दहलीज़ के पार - 16

दहलीज़ के पार

डॉ. कविता त्यागी

(16)

गाँव के कुछ लोग, जो स्त्रियो की शिक्षा तथा उनके अधिकारो के प्रति नकारात्मक सोच रखते थे, श्रुति उनकी आँखो की किरकिरी बन चुकी थी। इसीलिए वे कई बार श्रुति के कार्य—व्यवहारो की शिकायत उसके पिता तथा भाइयो से कर चुके थे कि वह गाँव—समाज का वातावरण बिगाड़ रही है, उसे देख—देखकर गाँव की अन्य लड़कियाँ भी नियत्रणहीन होकर स्वेच्छाचारी होती जा रही है। परन्तु, श्रुति को निरन्तर उसकी माँ का समर्थन आर्शीवाद के रूप मे प्राप्त हो रहा था, इसलिए उसके भाई निशान्त और प्रशान्त उसके किसी भी कार्य—व्यवहार पर प्रतिबन्ध नही लगा सके थे, जबकि बड़ा भाई आशुतोष तटस्थ था। वह न तो श्रुति की शिक्षा के विरुद्ध अपने भाईयो की दमनकारी नीतियो का समर्थन करता था, न ही किसी भी स्त्री की स्वेच्छाचारिता के पक्ष मे था। वह स्त्रियो को शिक्षा से वचित रखने के पक्ष मे कभी नही रहा था, परन्तु उसके सामाजिक सस्कारो का प्रभाव ही कहा जा सकता था कि उसके मन मे सदैव स्त्रियो के कर्तव्यो की तथा पुरुषो के अधिकारो की सूची ही परिकल्पित होती थी। स्त्रियो को भी कुछ अधिकार प्रकृति ने या कानून ने प्रदान किये है, इस विषय पर सोचने की उसने कभी भी आवश्यकता नही समझी थी।

दो वर्ष तक श्रुति के परिवार तथा समाज की स्थिति इसी प्रकार चलती रही। समाज का एक बड़ा भाग पचायत कर—करके पुरानी व्यवस्था को बनाए रखने का प्रयास कर रहा थेा। दूसरी ओर, धीरे—धीरे कुछ लोग जिनकी सख्या अपेक्षाकृत कम थी, रूढियो को तोड़ते हुए आगे बढ़ने का प्रयास कर रहे थे। इन दो वषोर् मे समाज के कुछ लोगो की धारणा अभी तक वही रुकी हुई थी, तो कुछ लोगो के जीवन मे तथा विचारो मे अत्यधिक परिवर्तन आ चुका था। दो वषोर् के समयान्तराल मे श्रुति बारहवी कक्षा उत्तीर्ण कर चुकी थी। गरिमा की स्नातक की शिक्षा सम्पन्न हो चुकी थी और उसका बेटा अब इतना बड़ा हो चुका था कि वह उसे शब्दो का शुद्ध उच्चारण करना सिखाने लगी थी।

गरिमा अपने बेटे के भविष्य को लेकर प्रतिक्षण अनेकानेक सुखद कल्पनाएँ करती रहती थी और साथ ही प्रभा की प्रेरणा से स्वय भी आकाश की ऊँचाईयो को स्पर्श करने के सुखद—सपने बुन रही थी। प्रभा ने गरिमा को अपने लक्ष्य के प्रति लगन और दृढ़ निश्चय से काम करने की ऐसी प्रेरणा दी थी कि उसके हृदय मे कुछ कर गुजरने की महती आकाक्षा हर पल हिलोरे लेने लगी थी। अपनी महत्वकाक्षा को साकार करने की दिशा मे वह यथासम्भव क्रियाशील रहती थी, किन्तु घर की चारदीवारी के अन्दर रहकर इस दिशा मे क्रियाशील रहने के कारण उसके प्रति समाज का विरोध—भाव उग्र रूप मे मुखर नही होता था। उसके प्रति समाज का उग्र विरोध न हाने का एक कारण यह भी था कि उसकी महत्वकाक्षाओ की पूर्ति के अधिकाश उपकरण उसके पिता के घर पर थे। अपनी महत्वकाक्षा के अपरिपक्व पखो से उड़ना सीखने के लिए वह प्रायः पिता के घर ही आती थी, जहाँ पर उसको उड़ने के लिए एक उन्मुक्त आकाश सुलभ होता था। परन्तु इस उड़ान के लिए उसके पास समय का एक बहुत छोटा तथा अपर्याप्त अश ही रहता था। पिता के घर रहने के लिए गरिमा को एक निश्चत समयावधि ही अनुमन्य थी। उसके बाद उसको अपनी उड़ान का अभ्यास उसी चारदीवारी मे करना पड़ता था, जिसे सभ्य—समाज ससुराल की सज्ञा से अभिहित करता है।

गरिमा की क्रियाशीलता श्रुति को भी प्रभावित एव प्रेरित करती थी। अपनी भाभी की उड़ान देखकर उसके अन्तःकरण मे भी महत्वकाक्षाएँ जन्म लेने लगी थी। उसकी महत्वकाक्षाओ का पोषण प्रभा एव उसका भाई अथर्व कर रहे थे। वे दोनो भाई—बहन लक्ष्य निर्धारण करने मे उसका मार्गदर्शन भी करते थे। किन्तु, दुर्भाग्यवश उसके लक्ष्य को प्राप्त करने मे उसका परिवार सहयोग नही दे रहा था। उसका परिवार यथाशीघ्र उसका विवाह सम्पन्न कराना चाहता था। उनका तर्क था कि लड़की के जीवन का एकमात्र लक्ष्य विवाह करके अपने पति का घर चलाना होना चाहिए और प्रत्येक लड़की का कर्तव्य है कि वह अपने अभिभावको द्वारा चयनित वर को स्वीकार करे। श्रुति ने अपने परिवार के इस दृष्टिकोण को नकारते हुए घोषणा कर दी —

किसी भी लड़की के जीवन का लक्ष्य निश्िचत करने का अधिकार स्वय उस लड़की को होना चाहिए ! मेरे जीवन का लक्ष्य भी मै स्वय निर्धारित करुँगी ! मै अभी विवाह नही करुँगी, विवाह मेरे जीवन का एकमात्र लक्ष्य नही है ! मै पढ—लिखकर अफसर बनूँगी और तब अपने लिए स्वय ही सुयोग्य जीवन—साथी का चुनाव करुँगी। इस विषय मे मै किसी का भी ऐसा निर्णय नही मानूँगी, जो मेरे विचारो के विरुद्ध मुझ पर थोपा जाएगा।

श्रुति की घोषणा ने उसके परिवार का चैन छीन लिया था। बेटी को उसकी इच्छानुसार पढ़—लिखकर अफसर बनने तक कुँवारी बिठाये रखना और तत्पश्चात्‌ उसे वर—चयन की छूट प्रदान करना श्रुति के परिवार की परम्परा नही थी। श्रुति की घोषणा के पश्चात्‌ अपनी परम्परा की तथा मान—मर्यादा की रक्षा के लिए उसके परिवार को एक ही विकल्प सूझ रहा था कि शीघ्रातिशीघ्र श्रुति का विवाह सम्पन्न करा दिया जाए, भले ही यह कार्य उसकी इच्छा के विरुद्ध बलपूर्वक ही क्यो न करना पड़े। इस स्थिति मे श्रुति के परिवार को शिक्षित, सम्पन्न—कुलीन वर्ग मिलना कठिन था। अतः उसके परिवार ने निश्चय किया कि वर की शैक्षिक योग्यता की अपेक्षा उसके कुल को वरीयता दी जाए, ताकि कम समय मे भी एक अच्छे कुल के साथ सम्बन्ध स्थापित हो सके।

श्रुति के परिवार को शका थी कि एक ऐसा लड़का, जो कुलीन और धन—सम्पन्न होने के साथ—साथ शिक्षा—सम्पन्न भी हो, उनकी पथभ्रष्ट बेटी को स्वीकार नही करेगा। अपनी इस शका के लिए वे स्वय उत्तरदायी थे, श्रुति नही थी, ऐसा श्रुति का कहना था। श्रुति का तर्क था कि परम्परा के नाम से रूढ़ियो का बोझ ढोना अज्ञानता है, जबकि उसका परिवार और समाज उसकी इसी तार्किक और प्रगतिशील सोच को विद्रोह का नाम देकर उसको अपराधी की सज्ञा से अभिहित करता है। किन्तु, अपराधी मानते हुए भी बेटी को किसी प्रकार की प्रत्यक्षतः यातना देने के पक्ष मे न तो श्रुति का परिवार था, न उसका समाज था। फिर भी श्रुति के विद्रोह का दमन उसके परिवार तथा समाज दोनो के लिए आवश्यक था, ताकि भविष्य मे कोई लड़की इस प्रकार विद्रोह न करे। उन्हे भय था कि यह विद्रोह परम्परा का रूप ग्रहण न कर ले, इसीलिए अतिशीघ्र श्रुति का विवाह करना और भी अधिक आवश्यक था।

श्रुति के विवाह सम्बन्धी उसके परिवार की योजना तथा समाज का इस योजना के लिए समर्थन अब श्रुति से छुपा नही रह सकता था। इस विषय मे ज्ञात होते ही श्रुति के विद्रोह ने उग्र रूप धारण कर लिया। उसके उग्र रूप को देखकर उसके भाईयो का क्रोध बढ़ रहा था। वे स्वय कोई कठोर कदम उठाने से अच्छा यह मानते थे कि विवाह का समय आने तक समझा—बुझाकर ही श्रुति को शान्त रखा जाए। अतः उनका माँ के ऊपर निरन्तर दबाव बढ़ता जा रहा था कि कुल की मान—मर्यादा की रक्षा के लिए वे अपनी बेटी को नियत्रण मे रखे। अपनी ममता के हितार्थ माँ उसे अपनी सामर्थ्य—भर समझाती थी ; उसको उन कठिनाईयो और दुष्परिणामो से अवगत कराती थी, जो अवश्यम्भावी थी।

श्रुति जिस राह पर चल पड़ी थी, वहाँ से लौटने के लिए तैयार नही थी। माँ के अधिक समझाने पर जब माँ उसके भविष्य के प्रति चिन्ता तथा भय प्रकट करती थी, तब माँ की छलकती आँखो मे झाँककर उसकी आँखे भी नम हो जाती थी। तब वह मात्र इतना ही कह पाती थी —

माँ, मै कुछ भी गलत नही कर रही हूँ। मै आपको विश्वास दिलाती हूँ, मै कभी ऐसा काम नही करुँगी, जिससे समाज मे तेरा सिर झुके। पर मै जीवन को अपने अनुसार जीना चाहती हूँ ! अपने जीवन मे प्रभा की तरह कुछ करना चाहती हूँ ! मुझे बस तेरा आशीर्वाद चाहिए ! मै जानती हूँ, मुझे मेरे परिवार से सहयोग नही मिल सकता, पर तेरा आशीर्वाद मुझे मिल सकता है ! दोगी ना मुझे आर्शीवाद, माँ ?

हाँ, पर बेटट्‌ी, मुझै तो लगै, मेरा आसीस तुझै थोड़ा पड़ जावेगा ! तेरे बाप—भइयो की अर इस बिरादरी—समाज की ताकत भोत बड़ी है!

माँ, मेरे लिए तेरे आशीर्वाद की ताकत उन सबकी ताकत से बड़ी है !

