पल जो यूँ गुज़रे - 7

पल जो यूँ गुज़रे

लाजपत राय गर्ग

(7)

आठ अक्तूबर की शाम

निर्मल मेस से चाय पीकर कमरे की ओर जा रहा था कि हॉस्टल के चपड़ासी ने उसे बताया कि जाह्नवी नाम की लड़की उससे मिलने आई है और कॉमन रूम में बैठी है। यह सुनते ही उसके पैरों ने गति पकड़ ली। निर्मल को देखते ही जाह्नवी ने उठते हुए ‘हैलो' कहा। जवाब में निर्मल ने ‘हाउ आर यू' कहा।

‘आय एम फाइन, एण्ड यू?'

‘आय एम ऑलसो फाइन। कब आई?'

‘दो—एक बजे पहुँची थी। भइया साथ आये थे। होटल की व्यवस्था आदि करवा कर घंटा—एक पहले ही वापस गये हैं। मैंने सोचा कि कमरे में पड़ी—पड़ी भी क्या करूँगी, इसलिये चली आयी तुमसे मिलने।'

‘बहुत अच्छा किया तुमने। मन बाग—बाग हो गया है तुम्हें देखकर। चाय यहीं पीना चाहोगी या स्टूडेंट सेन्टर चलें।'

‘बाहर चलते हैं।'

हॉस्टल से बाहर आकर साथ—साथ चलते हुए जाह्नवी बोली — ‘निर्मल, तुम्हारे दिल्ली से आने के बाद कई दिन तक मन बड़ा उचाट रहा। पढ़ने को मन ही ना किया करे। किताब उठाती तो आँखों के सामने अक्षरों की जगह तुम्हारी मनमोहिनी सूरत घूमने लगती। बड़ी मुश्किल से धीरे—धीरे मन पर काबू पाया।.... तुम्हारी स्टडीज़ कैसी चल रही है?'

निर्मल भी अपने मन की अवस्था उसके सामने प्रकट करना चाहता था, किन्तु यह सोचकर कि परसों से परीक्षा है, कहीं दोनों ही अपने लक्ष्य से भटक न जायें, पढ़ाई के बारे में ही बातें करता रहा।

‘जाह्नवी, ज्यों—ज्यों समय बीत रहा है, मन में परीक्षा को लेकर घबराहट—सी महसूस हो रही है। पता नहीं क्या होगा?'

‘मैं तो जब से दिल्ली से आई हूँ, बड़ा रिलैक्स महसूस कर रही हूँ। मैंने तो कोर्स की बुक्स एक तरफ रख दी हैं। न्यूज—पेपर पढ़ लेती हूँ और मैंने ‘गॉड फादर' नॉवेल पढ़ना शुरू किया हुआ है, कुछ ही पे बाकी रह गये हैं।'

‘कोर्स की बुक्स एक तरफ रख दी हैं, मतलब?'

‘मेरी आदत है कि परीक्षा से कुछ दिन पूर्व मैं पूरी तरह से रिलैक्स रहती हूँ। कई बार तो परीक्षा वाले दिन से पहली शाम को मैं कोई—न—कोई फिल्म जरूर देखती हूँ।'

‘वाह, क्या आदत है!'

बातें करते—करते ही दोनों स्टूडेंट सेन्टर का रैम्प चढ़ गये। कॉफी हाउस में काफी भीड़ थी। चारों तरफ देखने पर एक टेबल खाली दिखाई दी। वे उसी टेबल के पास दो कुर्सियाँ खींच कर बैठ गये। वेटर ने पानी के गिलास रख दिये। उसे ऑर्डर की प्रतीक्षा करते देखकर दो कॉफी कहकर निर्मल ने जाह्नवी से पूछा — ‘कुछ खाने के लिये मँगवाऊँ?'

‘एक प्लेट साम्भर—बड़ा मँगवा लो।'

ऑर्डर लेकर वेटर चला गया। जाह्नवी ने इधर—उधर नज़रें घुमाकर देखते हुए कहा — ‘यह तो बहुत बढ़िया जगह है। बहुत गहमागहमी है!'

