायरे लांग रहा था!
बडे बडे लोग अपनी सारी अच्छी बुरी बातो के लिए उनके मशवरे को अहम मानते थे! राजनीति में भी उनकी अच्छी पटती थी!
पर एक बात थी जो उसे खटकती थी
ऐसे रुतबे और मानमर्तबे वाला ईन्सान
घर में आकर चुप हो जाता था घर के किसी भी मामले में मुह नहीं खोलते थे!  चुपचाप सब कुछ देखते थे हां एक बात थी वह घर में होते थे तब किसी की हिम्मत नहीं होती थी कुछ भी बोलने की! सब जैसे मिमियानी बिल्ली बन जाते थे!
पापा जी ये ऐसा रवैया उसकी समझ में अभी तक नहीं आया था! 
लेकिन आज जो  ससुरजी उसके सामने खड़े थे वह बिल्कुल उसके पिता के रूप में थे!
न जाने क्यों आज उनके सीने से लग कर फफक पडी!
सके माथे पर हाथ फेरते हैं फिर उसे बेड पर बिठाकर कहते हैं!
"बेटी.. मैं तेरा गुनहगार हूं! मैंने अपने स्वार्थ वश होकर कोई ऐसी गलती कर दी जो मुझे नहीं करनी चाहिए थी!
मगर मेरे बच्चे तु एक अच्छे घर से आई हुई समझदार बच्ची है! एक बात की मन में गांठ बांधले जब तक मैं जिंदा हूं तेरे साथ कोई भी नाइंसाफी नहीं होने दूंगा!
वो हैरानी से पापा जी को देखकर उनकी बातों को समझने की कोशिश मे लग जाती है!
पापा की इस बात के पीछे जरूर कोई दमदार राज छुपा था! किस तरीके से वो उसके गुनहगार थे? ऐसी क्या नाइंसाफी उन्होंने उसके साथ की थी?
मेरे माता-पिता ने एक अच्छा खानदान देखकर रिश्ता जोड़ा था ऐसी क्या बात है जो मेरे ससुर जी मन में दबा कर बैठे है और वह बात उनको अंदर ही अंदर खाए जा रही है!
हालांकि पापा जी से पूछ भी पूछने की  उसमें हिम्मत थी!
उसने देखा पापा जी की आंखें भर आई थी!
         जैसे वो अपना चेहरा छुपाना चाहते हो ऐसे उसके कमरे से बाहर निकल जाते है!
एक भारी निश्वास के साथ ससुर जी के लिये उठे अपने मन के चक्रवात पर वो ब्रेक लगाती है!
फिर वही नन्ही सी जान की चिल्लाहट और किलकिलारियां के धेरे में खुद को घीरा हुवा पाती है!
सभी बहोत खुश थे!
उसको राजकुमारी की तरह हथेली मे रखा जा रहा था!
ईसी बात को लेकर परेशान थी!  उसकी जेठानी! 
अब ज्यादातर वो उससे बात नही करती थी! उसकी जानबूझकर उपेक्षा कर रही थी!
वो जब भी उसके करीब जाने की कोशिश करती हैं वो हाथ झटक देती!
जेठानी के वर्ताव ने उसकी नींद हराम कर रखी थी!
एक दिन मौका देखकर उसने जेठानी का हाथ पकड लिया!
"क्या मैं जान सकती हूं मेरे साथ आपका ऐसा रुखा व्यवहार क्यों है? आपकी बहन नहीं बेटी जैसी हुं!
आप हमेशा कहती हैं कि मेरे पति को बचपन से आपने ही पाला हैं? तो फिर मेरे ही साथ ऐसा रवैया क्यों..? मैं हमेशा आपका आदर करती हूं! मैंने कभी आपके सामने अपनी जबान खोली नहीं फिर मेरे साथ आपको क्या दुश्मनी है?
जेठानीने गुस्से से उसका हाथ झटक दीया !
धिक्कार भरे लब्ज उसके होटो से निकले!
मुझसे तेरा ये नाटक बरखास्त नही होता..! मै जानती हूं तु मां बनने वाली है तो तेरे कदम जमी पर नही ठहर रहे!
ईस घर को मै वारिस नहि दे पाई मगर तु देने वाली है..! तेरा रुत्बा मुझसे उपर होगा..!  तु अच्छी तरह जानती है! मै एक बांझ औरत हुं..!  तु मुझसे दुर रहा कर..! खबरदार जो मेरे करीब आने की कोशिश की तो..!
जेठानी की बात सूनकर वो सून्न थी..!
ईस घर को वारिस ना दे पाने की तडप उसके सीने मे सिसे की तरह उतर गई थी! शायद तब से वो काफी चिडचिडी रहने लगी थी!
वो लब्जो मे आत्मियता भरकर जेठानी से बोली!
"दीदी.. आप ये क्या बोल रही हो..?
बच्चे को आने तो दो..!  जभी बच्चा जन्म लेगा वो ना सिर्फ मेरा होगा बल्कि आपभी उसकी बडी मां होगी..! 
प्लीज अपने आप को बांझ कहकर खुदको गाली मत दो..!
मै वादा करती हु आपसे कभी मुझे ईसबात का अंहकार नही होगा की ये बच्चा मेरा है..!
ईस की दो माये होगी..! ये बच्चा हम दोनो का होगा.. !
उसकी बात सूनकर जेठानी को झटका लगा! उनके अहम को लगी ठेस चीख मे तब्दिल हो गई..!

