पल जो यूँ गुज़रे - 9

पल जो यूँ गुज़रे

लाजपत राय गर्ग

(9)

क्योंकि निर्मल ने पत्र द्वारा पहले ही सूचित किया हुआ था कि मैं दीवाली से चार दिन पूर्व आऊँगा, इसलिये कुछ तो दीवाली के कारण और कुछ उसके आने की खुशी में घर में त्योहार जैसा माहौल बना हुआ था। एक तो वह तीन महीने पश्चात्‌ घर आया था, दूसरे आईएएस के लिये उसके पेपर बहुत अच्छे हुए थे। सब को आशा थी कि अब तो बहुत जल्दी ही भाग्य परिवर्तन होने वाला है। सावित्री ने उसके आने की खुशी में माल—पूड़े तथा खीर बनाई थी। दीवाली सिर पर थी, इसलिये गुड़ की और नमकीन मठियाँ भी बना रखी थीं। जब उसने घर पहुँचकर दादी और माँ के चरण—स्पर्श किये तो दोनों ने उसे बहुत आशीर्वाद दिये। दादी उसे अपने सीने से लगाकर बहुत देर तक उसके सिर पर हाथ फेरती रही। कमला कॉलेज से आने के बाद उससे गले लगकर मिली। जब परमानन्द दोपहर का खाना खाने घर पर आया तो उसने निर्मल को छाती से लगाकर आशीर्वाद दिया। चाहे परमानन्द स्वयं केवल आठ क्लास तक ही पढ़ पाया था, फिर भी वह पढ़ाई की बहुत कद्र करता था। उसे समाचारपत्रों तथा पुस्तकों, जो वह पढ़ता था, में से मुख्य—मुख्य जानकारियाँ अपनी पॉकेट नोटबुक में लिख लेने की आदत थी। निर्मल ने कम्पीटीशन की तैयारी आरम्भ करने से पहले उनकी इस नोटबुक को कॉपी कर लिया था। उसे बहुत आश्चर्य हुआ था कि पापा की नोटबुक में बहुत—सी ऐसी जानकारियाँ थीं जो जनरल नॉलिज की किसी भी पुस्तक में उपलब्ध नहीं थीं। परमानन्द शहर की सामाजिक गतिविधियों में काफी सक्रिय हिस्सा लेता था। उसने निर्मल को खाने पर अपने साथ बिठाया। कई तरह की पूछताछ की। जब निर्मल ने बण्टू के बारे में पूछा तो परमानन्द ने बताया कि उसका पत्र आया था कि पढ़ाई के दबाव के कारण उसे केवल दीवाली वाले दिन की ही छुट्‌टी मिलेगी।

शाम को जब निर्मल जितेन्द्र की तरफ जाने लगा तो सावित्री ने उससे कहा — ‘बेटे, जितेन्द्र और उसकी बहू को कल दोपहर या रात के खाने पर बुला लेना, एक बार रस्मी तौर पर बहू आ जायेगी तो फिर आने—जाने में संकोच नहीं रहेगा। और बहिन जी भी साथ आ जायेंगी, वे अकेली घर में क्या करेंगी?'

‘ठीक है माँ। मैं उनको कह दूँगा कि आपने उन्हें बहुत याद किया है। हो सकता है, आज मैं खाना जितेन्द्र के साथ ही खाकर आऊँ!'

निर्मल जैसे ही जितेन्द्र की दुकान पर पहुँचा, जितेन्द्र ने पहला काम घर पर सुनन्दा को टेलिपफोन करके उसके आने का समाचार दिया और निर्मल से बिना पूछे ही सुनन्दा को कह दिया कि खाना इकट्ठे ही खायेंगे।