जब वेटर कॉफी और साम्भर—बड़ा लेकर आया तो निर्मल ने कहा — ‘एक खाली बाउल ले आओ।'

जाह्नवी— ‘रहने दो भइया।'

वेटर चला गया तो जाह्नवी ने कहा — ‘देखो न निर्मल, कितने लड़के—लड़कियाँ एक ही प्लेट में डोसे—बड़े खा रहे हैं। आज हम भी शुरुआत करते हैं।'

बिना प्रतिकार किये अन्यमनस्क भाव से निर्मल खाने लगा। चाहे निर्मल को यूनिवर्सिटी में आये दो वर्ष से अधिक हो गये थे, एक—आध लड़की से बातचीत भी हुई थी, किन्तु इस तरह कॉफी हाउस में किसी लड़की के साथ कॉफी पीने और एक ही प्लेट में खाने का उसके लिये यह पहला अवसर था। निर्मल बीच—बीच में इधर—उधर नज़र घुमाकर देख लेता था कि कहीं कोई उन्हें देख तो नहीं रहा। अभी ‘बड़ा' खत्म भी नहीं हुआ था कि मनोज उन्हीं की ओर आता हुआ दिखाई दिया। निर्मल ने प्लेट जाह्नवी की ओर सरका दी, यह जताने के लिये कि ‘बड़ा' वह अकेली ही खा रही है। जाह्नवी को निर्मल का इस तरह नर्वस होना थोड़ा अज़ीब—सा तो लगा, किन्तु वह भी सचेत हो गयी। आते हुए मनोज एक कुर्सी भी खींच लाया था। कुर्सी पर बैठते हुए उसने शिष्टाचारवश जाह्नवी को नमस्ते की और निर्मल से हाथ मिलाया। मनोज के बैठने के बाद जाह्नवी ने भी बचे हुए ‘बड़े' सहित प्लेट एक ओर सरका दी। इससे पहले कि मनोज कुछ पूछता या कहता, निर्मल ने दोनों को एक—दूसरे का परिचय देते हुए कहा — ‘मनोज, ये हैं जाह्नवी, शिमला से यूपीएससी के पेपर देने आई हैं। दिल्ली में हमने इकट्ठे कोचग ली थी, इसलिये मिलने चली आई हैं। और जाह्नवी, ये हैं मेरे क्लास—फैलो मनोज। ये भी अपीअर हो रहे हैं। मनोज, क्या लोगे, कॉफी या कोल्ड—ड्रक?'

निर्मल के साथ एक अनजान, अपरिचित लड़की बैठी देखकर मनोज ने अपने स्वभावानुसार कोई हल्की—भद्दी बात नहीं की। बस इतना ही कहा — ‘लगता है, तुम लोग तो खा—पी चुके हो। मैं एक कॉफी के लिये ही आया था कि तुम पर नज़र पड़ गयी।'

निर्मल ने वेटर को इशारा करके बुलाया और कॉफी का ऑर्डर दिया। जब मनोज कॉफी पी चुका तो जाह्नवी ने निर्मल से कहा — ‘बिल मँगवा लो, फिर चलते हैं।'

निर्मल ने वेटर को बिल लाने के लिये कहा। जाह्नवी पेमेंट करना चाहती थी, किन्तु मनोज के आ जाने से उसने अपना यह विचार त्याग दिया।

‘मनोज, तुम तो शायद अभी बैठोगे?'

‘हाँ, मैं तो अभी पन्द्रह—बीस मिनट यहीं रिलैक्स करूँगा।'

जाह्नवी ने उठते हुए मनोज को नमस्ते की और निर्मल के साथ नीचे उतर गयी। रास्ते में जाह्नवी ने पूछा — ‘निर्मल, कैम्पस तो बहुत बढ़िया है।....यहाँ कौन—कौन सी मूवीज़ लगी हुई हैं? अब तो लेट हो गये, कल मैटिनी शो देखने चलते हैं।'

‘मैंने तो कभी इस तरफ ध्यान ही नहीं दिया। हॉस्टल चलकर न्यूज़—पेपर से पता चल जायेगा।'

न्यूज़—पेपर के अनुसार चण्डीगढ़ के थियेटरों में ‘तेरे मेरे सपने', ‘आनन्द', ‘गुड्‌डी', ‘रखवाला', और ‘गैम्बलर' फिल्में लगी हुई थीं।

‘जाह्नवी, कल की बजाय अगर हम कम्पल्सरी पेपर देने के बाद फिल्म देखें तो अधिक ठीक रहेगा।'

‘नहीं यार, कल ही चलते हैं। मैं फिल्म देखकर पेपरों के लिये फ्रैश हो जाऊँगी।'

‘तुम्हारी खुशी के लिये इतना तो मैं कर ही सकता हूँ। बोलो, कौन—सी फिल्म देखना चाहती हो?'

