पल जो यूँ गुज़रे - 5

पल जो यूँ गुज़रे

लाजपत राय गर्ग

(5)

जिस दिन निर्मल घर वापस आया, दोपहर में सोने के बाद माँ को कहकर जितेन्द्र से मिलने के लिये जाने लगा तो सावित्री ने उसे बताया — ‘मैं बन्टु के साथ जाकर जितेन्द्र की बहू को मुँह दिखाई का शगुन दे आई थी। अब तो तूने कल चण्डीगढ़ जाना है, जब अगली बार आयेगा तो उनको खाने पर बुला लेंगे। और हाँ, जल्दी वापस आ जाना, क्योंकि तेरे पापा दुकान से आने के बाद तेरे साथ कुछ सलाह—मशविरा करना चाहते हैं।'

‘ठीक है माँ', कहकर निर्मल घर से निकल गया।

जितेन्द्र उससे गर्मजोशी से मिला। दोनों ने एक—दूसरे को अपने विगत दिनों की बातें बतार्इं। जब जितेन्द्र दुकान बन्द करने लगा तो निर्मल ने घर जाने की बात कही। जितेन्द्र ने उसे रोकते हुए कहा — ‘घर चलते हैं यार। तेरी भाभी तुझसे मिलने को बेताब है।

‘नहीं भाई, अब तो मैं घर जाऊँगा। माँ ने कहा था कि जल्दी आ जाना, पापा कोई सलाह—मशविरा करना चाहते हैं।'

‘तो ठीक है, सुबह नाश्ता इकट्ठे करेंगे।'

‘मैं सैर के वक्त तेरी तरफ आऊँगा', कहकर निर्मल वहाँ से चल पड़ा।

खाना खाने के बाद परमानन्द ने निर्मल को ‘बैठक' में बुलाया। उसकी पढ़ाई के बारे में पूछने के पश्चात्‌ कहा — ‘बेटे, कमला के लिये कई रिश्ते आये हैं। अब जब तू यहाँ है तो एक—आध जगह जाकर देखभाल कर लेते हैं।'

‘पापा, ठीक है, रिश्ते आये हैं। लेकिन अभी हमें आठ—दस महीने इन्तज़ार करना पड़ेगा। एक तो अक्तूबर में मेरे कम्पीटीशन के एग्ज़ाम हैं, फिर ‘रिटन' का रिजल्ट आने के बाद इन्टरव्यू की तैयारी के लिये भी मुझे महीने—बीस दिन के लिये दिल्ली जाना पड़ेगा। अगर अभी हम रिश्ते देखने लगे तो कहीं—न—कहीं बात बन भी सकती है। आप इतनी मुश्किलें उठाकर मेरी कोचग आदि पर जो खर्च कर रहे हैं, वह सब व्यर्थ चला जायेगा।'

‘बेटे, कमला ने बी.ए. कर लिया है। घर बैठे भी क्या करेगी?'

‘पापा, कमला पढ़ने में अच्छी है। वह फर्स्ट डिवीजन में पास हुई है। उसे बी.एड. में एडमिशन दिलवा देते हैं। कहीं बाहर भेजने की जरूरत नहीं। बी.एड. कॉलेज यहीं खुल गया है। खाली बैठने से अच्छा है, कुछ सीख लेगी। आगे भी यह पढ़ाई कभी उसके काम आ सकती है। मेरी क्लासें भी शुरू हो चुकी हैं। कल मुझे चण्डीगढ़ जाना है।'

‘देख निर्मल, बन्टु का भी मेडिकल का दाखिला भरना है, तेरा जो खर्चा है, सो है। कमला की बी.एड. के लिये खर्च निकालने का मतलब होगा, उसकी शादी के लिये रखे गये पैसे में सेंध लगाना। वो मैं करना नहीं चाहता।'

‘पापा, अगर ऊपरवाले की मेहर हो गयी और मैं कम्पीटीशन में पास हो जाता हूँ तो हमें कमला के लिये अधिक बढ़िया रिश्ता मिल सकेगा। अब तो यह मान लो कि किला फतह होने में अधिक समय नहीं है।'

‘बात तो तेरी ठीक है और भगवान्‌ भली करेंगे, तू अपने मिशन में जरूर कामयाब होगा।'

‘पापा, भगवान्‌ के साथ आप लोगों का आशीर्वाद मैं व्यर्थ नहीं जाने दूँगा।'

‘चलो ठीक है। तू अपनी पढ़ाई पर ध्यान दे। कमला को कहते हैं कि बी.एड. कर ले। भगवान्‌ की रज़ा में ही हम राज़ी।'

अपने रूटीन के अनुसार निर्मल सुबह घर से निकला और बीती रात जैसा जितेन्द्र को कहा था, उनके घर पहुँच गया। आसमान में बादल छाये हुए होने के कारण जितेन्द्र की माँ, सुनन्दा और जितेन्द्र सभी ‘बैठक' में बैठने की बजाय आँगन में बैठे उस की प्रतीक्षा कर रहे थे। बाहर का दरवाज़ा खुला था। इसलिये घर में प्रवेष करते ही निर्मल ने चाची के चरणस्पर्श किये, सुनन्दा को नमस्ते की, और जितेन्द्र के गले लगकर मिला। सुनन्दा उठी और कुछ ही मिनटों में चाय बना लायी।

चाय पीते—पीते सुनन्दा बोली — ‘भाई साहब, लड्‌डू कब खिला रहे हो?'