दूसरे दिन रात को जितेन्द्र ने दुकान समय से पूर्व बन्द कर दी और सुनन्दा को लेकर निर्मल के घर पहुँच गया। दोनों ने दादी और सावित्री के चरणस्पर्श करके आशीर्वाद लिया। जब सुनन्दा ने दादी के चरणस्पर्श किये तो उन्होंने उसे परम्परागत पंजाबी लहज़े में आशीर्वाद दिया — ‘बुड सुहागन होवें, दुधोे नहावें पुतों फलें। तू तां बहूए बोहत ही सोहनी ऐं।.....सावित्री थोड़ी जेही कालस लिआ, ऐहदे टिॅका ला दिआं, किते नज़र ना लग जावे।'

सुनन्दा — ‘दादी जी, अपनों की नज़र नहीं लगती।'

‘नर्इं बहूए, नज़र तां पहलां आपनेआं दी ही लगदी ऐ।'

सुनन्दा ने जब सावित्री के चरणस्पर्श करते हुए उन्हें ‘आंटी' कहकर सम्बोधित किया तो सावित्री ने उसे टोकते हुए कहा — ‘बहू, ‘आंटी' ‘अंकल' तो किसी भी चलते—फिरते व्यक्ति के लिये इस्तेमाल किये जाते हैं। जहाँ सम्बन्ध हैं, रिश्ता है, वहाँ ‘आंटी' ‘अंकल' कहना अच्छा नहीं लगता, खासकर मुझे तो बिल्कुल नहीं। हमारे यहाँ जब हर छोटे—बड़े रिश्ते के लिये एक अलग आत्मीयता—भरा नाम है, फिर क्यों हम ‘आंटी' ‘अंकल' के चक्र में पड़ें। जितेन्द्र को हमने हमेशा निर्मल का बड़ा भाई माना है, लेकिन तेरे ससुर निर्मल के पापा से छोटे थे तो यह उन्हें चाचाजी ही बुलाता था।'

सुनन्दा ने सावित्री के मनोभावों को समझते हुए तथा अपनी गलती का सुधार करते हुए कहा — ‘माफ करना ताई जी, आगे से ऐसी गलती नहीं करूँगी।'

सुनन्दा की बात सुनकर सावित्री ने उसे गले से लगा लिया। कमला ने भी सुनन्दा को नमस्ते की और उसे बाँहों में भर लिया।

खाने की जब तैयारी होने लगी तो रसोई के सामने कमला ने आँगन में लकड़ी के तीन पटके रखे और उनके सामने पीतल की चौकियाँ। फिर आवाज़ दी — ‘जितेन्द्र भइया, भाभी जी आओ बैठो, मैं खाना लगाती हूँ।' और स्वयं कांसे के थालों में खाना लगाने लगी।

निर्मल ने कमला से कहा — ‘वाह क्या बात है? भाभी को देखकर मुझे तो भूल ही गयी!'

‘अरे, तुझे तो वो कहावत याद ही होगी — घर की मुर्गी दाल बराबर।'

निर्मल ने उसकी इस बात पर उसकी पीठ पर प्यार से हल्का—सा धौल जमा दिया। वह कह उठी — ‘माँ, देखो ना, इसके लिये आसन तो लगा दिया है, फिर भी काम नहीं करने देता।'

‘तुम भाई—बहिन आपस में सुलटा लो, मैं कुछ नहीं कहती।'

सुनन्दा ने सीधे आसन पर बैठने की बजाय रसोई में आकर सावित्री से कहा — ‘ताई जी, मैं कुछ मदद करूँ?'

‘नहीं पुत्तर, सब कुछ तैयार है। मैं गरम—गरम चपाती बनाती हूँ। कमला बरता रही है। तुम लोग खाओ।'

सुनन्दा ने बैठते हुए कहा — ‘दीदी, तुम भी आ जाओ।'

‘मैं तो इसलिये नहीं बैठी भाभी जी कि माँ को चपातियाँ देने के लिये बार—बार चूल्हे के आगे से उठना पड़ता।'

अभी ये लोग खाना खा ही रहे थे कि परमानन्द घर आया। उसे आया देखकर जितेन्द्र ने तो बैठे—बैठे ही ‘नमस्ते ताया जी' कह दिया, किन्तु सुनन्दा उनके चरणस्पर्श करने हेतु उठने लगी तो उसने कहा — ‘बैठी रह पुत्तर। खाने के बीच में से नहीं उठा करते। इससे अ का निरादर होता है।.......कमला, मेरे लिये थाली बैठक में ही ले आना,' कहकर वह तो बैठक में चला गया।