‘‘आनन्द' देखेंगे। अब मैं चलती हूँ। मेरा फेवरिट हीरो राजेश खा लीड रोल में है। कल सुबह दस बजे मेरे पास आ जाना। नाश्ता मेरे साथ करना, फिर फिल्म देखने चलेंगे।'

‘मैं भी तुम्हारे साथ चलता हूँ। होटल भी देख लूँगा।'

‘अब तुम मुझे छोड़ने जाओगे, फिर मैं तुम्हें छोड़ने आऊँगी। कहीं यह सिलसिला सारी रात ही न चलता चला जाये।'

जह्नवी की इस बात पर दोनों हँस पड़े। यूनिवर्सिटी से बाहर आकर उन्होंने ऑटो लिया और होटल पहुँच गये। जब निर्मल ऑटो वाले को रुकने के लिये कहने लगा तो जाह्नवी बोली — ‘इसे जाने दो, मेरा रूम तो देख लो।'

रूम काफी अच्छा था। स्टडी टेबल पर सारी किताबें और रजिस्टर करीने से रखे हुए थे। दो बेड अलग—अलग लगेे हुए थे। इसे इंगित कर निर्मल ने शरारती अन्दाज़ में आँखें मटकाते हुए पूछा — ‘यह दूसरा बेड किसके लिये?'

जह्नवी ने भी उसी के लहज़े में उत्तर दिया — ‘कभी तुम्हारे जैसे शख्स को रोकना पड़ जाये, इसलिये।'

जह्नवी के मज़ाकिया लहज़े में दिये इस उत्तर ने निर्मल के अन्दर कई तरह की भावनाओं को जाग्रत कर दिया। किन्तु मुख से उसने कुछ नहीं कहा।

जह्नवी चाय का आर्डर देने के लिये इन्टरकॉम पर नम्बर मिलाने लगी तो निर्मल ने उसे रोकते हुए कहा — ‘अब चाय नहीं। बस, मैं चलता हूँ।'

निर्मल की परीक्षा को लेकर घबराहट वाली बात स्मरण कर जाह्नवी ने भी उसे रोका नहीं।

पोर्च में आकर जाह्नवी जब बॉय करके मुड़ने लगी तो निर्मल ने भी बॉय करते हुए कहा — ‘धन्यवाद चण्डीगढ़ पहुँचते ही मिलने आने के लिये।'

रात को जब जाह्नवी लेटी तो दिनभर की, विशेषकर निर्मल के साथ बिताये पलों की यादें उसके अर्न्तमन में उमड़ती—घुमड़ती रहीं। सोचने लगी कि जब मैंने एक प्लेट में ही साम्भर—बड़ा खाने की कही तो निर्मल ने चाहे मेरी बात मान ली, कोई प्रतिकार नहीं किया, लेकिन वह सहज नहीं था, किसी द्वन्द्व में था वह।.....निर्मल बेहतरीन इन्सान है, दिल से मुझे चाहता है, लेकिन मनोभाव जुबान पर लाने से कतराता है।..... उसमें आत्मविश्वास की थोड़ी कमी है। क्या ऐसा उसकी परवरिश के कारण है अथवा अपनी पारिवारिक पृश्ठभूमि के कारण वह हीनभावना से ग्रस्त है। मैंने तो उसके समक्ष कभी ऐसा व्यवहार नहीं किया कि उसमें मेरा सामना करने पर हीनग्रन्थि सक्रिय हो।....वह पढ़ाई में होशियार है, पूरी लगन से परिश्रम कर रहा है। एक बार यह परीक्षा पास कर ले, आत्मविश्वास अपने आप बढ़ जायेगा। यही सब कुछ सोचती तथा सुखद भविष्य की कल्पना करते—करते वह नींद की गिरफ्त में समा गयी।