श्रुति की हठ और हिम्मत के सामने माँ नतमस्तक हो जाती थी और बेटी को लेकर अपने मन मे व्याप्त भय और चिन्ता को छिपाती हुई घर के कायोर् मे व्यस्त हो जाती थी। घर के कायोर् मे व्यस्त रहते हुए भी माँ प्रति क्षण श्रुति की रक्षा के लिए ईश्वर से प्रार्थना करती रहती थी।

एक दिन प्रातःकाल श्रुति ने माँ को बताया कि उसको उच्च शिक्षा प्राप्त करने के लिए शहर मे जाना पड़ेगा। उसने माँ को यह भी बताया कि वह प्रभा की भाँति घर पर रहकर ही अध्ययन करेगी, बस एक बार कॉलिज जाना आवश्यक है। माँ ने श्रुति के समक्ष चिन्ता प्रकट करते हुए कहा कि अकेली लड़की शहर मे जाए यह उचित नही है। एक ओर तो वह अकेली होने के कारण स्वय असुरक्षित रहेगी दूसरी ओर समाज मे उसको लेकर भिन्न—भिन्न प्रकार की अशोभनीय टिप्पणियाँ की जाएँगी। प्रत्युत्तर मे श्रुति ने माँ को समाज की टिप्पणियो पर ध्यान न देने का परामर्श दिया और अपनी सुरक्षा के प्रति माँ को निश्चिन्त करते हुए बताया कि वह अकेली शहर नही जा रही है, बल्कि अर्थव उसके साथ जा रहा है। श्रुति के साथ अर्थव के जाने की सूचना सुनते ही माँ का सिर चकराने लगा। माँ ने एक बार पुनः श्रुति को समझाया कि अथर्व के जाने से बात बढ़ सकती है। लोग तिल का ताड़ बनाकर चर्चा करेगे, जिससे प्रशान्त और निशान्त का क्रोध अनियत्रित हो जाएगा और वे क्रोध के वशीभूत कुछ भी अनिष्ट कर सकते है।

माँ ने जिस परिवार और समाज मे इतना समय व्यतीत किया था कि यौवन का सौदर्य बुढ़ापे की झुर्रियो मे परिवर्तित हो चुका था और बाल सफेद हो चले थे, उस परिवार की प्रकृति से वे भली—भाँति परिचित थी। माँ जानती थी कि वह समाज किसी व्यक्ति की इच्छा—आवश्यकता की अपेक्षा अपनी रूढ़ परम्पराओ को अधिक महत्व देता है। और जब सिर पर क्रोध सवार हो, तब तो यह अपेक्षा करना भी बेमानी हो जाता है कि कोई व्यक्ति उचित—अनुचित के प्रश्न पर विचार करके कार्य करे। माँ को इस बात का आभास हो रहा था कि अथर्व के साथ श्रुति का शहर जाना किसी तूफान का सकेत है। इसीलिए उन्होने श्रुति को शहर जाने से रोकने का भरसक प्रयास किया था, परन्तु वह माँ की बात समझने के लिए तैयार नही थी। उसने अपनी माँ से निवेदन किया कि वे उसका अथर्व के साथ शहर जाने से न रोके, क्योकि सौभाग्य से ही उसको अर्थव का सहयोग मिला है, जिसे वह खोना नही चाहती है। बेटी की प्रार्थना और तकोर् से पराजित होकर माँ ने उसको अर्थव के साथ शहर जाने की अनुमति दे दी और माँ से आर्शीवाद लेकर श्रुति उच्च शिक्षा मे प्रविष्टि पाने के लिए घर से निकल पड़ी।

शाम के लगभग तीन बजे थे। श्रुति के सकुशल लौटने की प्रतीक्षा मे माँ की आँखे दरवाजे की ओर निरन्तर निर्निमेष देख रही थी। उसी समय प्रशान्त ने घर मे प्रवेश किया। उसकी आँखे क्रोध से लाल हो रही थी। उसको देखते ही माँ भय से काँपने लगी। हृदय मे किसी अनिष्ट की शका ने उनकी शक्ति को क्षीण कर दिया था। बेटे की आँखो मे देखकर उसके क्रोध का कारण पूछने की शक्ति अब उनमे नही थी, इसलिए दृष्टि नीचे करके अपने हाथ की तर्जनी से मिटट्‌ी कुरेदने लगी। अब तक प्रशान्त माँ के निकट आ चुका था। वह क्षण भर के लिए निकट खड़ा होकर क्रोधयुक्त दृष्टि से माँ को घूरता रहा। एक क्षण पश्चात्‌ उसने माँ से कहा —

सुरति कहाँ गयी ऐ ?

अभी आ जावेगी थोड़ी—भोत देर मे।

मैन्ने न्यु बुज्झी है, कहाँ गयी है सुरति ! उसके आणे का फैसला हम करेगे, इस घर मे अब ऊ आवेगी या ना !

मै कहरी हूँ ना तेरे सै, अभी आ जावेगी, बाहरै गयी ऐ किसी काम सै !

किस काम सै गयी ऐ ? तैन्नै ई भेज्जी ऐ ?

हाँ मैन्नै भेज्जी ऐ ! अभी आ री होयेगी !

तो न्यू और बता दे, कहाँ भेज्जी ऐ ? ...तेरे अर उसके पिच्छै चल पड़े, तो इस खानदान का नाम मटट्‌ी मे मिलने मे एक पल की बी देर ना लगै ! अर मटट्‌ी मे बी ऐसा मिलेगा, इस खानदान के नाम पै लोग थुक्केगे ! समझगी या न समझी ! प्रशान्त ने उपहास की मुद्रा मे कहा। अतिम वाक्य कहते—कहते उसकी मुद्रा कठोर हो गयी और वह बाहर की ओर चल दिया।

कोई मटट्‌ी मै ना मिला रा इस खानदान का नाम ! इतणा गरम मत हौवे तू ! परसान्त ! मेरी बात तो सुण ले बेटट्‌ा ! बस, एक बेर मेरी बात ...!

माँ प्रशान्त को रोकने का प्रयास करती रही ताकि श्रुति के प्रति उसका क्रोध शान्त करके वे उसको समझा सके और यह विश्वास दिला सके कि श्रुति कुछ भी अनुचित कार्य नही कर रही है। न ही वह भविष्य मे ऐसा कोई कार्य करेगी, जिससे उसके परिवार को समाज मे सिर झुकाना पड़े। किन्तु प्रशान्त क्रोधावेश मे माँ की बात सुनने—समझने के लिए तैयार नही था। माँ पर श्रुति को अनावश्यक छूट देने का और कुल की मान—मर्यादा का ध्यान न रखने का आरोप लगाता हुआ वह घर से निकल गया। प्रशान्त के घर से निकलते ही माँ फफक—फफक कर रोने लगी।

प्रशान्त का स्वर सुनकर गरिमा अपने कमरे से बाहर निकल आयी थी, परन्तु प्रशान्त के बाहर जाने तक वह उस स्थान पर नही आयी थी, जहाँ पर प्रशान्त माँ से अपना क्रोध प्रकट कर रहा था। प्रशान्त के जाने के पश्चात्‌ उसने माँ को रोते हुए देखा, तो वह तुरन्त माँ के निकट आकर उन्हे चुप कराने का प्रयास करने लगी। गरिमा को देखकर माँ का धैर्य पूर्णरूपेण छूट गया और वे फूट—फूट कर रोती हुई बार—बार कहने लगी —

मेरी बच्ची ! मेरी बच्ची कू बचा ल्यो कोई आज ! ये सब उसै मार देगे !

कौन मार देगे ? क्या किया है श्रुति ने जिससे आप इतना घबरा रही है ?

गरिमा के प्रश्नो का माँ ने कोई उत्तर नही दिया। वे केवल यही कहती रही कि श्रुति को ये सब मार देगे, उसे बचा लो और निरन्तर रोती रही। उनके रोने का स्वर सुनकर श्रुति की चाची दौड़कर उनके घर आयी। दरवाजे को पार करते—करते चाची ने गरिमा से उसकी सास के रोने का कारण पूछा। गरिमा ने चाची का प्रश्न सुनकर भी अनसुना कर दिया और अपनी दृष्टि माँ की ओर करके निश्छल भाव से देखने लगी। माँ के निकट पहुँचकर चाची ने सहानुभूतिपूर्वक उनके आँसू पौछते हुए पुनः रोने का कारण पूछा। अब तक माँ सम्हल चुकी थी। उन्होने बहुत ही सफाई के साथ बताया —

रामरती, आज अपणी माँ भोत याद आ री है। आज मेरी माँ जिन्दी होत्ती, तो छटे चमास पीहर मे मिल आत्ती ! पर, माँ—बाप के मरतो ई पीहर पराया हो गा ! अब तो आखिरी साँस तक इसी घर मै टैम काटना है।

भैन जी, इस घर मे कुछ दुख है तमै ? राज्जी—खुसी घर मै सब कुछ तो है ! आज बेटा—बऊ नै कुछ कह दिया है या जेठ जी से कुछ...?

कह्‌या तो किसी नै कुछ ना है रत्ती, पर जैसै उल्टे—पलटे बिना एक ओड़ से पड़ी—पड़ी रोटट्‌ी तवे पै जलण लगै है, ऐसै ई औरत की बात ऐ ! कधी पीहर मै अर कधी ससुराल मै रहकै ठीक टैम कट जावै तो ठीक है, नई तो तलवे जलण लगै ऐ !

हाँ—अ ! माँ—बाप याद तो आवै ई ऐ। चाची ने समर्थन करते हुए कहा। चाची ने माँ का समर्थन तो कर दिया था, किन्तु उनके स्वर मे अब सहानुभूति का वह वेग नही रह गया था, जो आते समय था। माँ की याद आना या माँ की याद मे रोना उनके लिए रोचक विषय नही था। अतः उन्होने वहाँ से चले जाना ही बेहतर समझा। चलते—चलते चाची के चेहरे का भाव—परिवर्तन हो गया और उन्होने माँ की ओर देखते हुए कहा—

बहन जी, माँ की याद आणे मै तो कुछ बुराई ना है, पर इतनी जोर—जोर मत रोये करो ! थारा रोणा सुणके मेरा तो दिल ई बैठ गा !

माँ को भविष्य मे ऊँची आवाज मे नही रोने का परामर्श देकर चाची चली गयी। चाची के आने के पश्चात्‌ माँ ने कुछ समय के लिए रोना बन्द कर दिया था, किन्तु चाची के जाने के पश्चात्‌ माँ ने पुनः रोना आरम्भ कर दिया। इस बार उनकी आँखो से आँसूओ की धारा बह रही थी, होठ बड़बड़ा रहे थे, किन्तु रोने का स्वर ऐसा था कि निकट बैठा व्यक्ति ही कठिनता से उनका रोना सुन पाता। माँ की स्थिति देखकर गरिमा ने पुनः उनसे पूछा—

आप श्रुति को इतनी चिन्ता क्यो कर रही है ? सुबह ही वह शाम तक लौटकर आने के लिए कहकर अपनी पढ़ाई के काम से शहर गयी थी। अभी शाम होने मे दो घटे बाकी है ! पाँच—छः तो बज ही जाते है, शहर से लौटने मे, फिर आप इतनी चिन्ता क्यो कर रही है ?

चल भित्तर चल,व्‌ही बताऊँगी, मुझै फिकर क्यूँ हो रही है !

माँ ने अपने आँसूओ को अपनी साड़ी के पल्लू से पोछते हुए और उठकर गरिमा का हाथ पकड़कर लगभग उसको खीचकर ले जाने की मुद्रा मे अदर की ओर चल दी। आज माँ गरिमा को लेकर अपने कमरे मे नही गयी, बल्कि गरिमा के कमरे मे जाकर स्वय बैठ गयी और गरिमा को भी बैठने का सकेत किया। तत्पश्चात्‌ स्वय ही गरिमा की जिज्ञासा शात करने के उद्‌देश्य से बोली—

भार सै कोई आवै ऐ तो सुद्‌दा मेरे कोठ्‌ठे मै आवै है, तेरे कोठ्‌ठे मै नी आवैगा कोई ! य्‌हाँ बैठकै मै तुझै बताऊँगी, मुझै सुरति की इतनी फिकर क्यू हो री है ! तू सुणेगी, तो तेरा बी कालजा काँप जावेगा !