खाना खाने और हाथ धोने के उपरान्त जितेन्द्र और सुनन्दा बैठक में गये, परमानन्द के चरणस्पर्श किये। परमानन्द ने जितेन्द्र से उसके काम—धन्धे सम्बन्धी दो—चार प्रश्न किये और उसकी माता का हालचाल पूछा। उसके बाद वे अन्दर आकर दादी के पास बैठ गये। निर्मल भी वहीं था। निर्मल ने सुनन्दा को छेड़ते हुए कहा — ‘भाभी, दादी जी की पड़पोता गोद में खिलाने की बड़ी इच्छा है। आज तो आपको आशीर्वाद भी मिल गया है। अब इनकी इच्छा पूरी कर दो।'

‘भाई साहब...' सुनन्दा जवाब में कुछ कहने लगी कि उसे रोकते हुए निर्मल बोला — ‘भाभी, अब यह भाई साहब कहना छोड़ो। याद है ना, अभी थोड़ी देर पहले माँ ने रिश्तों को लेकर क्या कहा था? या तो मुझे नाम से बुला लिया करो या देवर भी कह सकती हो।'

‘तो ठीक है देवर जी, अब भाई साहब नहीं कहूँगी।'

दादी जी — ‘बहू, निर्मल वाली गॅल तां विचे ही रह गयी।'

‘दादी जी, यह तो परमात्मा के हाथ में है।'

‘ओह्‌ह तां ठीक है कि एह परमात्मा दे हथ ‘च है, मेरा तां ऐना ही कहना है कि तुसीं आपदे वलों परमात्मा दी खेड़ ‘च रुकावट ना पाइयो।'

इतनी देर में सावित्री भी खाना आदि समेट कर वहाँ आ बैठी। निर्मल ने कहा — ‘माँ, कल रात मैंने भाभी के हाथ का बना खाना खाया। क्या लज़ीज खाना बनाती हैं? जब कभी दो चार मेहमान आने हों तो इन्हें बुला लिया करना। और कमला सुन, तू भी इनके पास चली जाया कर। बढ़िया खाना बनाना सीख लेगी तो आगे तेरे काम आयेगा।'

निर्मल की बात के उत्तर में सुनन्दा बोली — ‘देवर जी, मेरे खाने की तो वैसे ही तारीफ कर रहे हो, ताई जी के हाथ के बने खाने का तो कोई जवाब ही नहीं।'

इसी तरह की हल्की—फुल्की हँसी—मज़ाक की बातें होती रहीं। जितेन्द्र ने घड़ी देखी। दस बजने वाले थे। कहा — ‘निर्मल भाई, अब चलते हैं। माँ, इन्तज़ार कर रही होगी।'

उसके इतना कहते ही सुनन्दा को उठते हुए देखकर सावित्री अपने बेडरूम में गयी और एक साड़ी का पैकेट तथा एक लिफाफे में सौ रुपये डालकर ले आई और अपनी सास को पकड़ाते हुए सुनन्दा को देने के लिये कहा।

सुनन्दा — ‘यह क्या ताई जी?'

दादी — ‘बहू, तूं पहली वार घरे आई हैं, तैनूँ खाली हॅथ तोरांगे?'

जितेन्द्र ने गम्भीरता और मज़ाकिया लहज़े के सम्मिश्रण से कहा — ‘ले लो सुनन्दा। यह आशीर्वाद किस्मत वालों को ही मिलता है। अब तू ही देख, तेरे आने से घर के बेटे को तो जैसे सारे ही भूल गये हैं।'

‘ना पुत्तर, तैनूँ किवें भुल्ल सकदे आं। निर्मल ते बन्टु तां बाहर रहंदे ने। वेले—कुवेले तूँ ही सानूँ सँभालदा ऐं। सावित्री ऐहदे वास्ते वी शगन लिआ। बहू नाल तां ऐह वी पहली वार आया है।'