दूसरे दिन उन्होंने ‘केसी' थियेटर में ‘आनन्द' देखी। फिल्म देखने के बाद जाह्नवी राजेश खा के किरदार से बड़ी प्रभावित हुई। उसने निर्मल को कहा — ‘देखो निर्मल, कैंसर जैसी जानलेवा बीमारी होने और डॉक्टर द्वारा मृत्यु से पूर्व अधिकतम छः महीने की ज़िन्दगी का समय देने के बावजूद आनन्द कितने खिलन्दड़े ढंग से ज़िन्दगी जीता है, उससे हमें सबक लेना चाहिये। जो होना है, सो होना है। उसे कोई टाल नहीं सकता। हम अगर अपने कर्त्तव्य का निर्वहण पूरी ईमानदारी से करते हैं तो भगवान्‌ भी हमारी सहायता करता है। तुमने बहुत दिल लगाकर तैयारी की है, रिजल्ट भी अच्छा ही होगा। अब जाकर रिलैक्स करो। परसों शाम को मेरे पास आना, थोड़ा—बहुत घूमेंगे। तब तक के लिये गुड बॉय एण्ड विश यू बेस्ट ऑफ लक्क।'

‘सेम टू यू', कहता हुआ निर्मल जाह्नवी को होटल में छोड़कर सुहाने मौसम को देखते हुए यूनिवर्सिटी की ओर पैदल ही चल पड़ा।

अनिवार्य तीन पेपर — सामान्य ज्ञान, सामान्य अंग्रेज़ी व निबन्ध — दो दिनों में हो गये। तीसरा पेपर प्रातःकालीन सत्र में था। पेपर देने के पश्चात्‌ यूनिवर्सिटी जाने की बजाय निर्मल जाह्नवी के होटल पहुँच गया। जाह्नवी कुछ मिनट पहले ही पहुँची थी। अभी उसने कपड़े भी नहीं बदले थे कि उसके रूम की बेल बजी। ज्यों ही जाह्नवी ने दरवाज़ा खोला तो सामने निर्मल को देखकर आश्चर्यमिश्रित स्वर में बोली — ‘अरे, तुम!'

‘सॉरी जाह्नवी, अपनी बात तो शाम को मिलने की हुई थी। लेकिन पेपर देने के बाद सोचा, पता करूँ कि तुम्हारे पेपर कैसे हुए हैं? शाम तक इन्तज़ार करना मुश्किल लगा।'

‘मैं बहुत खुश हूँ। एक तो पेपर बहुत बढ़िया हुए हैं; दूसरे, शाम की बजाय तुम अभी आ गये। तुम बताओ कि तुम्हारे पेपर कैसे हुए हैं?'

‘मेरे भी अच्छे हुए हैं, थोड़ी—सी कसक है तो जनरल इंगलिश के पेपर को लेकर। यह पेपर उम्मीद के मुताबिक नहीं हुआ।'

‘बीती ताहि बिसारि दे, आगे की सुधि लेयि। निर्मल, जो हो गया सो गया। अब इसको चता का विषय मत बनाना। आगे की तैयारी पर इसका असर नहीं पड़ना चाहिये। भगवान्‌ भली करेंगे।.......तुमने ऐस्से कौन—सा लिखा?'

‘त्वसम वि व्चचवेपजपवद प्द च्ंतसपंउमदज क्मउवबतंबल (संसदीय लोकतन्त्र में विपक्ष का महत्त्व)। इस विषय से मिलते—जुलते विषय पर मैंने एक ऐस्से राईटग कम्पीटिशन के लिये ऐस्से लिखा था, जिसके लिये मुझे फर्स्ट प्राईज़ मिला था। इसलिये ऐस्से तो मेरा बहुत बढ़िया हुआ है।'

‘फिर तो तुम्हें बिल्कुल भी चता नहीं करनी चाहिये। जनरल इंगलिश की कमी तुम्हारा ऐस्से पूरी कर देगा।'

‘जाह्नवी, तुमसे मिलकर, तुम्हारी बातें सुनकर मेरा आत्मविश्वास बढ़ जाता है।......तुमने कौन—सा ऐस्से चुना?'

‘ज्ीम त्मसपहपवने ैचपतपज वि प्दकपं (भारत की धार्मिक आत्मा)।'

‘यह तो बिल्कुल नया विषय है। मुझे तो समझ ही नहीं आया कि इस विषय पर क्या लिखा जा सकता है। तुमने क्या लिखा इस पर?'