माँ की चेतावनी सुनकर गरिमा उनकी चिन्ता का कारण सुनने के लिए सावधान होकर बैठ गयी। उसको जिज्ञासा की मुद्रा मे बैठा देखकर माँ ने कहा—

तुझै पता है, सुरति किसकी साथ गयी है सहर मै ?...पिरभा के भैया की साथ गयी है ! अपने प्रश्न का उत्तर भी माँ ने स्वय ही दे दिया। एक क्षण रुककर माँ ने पुनः कहा— तैन्नै देक्खा नी परसान्त कितने गुस्से मै हा ? मुझै ऐसा लगै ऐ, उसे पता चल गा ेऐ सुरति के सहर जाणे का ! सुरति पहलाद के लौड्‌डे की साथ गयी है ,उसे न्यू पता चल गा तो ऊ सुरति कू बबली की तरयो—ई... ! माँ अपना वाक्य पूरा नहीे कर पायी और मुँह पर अपनी साड़ी का पल्लू रखकर सिसकने लगी। गरिमा ने माँ से कहा—

बबली की तरह क्या ? और बबली है कौन ? जिसका नाम लेते ही आप रोने लगती है !

इसी कुटम्ब—कुनबे मै सुरति के ताऊ है, जिनकी लौडिया सुरति सै तीन साल बड़ी ही। बडे लाड—प्यार सै उसके बाप नै उसका नाम बबली धरा हा, अर जब बबली बड़ी हुई, तो एक दिन उसी बाप नै अर उसके भइयो ने बबली कू...!

क्या किया उसके पिता ने जब वह बड़ी हो गयी ? बोलो मम्मी जी ! बताओ मुझे भी बबली के साथ उन्होने क्या किया ?

गरिमा बबली की दर्दननाक कहानी सुनने के लिए व्याकुल हो उठी। उसको आभास हो रहा था कि अवश्य ही बबली के साथ कुछ अनिष्ट हुआ था। बबली का नाम लेते ही माँ की आँखो मे जमाने—भर का दर्द उतर आया था। कुछ क्षण तक वे रोती रही, तत्पश्चात चुप होकर उन्होने गरिमा को बबली के विषय मे विस्तार से बताया। उन्होने गरिमा को उसके विषय मे जो कुछ बताया, उससे गरिमा के रोगटे खड़े हो गये और वह भय से काँपने लगी। माँ ने बताया था कि

बबली गाँव मे एक ऐसे लड़के के साथ घुल—मिलकर बाते करती थी, जो इस गाँव का नही था। वह लड़का गर्मियो की छुट्‌टी व्यतीत करने के लिए इस गाँव मे अपनी मौसी के घर आया हुआ था। एक महीने मे बबली उस लड़के के साथ इतना घुल—मिल गयी थी कि उसके लिए माता—पिता, भाई—बहन और बिरादरी समाज महत्वहीन हो गये थे। बबली के जीवन मे केवल उस लड़के का महत्व रह गया था। वह उसी के साथ जीना चाहती थी और उसी की खातिर मरने के लिए तैयार थी। एक दिन उसके पिता को पता चला, तो उन्होने बबली को बहुत समझाया—बुझाया कि वह मर्यादा मे रहे और कुल पर दाग न लगाये। किन्तु बबली को उस लड़के के बिना जीवित रहना स्वीकार नही था। उसने अपने स्पष्ट कह दिया था कि अपना सारा जीवन उसी लड़के के साथ बितायेगी, जिसे वह प्रेम करती है।

पिता ने प्रेम का नाम सुनते ही क्रोध मे आकर घर मे रखा हुआ टी॰वी॰ घर के बाहर खडजे पे दे मारा। उन्होले चिल्ला—चिल्लाकर कहा कि उनकी बेटी पर प्रेम का भूत टी॰वी॰ देखकर चढ़ा है। टी॰वी॰ देखकर नयी आयु के लड़के—लड़की अपनी यर्थाथ परिस्थिति और और सस्कृति को भूलकर उसी सस्कृति मे जीने की चाहत रखते है, जिसे टी॰वी॰ पर देखते है। अपनी सस्कृति तथा मान—मर्यादा को बता—समझाकर उन्होने बबली को चेतावनी दी कि यदि इतना समझाने के बाद भी वह उस लड़के के साथ मिली, तो वे उसको जीवित नही छोडेगे। उन्हे अपनी बेटी की हत्या करने मे भी किसी प्रकार का सकोच नही होगा, यदि उनकी बेटी मर्यादा की रेखा को पार करके उनके कुल की मान—प्रतिष्ठा पर धब्बा लगायेग ी! बबली ने अपने पिता से प्रार्थना की, उन्हे विश्वास दिलाया कि वह मर्यादा की रेखा नही लाँघना चाहती है, वह उस लड़के के साथ विवाह करके उसे अपना जीवन—साथी बनाना चाहती है। बबली के पिता को वह लड़का अपने दामाद के रूप मे स्वीकार नही था। उन्होने बेटी की प्रार्थना ठुकरा दी और बेटी ने पिता का प्यार ठुकराकर उनकी चेतावनी को चुनौती के रूप मे स्वीकार किया।

पिता की चेतावनी के पश्चात्‌ भी बबली अपने प्रेमी से यथावत्‌ भेट करती रही। पिता की कुपित दृष्टि अब निरन्तर बेटी का पीछा कर रही थी। बेटी के क्षण—क्षण का हिसाब पिता के पास रहने लगा था कि किस समय, किस स्थान पर अपने प्रेमी से भेट करने जाती है ? एक दिन बबली को माँ ने अपने घर से किसी काम के लिए भेजा, किन्तु वह माँ की आज्ञा का उल्लघन करके माँ द्वारा बताया गया काम छोड़कर अपने प्रेमी से मिलने जा पहुँची। पिता की पैनी दृष्टि से बच पाना उसके लिए कठिन ही नही, असम्भव था, वह इस बात को भली—भँति जानती थी। लेकिन वह इस तथ्य से पूर्णतः अनभिज्ञ थी कि उसके पिता अपने शब्दो को यर्थाथ मे परिवर्तित करने के लिए अपनी ही बेटी का जीवन छीन सकते है। अपनी इसी अनभिज्ञता के वशीभूत वह निश्चिन्त होकर वह अपने प्रेमी से भेट करने के लिए पहुँच गयी।

अगले दिन प्रातःकाल ज्ञात हुआ कि बबली ने आत्महत्या कर ली है। रात मे ही उसका दाह—सस्कार कर दिया गया था। बबली द्वारा आत्महत्या करने के पश्चात्‌ पता चला कि उसका प्रेमी भी उस रात अपने घर नही आया था। लड़के की मौसी को शका हो गयी थी कि बबली ने आत्महत्या नही की है, बल्कि उसकी हत्या की गयी है और उसी के साथ उसके प्रेमी की हत्या कर दी गयी होगी ! अपनी शका के आधार पर लड़के की मौसी ने पुलिस के पास शिकायत दर्ज कर दी। तब सबको पता चला कि बबली के पिता ने अपनी बेटी और उसके पे्रमी की निर्मम हत्या करके रात मे ही उन दोनो को जगल मे भूसे के ढ़ेर पर रखकर जला दिया था। गाँव मे पुलिस भी आयी, किन्तु शव न मिलने की बात कहकर कुछ ले—देकर बात वही खत्म कर दी गयी। गाँव मे सभी को पता चल गया था कि बबली के पिता ने कब और कहाँ किस प्रकार हत्या की थी, किन्तु कोई भी पुलिस के समक्ष सत्य—तथ्य बताने के लिए तैयार नही था। अधिकाश लोग गाँव—समाज मे ऐसे थे, जो बबली तथा उसके प्रमी की हत्या के पक्षधर थे और उसके पिता तथा भाईयो की सराहना करके कहते थे कि बिरादरी—समाज की मर्यादा को तार—तार करने वालो को ऐसा ही दण्ड मिलना चाहिए।

बबली की करुण कथा सुनाकर श्रुति की माँ ने गरिमा की आँखो मे देखा, मानो कह रही थी कि उनकी बेटी का जीवन भी सकट मे है। उसका जीवन वे बचाना चाहती है, किन्तु वे अपनी बेटी के प्राण कैसे बचाये ? माँ की दृष्टि का आशय समझकर गरिमा ने वैचारिक मुद्रा धारण कर ली। अब तक वह बबली की करुण कथा सुनकर भय से अस्थिर थी। उसके रोगटे खड़े हो गये थे। परन्तु माँ की दृष्टि ने उसे अनुभव कराया था कि यह समय समस्या का समाधान ढूँढने का समय है। भयभीत होना या चिन्ता करना उसकी समस्या का समाधान नही है। कुछ क्षणो तक वह समस्या का विश्लेषण करती रही। वह श्रुति को उसके भाईयो के कोप से बचाने का हर सम्भव प्रयास करना चाहती थी, परन्तु उस समय श्रुति को बचाने का कोई भी उपाय उसको सूझ नही रहा था।

श्रुति के विषय मे विचार करते—करते गरिमा के मन—मस्तिष्क मे आशा की एक किरण चमक उठी और गरिमा प्रसन्नता से उछल पड़ी। उसने माँ को बताया कि अथर्व सदैव अपने साथ मोबाइल फोन रखता है। यदि प्रभा के घर जाकर उसको वर्तमान परिस्थिति से अवगत कराया जाए, तो वह अथर्व को तथा श्रुति को सकट के प्रति सचेत कर सकती है। माँ तुरन्त ही गरिमा के विचार से सहमत हो गयी। उन्होने अपनी सहमति प्रकट करने के लिए आशामयी मुद्रा मे सिर हिलाया और उठकर बाहर की ओर चल दी। माँ की आँखो मे अब आँसूओ के स्थान पर आशा की झलक दिखायी दे रही थी।

जिस समय श्रुति की माँ अपने घर के दरवाजे से बाहर निकली थी, उस समय तक उन्हे यह ज्ञात नही था कि जिस बात को वह अपने घर परिवार तक सीमित रखकर बाहर वालो से छिपाना चाहती है, वह बात पहले ही गाँव—भर मे जगल की आग की भाँति फैल चुकी है। यह बात उन्हे घर के बाहर निकलकर ज्ञात हुई, जब पडोस के स्त्री—पुरुष उन्हे देखकर आपस मे कानाफूसी करने लगे। उन लोगो की दृष्टि से श्रुति की माँ आहत हो उठी। उनमे से प्रत्येक की दृष्टि विषैले बाणो की भाँति माँ के हृदय को ऐसे बेध रही थी, मानो माँ ने कोई जघन्य अपराध कर दिया था। अपने आहत हृदय के साथ श्रुति की माँ आगे बढ़ गयी और बढ़ती ही गयी, जब तक प्रभा के घर न पहुँच गयी। प्रभा के घर मे प्रवेश करने तक अनगिनत आँखे माँ का पीछा करती रही थी। ऐसा प्रतीत हो रहा था कि माँ का पीछा करने वाली आँखो को उन पर किसी अकल्याणकारी—गुप्त योजना मे सम्मिलित होने का सदेह होने के कारण वे आँखे उनके प्रत्येक क्षण की कार्यविधियो का सकलन कर रही थी। माँ अपना पीछा करने वाली उन आँखो से असहज अवश्य हो रही थी, परन्तु उस समय अपनी बेटी की चिन्ता मे उनके लिए सब कुछ तुच्छ एव महत्वहीन लग रहा था।

प्रभा के घर मे प्रवेश करने के पश्चात्‌ माँ ने एक लम्बी साँस ली। प्रभा के घर की चारदीवारी मे श्रुति की माँ स्वय का पीछा करने वाली आँखो से ओझल होकर राहत का अनुभव कर रही थी। परन्तु, श्रुति की माँ को देखकर, जो प्रभा के घर किन्ही विशेष परिस्थितियो मे ही आती थी, प्रभा और उसकी माँ घबरा उठी। उन्हे देखकर प्रभा ने कहा —

क्या बात है ? सब कुछ ठीक तो है ?