‘नहीं दादी जी, मैं तो मज़ाक कर रहा था।'

जब निर्मल जितेन्द्र और सुनन्दा को बाहर छोड़ने के लिये आया और सुनन्दा स्कूटर पर बैठने लगी तो निर्मल बोला — ‘भाभी, सँभलकर बैठना, मेरा भाई एक्सपर्ट ड्राईवर नहीं है।'

सुनन्दा ने हँसते हुए कहा — ‘देवर जी, भाभी की बड़ी चता है आपको? आप तीन—चार महीने पहले की बात कर रहे हैं। अब ‘ये' पूरी तरह एक्सपर्ट हो चुके हैं....' बात समाप्त होते—होते जितेन्द्र ने किक मारी और स्कूटर ने रफ्तार पकड़ ली।

घर में सबसे पहले जागने वालों में थी दादी जी। उसके बाद सावित्री और परमानन्द थोड़ा आगे पीछे। नवम्बर का पहला पखवाड़ा। रात को चादर या खेस से अब काम न चलता था, कम्बल की दरकार होने लगी थी। सुबह—शाम को भी थोड़ी—थोड़ी ठंड लगने लगी थी। सुबह की सैर करने वाले स्वेटर आदि पहनकर ही घर से बाहर निकलने लगे थे। दीवाली से एक दिन पहले सुबह जैसे ही परमानन्द उठा तो हैरान कि आज माँ की कोई आवाज़ नहीं सुनाई दे रही, वरना तो इस समय तक उनके ‘नाम जाप' के स्वर घर भर में गूँजने लगते थे। उसने माँ के कमरे में झाँका। चादर ओढ़े माँ निश्चल पड़ी थी। माँ को गर्मी अधिक लगती थी, इसलिये अभी पतली चादर ओढ़कर ही सोया करती थी। आगे बढ़कर देखा, चेहरा दिप्‌—दिप्‌ करता हुआ। शरीर छूआ तो एकदम बर्फ। उसकी चीख निकल गयी — ‘माँ...' और वह दहाड़ मारकर माँ के शरीर से लिपट गया। चीख सुनकर सावित्री दौड़ी आई। ‘क्या हुआ.....?'

उठते हुए रूआँसे स्वर में परमानन्द बोला — ‘माँ नहीं रही', उसकी आँखें भर आर्इं। सावित्री भी रोने लगी। दोनों एक—दूसरे को सँभालते, सहारा देते हुए आँगन में आये। सावित्री ने निर्मल को जगाया, एक दरी निकाली और माँ का शव आँगन में लाये। परमानन्द ने जुगल को टेलिफोन कर बताया कि माँ नहीं रही। दसेक मिनट में जुगल, उसकी पत्नी वीणा भी आ गये। उनके आते ही एकबार कोहराम—सा मच गया। रोने की आवाज़ें सुनकर दो—चार पड़ोसी भी आ गये। आदमियों ने दोनों भाइयों को और स्त्रियों ने सावित्री और वीणा को सांत्वना देते हुए चुप करवाया। थोड़ा शान्त होते ही जुगल सगे—सम्बन्धियों और दोस्त—मित्रों को टेलिफोन करने लगा। जिन नज़दीकी रिश्तेदारों के पास टेलिफोन नहीं थे, उन्हें तार देने के लिये निर्मल को भेजा। इतने में कमला भी जाग चुकी थी। वह माँ और चाची के पास आकर बैठी। एक पड़ोसन ने रसोई में से पानी के गिलास भर कर सबको पानी पिलाने की कोशिश की।

जब जुगल टेलिफोन से फारिग होकर परमानन्द के पास आकर बैठा तो परमानन्द ने उससे कहा — ‘जुगल, माँ बड़ी करमांवाली थी जो इस तरह किसी भी प्रकार का दुःख—दर्द सहे बिना अपनी सांसारिक यात्रा पूरी करके गयी है। मैं चाहता हूँ कि माँ की आँखें दान कर दें।'