‘मैंने तो आरम्भ इस तरह किया कि चाहे राजनैतिक रूप से वर्तमान भारत की भौगोलिक सीमाएँ 1947 में तय हुर्इं, किन्तु अखण्ड भारत की परिकल्पना तो हज़ारों वर्ष पूर्व हमारे धर्माचार्यों तथा पूर्वजों ने कर ली थी। आदिगुरु शंकराचार्य ने तो चारों दिशाओं में चार तीर्थ — उत्तर में श्री बदरीनाथ, पूर्व में श्री जगाथ पुरी, दक्षिण में श्री रामेश्वरम्‌ तथा पश्चिम में द्वारका — स्थापित करके भारत की सीमाएँ ही निर्धरित कर दी थीं। इसके अतिरिक्त समय—समय पर अवतरित हुए धर्म—गुरुओं तथा भक्त—कवियों ने भारतीयों को धर्म के आधर पर एक सूत्र में पिरोये रखने का महत्त कार्य सम्पादित किया।'

‘अद्‌भुत। विषय का ऐसा प्रतिपादन तो शायद ही किसी ने किया होगा। बहुत अच्छे नम्बर मिलेंगे तुम्हें।'

‘खाने का ऑर्डर करूँ या थोड़ी देर रुकना है?'

‘बोल दो, खाना आने में भी तो पन्द्रह—बीस मिनट लगेंगे।'

खाना खाने के बाद निर्मल जाने लगा तो जाह्नवी ने कहा — ‘अब जाओगे, दो घंटे बाद फिर आओगे। यहीं आराम कर लो।'

‘तुम्हें असुविधा होगी, तुम आराम नहीं कर पाओगी, इसलिये जा रहा हूँ।'

‘तुम्हारे यहाँ रहने से मुझे तनिक भी असुविधा नहीं होगी। हाँ, तुम जरूर इन फॉर्मल कपड़ों में ठीक से आराम नहीं कर पाओगे। अगर तुम्हें बुरा न लगे तो मेरे पास एक पैरलल पायज़ामा, यूनीसेक्स लोअर है, तुम वह पहन सकते हो,' इसके साथ ही उसने सूटकेस में से एक पायज़ामा निकाला और निर्मल को पकड़ाते हुए कहा — ‘लो, चेंज कर लो। आराम से दो—ढाई घंटे लेटो, नींद आती हो तो सो लो।'

निर्मल ने बाथरूम में जाकर पैंट उतार कर खूँटी पर टाँग दी और पायज़ामा पहनकर बाहर आते हुए कहा — ‘यह पायज़ामा इतना सही आया है, लगता हैे जैसे मेरे लिये ही लिया गया हो। अब कोई टॉप भी दे दो।'

‘टॉप तो सारे लड़कियों वाले हैं।'

‘कोई बात नहीं रे, दे दो एक। तुम्हारे सिवा यहाँ कौन है जिसे अटपटा लगेगा?'

जह्नवी ने एक टॉप निकाला और उसे दे दिया। निर्मल जब उसे पहनकर आया तो जाह्नवी अपनी हँसी रोक नहीं पायी और बोली — ‘वाह, बड़े वो लग रहे हो। कैमरा होता तो मैं एक फोटो अवश्य ले लेती।'

‘हालात से समझौता किया है, हँसी मत उड़ाओ,' कहकर निर्मल दूसरे बेड पर लेट गया। इसके बाद जाह्नवी भी टॉप और लोअर पहनकर आकर अपने बेड पर लेट गयी। थोड़ी देर बातें करने के बाद दोनों को ही नींद आ गयी, क्योंकि लगातार तीन पेपर देने के बाद दोनों ही काफी राहत महसूस कर रहे थे, पूरी तरह बेफिक्र। मन में बेफिक्री और निश्चतता हो तो नींद आते कहाँ देर लगती है!

थोड़ा आगे—पीछे पाँच बजे के लगभग दोनों उठे। तय हुआ कि सुखना लेक देखने चलते हैं। लेक पर जाकर पहले उन्होंने कॉफी पी, फिर पैडल वाली किश्ती में आधा घंटा लेक के चक्क्र लगाये। किश्ती जब किनारे से दूर झील के बीच में थी और उनके आसपास कोई अन्य किश्ती नहीं थी, तब जाह्नवी ने पूछा — ‘निर्मल, तुमने ‘कश्मीर की कली' फिल्म देखी है?'