अरी घर मे आने वाले को पहले आने—बैठने की बात कहने की जगह खड़े—खड़े न्यूँ बूझ रही है, क्यूँ आयी है ? ये कहाँ की तहजीब है ? प्रभा की माँ ने उसको डाँटते हुए कहा। श्रुति की माँ ने उनकी बातो पर ध्यान नही दिया। उनका तो तन—मन अपनी बेटी की चिन्ता मे लय हो रहा था। उनका ध्यान केवल प्रभा के प्रश्न को ग्रहण कर पाया था, इसलिए उन्होने उसी का उत्तर देते हुए अपने भावो को प्रकट किया। उनकी भावाभिव्यक्ति मे अपनी बेटी की चिन्ता तथा उसकी सहायता के लिए प्रभा के प्रति ममतामयी आशा एक साथ अपने करुण रूप मे विद्यमान थी। उन्होने प्रभा से कहा —

ना बेट्‌टी कुछ ठीक नी है ! मेरी बच्ची की जान बचा ले, मेरी बच्ची !

पर हुआ क्या है ? यह तो बताइये मुझे !

मेरी बच्ची, परसान्त कू पता चल गा ऐ, सुरति तेरे भैया के साथ सहर गयी ऐ ! ऊ जाण सै मार देगाा मेरी बच्ची कू, जैसे बबली के बाप ने...! श्रुति की माँ की चिन्ता देखकर और उनकी चिन्ता का कारण जानकर प्रभा के पैरो के नीचे से धरती खिसकने लगी। बबली के साथ हुई अमानवीय घटना से प्रभा अनभिज्ञ नही थी। प्रभा की माँ भी इस सूचना को सुनकर चिन्ता से बेचैन हो गयी। अपने बेटे अथर्व के प्राणो पर सकट के बादल मँडराने का अनुमान करते ही उनकी आँखो मे अँधेरा छा गया। अपनी माँ की तथा श्रुति की माँ की दयनीय दशा को देखकर प्रभा ने स्वय को सम्भाला और कहा —

आप दोनो चिन्ता मत कीजिए। श्रुति और अथर्व को कुछ नही होगा।

कैसै कुछ ना होवेगा ? कैसै बचेगे वे उस जल्लाद परसान्त सै ? श्रुति की माँ ने अपने हृदय की शका प्रकट करते हुए कहा। उन्होने प्रभा को यह भी बताया कि प्रशान्त ने सम्भवतः निशान्त तथा अपने अन्य साथियो को भी साथ लेकर कोई घृणित योजना बनायी होगी और अपनी योजना को कार्यरूप मे परिणत करने से पहले वह शान्त नही बैठेगा। प्रभा जानती थी कि श्रुति की माँ के हृदय मे व्याप्त भय और चिन्ता निराधार नही है। वह इस तथ्य से भी अवगत थी कि विषम से विषम परिस्थिति मे धैर्य और साहस नही खोना चाहिए। इसी तथ्य को धारण करके प्रभा ने कहा —

प्रशान्त भैया का राज इस गाँव मे चल सकता है, शहर मे नही ! वैसे भी उन्हे कैसे पता चलेगा कि श्रुति और अथर्व शहर मे किस स्थान पर है ? और क्या कर रहे है ? पहले तो प्रशान्त को श्रुति और अथर्व मिल ही नही पाएँगे, क्योकि ये उन्हे ढूँढने के लिए शहर नही जाएँगे। ये सभी जानते है कि शहर मे इनका नही, कानून और पुलिस का शासन चलता है। दूसरे, मै अभी फोन करके अथर्व को सूचित कर दूँगी कि प्रशान्त भैया क्रोध मे उनके प्राण ले सकते है, इसलिए अथर्व और श्रुति दोनो सावधान रहे !

ठीक है, बेट्‌टी, तू जल्दी फोन करकै कह दे ! न्यूँ बी कह दे, अभी गाँव मे ना आवै अर सुरति कू बी ना आण देवै ! परसान्त के सिर पै अब सैतान सवार ऐ, आज ऊ सुरति की जान ... !

श्रति की माँ का निर्देश सुनकर प्रभा ने सहमति मे गर्दन हिला दी और फोन करने के लिए अर्थव का मोबाइल—नम्बर डायल करने लगी। लगभग दो—तीन मिनट पश्चात्‌ प्रभा ने श्रुति की माँ को तथा अपनी माँ को बताया कि अर्थव और श्रुति गाँव से कुछ दूर है। वे शहर से लौट चुके है, किन्तु गाँव की स्थिति जानने के पश्चात्‌ उन्होने आज अपने गाँव मे आने के बजाय वापिस शहर लौटने का निर्णय लिया है। प्रभा ने यह भी बताया कि निकट के गाँव मे अर्थव का एक मित्र रहता है, श्रुति को लेकर अर्थव वहाँ भी जा सकता है, ताकि श्रुति को सुरक्षित रखा जा सके। प्रभा की बातो से उसकी तथा श्रुति की माँ को बहुत राहत का अनुभव हो रहा था। उनकी चिन्ता अभी समाप्त नही हो सकती थी, किन्तु कम अवश्य हो गयी थी। श्रति की माँ के मन मे अब अपनी बेटी की सुरक्षा की आशा जागने लगी थी।

मन मे आशा लेकर श्रुति की माँ प्रभा तथा उसकी माँ से विदा लेकर अपने घर लौट गयी, परन्तु घर लौटकर भी उनका चित्त बहुत अशान्त था। उनके हृदय मे अब एक अन्य भय व्याप्त हो गया था कि यदि श्रुति को लेकर अर्थव निकट के गाँव मे चला गया, तो वहाँ भी श्रुति चर्चा का विषय बन जायेगी। यदि ऐसा हुआ तो श्रुति की बदनामी तो होगी ही, साथ ही यह समाचार शीघ्र ही उसके भाईयो तक पहुँच जाएगा। तब उन दोनो के प्राण बचाना किसी के लिए भी कठिन ही नही, असम्भव हो जाएगा।

लगभग दो घटे तक श्रुति की माँ अपनी बेटी और अर्थव के प्रति चिन्ता तथा भय से व्याकुल होकर आँसू बहाती रही। बेचैन होकर वे कभी बैठती थी, कभी खड़ी होती थी, कभी घर मे टहलने लगती थी। गरिमा ने अब तक भोजन तैयार कर दिया था और उसके बार—बार आग्रह करने पर भी उन्होने खाने से इन्कार कर दिया। उनके शरीर को ऊर्जा की आवश्यकता थी, परन्तु हृदय मे भोजन करने की इच्छा नही थी। उनकी व्याकुलता को कम करने के लिए गरिमा ने उन्हे सात्वना दी और समझाया कि अर्थव बुद्धिमान युवक है, वह अपनी और श्रुति की रक्षा कर सकता है। परन्तु माँ के चित्त को शान्त करने के अपने प्रयास मे गरिमा को सफलता नही मिली।

अन्त मे माँ पुनः घर से निकलकर प्रभा के घर की ओर चल दी। उन्हे स्वय यह ज्ञात नही था कि वे कहाँ जा रही थी। उस लक्ष्य की ओर उनके कदम स्वतः ही बढ़ते चले जा रहे थे। कुछ ही मिनटो मे वे प्रभा के घर पहुँच गयी। इस बार उन्हे देखकर प्रभा को आश्चर्य नही हुआ। वह उनकी चिन्ता को समझती थी, क्योकि स्वय उसकी माँ उतनी ही बेचैन थी, जितनी बेचैन श्रुति की माँ थी। फिर भी, श्रुति की माँ का पुनः अपने घर आना प्रभा को अच्छा नही लगा। श्रुति की माँ का बार—बार वहाँ आना प्रभा को किसी अज्ञात सकट का सकेत दे रहा था। परन्तु वह उन्हे ऐसा कुछ नही कहना चाहती थी, जो उन्हे कष्टदायक हो।

प्रभा को शान्त तथा उदासीन देखकर श्रुति की माँ थोड़ी—सी असहज हो गयी। उनको अनुभव हो रहा था कि उन्होने उस समय वहाँ पर आकर उचित नही किया। अपनी अनुभूति के अनुरूप वे अपराधी की भाँति खड़ी हो गयी। तत्पश्चात्‌ उन्होने अपराध बोध की मुद्रा मे प्रभा से कहा कि वे वहाँ आना नही चाहती थी, बेटी की सुरक्षा की चिन्ता मे उनके कदम स्वतः उन्हे वहाँ तक खीच लायी। अपने हृदय की शका को व्यक्त करते हुए उन्होने निवेदन किया कि वह एक बार पुनः अर्थव के मोबाइल पर सम्पर्क करके उसको निकट के गाँव जाने से रोक ले, ताकि उस गाँव से किसी प्रकार की सूचना पाकर प्रशान्त उसका अनिष्ट न कर सके। इस समस्या को तथा श्रुति की माँ की चिन्ता को दूर करते हुए प्रभा ने उनको बताया कि अथर्व के मस्तिष्क मे भी यही शका थी। उसने कुछ समय पहले फोन करके सूचना दी थी कि वे दोनो शहर लौट चुके है, उनकी चिन्ता करने की आवश्यकता नही है। प्रभा से बेटी की कुशलता तथा सुरक्षा की सूचना पाकर श्रुति की माँ सतुष्ट हो गयी, परन्तु बेटी का स्वर सुनने के लिए उनकी ममता तड़प उठी। उन्होने प्रभा से सविनय निवेदन किया कि एक बार वह श्रुति से उनकी बात करा दे। निवेदन स्वीकार करके प्रभा ने उनकी बात श्रुति से करा दी। श्रुति ने माँ से कहा —

माँ, मै अथर्व के साथ पूरी तरह से सुरक्षित हूँ ! मेरे भाई मुुझे मार देगे, आप तब तक ऐसा मत सोचना, जब तक अथर्व मेरे साथ है ! आप मेरी चिन्ता मत करना और अपना ध्यान रखना !

तेरी फिकर कैसे ना करूँ, तेरी माँ हूँ मै ! माँ अपनी ममता की विवशता को प्रकट करती रही, परन्तु तब तक सम्पर्क कट चुका था। जब दूसरी ओर से कानाे मे श्रुति का स्वर आना बन्द हो गया, तब माँ ने भी रिसीवर नीचे रख दिया और प्रभा की ओर क्षमा याचना की—सी दृष्टि से देखने लगी। श्रुति की माँ की उस दृष्टि से प्रभा का हृदय करुणा से भर गया। वह कुछ क्षण पूर्व उनसे कुछ ऐसा कहना चाहती थी कि श्रुति के लौटने से पहले वे उसके घर न आएँ। परन्तु उनकी दृष्टि ने प्रभा को दुविधा मे डाल दिया कि वह उनसे कुछ कहे तो क्या कहे ? कैसे कहे ? कुछ क्षणो तक वह इसी दुविधा मे फँसी रही। कुछ क्षणोपरात वह निर्णायक मुद्रा मे बोली—

चाची जी ! बार—बार आप यहाँ आयेगी, तो...! जब आप यहाँ आती है, पड़ोसियो के कान खड़े हो जाते है। वे प्रशान्त, निशान्त या सौरभ को इस विषय मे सूचना दे सकते है ! यदि उन्हे आपके यहाँ आने की सूचना मिली, तो वे अनुमान लगा लेगे कि अथर्व तथा श्रुति के बारे मे हमे सब कुछ ज्ञात है और आप यहाँ पर उनकी जानकारी लेने के लिए आते है। प्रशान्त भैया उनके विषय मे हमसे पूछताछ करने के लिए यहाँ आयेगे, तो पता नही वे यहाँ आकर हमारे साथ कैसा व्यवहार करेगे ? कहते—कहते प्रभा भय से काँपने लगी।

श्रुति की माँ प्रभा की मनोदशा को भली—भाँति अनुभव कर सकती थी, क्योकि अपने बेटे को वे प्रभा की अपेक्षा अधिक जानती थी। उन्होने अब तक समस्या को इस कोण से देखा ही नही था। प्रभा के बताने पर जब उन्होने इस विषय मे सोचा, तो उनको अनुभव हुआ कि अनजाने मे ही उन्होने एक नयी समस्या का बीजारोपण कर दिया था। किन्तु अब उनके पास पछताने के अतिरिक्त कोई उपाय नही था। केवल ईश्वर से उनकी सकुशलता के लिए प्रार्थना कर सकती थी और भविष्य मे सोच—विचार कर कार्य करने का सकल्प कर सकती थी। इसी सकल्प और अपराध—बोध के साथ प्रभा तथा उसकी माँ से विदा लेकर वे अपने घर लौट आयी।