‘भाई साहब, यह तो आपने बहुत अच्छा सोचा है। मैं अभी नेत्रादान केन्द्र में टेलिफोन करता हूँ।'

पन्द्रह मिनट में ही नेत्रदान केन्द्र से टीम आ गयी। एक सिम्पल—सा फार्म भरकर परमानन्द और जुगल के हस्ताक्ष्र करवा कर उन्होंने अपना काम आरम्भ कर दिया। दस मिनट भी नहीं हुए होंगे कि उन्होंने हाथ जोड़कर परमानन्द और जुगल का धन्यवाद किया और विदा ली।

शहर के मिलने—जुलने वालों को अंतिम संस्कार का समय ग्यारह बजे का बताया था। जितेन्द्र भी अपनी माता के साथ नौ बजे के करीब पहुँच गया था। निर्मल और परमानन्द को देखकर वह भी अपने आँसू रोक नहीं पाया। परमानन्द ने उसकी पीठ थपथपा कर उसे चुप कराया। चुप होते ही वह बोला — ‘ताया जी, यह क्या हो गया? परसों रात को तो हम सारे दादी जी के साथ बैठे हँस—खेल रहे थे।'

‘बेटे, परसों तो ठीक है। कल रात भी माँ ने अपना खाना—वाना ठीक से खाया था। किसी तरह का रत्ती भर भी अंदेशा नहीं था कि इस घर में यह उनकी अंतिम रात होगी। लेकिन भगवान्‌ को यही मंजूर था। हम कर भी क्या सकते हैं!'

‘ताया जी, दादी जी भागों वाली थी जो इस तरह बिना कष्ट सहे या किसी को कोई कष्ट दिये भगवान्‌ को प्यारी हो गयी।'

‘बेटे, पंडित जी आ चुके हैं। अब तुम निर्मल के साथ मिलकर आगे की तैयारी करवाओ। ग्यारह बजे से लेट नहीं होना।'

जितेन्द्र निर्मल के पास आया। निर्मल ने उसे समझाया कि वह हलवाई के पास जाकर लगभग सौ लोगों के लिये खाने का कह आये और बारह बजे तक खाना अवश्य पहुँच जाये, देरी नहीं होनी चाहिये।

नियत समय पर घर से शवयात्रा ‘शिवपुरी धाम' के लिये चली। परमानन्द के सामाजिक गतिविधियों में भाग लेने के कारण बड़ी सँख्या में नगर के लोग शवयात्रा में सम्मिलित थे।

दाह—संस्कार करने के बाद जब घर लौटे तो हलवाई खाना लेकर पहुँच चुका था। निर्मल के मामा मोहन लाल तथा जुगल के साले देवेन्द्र ने आपस में सलाह कर परमानन्द को एक तरफ बुलाकर कहा — ‘बाबू परमानन्द जी, रिवायत के अनुसार खाना हमें बनवाना चाहिये था। क्योंकि समय नहीं था, आपने खाना मँगवा लिया है तो इसपर जो खर्च हुआ है, वह आप हमसे ले लें।'

‘मैं ऐसी रूढ़ियों को नहीं मानता। कभी ये रिवायतें ठीक रही होंगी, लेकिन अब इनका कोई औचित्य नहीं। बदलते समय के साथ बेकार के रीति—रिवाज़ों को छोड़ देने में ही समाज की भलाई है। पुराने समय में गाँवों में सारा गाँव एक बड़े परिचार की तरह होता था। सब के सुख—दुःख साँझे होते थे। इस तरह की दुःख की घड़ी में सारे गाँव में चुल्हा नहीं जलता था तो नज़दीकी सम्बन्धी घर वालों तथा आये हुए मेहमानों के लिये खाने का प्रबन्ध करते थे। अब समय बदल गया है। हर जगह साधन उपलब्ध हैं। देखो, ऐसे समय खाना इतने लोगों के लिये घर में तो बन नहीं सकता था, हलवाई को कहा और बन कर आ गया। आप भी इन पुराने रीति—रिवाज़ों को छोड़ो। आप तो इतना ही देख लेना कि बाहर से आया हुआ कोई व्यक्ति खाना खाये बिना न जाये।'