‘हाँ, क्यों?'

‘तुम्हें ऐसा नहीं लगता, जैसे शम्मी कपूर और शर्मिला टैगोर की जगह तुम और मैं फिल्म के डल लेक वाले सीन में उतर आये हों?'

‘मैं तो खुद को शम्मी कपूर समझने की भूल नहीं कर सकता; तुम स्वयं को शर्मिला टैगोर मानती हो तो मुझे कोई एतराज़ नहीं। वैसे तुम्हारी कल्पना—शक्ति का भी जवाब नहीं। अब यह ना कह बैठना कि मैं शम्मी कपूर की तरह तुम्हारे लिये गाना गाऊँ।'

जाह्नवी ने मचलकर कहा — ‘वो तो मैं कहूँगी और तुम्हें गाना सुनाना भी पड़ेगा।'

‘ना बाबा ना। मुझे गाना—वाना नहीं आता।'

‘प्लीज, शम्मी कपूर वाला ना सही, कोई भी गाना सुना दो। चलो पूरा गाना ना सही, किसी भी गाने की दो—चार लाइनें ही गुनगुना दो।'

‘मतलब कि तुम सुने बिना नहीं मानोगी?'

‘बिल्कुल नहीं।'

कुछ देर सोचकर निर्मल गुनगुनाने लगाः

‘तुम अगर साथ देने का वादा करो

मैं यूँ ही मस्त नग्मे लूटाता रहूँ

तुम मुझे देखकर मुस्कराती रहो

मैं तुम्हें देखकर गीत गाता रहूँ

कितने जलवे पिफज़ाओं में बिखरे मगर

मैंने अब तक किसी को पुकारा नहीं

तुमको देखा तो नज़रें ये कहने लगीं

हमको चेहरे से हटना गवारा नहीं

बस इतना ही याद है।'

जाह्नवी ने छेड़ने के अन्दाज़ में पूछा — ‘निर्मल, सच्ची कहते हो कि मुझसे पहले तुमने किसी को पुकारा नहीं?'

‘अपने दिल से ही पूछ लो।'

‘दिल तो पहले ही तुम्हारा हो चुका है, तुम्हारे विरुद्ध गवाही कैसे देगा?......तुम तो अच्छा गुनगुना लेते हो।....... ऊपर को उठती हुई पहाड़ियों तथा घने जंगलों से घिरी झील, झील के बीचों—बीच हल्के—हल्के हिचकोले खाते ‘तुम और मैं', ‘मैं और तुम' कितना उन्माद—भरा माहौल है। जी करता है, समय की कोई सीमा न हो बल्कि समय ठहर जाये और हम यूँ ही लहरों पर थिरकते रहें।'

‘कल्पना—लोक से धरातल पर आओ मैडम, हमें दस मिनट में बोट वापस भी करनी है और किनारे तक जाने में दस मिनट लगेंगे ही।'

इसके बाद थोड़ी देर टहलने के पश्चात्‌ दोनों ने एक—दूसरे से अपने—अपने ठिकाने के लिये विदा ली।

दूसरे दिन दोपहर में जाह्नवी जब सोने लगी तो खूँटी पर टँगे वही टॉप और पायज़ामा दिखाई दिये जो पहले दिन निर्मल को पहनने के लिये दिये थे। और कपड़े तो सुबह लॉण्ड्री—ब्वॉय को दे चुकीे थी, अतः उसने वही टॉप और पायज़ामा पहन लिये। बेड पर लेटी तो उसे उन कपड़ों में से ऐसी गन्ध का अहसास हुआ, जिससे अब तक वह अपरिचित थी। यह गंध उसे स्वयं के शरीर के साथ लिपटती महसूस हुई। नींद में उसे ऐसा लगा जैसे निर्मल उसके अंग—प्रत्यंग के साथ घुला—मिला उसके संग ही सो रहा है।

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Anami Indian 1 month ago

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कथा रोचक ,संवाद पात्रानुकूल , उद्देश्यपरक,शैली लालित्यपूर्ण । आगे जानने की उत्सुकता बनी रहती है।समग्र प्रभाव उत्कृष्ट।

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Lajpat Rai Garg 2 months ago

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Manjula Makvana 2 months ago

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Santoki Hemali 2 months ago