अपने घर लौटकर श्रुति की माँ बिस्तर पर लेट गयी। घर लौटकर भी उन्होने कुछ नही खाया—पिया। नीद भी उनकी आँखो से कोसो दूर थी। उनकी व्याकुलता ने गरिमा को भी चिन्तित और व्याकुल कर दिया था। माँ को सात्वना देते हुए वह भी उन्ही के पास श्रुति के बिस्तर पर लेट गयी थी। रात—भर वे दोनो करवटे बदलती रही। न तो माँ को नीद आ सकी, न ही गरिमा सो पायी। सारी रात माँ श्रुति का नाम ले—लेकर सिसकती—कराहती रही और गरिमा उन्हे सात्वना देती रही। उनसे ईश्वर पर विश्वास रखने का आग्रह करती रही।

पूरी रात जागते रहने के कारण गरिमा तथा उसकी सास प्रातः शीघ्र ही बिस्तर से उठ गयी और शीघ्र ही अपने दैनिक कायोर् से निवृत्त हो गयी। इतनी शीघ्र कि जिस समय सामान्यतः सोकर उठने का समय होता है, उस समय वे दोनो घर का अधिकाश कार्य समाप्त कर चुकी थी। अभी तक सूर्य का उदय नही हुआ था। वे दोनो मन ही मन प्रार्थना कर रही थी कि सूर्य की किरणो के साथ श्रुति की कुशल—क्षेम भी उन्हे मिल जाए। तभी श्रुति की चाची ने घर मे प्रवेश किया और धीमे स्वर मे भय तथा आश्चर्य मिश्रित भाव व्यक्त करते हुए कहा—

बहन जी, कुछ पता है ? परसान्त ने पहलाद की लौडिया की साथ का करा है ? हम तो सोच बाी ना सकै ऐ परसान्त इतना बुरा काम करेगा ! उसने तो खानदान का नाम भी डुबोया ऐ, अर उसके कुकमोर् से कुणबे पे जो आफत पड़ेगी सो अलग !

क्या किया प्रशान्त भैया ने ? गरिमा ने पूछा।

अरी, रात—भर अपणे गुण्डे यार—दोस्तो की साथ मिलकै पिरभा की खूब दुगर्ति करी है ! बिचारी गाँव—बिरादरी मै मुँह दिखाणे लायक ना छोड्‌डी मुसटडो ने। घर से लिकडना बी उस लौडिया कू अर उसके घरवालो कू मौत हो जावेगा अब ! चाची ने प्रभा तथा उसके परिवार के प्रति भर्त्सना प्रकट करते हुए कहा।

चाची द्वारा दी गयी सूचना से गरिमा तथा उसकी सास के हृदय मे प्रशान्त के प्रति क्रोध की ज्वाला भड़क उठी। उनके मस्तिष्क मे बार—बार एक ही प्रश्न उठ रहा था—

आखिर प्रशान्त ने प्रभा के साथ ऐसा क्यो किया कि उसका सुखी—जीवन का सपना चूर—चूर हो जाए। उसको किस अपराध का दण्ड मिला है ? श्रुति की माँ इस दुघर्टना के लिए खुद को दोषी मानकर एक बात की ही रट लगाये थी कि यदि वे प्रभा के घर नही जाती, तो सम्भवतः प्रभा प्रशान्त के पाश्विक आचरण का शिकार नही होती। इस अपराध—बोध मे श्रुति की माँ के मुख से एक भी शब्द निसृत नही हो पा रहा था और उनकी व्यथा निरन्तर बढती जी रही थी। गरिमा भी उस समय आश्चर्य, क्रोध और व्यथा से एक साथ ग्रस्त थी, इसलिए मौन थी। कुछ क्षणोपरान्त गरिमा के अन्तःकरण मे शक्ति तथा दृढ़ता का सचरण स्वतः ही होने लगा। उसने अपनी सास से कहा—

मम्मी जी, प्रभा को इस समय सहारे की आवश्यकता है ! उसकी माँ उसको सहारा नही दे सकती। एक माँ ऐसे समय मे स्वय असहनीय पीड़ा भोग रही होती है। मुझे लगता है कि हमे प्रभा के पास जाना चाहिए ! ऐसा न हो कि वह अपना जीवन ही समाप्त कर दे ! हमे शीघ्र वहाँ जाना चाहिए !

गरिमा का प्रस्ताव उसकी माँ ने सहर्ष स्वीकार कर लिया, किन्तु वहाँ जाने का उनमे साहस नही था। उन्होने कहा कि वे प्रभा तथा उसकी माँ की दृष्टि का सामना नही कर सकेगी, इसलिए गरिमा वहाँ अकेली चली जाए। सास की अनुमति पाकर गरिमा घर से अकेली निकल पड़ी और तेज गति से चलकर शीघ्र ही प्रभा के घर पहुँच गयी।

जिस समय प्रभा गरिमा प्रभा के घर पहुँची, वहाँ पर पड़ोस की अनेक स्त्रियाँ खड़ी थी। स्त्रियो की उस भीड़ से अनेक स्वर निकलकर आ रहे थे। उनमे से कुछ स्वर प्रशान्त की भर्त्सना कर रहे थे, कुछ प्रभा के प्रति सहानुभूति प्रकट करने वाले थे। अधिकाश स्वर इन दोनो स्वरो से भिन्न प्रभा के भावी जीवन पर प्रश्नचिन्ह लगा रहे थे कि आज के बाद प्रभा सामान्य जीवन नही जी पायेगी, क्योकि जो धब्बा प्रशान्त ने उसके चरित्र पर लगाया है, वह कभी नही धुल सकेगा। उस प्रश्नचिन्ह से गरिमा के मस्तिष्क मे हलचल मच गयी। उसने क्रोधपूर्ण मुद्रा मे अपने भाव प्रकट करते हुए कहा—

किसी भी व्यक्ति का चरित्र उसके कमोर् से बनता है और उसके चरित्र पर धब्बा भी उसी के दुष्कमोर् से लगता है ! प्रभा ने जब कुछ गलत कार्य किया ही नही है ,तो उसके चरित्र पर धब्बा कैसे लग गया ? धब्बा उसके चरित्र पर लगा है, जिसने इसके साथ दुष्कर्म किया है !

गरिमा का तर्क सुनकर प्रभा के घर मे खड़ी हुई सभी स्त्रियाँ चुप हो गयी। तभी उसका चित्‌ प्रभा के लिए चिन्तित हो उठा। प्रभा को उसकी आँखे चारो ओर ढूँढने लगी, परन्तु वह कही दिखाई नही दी। गरिमा ने वहाँ पर खड़ी स्त्रियो से प्रभा तथा उसकी माँ के विषय मे पूछा, तो एक स्त्री ने उस कमरे की ओर सकेत किया, जिसका दरवाजा बन्द था। गरिमा दरवाजे की ओर बढ़ गयी। दरवाजे के समीप जाकर उसने हाथ से अन्दर की ओर धक्का देकर द्वार को खोलने का प्रयास किया ,लेकिन दरवाजा अन्दर से बन्द था। द्वार को अन्दर से बन्द पाकर उसकी धड़कने तेज गति से चलने लगी। उसने कुछ भी सोचे—समझे बिना प्रभा को पुकारते हुए द्वार खटखटाना आरम्भ कर दिया। कुछ क्षणो तक जब गरिमा को अन्दर से कोई प्रकिया नही मिली, तब उसने जोर—जोर से चीखना—चिल्लाना आरम्भ कर दिया कि शीघ्र ही दरवरजा तोड़ना होगा, अन्यथा प्रभा अपने प्राणो का अन्त कर लेगी। वह द्वार को तोड़ने के लिए सहायता माँग रही थी, ताकि प्रभा को आत्महत्या करने से रोका जा सके, तभी स्त्रियो की भीड़ से एक स्वर आया—

मरने के अलावा बिचारी अब का करेगी ? फाँस्सी खाकै मर जावै या दरिया मै डूब कै मर जावै ! मरणा ई है, दुनिया अब उसे जीण तो ना देवेगी ! जिघै कू बी लिकडे़गी, उघै कू ई लोग इसै उल्टे—सुद्‌दे तान्ने देवेगे अर जलील करेगे !

गरिमा ने उस महिला की टिप्पणी का कोई उत्तर नही दिया। वह जानती थी कि उस स्त्री के कथन से समाज की रूढिवादी धारणा का नग्न यथार्थ प्रकट हो रहा था। क्षण—भर के लिए उसका ध्यान अपने उस लक्ष्य से हट गया, जो प्रभा के प्राण बचाने के लिए आवश्यक था और उस समय स्वतः ही उसके द्वारा निर्धारित हो गया था। किन्तु प्रभा को अनुभव हो रहा था कि अगले ही क्षण दरवाजा टूटकर गिर पड़ेगा और गरिमा के साथ स्त्रियो की वह भीड़ उस कमरे मे प्रवेश कर जाएगी। प्रभा नही चाहती थी कि उस भीड़ मे से कोई भी स्त्री घर के अन्दर आने के बाद उसके कमरे मे भी प्रवेश कर जाए। उसने धीरे से कमरे का द्वार खोला और गरिमा को अन्दर करके द्वार पुनः बन्द कर लिया।

कमरे के अन्दर प्रवेश करके गरिमा ने देखा कि जैसा वह सोच रही थी, कमरे का दृश्य उसी के अनुरूप था। कमरे की छत मे लगे पखे से रस्सी का एक फदा लटक रहा था और एक छोटी—सी मेज उसके ठीक नीचे रखी थी। गरिमा ने गम्भीर मुद्रा मे अधिकारपूर्वक डाँटते हुए कहा—

यह क्या करना चाहती थी तुम ?

तो और क्या करती मै ? मरने के अतिरिक्त मेरे लिए सब रास्ते बन्द हो गये है। आप नही जानती, उन दरिदो ने मेरे साथ..! उन सबने एक—एक करके कितनी निर्ममता से मेरे...! भाभी...! कहते—कहते प्रभा फूट—फूट कर रोने लगी। इससे अधिक शब्द उसके होठ नही बोल सके थे, किन्तु उसके आँसू ; उसकी पीड़ा और उसकी अस्त—व्यस्त दशा मूक वाणी मे चीख—चीख कर कह रही थी। जो घृणित दुष्कर्म उसके साथ प्रशान्त ने अपने साथियो के साथ मिलकर किया था, उसका वर्णन करने की क्षमता शब्दो मे उतनी नही थी, जितनी प्रभा की पीड़ा को व्यक्त करती हुई उसकी आँखो मे थी। कुछ क्षणो तक गरिमा भी उसकी पीड़ा मे डूब गयी। कुछ क्षणोपरान्त उसको याद आया कि वह यहाँ प्रभा की पीड़ा मे डूबने के लिए नही आयी है, बल्कि उसको उसकी पीड़ा के सागर से निकलने का प्रयास करने मे उसको सहयाग करने के लिए आयी है। उसको विश्वास था कि थोड़ा—सा सम्बल प्राप्त होते ही प्रभा अपनी पीड़ा से मुक्ति पाकर सुदृढ दशा को प्राप्त कर सकती है। उसने प्रभा से कहा—

जीने का रास्ता कायरो के लिए बन्द होता है। तुम कायर नही हो, यह तुम जानती हो। प्रभा, तुम एक बार अपनी शक्ति पर विचार करो और तब इस रूढ़िवादी समाज से सघर्ष करो, देखना जीत तुम्हारी होगी ! प्रभा, तुम अबला नही हो ! तुम तो नये युग की शिक्षित और शक्ति—सम्पन्ना मातृशक्ति हो ! सघर्ष से पहले ही हार स्वीकार करना तुम्हारे लिए शोभनीय नही है !

भाभी जी, मै सब कुछ जानती हूँ, पर आप ही बताइये, इतने बड़े समाज से सघर्ष मै मै अकेली कैसे करूँ ? मै अकेली इस सोये हुए समाज को अकेली कैसे जगाऊँ ? कैसे इस रूढ़िवादी समाज की सोच मे बदलाव लाऊँ ? भाभी, अकेला चना भाड़ नही भून सकता ! आपने अभी देखा नही था, कैसे सभी स्त्रियाँ मेरे चरित्र पर उँगली उठा रही थी !