परमानन्द की दो—टूक बात सुनकर मोहन लाल और देवेन्द्र ने और आग्रह करना उचित नहीं समझा। खाना आदि के बाद अधिकतर सगे—सम्बन्ध्ी अपने—अपने ठिकानों को लौट गये। निर्मल को फुरसत में देखकर कमला ने डाक से आया जाह्नवी का दीवाली—कार्ड उसे दिया। उसने सरसरी नज़र डालकर कार्ड वापस कमला को देते हुए कहा — ‘मेरी अलमारी में रख दे।'

घर में बड़ा लड़का होने की वजह से निर्मल को ही गरुड़—पुराण की कथा के लिये कर्त्तव्य—निर्वहण करना पड़ा। जब तेरहवीं की तिथि तय करने की बात आई तो परमान्द ने कहा कि अगले रविवार को दस दिन हो जायेंगे, इसलिये रस्म—भोग और गरुड़—पुराण कथा की पूर्णाहूति रविवार को ही कर लेते हैं। परमानन्द के विचार में ऐसे कार्यक्रमों के तिथि—निर्धारण के समय बाहर से आने—जाने वालों की सुविधा का ध्यान रखना बहुत जरूरी है। अतः इसी के अनुसार उन्होंने अपने रिश्ते—नातेदारों को पत्र डालकर अथवा टेलिफोन करके सूचना दी। साथ ही परमानन्द यह लिखना या बताना भी नहीं भूला कि कोई भी सगा—सम्बन्धी पगड़ी के निमित्त तौलिया आदि लेकर न आये, क्योंकि पगड़ी का अर्थ होता है मृतक का उत्तराधिकारी नियुक्त करना। हमारे समाज में पुरुष से उत्तराधिकार अगली पीढ़ी को मिलता है, स्त्री से नहीं। इसलिये पगड़ी की रस्म का कोई औचित्य नहीं। कुछ लोगों ने दबी जुबान से इसका विरोध भी किया, किन्तु सभी जानते थे कि ऐसे मसलों में परमानन्द अपने मन की करता है, किसी और की नहीं सुनता।

निर्मल आया था चार दिन के लिये, लेकिन दादी के देहान्त के कारण लग गये पन्द्रह दिन। निर्मल ने इन दिनों में कई बार सोचा कि जाह्नवी को पत्र लिखूँ, परन्तु उसका मन इसके लिये तैयार नहीं हुआ। आखिर उसने चण्डीगढ़ जाने के बाद ही पत्र लिखने का निश्चय किया। रस्म—भोग के उपरान्त शाम तक सभी आगन्तुक वापस जा चुके थे। कई दिनों की गहमागहमी एकाएक निस्तब्ध्ता में परिवर्तित हो गयी। निर्मल बिना बिजली जलाये अपने कमरे में चारपाई पर लेटा हुआ था। कमला ने कमरे में कदम रखते हुए स्विच ऑन किया, देखा कि निर्मल कम्बल ओढ़े लेटा हुआ है तो पूछ लिया — ‘भइया, क्या बात, तबीयत ठीक नहीं है क्या?'

‘तबीयत तो ठीक है बहिना। बस थोड़ी थकावट थी, इसलिये लेट गया।......बाहर से आने वाले प्रत्येक व्यक्ति के चाय—पानी और खाने आदि का ख्याल रखने में सुबह से ही काफी भाग—दौड़ करनी पड़ी है ना।'

‘कहो तो चाय या कॉफी बना लाऊँ?'

‘हाँ, कॉफी बना लाओ।'

कमला कॉफी बना लाई। जब निर्मल ने कॉफी पी ली और कमला को लगा कि अब वह नॉर्मल है तो उसने पूछा — ‘भइया, दीवाली—कार्ड जिस लड़की का आया था, वह कौन है?'

‘वह! वह और मैं दिल्ली में कोचग में इकट्ठे थे।'

‘शिमला में रहती है वह?'