रहने दे...!  सब कहना बहोत आसान हैं! बात पर अमल करना उतना ही मुश्किल..!
कल को तुम भी लोगो की बातो में आओगी..!
जब भी ईस बच्चे की कोईभी रस्म करनी होगी..  लोगो की बातो में आकर मुझे तु नही बुलाएगी !
जेठानी की गभराहट जानकर वो उनके गले लग गई!
दीदी ऐसी घटीया सोच अपने दिमाग से निकाल फेंको..!
औरत कभी बांझ नही होती! औरत तो वो घरती है जो अपने अंदर सुख दुख
सबकुछ समेट लेती है!
कहते हैं बीजली अगर पक्के घरो पर गिरे तो घर तोड देती है!  तहस-महस कर देती हैं! 
लेकिन वो ही बिजली एक कच्ची घरती पर गिरती है तो वो भूमि उसे अपने भीतर समा लेती है!
दीदी हम औरते उस कच्ची धरती की तरह है जो कितने वज्रपात होने पर कभी टूटती नही है!
तुम बांझ नही हो बांझ तो वो औरते होती है जो दुसरी औरत की कद्र नही करती..!
तुम्हें बच्चा ना होना उसके लिए सिर्फ तुम ही जिम्मेदार नही हो..? क्या पता भाई जी मे ही कुछ कमी हो..!
फिकर ना करो एक दिन तूम्हे डॉक्टर को दिखा कर तसल्ली जरूर करूगी..!
मुझे यकिन है आप को भी जरुर मां बनने का सौभाग्य प्राप्त होगा..! "
आज वो बडी बडी बाते कर रही थी!
शायद वो उसी बच्चे की वजह से..!
उस दिन के बाद जेठानी का रवैया कुछ हद तक बदल गया!
वो भी उनसे नरमी से पेश आने लगी!
उसने सोचा सबकुछ ठीक हो जायेगा..  हालात भी बदल जायेंगी..!
मगर उसे मालुम नही था की उसकी जिंदगी में बच्चे के रुप मे आने वाली खुशी बडे बडे झंझावात लेकर आने वाली थी..!
सारे परिवार मे मात्र उसको ही बच्चा होना ये उसके लिए गर्व लेने वाली बात उसके लिए अभिषप्त होने वाली थी..!
..............
प्रिय रिडर्स... अगर एक औरत दुसरी औरत के लिए हमदर्द बनजाये तो बहोत सारी मुश्किले  अपने आप हल हो जाये..!
मगर ज्यादातर औरते ही दुसरी औरत का जीना हराम कर देती है..!  आप क्या कहते है..?  क्या होने वाला है उसकी जिंदगी में..?  कैसा तूफान आया जिसके चलते उसकी जिंदगी अश्को का दरिया बन गई..
जानने के लिए पढते रहे 'दास्तान-ए-अश्क! '

***

Rate & Review

Komal 1 day ago

Sarika Junghare 5 days ago

Heena Viral Gamit 5 days ago

Tejal patel 6 days ago

Gopal Nama 1 week ago