मैने देखा भी था और सुना भी था ! प्रभा, उन्हे उचित—अनुचित का ज्ञान नही है ! यदि उनकी विचार दृष्टि समृद्ध और विकसित होती, तब तुम्हे सघर्ष करने की आवश्यकता नही पड़ती। तुम्हारा विशेष महत्व इसीलिए है, क्योकि तुम्हारी तरह इस समाज की स्त्रियाँ विचार समृद्ध नही है। यदि तुम्हारे प्रयास से इस समाज की स्त्रियो की विचार—दृष्टि मे परिवर्तन हो सका, तो निश्चय ही पुरुषो की सोच मे सकारात्मक परिवर्तन हो सकता है !

कैसे ?

देखो प्रभा, जब तक स्त्री को अपनी मातृ शक्ति का अनुभव नही होता है, तब तक वह पुरुष के साथ अपने प्रत्येक सम्बन्ध और प्रत्येक स्तर पर अबला होती है। किन्तु, तुमने कभी सोचा है, अपने जीवन मे हर आयु वर्ग का पुरुष किसी न किसी प्रकार से स्त्री पर निर्भर होता है। तभी उसका जीवन सरस और शक्तिशाली बनता है। जरा सोचो, एक माँ अपने बेटे को सयमित जीवनयापन करना सिखाये और उसे बताये कि स्त्री का महत्व किसी भी दशा मे पुरुष से कम नही है, बल्कि अनेक अथोर् मे वह पुरुष की अपेक्षा श्रेष्ठ होती है। एक माँ अपनी बेटी मे स्वाभिमान जाग्रत कर सकती है। माँ उसे बता सकती है कि उसकी बेटी अबला नही है। वह अपने बड़े भाई के समान शक्तिशाली ही नही है, वह उससे ज्यादा शक्तिशाली है, क्याेकि एक लड़की अपने शारीरिक व मानसिक सरचना के अनूरूप अनेक ऐसे गुणो को सवहन करती है ; अनेक ऐसेे कार्य कर सकती है, जिनकी क्षमता ईश्वर ने पुरुषो को प्रदान ही नही की है !

भाभी, मुझे कुछ नही सूझ रहा है, मै क्या करूँ और क्या न करूँ ! मै मर जाती तो अच्छा होता, पर आपने यहाँ आकर...!

प्रभा, तुम्हे मरना नही जीना है ! दृढ़ता से उठना है और सघर्ष करना है ! इस समय अथर्व को भी तुम्हारी आवश्यकता है और तुम्हारी माँ को भी। यदि तुमने साहस छोड़ दिया, तो इन दोनो का क्या होगा ? यह सोचा है तुमने ?

ठीक है, भाभी ! मै हिम्मत नही हारुँगी और लड़ूँगी ! भाभी,

आपकी एक—एक बात से मुझे सकारात्मक ऊर्जा मिली है और जीवन मे आने वाली कठिनाइयो से लड़ने की प्रेरणा भी मिली है ! आज, जब प्रतिकूल परिस्थितियो मे सभी हमारे विरुद्ध बोल रहे है, तब भी आपने मेरा साथ दिया है। इसके लिए आजीवन मै आपकी आभारी रहूँगी ! कुछ समय तक गरिमा तथा प्रभा के बीच निःशब्दता ने अपना स्थान बना लिया। दोनो विचारपूर्ण मुद्रा मे बैठी रही। कुछ समय बाद प्रभा पुनः ने कहा — भाभी, अब आप मेरा मार्गदर्शन कीजिए कि मुझे अब क्या करना चाहिए ? मुझमे तो सोचने की और निर्णय लेने की क्षमता ही नही रह गयी है !

प्रभा, सबसे पहले तुम्हे पुलिस से शिकायत करनी चाहिए ! तुम्हे वहाँ जाकर रिपोर्ट दर्ज करानी चाहिए और सबकुछ सच—सच बताना चाहिए !

भाभी ! यह आप क्या कह रही है ? प्रशान्त आपके पति का भाई है ! प्रभा ने आश्चर्य और सदेह की मुद्रा मे कहा।

प्रभा वह दरिदा न किसी का भाई है, न किसी का बेटा ! तुम अपराधी को दड दिलाकर समाज को बता दो कि न्याय पाना सबका अधिकार है। इतना जघन्य अपराध करके कोई भी दड से नही बचना चाहिए ! मै इस लड़ाई मे तुम्हारे साथ रहूँगी !

गरिमा का सहारा पाकर प्रभा मे सकारात्मक ऊर्जा का सचार होने लगा। गरिमा की प्रेरणा से उसने थाने मे जाकर प्रशान्त तथा उसके साथियो के विरुद्ध रिपोर्ट दर्ज कराने का निश्चिय कर लिया। किन्तु, उसकी माँ का कहना था कि थाने—कचहरी जाकर उसकी और अधिक बदनामी होगी, जबकि प्रशान्त तथा उसके साथियो को पुलिस कुछ नही कहेगी। प्रभा की माँ ने उसको समझाया कि गाँव मे आज से पहले भी ऐसी दुर्घटनाएँ हो चुकी है। तब भी पीड़ित लड़की ने और उसके परिवार ने कानून से न्याय की गुहार लगायी थी, परन्तु दुष्कर्मियो का बाल भी बाँका नही हो सका। पुलिस ने घूस खा ली और अपराधियो पर किसी प्रकार की कानूनी कार्यवाही नही की। आज भी इस समाज मे वे अपराधी निश्चिन्त—निर्भय होकर घूम रहे है।

प्रभा अपनी माँ से सहमत नही थी। उसने अपनी माँ की एक नही मानी और माँ को समझाया —

ऐसी परिस्थितियो मे अपनी बदनामी के भय से लड़की चुप बैठ जाती है और उसका परिवार भी यही चाहता है, इसीलिए प्रशान्त जैसे अपराधियो का साहस बढ़ता जा रहा है। परन्तु, माँ, मै चुप नही बैठूँगी ! मै न्याय के लिए आखिरी साँस तक लड़ूँगी। माँ को अपना निर्णय सुनाने के पश्चात्‌ प्रभा ने गरिमा से कहा — भाभी ! प्रशान्त आपके पति का भाई है ! आपने मेरा साथ दिया तो आपके दाम्पत्य सम्बन्धो मे कटुता आ सकती है। यह मेरी लड़ाई है, इसे मै स्वय लड़ूँगी !

नही प्रभा, अपने दाम्पत्य सम्बन्धो मे कटुता आने के भय से मै अनुचित का साथ नही दे सकती ! जो कुछ प्रशान्त ने आज तुम्हारे साथ किया है, कल किसी अन्य के साथ कर सकता है ; मेरे साथ भी कर सकता है ! मै तो यह प्रयास करुँगी कि स्वय आशुतोष भी उसके जघन्य अपराध को हल्के से न देखे !

भाभी, आप ठीक कह रही है। फिर भी, मै चाहती हूँ कि आप खुलकर मेरा साथ न दे। आप केवल श्रुति की चिन्ता करे !

गरिमा के साथ बातचीत करके उसकी प्रेरणा से प्रभा अब प्रकृतिस्थ हो गयी थी। प्रभा को प्रकतिष्ठ देखकर गरिमा ने वहाँ से चलने की अनुमति माँगी और उठकर द्वार खोलने लगी। जिस समय उसने द्वार खोला, उस समय तक वहाँ से स्त्रियो की भीड़ छँट चुकी थी। एक—दो ही स्त्रियाँ ही प्रभा के घर के आँगन मे शेष बची थी। उन्हे देखकर गरिमा क्षणभर के लिए ठिठकी, तत्पश्चात्‌ चुपचाप वह बाहर की ओर चल दी। गरिमा के प्रस्थान करने के बाद वे स्त्रियाँ भी प्रभा के घर से चुपचाप खिसक ली। अपने घर से सभी स्त्रियो के जाने के पश्चात्‌ प्रभा ने एक लम्बी साँस ली और अपनी माँ की गोद मे सिर रखकर आसमान को घूरने लगी। उसकी मुद्रा को देखकर ऐसा प्रतीत हो रहा था, कि वह अपने भावी कार्यक्रम की रूपरेखा को शून्य मे लिपिबद्ध कर रही थी। कुछ समय तक वह उसी मुद्रा मे माँ की गोद मे सिर रखकर लेटी रही। कुछ समय पश्चात्‌ वह एक झटके से उठ बैठी। उठकर उसने मुँह धोया और अपनी आँखो पर पानी की छीटे मारती हुई बोली—

माँ, मै थाने जा रही हूँ ! आप कमरे मे ही रहना और तब तक दरवाजा अदर से मत खोलना, जब तक मै आपको ना पुकारूँ ! उन लागो का कुछ भरोसा नही है, वे कब क्या कर दे ?

पर बेट्‌टी, तू अकेल्ली बाहर... ?

आप मेरी चिन्ता मत करना ! अब मै ऐसी चिगारी बन चुकी हूँ, जो प्रशान्त और उसके साथियो के साथ—साथ ऐसे बहुत से अन्य अपराधियो को भी जला देगी !

माँ को थाने जाने की सूचना तथा दरवाजा बन्द करके सावधान रहने का निर्देश देकर प्रभा ने अपना दुपट्‌टा उठाया और गले मे डालती हुई बाहर निकल गयी। घर से निकलकर गाँव की बाहरी सीमा पार करने तक प्रभा को गाँव के अनेक स्त्री—पुरूषो की तिरस्कारपूर्ण तथा अनेको की दयापूर्ण दृष्टि के समक्ष अपनी साहस की परीक्षा देनी पड़ी। अनेक स्त्रियो ने उसको देखकर अपने कटु व्यग बाणो से भी उस पर प्रहार किया—

अरी, देख तो, इतनी बेइज्जती हो गयी, अब भी मुँह छिपा के ना बैठ सके ! दूसरी ने प्रत्युत्तर मे कहा— बेइज्जती तो उसकी हौवे ऐ, जो मान्ने ! जो ना मान्ने, उसकी कैसी इज्जत, केसी बेइज्जती ? नकटे की नाक कटी, सवा हाथ और बढ़ी ! अब तीसरी ने व्यग्य बाण छोड़ा— ठीक बात है ! ‘जिसकी उतर गी लोई, उसका का करेगा कोई' म्हारे पुरखो नै यू बात सोच समझ कै सोलै आन्ने ठीक कही ऐ ! कुछ ऐसी भी स्त्रियाँ थी, जिन्होने अपनी दयापूर्ण दृष्टि तथा शब्दो से प्रभा पर प्रहार किया—

बिचारी, चचच...! कैसे काट्‌टेगी अपनी पहाड़ सी जिन्दगी !.