‘लड्‌डू किस बात के?'

‘अब यूँ अनजान बनने का नाटक न करो। ‘इन्होंने' मुझे सारी बातें बता दी हैं।'

बनावटी गुस्से के साथ निर्मल ने जितेन्द्र को सम्बोध्ति करते हुए कहा — ‘अबे, मुझे नहीं पता था कि तेरा हाज़मा इतना कमज़ोर हो गया है? मैंने तो ज़िगरी दोस्त के नाते तुझे कुछ बता दिया और तूने सारा—का—सारा भाभी के सामने उगल दिया।'

ये सांकेतिक बातचीत सुनकर जितेन्द्र की माँ अपनी जिज्ञासा दबा न सकी और पूछ बैठी — ‘पुत्तर, मुझे अँधेरे में रखकर किस खुशी की बातें कर रहे हो, कुछ मुझे भी तो बताओे?'

निर्मल — ‘कुछ नहीं चाची जी। मियां—बीवी मिलकर मेरा मज़ाक बना रहे हैं।'

जितेन्द्र ने बातचीत का सूत्र पकड़ते हुए कहा — ‘माँ, अपने इस भोले—से दिखने वाले छोरे ने दिल्ली अपने साथ पढ़ने वाली लड़की को पसन्द कर लिया है। सुनन्दा उसी सिलसिले में लड्‌डू खिलाने की बात कर रही है।'

निर्मल — ‘चाची जी, ऐसा कुछ नहीं। मैंने कोई लड़की—बड़की पसन्द नहीं की। एक लड़की मेरे साथ दिल्ली पढ़ती थी। मेरे और उसके सब्जेक्ट एक—से हैं। इसलिये हम एक—दूसरे से कुछ समझने के लिये कभी—कभार उसके या मेरे ठिकाने पर मिल—बैठ लेते थे।'

इस प्रसंग को आरम्भ करने के बाद से सुनन्दा अब तक चुप थी। अब बोली — ‘भाई साहब, आपकी क्लास में तो और लड़कियाँ भी होंगी, यही अकेली लड़की तो नहीं होगी न! दूध और चावल मिलकर ही खीर बनती है। अगर आपके दिल में ‘उसके' लिये ‘कुछ' न होता तो बात हमारे तक कैसे पहुँचती? कुछ—न—कुछ तो ज़रूर है, यह बात और है कि आप लड्‌डू नहीं खिलाना चाहते तो न खिलाइये।'

जितेन्द्र की माँ ने बात को समाप्त करने के इरादे से कहा — ‘पुत्तर निर्मल, मेरी तो तुझे यही सलाह है कि अगर तुम दोनों के बीच कुछ है भी तो अभी उसको कुछ महीनों के लिये भूलकर अपनी पढ़ाई पर ध्यान दो। एक बार तुम्हें कामयाबी मिल जाये, हम सीना चौड़ा करके जहाँ तू चाहेगा, तेरा विवाह धूमधम से करेंगे।'

सुनन्दा — ‘भाई साहब, माँ जी ने आपकी बचत करवा दी। लेकिन इसे बचत मत समझना, मैं अपना नेग ब्याज़ समेत लिये बिना नहीं मानूँगी।'

‘भाभी, जब अवसर आयेगा तो आपको नेग भी मिलेगा और ब्याज़ भी। अब मैं सैर को निकलता हूँ। आज आपके हाथ का बना नाश्ता करना है। भूल तो नहीं गर्इं ना?'

‘बिल्कुल याद है। आप तैयार होकर आओ। आपकी पसन्द का नाश्ता तैयार मिलेगा।'

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Anami Indian 1 month ago

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S Nagpal 1 month ago

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Harsh Parmar 2 months ago

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निर्मल जितेंद्र सुनन्दा व मां जी के बीच आत्मीयतापूर्ण वार्तालाप के माध्यम से पात्रों के चरित्र पर प्रकाश।कथा की गति का विकास, भाषा सरल पर मुहावरेदार ,"क्लास में और भी तो लड़कियां पढ़ती होंगी , 'बिना दूध चावल के खीर नहीं पकती' ।" भाषा में सम्प्रेषणीयता। अभिव्यक्ति कौशल अप्रतिम। उपन्यासकार को साधुवाद ।

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Manjula Makvana 2 months ago