‘हाँ। वह एम.ए. हिन्दी में यूनिवर्सिटी में फर्स्ट आई है। बहुत इंटेलिजेंट लड़की है। आईएएस में पक्का आ जायेगी।'

‘मेरा भइया कौन—सा कम इंटेलिजेंट है? तुम भी पक्का आईएएस में आओगे। भइया, उसकी फोटो तो दिखाओ, देखूँ, कैसी है मेरी होने वाली ‘भाभी'?'

और कोई अवसर होता तो निर्मल ने उसकी चोटी खींचकर धौल जमा देना था, किन्तु आज उसने संजीदगी से कहा — ‘कमला, हमारे बीच ऐसा—वैसा कुछ नहीं है। वह अपने कॅरिअर को लेकर सीरियस है। दूसरे, वह बहुत सम्प परिवार से है।'

‘मैं नहीं मानती। जब आप दोनों आईएएस क्वालीपफाई कर जाओगे तो दोनों एक लेवल के हो जाओगे। दूसरे, अगर उसके दिल में कुछ है, तभी तो उसने आपको दीवाली—विश किया है।'

‘मैंने तो उस दिन के बाद कार्ड खोलकर भी नहीं देखा। चण्डीगढ़ जाकर धन्यवाद का पत्र लिखूँगा।'

‘और लिख देना कि मेरी बहिन तुमसे मिलने को बहुत आतुर है, क्योंकि उसको तुम्हारी हैंडराइटग बड़ी सुन्दर लगी है।'

‘अच्छा बाबा, सब लिख दूँगा, लेकिन इस बात को हवा देने की जरूरत नहीं, समझी?'

चेहरे पर हँसी बिखेरती और इठलाती हुई कमला ने ‘समझ गयी' कहा और सीढ़ियाँ उतर गयी।

रात को जुगल ने आकर निर्मल को बैठक में बुला लिया। निर्मल ने आते ही पूछा — ‘चाचाजी, आपने बुलाया, कुछ काम है मुझसे?'

‘हाँ बेटे। देखो, तुम, कमला, बन्टु, और नदी, मु एक ही वृक्ष की अलग—अलग टहनियों पर पैदा हुए हो, फिर भी कितना फर्क है? नदी और मु पढ़ाई में मन ही नहीं लगाते। उनका क्या बनेगा?'

‘चाचाजी, बुरा ना मनाना, एक बात कहूँ तो।'

‘नहीं बेटे, तेरी बात का बुरा क्यों मनाऊँगा। तू जो कहेगा, भले की बात ही कहेगा।'

‘चाचाजी, आपने तथा चाचीजी ने नदी और मु को शुरू से ज्यादा ही लाड़—प्यार में रखा है। उनकी नाजायज़ बातों पर भी उन्हें कभी रोका—टोका नहीं। बच्चों को लाड़—प्यार तो करना चाहिये, साथ ही उनकी गलत हरकतों के लिये डाँटना भी चाहिये। अब तो रात हो गयी है, कल सुबह मुझे चण्डीगढ़ जाना है। जब अगली बार आऊँगा तो फुरसत में बैठकर, उन्हें मैं अपने ढंग से समझाऊँगा। अच्छा चाचाजी, अब मुझे नींद आ रही है, आप भी आराम करें।'

इतना कह कर निर्मल अपने कमरे में जाने के लिये सीढ़ियाँ चढ़ गया।

***

***

Rate & Review

Verified icon

Imran Saiyed 2 weeks ago

Verified icon

Anami Indian 1 month ago

Verified icon

S Nagpal 2 months ago

Verified icon

रोचक एपिसोड ,हास्य-परिहासपूर्ण स्वाभाविक संवाद ,पात्रानुकूल भाषा, पंजाबी संस्कृति की सौंधी गन्ध। समग्र प्रभाव की दृष्टि से श्रेष्ठ ,कथावस्तु में कसावट ।शुभकामनाएं ।

Verified icon

Raj Kumar Singla 2 months ago

बहुत बढ़िया। लेखक को बधाई।