..इसकी तो सारी जिन्दगी बरबाद कर दी। कोई ब्याह कै ले जाणे कू बी तैयार ना होवेगा ! बता, का मिला उनै इसकी जिन्दगी खराब करकै ? बस, अपनी हवस पूरी कर ली अर भैया का बदला भैण से ले लिया ! प्रभा ने सभी स्त्रियो की बाते सुनी, परन्तु किसी की बात का पलटकर उत्तर नही दिया। धैर्य और साहस के साथ उनके प्रहार झेलती हुई आगे बढ़ गयी।

गाँव से आठ—नौ किलोमीटर दूर पैदल चलकर प्रभा थाने मे पहुँच गयी। वहाँ पहुँचकर उसने थाना इचार्ज को आप—बीती सुनायी और शिकायत लिखने के लिए निवेदन किया। थानेदार ने उसकी शिकायत लिखने के लिए उससे भिन्न—भिन्न प्रकार के प्रश्न किये, जो उसको नही पूछने चाहिए थे। प्रभा ने उसके प्रत्येक प्रश्न का भय और लज्जा त्यागकर उत्तर दिया और पुनः शिकायत लिखने का निवेदन किया। इस बार थानेदार ने प्रभा से कहा कि वह उसकी शिकायत तभी लिखेगा, जबकि उसके साथ उसके परिवार का कोई पुरुष शिकायत लिखवाने के लिए आएगा। प्रभा ने परिवार के किसी पुरुष को अपने साथ लाने मे असमर्थता प्रकट की, तो थानेदार ने उसको समझाया कि प्रशान्त और उसके साथियो के विरुद्ध वह शिकायत लिखने की भूल न करे, इसी मे उसकी भलाई है। इतना ही नही, प्रशान्त की सामाजिक—आर्थिक शक्ति और गुण्डागर्दी का भयावह वर्णन करके थानेदार ने प्रभा से कहा कि यदि प्रशान्त को थाने मे आकर उसकी शिकायत लिखाने के बारे मे ज्ञात हुआ, तो उसकी दशा वर्तमान दशा से बदतर कर देगा, इसलिए उल्टे पाँव वहाँ से शीघ्र लौटना ही उसके हित मे है। थानेदार के बार—बार डराने—धमकाने और समझाने पर भी प्रभा अटल रही और पुनः—पुनः प्रशान्त तथा उसके साथियो के विरूद्ध शिकायत लिखवाने का निवेदन करती रही। अन्त मे थानेदार ने प्रभा से कहा—

ऐ लड़की ! रपट लिखवाके तू परशान्त को सजा नही करवा सकती, और भी बहोत कुछ करना पड़ेगा तुझै ! किसी कू सजा करवाणा इतणा आसाण होत्ता, तो आद्धी दुणिया जेल मे सजा काट री होत्ती आज ! समझी ?

मुझे क्या क्या करना पड़ेगा, वह मेरी टेशन है ! आप शिकायत लिखकर अपना काम कीजिए ! प्रभा ने दृढ़तापूर्वक थानेदार से कहा।

शिकायत लिक्खी जावेगी, तो तेरी जाँच भी होवेगी, तू झूठ बोल री है या सच !

मेरा कहा हुआ एक—एक शब्द सच है और मुझे जाँच कराने मे कोई आपत्ति नही है!

हँ—ऊँ—ऊँ, तो जाँच करवाने कू भी तैयार है ! थानेदार ने अश्लील हँसी हँसते हुए कहा— अरे, ओ बल्लू ! इस लौडिया कू भित्तर लेके जा अर देख, इसकी बात मे कितना दम है ? एक सिपाही को पुकारते हुए थानेदार पुनः बेशरमी से हँसा और प्रभा की ओर अभद्र ढग से घूरने लगा।

प्रभा ने ऐसे अनेक पुलिसकर्मियो के विषय मे सुना—पढ़ा था, जो अपने रक्षक रूप को भूलकर भक्षक बन जाते है और जनसामान्य के साथ कुकृत्य करते है। थानेदार की दृष्टि तथा उसके शब्दो से प्रभा के मनोमस्तिष्क मे भूचाल—सा आ गया। उसने क्षण—भर मे ही वहाँ से भागने मे अपनी कुशलता का अनुभव किया और तुरन्त भाग खड़ी हुई। बाहर की ओर भागते—भागते उसके कानो मे थानेदार का स्वर गूँजा। वह शील और मर्यादा की सीमा लाँघकर ठहाका लगाते हुए कह रहा था—

मैडम, थाणे मे जाँच करवाणे से डर री हो, तो...! परसान्त ने तो अपणे इतने साथियो की साथ..., हम तो...!

प्रभा के जाने के पश्चात्‌ थानेदार ने अपने सिपाही से कहा— बल्लू ! जा, गाँव मे जाकै पता कर, परसान्त कहाँ है ? मिल जावै, तो उसे बताके आ, सुसराल जाणे से बचना है, तो मोटी रकम का इन्तजाम करके पहुँचा दे !

थानेदार का विचार था कि प्रभा वहाँ से डरकर भाग गयी है, अब किसी भी दशा मे वापिस लौटकर शिकायत लिखवाने के लिए उसका आना सम्भव नही है। उसका ऐसा सोचने का कारण प्रभा का थाने मे अकेले आना था। प्रभा की निर्णय—श्शक्ति के पीछे उसके आत्मविश्वास का अनुमान वह नही कर सका था। प्रभा को अबला और अकेली समझना उसकी कितनी बड़ी भूल हो सकती है, यह उस थानेदार को आभास मात्र भी नही था। उसने प्रभा के क्रोध की ज्वाला को अपनी अश्लीलता से हवा देकर आचरण से पहले की अपेक्षा अधिक दष्ढ़ बना दिया था, यह अनुमान करना उसके वश की बात नही थी।

थाने से निकलकर प्रभा सड़क पर आकर एक सार्वजनिक स्थान पर खड़ी हो गयी, जहाँ पर वह स्वय को सुरक्षित अनुभव कर सकती थी। कुछ समय तक वहाँ खड़ी हुई विचार करती रही कि अब वह क्या कर सकती है ? और उसको क्या करना चाहिए ? अपने भावी कदम के विषय मे सोचने के पश्चात्‌ उसने एक बस को रोकने के लिए हाथ से सकेत दिया। सकेत पाकर चालक ने बस रोक दी और वह बस के द्वारा शहर जा पहुँच गयी।

शहर मे पहुँचकर प्रभा सीधे एस.एस.पी. देहात के कार्यालय मे गयी। उसने वहाँ पर उपस्थित अधिकारी को प्रशान्त व उसके साथियो द्वारा किये गये दुष्कर्म तथा स्थानीय थानेदार के विषय मे विस्तार से बताया। प्रभा की शिकायत पर उस अधिकारी ने प्रभा को न्याय दिलाने का आश्वासन देते हुए उसकी शिकायत पर तत्काल कार्यवाही आरम्भ कर दी। शिकायत लिखाने के समय तक शाम ढल चुकी थी। प्रभा के पास रात व्यतीत करने के लिए कोई आश्रय नही था। उस समय उसके लिए गाँव लौटना भी सम्भव नही था। न ही सुरक्षा की दृष्टि से उचित था।

प्रभा की समस्या को भाँपकर अधिकारी ने प्रभा को पुलिस सरक्षण मे रात व्यतीत करने का सुझाव दिया। उस सुझाव को सुनकर क्षण—भर के लिए प्रभा पाषाण प्रतिमा बन गयी थी। अगले क्षण उसके कानो मे पुनः अधिकारी का स्वर अपने उसी सुझाव के साथ गूँजा, तो वह भय से थर—थर काँपने लगी। उसको ऐसा अनुभव हो रहा था, जैसे कि एक छोटी मछली बड़ी मछली से बचकर मगरमच्छ का ग्रास बनने जा रही थी। प्रभा की मनोदशा को अधिकारी ने भाँप लया था। उसने प्रभा को सात्वना दी और विश्वास दिलाया कि उनके सरक्षण मे वह पूर्णरूपेण सुरक्षित रहेगी। साथ ही अपने प्रभावशाली वक्तव्य से उस अधिकारी ने प्रभा को यह भी विश्वास दिलाया कि उसके साथ अभद्र व्यवहार करने वाले पुलिसकर्मियो तथा अधिकारी के साथ यथोचित दण्डात्मक कार्यवाही की जाएगी। उस अधिकारी से अपने पक्ष मे आश्वासन पाकर प्रभा रात भर उन्ही के सरक्षण मे रहने के लिए तैयार हो गयी।

दूसरी ओर, अथर्व के साथ मिलकर श्रुति भी शिकायत लिखवाने के लिए उसी कार्यालय मे जा पहुँची थी, जिसमे प्रभा ने शिकायत की थी। अथर्व और श्रुति ने भी अपनी शिकायत प्रशान्त के विरुद्ध तथा उसके समाज के कुछ कट्‌टर विचारधारा वाले लोगो के विरुद्ध लिखा दी कि उनकी जान को खतरा है। अथर्व तथा श्रुति को अभी तक प्रभा के साथ घटित घटना के बारे मे ज्ञात नही था। उनके गाँव का तथा प्रशान्त का नाम सुनकर अधिकारी ने उन दोनो से जब अधिक विस्तारपूर्वक जानकारी ली, तब उसने अथर्व को बताया कि उसक बहन प्रशान्त और उसके साथियो की प्रतिशोध की आग मे झुलस चुकी है। वह अत्यत साहसी लड़की है, जो दुष्कर्म की शिकार होने के बाद भी साहस के साथ खड़ी है और सामाजिक तिरस्कार को पैरो तले रौदकर न्याय पाने के लिए सघर्ष कर रही है।

अधिकारी से अपनी बहन के साथ हुए अमानवीय अत्याचार के बारे मे जानकर अथर्व का क्रोध नियत्रणहीन हो गया। वह क्रोधावेश मे प्रशान्त को गालियाँ देते हुआ वहाँ से तुरन्त चल पड़ा। उस समय वह भूल चुका था कि उसकी बहन को अभी उसकी आवश्यकता हो सकती है, जो उस समय वही कुछ दूरी पर उपस्थित थी। वह यह भी भूल चूका था कि प्रशान्त की बहन श्रुति अभी भी उसके साथ है, जिसकी सहायता करने के कारण उसका परिवार इस सकट मे घिरा है और जिसकी प्राण रक्षा करना अब उसका नैतिक दायित्व है। आवेश मे उठाये गये अथर्व के कदमो को रोकने के लिए पुलिस ने उसे बलपूर्वक पकड़ा और बन्द कर दिया। कुछ समय बन्द रहने के पश्चात्‌ जब अथर्व का क्रोध शान्त हो गया, तब उसने अपनी बहन प्रभा से मिलने की इच्छा प्रकट करते हुए अपने व्यवहार के लिए क्षमायाचना की। उस समय वहाँ पर उपस्थित पुलिसकर्मी ने अथर्व को उसकी बहन से मिलने की अनुमति प्रदान कर दी और उसको प्रभा से भेट करने के लिए उस स्थान पर पहुँचा दिया, जहाँ पर प्रभा को रखा गया था।

प्रभा के पास जाकर अथर्व की भावनाएँ पुनः नियत्रणहीण हो गयी। बहन की दशा देखकर वह फूट—फूट कर रोने लगा और भावावेश मे आकर बार—बार अपना सिर दीवार मे मारने लगा। आहो—कराहो के साथ रोने के स्वर के बीच उसके होठो से बस यही शब्द उच्चारित हो रहे थे— मै ही गुनाहगार हूँ ! मै तुम्हारा अपराधी हूँ ! मेरी बहन ! मै तेरी बात मानकर श्रुति सहायता के लिए तैयार नही होता, तो वह पशु, प्रशान्त आज तेरी ओर आँख उठाकर देखने की हिममत नही करता ! धिक्कार है ऐसे भाई पर, जो अपनी बहन की रक्षा करने के स्थान पर उसकी बर्बादी और बदनामी का कारण बन जाए !

अथर्व को रोते बिलखते देखकर श्रुति के लिए भी आत्मनियत्रण रखना कठिन था। यह अनुभव करके कि इस सारे विप्लव की जड़ कोई अन्य नही है, बल्कि वह स्वय है, श्रुति का हृदय ग्लानि से भर गया। ग्लानि मे डूबी हुई श्रुति को इतना साहस नही हुआ कि वह अथर्व को सात्वना दे सके और उससे यह कह सके कि प्रभा की अपराधिनी मै हूँ, तुम नही हो। श्रुति के हृदय से बार—बार एक ही आवाज आ रही थी कि जाकर अथर्व से कहे, वह प्रभा का अपराधी नही है। इस घटना के लिए वह किसी प्रकार दोषी नही है, इसलिए अपराध—बोध त्यागकर प्रभा को सँभाले ! उसको सहारा दे ,उसका साहस बढ़ाये और दोषियो को दण्ड दिलाने मे उसयका सहयोग करे ! परन्तु वह ऐसा नही कर सकी। वह अपने स्थान पर बैठी सुबकती रही, जहाँ पर उसको कुछ समय पूर्व पुलिसकर्मी ने बैठाया था।

जिस समय पुलिसकर्मी श्रुति को वहाँ पर बैठाकर गया था, उसी समय से वह ग्लानि के भार से दबी हुई थी। वह प्रभा से भी बहुत—कुछ कहना चाहती थी ; उसके प्रति अपनी सवेदना प्रकट करना चाहती थी। वह अपना अपराध—बोध प्रकट करना चाहती थी ; अपनी शक्ति को प्रभा की शक्ति के साथ मिलाकर आगे बढ़ने की आशा और विश्वास प्रभा को देना चाहती थी। परन्तु उसके होठो से एक शब्द भी न निकल सका। ग्लानि मे डूबकर वह दृष्टि झुकाये हुए मौन बैठी रही और आँसू बहाती रही।

अथर्व की करुण दशा को देखकर प्रभा अपनी पीड़ा को विस्मृत कर अपने भाई की व्यथा का अनुभव करने लगी थी। करुणा—विह्‌वल होकर वह उठी और अथर्व को शान्त करनेे का प्रयास करते हुए सस्नेह उसके आँसू पोछने लगी। प्रभा को श्रुति की मनोदशा का भी भली—भाँति आभास था, परन्तु उसने अभी तक श्रुति के साथ किसी प्रकार का सवाद नही किया था। अभी तक अपनी पीड़ा से, व्यथा से बाहर निकलना उसके लिए अति कठिन हो रहा था। अपने लिए भाई की मनोव्यथा देखकर उसके प्रति अपनी भावानुभूति से प्रभा के अन्दर अतिरिक्त साहस और शक्ति का सचार होने लगा। अब वह स्वय को इस योग्य अनुभव करने लगी थी कि स्वय को सम्हलने के साथ—साथ श्रुति और अथर्व को भी सम्भाल सकती थी। अतः अथर्व को सम्भालते हुए उसने श्रुति की ओर दृष्टि करके कहा —

तुम दोनो मेरे अपराधी नही हो, क्योकि तुमने अभी तक कोई अपराध नही किया है ! मुझे लग रहा है कि अब तुम जिस रास्ते पर चल रहे हो, वह रास्ता तुम्हे अपराध की दुनिया की ओर ले जायेगा और तुम दोनो ही अपराधी बन जाओगे !

क्या कह रही हो प्रभा, तुम ? अथर्व और श्रुति ने एक स्वर मे कहा।

मै ठीक ही कह रही हूँ ! अत्याचार सहकर चुप रहना और दोषियो को खुले घूमने की छूट देना अपराध नही है ? जो घृणित अपराध प्रशान्त और उसके साथियो ने किया है, तुम दोनो उस पर चर्चा करने के बजाय, उन्हे उनके दुष्कर्म का दड दिलाने मे मेरा सहयोग करने के बजाय, तुम दोनो स्वय को दोषी मानकर आँसू बहा रहे हो, यह अपराध से कम नही है ? मै चाहती हूँ कि तुम दोनो इस अपराध को न करो। यदि आज तुम चुप बैठे रहे, तो इस समाज मे झूठी और खोखली मान—मर्यादा के नाम पर हर रोज किसी बबली तथा श्रुति की हत्या होती रहेगी और हर दिन किसी प्रभा के साथ प्रतिशोध की आड़ मे सामूहिक बलात्कार होता रहेगा !... श्रुति, मै तुम्हारी द्विधा दशा को समझ सकती हूँ ! अपने भाई के विरुद्ध खड़ा होना तुम्हारे लिए कठिन है, लेकिन यह मत भूलना कि प्रशान्त जैसा दरिन्दा न तो किसी का भाई हो सकता है, न बेटा हो सकता है ! वह मनुष्य के रूप मे एक हिसक पशु है ! यदि आज तुमने उस अन्यायी का विरोध नही किया, तो अवसर पाते ही वह तुम्हारी हत्या कर देगा !

प्रभा तुम गलत सोच रही हो ! मै अपने भाई से प्यार करती थीँ, दुष्कर्मी प्रशान्त से नही ! मै नही चाहती, जो जघन्य अपराध प्रशान्त ने तुम्हारे साथ किया है, कल फिर उस घृणित कर्म वह किसी अन्य लड़की के साथ करे ! मुझे अपनी चिन्ता नही है, परन्तु आज हमने यदि प्रशान्त के विरुद्ध सघर्ष नही किया और उसके अपराध का दड नही दिलाया, तो उसका साहस बढ़ जायेगा ! इसलिए मै तुम्हारे साथ ही नही, तुमसे आगे चलकर प्रशान्त के विरुद्ध खड़ी हो जाऊँगी !

हाँ प्रभा, श्रुति बिलकुल सच कह रही है ! शायद तुम्हे ज्ञात नही है, श्रुति और मै यहाँ पर प्रशान्त की शिकायत लेकर ही आये थे। श्रुति ने एसपी से अपने प्रणो की रक्षा की गुहार करते हुए प्रशान्त के साथ—साथ पूरे समाज के विरुद्ध लिखित शिकायत की है। अथर्व ने श्रुति का समर्थन करते हुए कहा।

अथर्व तथा श्रुति की बातो से प्रभा को बल मिल रहा था। उसने उन दोनो से विस्तारपूर्वक पर्याप्त समय तक बातचीत की। यह जानकर कि एसपी ने यथाशीघ्र कार्यवाही करने का आश्वासन दिया है, प्रभा की जान मे जान आ गयी। उसके चेहरे पर विश्वास और सतोष झलक आया कि श्रुति, अथर्व और कानून का साथ पाकर वह दोषियो को कठोरतम दड दिलाने मे अवश्य सफल होगी। प्रभा के साहस और दृढ़ता से प्रेरित होकर श्रुति का साहस भी ऊर्ध्वाधर बढ़ रहा था। उसने मन ही मन सकल्प किया कि प्रभा को न्याय दिलाने के लिए वह एड़ी—चोटी का जोर लगा देगी। उसने यह भी सकल्प लिया कि वह तब तक शान्त नही बैठेगी, जब तक उसके समाज मे फैली रूढ़ियो की जजीरो को तोड़कर प्रत्येक स्त्री स्वय स्वतत्र होने के लिए प्रयासरत नही होगी। वह रूढ़िवादी समाज से सघर्ष करते हुए रूढ़ियो मे जकड़ी हुई स्त्रियो को स्वतत्रता का महत्व समझायेगी और उन्हे तार्किक ढग से सोचना और प्रत्येक समस्या का समाधान करना सिखायेगी।

अगले दिन प्रभा, श्रुति और अथर्व के साहस और प्रयास का रग दिखायी दिया ,जब गाँव मे पुलिसकर्मियो की टोली स्थिति का जायजा लेने के लिए आ धमकी। किसी को यह आशा नही थी कि सदैव सिर पर दुपट्‌टा रखकर चलने वाली प्रभा भी इतना साहसिक कार्य कर सकती है कि पूरे गाँव पर शासन करने वाले लोग कानून का शासन स्वीकारने के लिए विवश हो जाएँगे। दिन—भर गाँव मे पुलिस गश्त लगाती रही और दोषियो को ढूँढती रही। परन्तु प्रशान्त और उसके साथी फरार हो चुके थे।

शाम को श्रुति, प्रभा और अथर्व पुलिस की सुरक्षा मे गाँव मे आये। गाँव के प्रधान और अनेक अन्य मुख्य व्यक्तियो से लिखित बयान लेकर पुलिस लौटने लगी, तो श्रुति ने अथर्व का मोबाइल लेकर तुरन्त एसपी से निवेदन किया कि यदि उसे सुरक्षा प्रदान नही की, तो उसके भाई गाँव के कुछ कट्‌टर लोगो के साथ मिलकर उसकी हत्या कर देगे। श्रुति का निवेदन सुनकर अधिकारी ने तुरन्त आदेश दिया कि जब तक प्रशान्त और उसके साथी उनकी की गिरफ्त मे नही आयेगे, तब तक इन तीनो को पुलिस की सुरक्षा मे रखा जाए।

एक सप्ताह तक गाँव मे पुलिस पहरा देती रही। इस समयान्तराल मे प्रशान्त तथा उसके दो साथियो को अरेस्ट कर लिया गया। शेष दुष्कर्मी अभी तक पुलिस की पकड़ से दूर थे और पुलिस की कार्यवाही मन्द पड़ गयी थी। गाँव से पुलिस का पहरा हटन के बाद सेे ही श्रुति और प्रभा को अपनी असुरक्षा का भय यथावत बना हुआ था। गाँव के कई दबग इस विषय मे अप्रत्यक्ष रूप से परस्पर चर्चा कर रहे थे कि गाँव मे पुलिस को बुलाकर इन दोनो लड़कियो ने उचित नही किया है। इस गलती का दड उन्हे अवश्य ही भोगना पड़ेगा।

गाँव के दबग और कट्‌टर लोगो की मशा भाँपकर श्रुति, प्रभा और अथर्व ने उसी दिन गाँव छोड़ने का निश्चय कर लिया, जिस दिन पुलिस ने उन्हे सुरक्षा देना बन्द कर दिया था। प्रभा और अथर्व जानते थे कि उनके गाँव छोड़ने के पश्चात्‌ उनकी माँ को गाँव के स्त्री—पुरुषो के व्यग्यबाण चैन से जीने नही देगे, इसलिए उन्होने अपनी माँ से भी अपने साथ ही गाँव छोड़ने का आग्रह किया, जिसे माँ ने सहर्ष स्वीकार कर लिया था। परन्तु, न तो प्रभा और अथर्व, न ही उनकी माँ चाहती थी कि श्रुति अपना परिवार तथा गाँव छोड़कर उनके साथ शहर जाए। प्रभा की माँ ने बार—बार उसे समझाया कि उनके साथ चलकर उसको बदनामी के अतिरिक्त कुछ भी प्राप्त नही होगा। इतना ही नही, प्रभा की माँ ने यह भी कहा कि जब तक श्रुति उनके साथ रहेगी, तब तक अथर्व के ऊपर प्राणो का सकट मडराता रहेगा। प्रभा तथा अथर्व अपनी माँ से पूर्णतः सहमत थे। उन सबका अपने प्रति नकारात्मक भाव देखकर श्रुति के हृदय मे निराशा भर गयी। यह निराशा शीघ्र ही उसके हृदय से निकलकर उसके होठो पर आ गयी। उसने निराशापूर्ण मुद्रा मे कहा —

मै जानती हूँ, आपके परिवार मे मै विपत्तियो का काला बादल बनकर आयी हूँ। मै यहाँ नही आती, तो प्रभा के साथ कभी कुछ गलत नही होता! ...पर मै क्या करती ? मै उन सभी बदिशो को हटाना चाहती थी, जो मुझ पर लगी थी। मै उन सभी जजीरो को तोड़ना चाहती थी, जो दिखायी नही देती, फिर भी उन्होने मुझे जकड़ कर रखा था। ...ठीक है ! मै आपके साथ नही जाऊँगी ! अधिक से अधिक क्या होगा, बस ! प्रशान्त मुझे मार देगा !... जब तक प्रशान्त जेल मे रहेगा, तब तक गाँव वालो के ताने सह लूँगी ! कहते—कहते श्रुति की आँखो से आँसू टपकने लगे। उसकी निराश मुद्रा ने और छलकते आँसुओ ने प्रभा और अथर्व को अपना निर्णय बदलने के लिए विवश कर दिया। दोनो बहन—भाई दृढ़तापूर्वक एक साथ बोले —

नही श्रुति, हम तुम्हे मरने के लिए यहाँ नही छोड़ेगे ! इस समाज मे फैली हुई रूढ़ियो को तथा स्त्रियो के लिए निर्धारित प्रतिबन्धो को तोड़ने का जो बीड़ा तुमने उठाया है, हम उसमे तुम्हारा साथ देगे ! तुम अकेली नही हो, श्रुति ! हम सदैव तुम्हारे साथ रहेगे। अन्तिम वाक्य अथर्व ने कहा। अथर्व की माँ उसके अन्तिम वाक्य को सुनकर सोच मे पड़ गयी। उनके मन—मस्तिष्क मे भाँति—भाँति के विचार आने लगे।

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